आजाद हिन्‍दुस्‍तान के बारे में कुछ कवियों-शायरों की नज़्मों-कविताओं के अंश

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अगस्‍त 1947 में आज़ादी मिलने के कुछ ही समय बाद मशहूर शायर फैज़ अहमद फैज़ ने इस आज़ादी को ‘दाग-दाग उज़ाला’ कहा। उन्‍होंने कहा :

ये दाग़-दाग़ उज़ाला, ये शबगुज़ीदा सहर

वो इन्‍तज़ार था जिसका, ये वो सहर तो नहीं

ये वो सहर तो नहीं, जिसकी आरजू लेकर

चले थे यार कि मिल जायेगी कहीं न कहीं

फ़लक के दश्‍त में तारों की आख़री मंज़ि‍ल

कहीं तो होगा शबे सुस्‍त मौज का साहिल

कहीं तो जा के रुकेगा, सफ़ीन-ए-ग़मे-दिल……….

अली सरदार जाफ़री ने इस आजादी के बारे में लिखा :

कौन आज़ाद हुआ

किसके माथे से ग़ुलामी की सियाही छूटी

मेरे सीने में अभी दर्द है महकूमी का

मादरे-हिन्‍द के चेहरे पे उदासी वही

कौन आज़ाद हुआ…

खंजर आज़ाद है सीनों में उतरने के लिए

मौत आज़ाद है लाशों पे गुज़रने के लिए

कौन आज़ाद हुआ…

जब आज़ाद भारत की सरकार ने हकों-अधिकारों की बात करने वालों और जनांदोलनों को कुचलने में अंग्रेजों को भी मात देनी शुरु कर दी, तो शंकर शैलेन्‍द्र ने लिखा :

भगतसिंह इस बार न लेना

काया भारतवासी की

देशभक्ति के लिए आज भी

सज़ा मिलेगी फांसी की

आजादी को सिरे से नकारते हुए इप्‍टा ने आम लोगों की आवाज को अल्‍फाज़ दिए :

तोड़ो बंधन तोड़ो

ये अन्‍याय के बंधन

तोड़ो बंधन तोड़ो बंधन तोड़ो बंधन तोड़ो…

हम क्‍या जानें भारत भी में भी आया है स्‍वराज

ओ भइया आया है स्‍वराज

आज भी हम भूखे-नंगे हैं आज भी हम मोहताज

ओ भइया आज भी हम मोहताज

रोटी मांगे तो खायें हम लाठी-गोली आज

थैलीशाहों की ठोकर में सारे देश की लाज

ऐ मज़दूर और किसानो, ऐ दुखियारे इन्‍सानों

ऐ छात्रो और जवानो, ऐ दुखियारे इन्‍सानों

झूठी आशा छोड़ो…

तोड़ो बंधन तोड़ा…

ख़लीलुर्रहमान आज़मी ने आज़ादी मिलने के दावे को सिरे से नकार दिया।

अभी वही है निज़ामे कोहना अभी तो जुल्‍मो सितम वही है

अभी मैं किस तरह मुस्‍कराऊं अभी रंजो अलम वही है

नये ग़ुलामो अभी तो हाथों में है वही कास-ए-गदाई

अभी तो ग़ैरों का आसरा है अभी तो रस्‍मो करम वही है

अभी कहां खुल सका है पर्दा अभी कहां तुम हुए हो उरियां

अभी तो रहबर बने हुए हो अभी तुम्‍हारा भरम वही है

अभी तो जम्‍हूरियत के साये में आमरीयत पनप रही है

हवस के हाथों में अब भी कानून का पुराना कलम वही है

मैं कैसे मानूं कि इन खुदाओं की बंदगी का तिलिस्‍म टूटा

अभी वही पीरे-मैकदा है अभी तो शेखो-हरम वही है

अभी वही है उदास राहें वही हैं तरसी हुई निगाहें

सहर के पैगम्‍बरों से कह दो यहां अभी शामे-ग़म वही है

व्‍यंग्‍य कई बार भावनाओं-भावावेशों का अतिरेक तथा सांद्रतम गंभीरता की अभिव्‍यक्ति भी होती है। रघुवीर सहाय ने जन-गण-मन के ‘अधिनायक’ के बारे में कहा :

राष्‍ट्रगीत में भला कौन वह

भारत भाग्‍य विधाता है

फटा सुथन्‍ना पहने जिसका

गुन हरचरना गाता है।

मखमल टमटम बल्‍लम तुरही

पगड़ी छत्र चंवर के साथ

तोप छुड़ाकर ढोल बजाकर

जय-जय कौन कराता है।

पूरब पच्छिम से आते हैं

नंगे-बूचे नरकंकाल

सिंहासन पर बैठा, उने

तमगे कौन लगाता है।

कौन-कौन है वह जन-गण-मन

अधिनायक वह महाबली

डरा हुआ मन बेमन जिसका

बाजा रोज बजाता है।

विष्‍णु नागर ने तो राष्‍ट्रगीत की वैधता पर ही सवाल खड़ा कर दिया :

जन-गण-मन अधिनायक जय हे

जय हे, जय हे, जय जय हे

जय-जय, जय-जय, जय-जय-जय

जय-जय, जय-जय, जय-जय-जय

हे-हे, हे-हे, हे-हे, हे-हे, हे

हें-हें, हें-हें, हें-हें, हें

हा-हा, ही-ही, हू-हू है

हे-है, हो-हौ, ह-ह, है

हो-हो, हो-हो, हो-हौ है

याहू-याहू, याहू-याहू, याहू है

चाहे कोई मुझे जंगली कहे।

तो क्‍या लाखों शहीदों की शहादतें बेकार गईं। नहीं, शहादतों ने हमें एक मुकाम तक पहुंचाया, और अब ये शहादतें आगामी संघर्ष-पथ पर हमारे लिए प्रेरणा-स्रोत है। शलभ श्रीराम सिंह ने लिखा :

तसल्लियों के इतने साल बाद अपने हाल पर

निगाह डाल, सोच और सोचकर सवाल कर

किधर गये वो वायदे? सुखों के ख्‍वाब क्‍या हुए?

तुझे था जिनका इंतज़ार वो जवाब क्‍या हुए?

तू इनकी झूठी बात पर, न और ऐतबार कर

कि तुझको सांस-सांस का सही हिसाब चाहिए!

घिरे हैं हम सवाल से हमें जवाब चाहिए!

जवाब दर सवाल है कि इंक़लाब चाहिए!

अंत में, शहीदों की ओर से

शहादत थी हमारी इसलिए

कि आज़ादियों का बढ़ता हुआ सफीना

रुके न पल भर को!

पर ये क्‍या?

ये अंधेरा!

ये कारवां रुका क्‍यों है?

बढ़े चलो, अभी तो

काफिला-ए-इंक़लाब को

आगे, बहुत आगे जाना है!

दोस्‍तो, 1947 का ‘दाग़-दाग़ उज़ाला’ अब गहरे अंधेरे में तब्‍दील हो चुका है। हम सभी इस बात को जानते तो हैं, पर पता नहीं महसूस कितना करते हैं। खैर, अब भी अगर कोई आजादी की शुभकामनाएं दे, तो उसके लिए पेश है नागार्जुन की कविता :

किसकी है जनवरी, किसका अगस्‍त है?

कौन यहां सुखी है, कौन यहां मस्‍त है?

सेठ है, शोषक है, नामी गला-काटू है

गालियां भी सुनता है, भारी थूक-चाटू है

चोर है, डाकू है, झूठा-मक्‍कार है

कातिल है, छलिया है, लुच्‍चा-लबार है

जैसे भी टिकट मिला

जहां भी टिकट मिला

शासन के घोड़े पर वह भी सवार है

उसी की जनवरी छब्‍बीस

उसीका पन्‍द्रह अगस्‍त है

बाकी सब दुखी है, बाकी सब पस्‍त है…

कौन है खिला-खिला, बुझा-बुझा कौन है

कौन है बुलंद आज, कौन आज मस्‍त है?

खिला-खिला सेठ है, श्रमिक है बुझा-बुझा

मालिक बुलंद है, कुली-मजूर पस्‍त है

सेठ यहां सुखी है, सेठ यहां मस्‍त है

उसकी है जनवरी, उसी का अगस्‍त है

पटना है, दिल्‍ली है, वहीं सब जुगाड़ है

मेला है, ठेला है, भारी भीड़-भाड़ है

फ्रिज है, सोफा है, बिजली का झाड़ है

फैशन की ओट है, सबकुछ उघाड़ है

पब्लिक की पीठ पर बजट का पहाड़ है

गिन लो जी, गिन लो, गिन लो जी, गिन लो

मास्‍टर की छाती में कै ठो हाड़ है!

गिन लो जी, गिन लो, गिन लो जी, गिन लो

मज़दूर की छाती में कै ठो हाड़ है!

गिन लो जी, गिन लो, गिन लो जी, गिन लो

घरनी की छाती में कै ठो हाड़ है!

गिन लो जी, गिन लो, गिन लो जी, गिन लो

बच्‍चे की छाती में कै ठो हाड़ है!

देख लो जी, देख लो, देख लो जी, देख लो

पब्लिक की पीठ पर बजट का पहाड़ है!

मेला है, ठेला है, भारी भीड़-भाड़ है

पटना है, दिल्‍ली है, वहीं सब जुगाड़ है

फ्रिज है, सोफा है, बिजली का झाड़ है

फैशन की ओट है, सबकुछ उघाड़ है

महल आबाद है, झोपड़ी उजाड़ है

ग़रीबों की बस्‍ती में उखाड़ है, पछाड़ है

धत् तेरी, धत् तेरी, कुच्‍छों नहीं! कुच्‍छों नहीं

ताड़ का तिल है, तिल का ताड़ है

ताड़ के पत्‍ते हैं, पत्‍तों के पंखे हैं

पंखों की ओट है, पंखों की आड़ है

कुच्‍छों नहीं, कुच्‍छों नहीं…

ताड़ का तिल है, तिल का ताड़ है

पब्लिक की पीठ पर बजट का पहाड़ है!

किसकी है जनवरी, किसका अगस्‍त है!

कौन यहां सुखी है, कौन यहां मस्‍त है!

सेठ ही सुखी है, सेठ ही मस्‍त है

मंत्री ही सुखी है, मंत्री ही मस्‍त है

उसी की है जनवरी, उसी का अगस्‍त है…

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6 thoughts on “आजाद हिन्‍दुस्‍तान के बारे में कुछ कवियों-शायरों की नज़्मों-कविताओं के अंश

    mahendra mishra said:
    August 16, 2009 at 10:08 PM

    बढ़िया प्रस्तुति. धन्यवाद.

    amar jyoti said:
    August 17, 2009 at 11:15 PM

    वो सुबह कभी तो आयेगी!

    loksangharsha said:
    August 18, 2009 at 7:26 AM

    nice

    Shaheed Bhagat Singh Vichar Manch, Santnagar responded:
    August 19, 2009 at 7:36 AM

    मंच के एक साथी की गलती से ये कवितायेँ http://dayitvbodh.wordpress.com/ पर लग गयी जबकि ‘मंच’ की ओर से इस ब्लॉग पर नियमित काम करने का कोई कार्यक्रम नहीं है. वर्डप्रेस पर इसे उस वक्त सुरक्षित किया गया था जब ‘उन बुद्धिजीवियों की पत्रिका है जिन्होंने जनता का पक्ष चुना है – दायित्वबोध’ http://dayitvabodh.googlepages.com/ पर नहीं थी. जल्दी ही इसके मुख्य प्रकाशनों की पीडीऍफ़ फाइल्स को अदारा ‘दायित्वबोध’ ने ऑनलाइन कर दिया था.

    गलती यह हुई कि इसे वर्डप्रेस पर मिटाया नहीं गया. जिस साथी को इन संकलित कवितायों को https://samajvad.wordpress.com/ पर प्रकाशित करने की जिम्मेदारी सौंपी गयी थी वे नियमित रूप से प्रकाशन का कार्य नहीं करते हैं जिससे हुआ यह कि login होते ही वे डैशबोर्ड पर ‘समाजवाद’ की बजाय ‘दायित्वबोध’ पर चले गए और उन्होंने इन कवितायों को प्रकाशित कर दिया.

    लेकिन आप सभी ने इन कवितायों को सराहा, मंच आप सभी का शुक्रिया अदा करता है और भविष्य में अधिक सजगता का वादा करता है.

    आप की टिप्पणियों को https://samajvad.wordpress.com/ पर प्रकाशित किया जा रहा है .

    islamicwebdunia
    islamicwebdunia.com
    response@islamicwebdunia.com
    115.240.146.197
    Submitted on 2009/08/18 at 10:24pm

    आपका ब्लॉग अच्छा लगा
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    response@islamicwebdunia.com
    islamicwebdunia
    http://www.islamicwebdunia.com
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    आजाद हिन्‍दुस्‍तान के बारे में कुछ कवियों-शायरों की नज़्मों-कविताओं के अंश
    0 #
    Vikas
    filhaalitnahi.blogspot.com
    urfriendlyneighbour.v@gmail.com
    125.20.67.2
    Submitted on 2009/08/18 at 1:46pm

    sahi kaha,

    hamne aazadi to payi, par uski kimat nahi pehchani,
    aazadi pa lene bhar se sirf, kaam khatam nahi ho jata, aazadi maangi thi hamne aam janta ke adhikaro ke liye, par aaz desh ki halat aisi hai ke hame apno ne hi gulam bana liya.

    Pehle videshi saudagauo ne raaz kiya,
    ab apne hi saudagar ban gaye hai,

    azi tabhi to kisi ne kaha hai,

    “जब सौदागर हो राजा
    तो प्रजा का बजेगा बाजा “
    sahi kaha, hamne aazadi to payi, par uski kimat nahi pehchani, aazadi pa lene bhar se sirf, kaam khatam nahi ho jata, aazadi maangi thi hamne aam janta ke adhikaro ke liye, par aaz desh ki halat aisi hai ke hame apno ne hi gulam bana liya. Pehle videshi saudagauo ne raaz kiya, ab apne hi saudagar ban gaye hai, azi tabhi to kisi ne kaha hai, “जब सौदागर हो राजा तो प्रजा का बजेगा बाजा ”
    urfriendlyneighbour.v@gmail.com
    Vikas
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    आजाद हिन्‍दुस्‍तान के बारे में कुछ कवियों-शायरों की नज़्मों-कविताओं के अंश
    0 #
    gargi
    feelings44ever.blogspot.com
    gargiji2008@gmail.com
    122.163.177.45
    Submitted on 2009/08/18 at 1:37pm

    आप की रचना प्रशंसा के योग्य है . आशा है आप अपने विचारो से हिंदी जगत को बहुत आगे ले जायंगे
    लिखते रहिये
    चिटठा जगत मे आप का स्वागत है
    गार्गी
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    gargiji2008@gmail.com
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    Hello Mithilaa
    hellomithilaa.blogspot.com
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    61.246.178.36
    Submitted on 2009/08/18 at 11:00am

    Bahut Barhia…Isi Tarah likhte rahiye…

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    Mithilak Gap… Maithili Me

    http://mastgaane.blogspot.com
    Manpasand Gaane

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    Aapke Bheje Photo
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    dr.bhoopendra
    jeevansandarbh.blogspot.com
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    Submitted on 2009/08/18 at 12:49am

    appriciation is a small word for u.it must be replicated,we are thankful and obliged for yr efforts.
    regards.
    yours ,
    dr.bhoopendra
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    dr.bhoopendra
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    Submitted on 2009/08/18 at 12:47am

    excellent collection ,must be replicated and followed.
    my regards and thanks as well.kindly keep writing.
    thankfully yours ,
    dr.bhoopendra
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    About
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    समय
    main-samay-hoon.blogspot.com/
    mainsamayhoon@gmail.com
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    Submitted on 2009/08/17 at 10:59pm

    मुआफ़ी की दरख़वास्त है..हा..हा…हा…हाआ

    बाकी गीतों और रचनाओं से तो कई बार गुजरना हुआ।
    परंतु…यह विष्णु नागर जी का गीत।
    उफ़!!
    हँसते-हँसते पेट में बल पड गये।
    इसे गाकर देखा तो ज़्यादा मज़ा आया।

    वाकई में मुआफ़ कीजिएगा, पर ऐसा हुआ, समय अब क्या करता।
    मुआफ़ी की दरख़वास्त है..हा..हा…हा…हाआ बाकी गीतों और रचनाओं से तो कई बार गुजरना हुआ। परंतु…यह विष्णु नागर जी का गीत। उफ़!! हँसते-हँसते पेट में बल पड गये। इसे गाकर देखा तो ज़्यादा मज़ा आया। वाकई में मुआफ़ कीजिएगा, पर ऐसा हुआ, समय अब क्या करता।
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    आजाद हिन्‍दुस्‍तान के बारे में कुछ कवियों-शायरों की नज़्मों-कविताओं के अंश
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    रवि कुमार, रावतभाटा
    ravikumarswarnkar.wordpress.com
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    Submitted on 2009/08/17 at 10:38pm

    एक और भाई जी,
    अच्छा लगा…

    एक साथ इतने लोकप्रिय गीतों को देखकर मन में हलचल मच गई….

    शुक्रिया…
    एक और भाई जी, अच्छा लगा… एक साथ इतने लोकप्रिय गीतों को देखकर मन में हलचल मच गई…. शुक्रिया…
    ravikumarswarnkar@gmail.com
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    vipin goyal
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    viping19@gmail.com
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    Submitted on 2009/08/17 at 10:07pm

    good thinking
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    buntu dhatiyan said:
    September 21, 2009 at 10:34 PM

    aap itihas ki 2oo saal purani jail men sad rahe hain. mukti ke kisi bhi darshan ka har kaal men naye chor aur naye sandharbh men sandhaan kiya jaata hai. coms, aap bas apne jaise logon se baat karna chahte hain. badlaav sirf aapki bahaduri se nahi hone wala. jis loktantra ko aap latiya rahe hain usse bahuta ka bhala hua hai. dukh is baat ka hai ki aap bahut saare damdaar aur swapjeevi logon ko hamesha ki tarah bharmatae rahego. yaad rakhiye duniya ko badalne wale log aur bhi hain. aap bahut sthool kism ke tark dete hain jinse mutmain hone mushkil hain.
    saadar
    buntu dhatiyan

    Shaheed Bhagat Singh Vichar Manch, Santnagar responded:
    September 22, 2009 at 7:20 AM

    इसमें कोई शक नहीं कि इस लोकतंत्र ने बहुत लोगों का भला किया है. पंद्रह-बीस करोड़ लोग बहुत लोग ही होते हैं. लेकिन जो बाकि ८४ करोड़ लोग हैं वे भी कम लोग नहीं हैं.

    आप ने कहा हम अपने जैसे लोगों से से बात करना चाहते हैं. हम इसे स्वीकार करते हैं क्योंकि मार्क्सवाद मेहनतकश लोगों की मुक्ति का फलसफा है जो परजीवी लोगों के पक्ष में नहीं है. लेकिन लंबे समय में यह उनकी मुक्ति का भी फलसफा सिद्ध होगा क्योंकि पूंजीपति जो पूँजी का गुलाम होता है उसकी मुक्ति भी इसमें निहित है. मार्क्सवाद हमारे दिमाग से निकला हुआ कोई महान विचार नहीं है बल्कि यह पूंजीवादी समाज की आन्तरिक विसंगतियों के कारण गतिशील सामाजिक शक्तियों के कारण ही सार्थक है.

    आपने ठीक कहा कि काम हमारी बहादुरी से नहीं होने वाला. लेकिन आपने यह बात गंभीर दार्शनिक लिहाज से नहीं कही है. अनजाने में ही आप के मुहं से निकल गयी. लेकिन है यह सच. बदलाव मेहनतकश लोग करेंगे हम नहीं. इस ८४ करोड़ आबादी में से ही इसके हिरावल पैदा होंगे जो समाज से ही सीखेंगे और बदले में इसी समाज की अगुआई द्वारा अपने कर्ज का भुगतान करेंगे.

    आप पूंजीवाद की मरणासन्न स्थिति को नहीं देख पा रहे हैं. पूंजीवाद का वर्तमान स्वरूप जिसमें पूँजी का केवल १० प्रतिशत भाग ही उत्पादन कार्यों में लगा है बाकि ९० फीसदी गैर उत्पादक कार्यों जैसे सट्टा, स्टॉक-मार्केट , सेवायों आदि में सक्रीय है. आप को पता नहीं है कि १९९१ में सरकारी आंकडों के अनुसार देश के उत्पादन में श्रम शक्ति का हिस्सा १०० रुपये में से २३ रुपये था जो कि अब ६ रुपये ही रह गया. पूंजीपतियों का माल इस ६ रुपये में बिकता नहीं है. पूंजीवाद महामंदी के असाध्य रोग में उलझा हुआ है. इससे निकलने के लिए वह युद्ध जैसी स्थिति अपनाने से भी नहीं झिझकता क्योंकि इससे उत्पादक शक्तियों का नाश होता है और फिर इसके पुनर्निर्माण द्वारा इसकी मंदी दूर होती है.

    थोडा पढने-पढाने का काम भी करा कीजिये. केवल भावुकतावश लिखी टिपण्णी से किसी को कोई फायदा नहीं होने वाला.

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