सर्वहारा और कानून का सम्मान

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29.  ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ पर डेविड रियाजानोव

की व्याख्यात्मक टिप्पणियां

निजी संपत्ति समस्त पूंजीवादी समाज की आधारशीला है. न्याय और समानता के नाम पर बुर्जुआ ने इसे सामंतवाद की बेडियों से, एकाधिकार से और विशेषाधिकार से मुक्ति दिलाई. यह निर्दोष और सहज दिखनेवाली निजी सम्पति पूंजीवादी विकास के नियमों के कारण पूंजीवादी निजी संपत्ति में धीरे-धीरे तब्दील होने लगी अर्थात संपत्ति ने ऐसा रूप धारण किया जिसका अस्तित्व निजी संपत्ति से वंचित व्यक्तियों की संख्या में वृद्धि पर निर्भर था. निजी संपत्ति की पवित्रता और अनुल्लंघनियता पर बुर्जुआ जितना अधिक संभ्रम फैलाता है, उसी व्यग्रता से वह इसे छोटे व्यापारी, कारीगर और किसान से छीनता जाता है. इस प्रकार वह उन्हें निजी संपत्ति से वंचित जन-साधारण अर्थात सर्वहारा में परिवर्तित  कर देता है. निजी संपत्ति के ध्वंस की मांग प्रस्तुत करके सर्वहारा मात्र उस वस्तु का ध्वंस चाहते हैं जो उनके लिए नष्ट हो चुकी है — वह चीज जिसका अभाव उनकी मौलिक अभिलाक्षणिकता है. सर्वहारा पुरानी व्यवस्था के विघटन से, मध्य वर्गों विशेषकर इनके निम्न संस्तर के क्षय से उद्भूत व्यक्तियों का समूह है. सर्वहारा की ऐतिहासिक भूमिका के बारे में अपनी नयी अवधारणा का प्रतिपादन करते हुए मार्क्स लिखते हैं,

“हीगेल के न्याय-दर्शन की आलोचना करते हुए यदि सर्वहारा पूर्ववर्ती सामाजिक व्यवस्था के विघटन की घोषणा  करता है, तो वह मात्र अपने अस्तित्व के रहस्य को प्रकट कर रहा है क्योंकि वास्तव में उस व्यवस्था के विघटन से उसका जन्म हुआ है. सर्वहारा निजी संपत्ति के निषेध की मांग करता है तो वह महज़ एक ऐसी चीज को समाज के सिद्धांत का दर्जा दे रहा है जिसे समाज ने पहले से ही अपना सिद्धांत बना रखा है, जोकि सर्वहारा के रूप में, उसके सहयोग के बिना ही, समाज का एक नकारात्मक परिणाम बन गया है.”

पूंजीवादी व्यवस्था ने निजी सम्पत्ति की सुरक्षा के लिए कानून बनाये हैं. पूंजीवादी विकास के दौरान ये तथ्य और अधिक स्पष्ट हो गया है कि ये कानून संपत्ति की सुरक्षा कर पाने में अक्षम साबित होते हैं चाहे उनका बहुत सावधानी से विस्तृत प्रतिपादन ही क्यों न किया गया हो. जहाँ तक मेहनतकशों का सम्बन्ध है, इन कानूनों को इसलिए बनाया जाता है ताकि उनकी निजी संपत्ति पर हमला करने से रोका जा सके. केवल कड़े संघर्ष और कई लोगों की कुर्बानियों के बाद सर्वहारा को अपनी एकमात्र संपत्ति अर्थात श्रमशक्ति के लिए कुछ कानूनी सुरक्षा हासिल हुई है. मेहनतकशों के निरंतर संघर्ष के बाद ही ऐसे कानून बनाये गए जो उनकी श्रमशक्ति को पूंजीपतियों के निर्मम शोषण से बचाते थे. इंग्लैंड में मजदूर वर्ग की स्थिति को चित्रित करने वाली अपनी पुस्तक में एंगेल्स ने इन बुर्जुआ कानूनों पर मेहनतकशों के रुख, इन कानूनों के प्रति उनमें सम्मान के अभाव आदि का उत्कृष्ट चित्र प्रस्तुत किया है.

“कानून बुर्जुआ द्वारा गढा जाता है, उसकी सहमति से पारित किया जाता है और बुर्जुआ के लाभ और उसकी सुरक्षा के लिए तत्पर रहता है इसलिए बुर्जुआ की नज़र में कानून एक पवित्र चीज है. बुर्जुआ अच्छी तरह जानता है कि कोई कानून विशेष उसके किसी सदस्य के लिए हानिकारक हो सकता है लेकिन आमतौर पर कानून-संहिता बुर्जुआ के समग्र हितों की रक्षा करती है. केवल यही बात नहीं है. कानून की पवित्रता, प्रतिष्ठित संस्थाओं की अनुल्लंघनीयता जो समाज के एक हिस्से के सक्रिय संकल्प से स्थापित की जाती है और समाज के दूसरे हिस्से द्वारा निश्चेस्ट रूप से स्वीकार की जाती है –समाज में बुर्जुआ की अवस्थिति इन अमूर्त रूपों के सर्वाधिक ठोस आधार पर निर्भर करती है. अंग्रेज बुर्जुआ के लिए कानून एक पवित्र चीज है क्योंकि वह उसका प्रतिबिम्ब और उसके समान है ठीक उसी तरह जिस तरह ईश्वर उसका प्रतिबिम्ब और उसके समान है. यही वजह है कि पुलिस का डंडा (जो वास्तव में उसका अपना डंडा है) उसके मन को बहुत सकून देता है. लेकिन मजदूर को इसमें कोई पवित्रता नज़र नहीं आती है. कठोर अनुभव ने उसे सिखा दिया है कि कानून डोरियों से बना जाल है जिसे बुर्जुआ उसके लिए बुनता है. इसलिए परिस्थितियां उसे बाध्य न कर दें, मजदूर कानून की सहायता कभी नहीं मांगता है…”(एंगेल्स, द कन्डीशन ऑफ़ द वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड, क्वेल्व का अनुवाद पृ. 227)

“क्या संपत्तिहीन के लिए चोरी से परहेज़ करने का प्रयाप्त आधार मौजूद रहता है? निसंदेह ‘संपत्ति की पवित्रता’ मुहावरा बहुत सुन्दर लगता है और बुर्जुआ के कानों को बहुत मधुर लगता है. लेकिन सम्पत्तिहीन के लिए संपत्ति को पवित्र समझना बहुत मुश्किल है. इस दुनिया ने मुद्रा को भगवन बना दिया है. बुर्जुआ सर्वहारा को धन से वंचित रखता है और इस प्रकार उसे मोटे तौर पर नास्तिक बना देता है. तब क्या हमें इस बात से हैरानी होनी चाहिए कि सर्वहारा अपनी नास्तिकता स्वीकार करता है और कि इस दुनिया के भगवान की शक्ति और पवित्रता पर उसकी श्रद्धा समाप्त हो गयी है? जब सर्वहारा वर्ग की गरीबी इस हद तक बढ़ जाती है कि जीवन की मूलभूत ज़रूरतों की पूर्ति का पूर्ण अभाव हो जाये, जब भूखमरी और कंगालीकरण तेजी से फैलने लगे तब मौजूद सामाजिक व्यवस्था के कानून की अवहेलना की सम्भावना बहुत बढ़ जाती है.” (एंगेल्स, द कन्डीशन ऑफ़ द वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड, पृ. 115)

बड़े पैमाने के उद्योग की विकास प्रक्रिया और इसके फलस्वरूप शहरों में आबादी के बड़े हिस्से में जमावडे के कारण मजदूरों की समग्र मानसिकता बदल जाती है. जब मजदूर सामूहिक उद्देश्य की प्राप्ति के लिए संगठित होता है तब उसे अपनी वर्ग स्थिति की जानकारी होती है. उसे यह मालूम हो जाता है कि एक-दूसरे से अलग रहने पर  वह कमज़ोर हो जाता है लेकिन एक साथ हो  जाने से वह ताक़तवर हो जाता है. उसे बुर्जुआ से अपने विभेद का तीव्र अहसास होने लगता है. तब वह अपने बारे में सोचने लगता है, उसका अपना दृष्टिकोण विकसित होने लगता है, उसकी स्थिति के अनुकूल विचार और दृष्टिकोण पनपने लगते हैं. तब उसे अपनी गुलामों जैसी स्थिति का भान होता है और धीरे-धीरे राजनीतिक और सामाजिक घटनाओं की समझ विकसित होने लगती है. पुराने पितृसत्तात्मक सम्बन्ध बड़ी चतुराई से मेहनतकश की गुलामी पर पर्दा डाल देते थे और बौद्धिक दृष्टिकोण से मेहनतकश अपने हितों से अनभिज्ञ और सामान्य ज्ञान से वंचित निर्जीव वस्तु-सा था. जब मालिक और कारिंदे के बीच का एकमात्र सम्बन्ध सिर्फ इस सम्बन्ध से लाभ निचोड़ने में मालिक का व्यक्तिगत हित ही है, जब सारी हमदर्दी ख़त्म हो गयी और उसका कोई निशान शेष न बचा — तभी मेहनतकश को अपनी स्थिति और अपने हितों की चेतना हुई और उसका बौद्धिक पुनर्जन्म हुआ. तभी उसने संवेदना, विचार और उद्यम के क्षेत्र में मालिक का अनुसरण करना बंद कर दिया.

बुर्जुआ वर्ग और उसके बीच रहने वाले मजदूरों के बीच समानता के सापेक्ष बुर्जुआ और विश्व के पिछडे राष्ट्रों के बीच साम्य अधिक है. मजदूर अलग बोली बोलता है. मजदूर और बुर्जुआ के विचार और कल्पनाएँ परस्पर विरोधी होती हैं. उनकी आदतें, नैतिक सिद्धांत, धार्मिक और राजनीतिक दृष्टिकोण एकदम भिन्न होते हैं. बुर्जुआ और सर्वहारा पृथक राष्ट्र होते हैं. वे एक दूसरे से इतना अलग होते हैं कि उन्हें दो प्रजातियाँ कहा जा सकता है. डिज़रायली का उपन्यास ‘सिबिल, ऑर द टू नेशन्ज़‘ की रचना 1845 में की गयी थी. उसी समय यानि कम्युनिस्ट घोषणापत्र के प्रकाशन के तीन साल से भी कम समय पहले अँग्रेज़ मजदूर वर्ग की स्थिति पर एंगेल्स की पुस्तक की रचना की गयी थी. डिज़रायली ने पुरानी पारिभाषिक शब्दावली का प्रयोग किया था और अपने पाठकों को बताया था कि “अमीर” और ‘गरीब” ही दो राष्ट्र होते हैं. लेकिन अब हम बाखूबी समझ सकते हैं कि बुर्जुआ और सर्वहारा के बीच चौडी होती जा रही खाई, मानसिक और शारीरिक दोनों किस्म की, ने नौजवान अनुदार राजनीतिक को बहुत प्रभावित किया था.

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2 thoughts on “सर्वहारा और कानून का सम्मान

    Ratan Singh said:
    June 24, 2009 at 6:13 AM

    अब ये व्याख्यान सिर्फ किताबों व गोष्ठियों तक ही सिमित है व्यवहार में नहीं | बंगाल में देख लीजिए पूंजीवाद व सामन्तवाद का खात्मा करने वाली माकपा का काडर खुद नए सामंत बन गए | और बंगाल में माकपा काडर द्वारा कानून का कितना सम्मान किया गया उसका नमूना नंदीग्राम में दिख चूका है और अब लालगढ़ में देखा जा सकता है |

    इस विचारधारा की हालत हम सोवियत रूस में देख चुके है | चीन में भी कमुनिस्ट सिर्फ नाम के है उन्होंने भी पूंजीवाद ही अपना रखा है ये विचार धारा क्रांति लाने तक तो ठीक है वर्तमान समय में शासन के लिए उपयुक्त नहीं |

    दिनेशराय द्विवेदी said:
    June 24, 2009 at 7:46 AM

    डेविड रियाजानोव की टिप्पणियाँ महत्वपूर्ण हैं। लेकिन क्या वर्तमान संदर्भों में नए सिरे से टिप्पणियाँ नहीं की जा सकती हैं?

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