चुनाव या कोई अन्य इंकलाबी विकल्प – दूसरी किश्त

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इस ऑडियो द्वारा शहीद भगत सिंह विचार मंच ने भारत में होने वाले निरर्थक संसदीय ओर अन्य चुनावों के बारे में अपना नजरिया स्पष्ट करने की कोशिश की है. इस ऑडियो का हिंदी अनुवाद यहाँ दिया जा रहा है. ऑडियो की हूबहू नक़ल नहीं की गयी है लेकिन उसके मूल तत्त्व को सुरक्षित रखने की कोशिश की गयी है.

कश्मीर

अब हम बदल के बारे में कुछ ऐतिहासिक बातें करते हैं. चुनावों के बारे में कहा जाता है कि ये तो बहुत ज़रूरी हैं और चुनाव कभी लोकसभा के तो कभी विधानसभा या पंचायतो और मयुन्सिपलिटी के चुनाव. ऊपर से लेकर नीचे तक चुनावों का जाल बुना गया है. लेकिन हम देखते हैं कि इन पर अरबों-खरबों का खर्च होता है.पिछले दिनों, आपने देखा होगा कि बुर्जुआ पत्रकार किस प्रकार पांच सितारा होटलों में ठहरे होते हैं , और ये लोग इन नेताओं और सरकारों के खिलाफ लिखते हैं ! जाने-माने पत्रकार खुशवंत सिंह पूछते हैं कि इन पत्रकारों और अख़बारों में से कोई एक भी ऐसा है जो अपनी जेब से खर्च करता हो ! ये पत्रकार, उनसे आप वहां मिल ही नहीं सकते . इसके विपरीत जब हम इसके बदल की बात करते हैं तो  हम मजदूरों के प्रारंभिक, बेशक  अल्पकालीन ही सही लेकिन महत्त्वपूर्ण अनुभवों को देखते हैं.१८७१ के पेरिस कम्यून में हम देखते हैं कि उन्होंने सारी बुर्जुआ मशीनरी को हटा दिया और सारे काम-काज को स्वयं संभाल लिया. उस अस्थाई ढांचे जिसने कुछ दिन ही शासन किया, वहां एक मजदूर वर्ग का प्रतिनिधि  शासन करने के अलावा फैक्टरी में भी काम करता था और उसकी तनख्वाह एक औसत मजदूर से ज्यादा नहीं थी. इसी प्रकार सोवियतें जो सोवियत यूनियन में बनीं. सोवियतें हमारी संसद की तरह थी लेकिन तत्त्व रूप से बिलकुल भिन्न. हमारी संसद अपने आप में कोई शासक शक्ति नहीं है बल्कि राज्य की शक्ति के कुल जोड़ का एक हिस्सा है. इसके विपरीत सोवियतें कानून ही नहीं बनाती थीं बल्कि उन्हें लागू भी करती थीं. हमारी संसद की तरह नहीं कि कानून को लागू करने के लिए भारी-भरकम अफसरशाही रखी जाये. और अफसरशाही उसे लागू करने में बीस-बीस साल या इससे भी अधिक समय लगाए और लोग इंसाफ का इंतजार करते-करते मर जाएँ. बुर्जुआ राज्य के दिखाने के दांत कोई और होते हैं और खाने वाले कोई और. संसद बुर्जुआ के दिखाने के दांत हैं जबकि अफसरशाही इसके खाने के. चीन में कम्युनों की मिसाल लें. महान सांस्कृतिक क्रांति जो माओ की अगुआई में शुरू हुई थी, उसके अनुभवों को देखें. हालाँकि दुनिया भर के वाईट-कालर बुद्धिजीवी वर्ग और चीन के बुद्धिजीवियों का भी कहना था की माओ ‘पागल’ हो गए हैं. उन्होंने कहा था कि अब प्रोफेसर और बुद्धिजीवी पढ़ने-पढाने के अलावा खेतों और फैक्ट्रियों में काम भी करेंगे और मजदूर और किसान स्कूलों और विश्वविद्यालयों में पढायेंगे. कई वस्तुगत कारणों के अलावा यह भी एक कारण था कि बुद्धिजीवी वर्ग जो क्रांति के समय मजदूर और किसान के साथ था, अपनी मंजिल आते ही इस जनवादी क्रांति की बस से नीचे कूद  गया !

अब हमारी इस नयी संसद के गठन पर इन्होने नौकरियों के लिए कुछ फार्म भरवाने शुरू किये हैं लेकिन ये आने वाले पॉँच सालों में इन फार्मों को छेड़ेंगे नहीं. अगर कर्मचारियों की भरती की भी जायेगी तो मुट्ठीभर लोगों की. तो यह है हमारी संसदीय प्रणाली. अगर हम इस संसदीय प्रणाली में इस बुर्जुआ राज्य की शक्ति के कुल जोड़ के एक अंग ‘संसद’ में बहुमत प्राप्त भी कर लेते हैं, जैसा की संशोधनवादी और संसदमार्गी कम्युनिस्टों का मानना है – हालाँकि इस प्रकार की स्थिति में इसकी कोई गुंजाईश भी नहीं दीखती, तो भी मजदूर वर्ग अपने ऐज़ंडा कि पैदावार या उत्पादन के साधनों के  समाजीकरण के साथ-साथ इन्हें सांझी मलकीयत में बदला जाये, तो किस प्रकार केवल कानून बनाकर इसे लागू किया जा सकता है जबकि सत्ता का एक बहुत बड़ा हिस्सा जैसे सरकारी अफसरशाही, पुलिस, फौज और स्वयं पूंजीपति वर्ग अपने निजी दल-बल और हथियारों के साथ इसके विरोध में मर-मिटने को तैयार-बर तैयार बैठा है ? हमारी चुनाव प्रणाली एक पूरे धंधे में बदल चुकी है. एक मजदूर कभी करोड़पति नहीं बन सकता (कौन बनेगा करोड़पति और स्लमडोग मिल्लियानेरी के भ्रम को अपने दिमाग से निकाल दें)

दूसरी बात जिसका कि ऐतिहासिक महत्त्व है वह है पूंजीवादी चुनाव और पूंजीवादी दल. पूंजीवादी दलों और पूंजीवादी चुनाव प्रणाली पूंजीवाद के जन्म के साथ-साथ पैदा हुए, ये हमेशा से इसी तरह विद्यमान नहीं रहे हैं. पूंजीवादी चुनावों का महत्त्व पूंजीवादी प्रणाली के अन्दर और इसे इसी प्रकार बरक़रार रखने में ही है. इसमें पूंजीपति या उनके उम्मीदवार ही चुनें जाते हैं या फिर वे जो इसी प्रणाली के अन्दर के रेस के घोडे होते हैं. अब तो उन्होंने इसे भी बर्दाश्त करना बंद कर दिया है. मिसाल के लिए हमारे प्रधान मंत्री और गृहमंत्री जो पहले वित्तमंत्री रहे हैं या तो चुनाव लड़ते ही नहीं या फिर हार जाते हैं लेकिन अमेरिकन पूंजीवादी साम्राज्य के, जिनकी कि भारतीय बुर्जुआजी जूनियर पार्टनर है, विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी संस्थायों के इशारों पर सीधे नियुक्ति कर दी जाती है. इसके इलावा जातिवाद, धर्म, अल्पसंख्यक, बहुसंख्यक, संप्रदाय आदि के प्रतिक्रियावादी समीकरणों में इन चुनावों को देखा जाता है. इस प्रकार इसे इतना पीछे-खींचू देखा जाता है,जैसे मिसाल के लिए अगर ‘हजका’ वालों ने राय सिख को खडा कर दिया तो लोकदल वालों ने देखा कि उनका ऐसा उम्मीदवार हो जो सिख न हो, भुमनशाह के डेरे को भी मानता हो और सच्चे सौदे का भी उपासक हो, कम्बोज हो लेकिन सिख नहीं मोना हो, उसे ढूंढकर खडा कर दिया है. इस तरह का सर्च-वर्क किया जाता है. वे लोग जो महीनों से टिकट पाने के लिए मुशक्कत कर रहे थे, हाथ मलते रह गए हैं ! उन्होंने एक कम्बोज को जो सिख नहीं है और जिसकी कि आढ़त की दुकान है और जो कृषि-पूंजीपति है उसे टिकट थमा दी है क्योंकि वह पूँजी के लिहाज से अन्य पार्टियों के उम्मीदवारों से किसी भी प्रकार से छोटा नहीं है. तो यह है वह स्थिति जिसके की हम सभी चश्मदीद गवाह हैं.

दूसरी और अपने उम्मीदवार जो चुंने जाते हैं. इस प्रकार की तो कोई बात नहीं है कि वर्तमान में हमारी ये बुर्जुआ पंचायते जो केवल बुर्जुआ वर्ग के हितों की रक्षा के लिए गठित की जाती हैं, हमारे सपने का हिस्सा हों. जिस प्रकार हम देखतें हैं की भगत सिंह का सपना सोवियतों की तर्ज़ पर पंचायतो के निर्माण का सपना था. अब सोवियतें क्या थीं ? जब हम कहते हैं की सारी सत्ता सोवियतों को? सोवियतों और पार्लियमैन्ट में क्या फर्क है? पंचायतो के निर्माण का सपना तो महात्मा गाँधी का भी था. लेकिन वह इसे वर्तमान और भविष्य के लिए नहीं देखता था बल्कि भारत के तथाकथित गौरवशाली अतीत की अन्धगली में छलांग लगा देता था. समाजवाद में सोवियत होगी इसके उल्ट की पार्लियमैन्ट हो. पार्लियमैन्ट क्या है ? यह कानून बनाती है जिसे इसे लागू करने का हक़ नहीं होता. इसे लागू करती है नौकरशाही जो जैसा कि हमने जिक्र किया, इसे लागू करने में बीस-बीस वर्ष लगा देती है. यह नौकरशाही ही इसके असली और खाने के दाँत होते हैं. अब मान लीजिये कि हमारी न्यायव्यवस्था में कोई व्यक्ति किसी मुकद्दमें में जीत भी जाता है तो नौकरशाही उसकी मदद तब ही करती है जब वह अपने विरोधी पक्ष से पूँजी के मामले में अधिक शक्तिशाली होता है.

बाकी हिस्सा अगली किश्त भारत के गाँव-गाँव तक पैठ कर चुकी बुर्जुआजी

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