सांस्कृतिक मोर्चे पर अन्तरराष्ट्रीयतावादी दृष्टिकोण का प्रश्न

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एक नए सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन के वैचारिक सांस्कृतिक कार्यभार

(सांस्कृतिक मोर्चे पर नई शुरुआत के लिए एक प्रस्ताव)

कात्यायनी, सत्यम

कहने की आवश्यकता नहीं कि जीवन के हर क्षेत्र में सर्वहारा वर्ग का नज़रिया व्यापक ऐतिहासिक सन्दर्भों में हर-हमेशा अन्तरराष्ट्रीयतावादी होता है। लेकिन आज पूँजी के भूमण्डलीकरण के नये दौर में, एक ओर जहाँ बुर्जुआ राष्ट्रवाद क्षरित-स्खलित होकर, अपनी ऐतिहासिक सकारात्मकता खोकर फासिस्ट अन्धराष्ट्रवाद का लगभग समानार्थी-सा बन गया है, वहीं सर्वहारा अन्तरराष्ट्रीयतावादी चेतना का ज्यादा मज़बूत और व्यापक भौतिक आधार भी तैयार हुआ है।

सर्वहारा अन्तरराष्ट्रीयतावाद के दो सन्दर्भों की चर्चा प्रकारान्तर से ऊपर के दो उपशीर्षकों के अन्तर्गत आ चुकी है। पहली बात, राष्ट्रीय जनवादी क्रान्तियों का दौर बीतने के बाद राष्ट्रवाद के रणनीतिक नारों का झण्डा सर्वहारा वर्ग और मुक्तिकामी जनों के विरुद्ध अपनी प्रासंगिकता खो चुका है। अन्तरविरोध आज सीधे-सीधे श्रम और पूँजी के दो शिविरों के बीच है। संस्कृति के मोर्चे पर आज यह एक अति महत्त्वपूर्ण काम है कि हम फासिस्ट अन्धराष्ट्रवाद सहित प्रतिक्रियावादी बुर्जुआ राष्ट्रवाद की संस्कृति का व्यापक भण्डाफोड़ और विरोध करें और श्रम की संस्कृति का, अन्तरराष्ट्रीयतावादी श्रमिक एकजुटता के विचार का विकल्प सामने रखें। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि राष्ट्रवाद और देशभक्ति दो चीज़ें हैं। राष्ट्रवाद एक बुर्जुआ परिघटना के रूप में जब अपनी ऐतिहासिक प्रासंगिकता खो देगा, तब भी देशभक्ति की भावना व संस्कृति बनी रहेगी। वह बुर्जुआ देशभक्ति की संस्कृति न होकर सर्वहारा देशभक्ति की संस्कृति होगी। सर्वहारा वर्ग ही अपने देश की जनता, संस्कृति और प्रकृति को वास्तविक प्यार करता है और अपने देश में समाजवाद की विजय के बाद वह समाजवादी मातृभूति की रक्षा के लिए हर कीमत चुकाने को तैयार रहेगा।

दूसरी बात, जब हम अपनी सांस्कृतिक-वैचारिक परम्परा की बात करते हैं तो इसका एक पक्ष है हमारे देश की मुक्तिकामी जनता के इतिहास की विरासत और दूसरा पक्ष है, पूरी दुनिया के सर्वहारा संघर्षों और सर्वहारा क्रान्तियों से जुड़ी सांस्कृतिक विरासत और पूरी दुनिया की मुक्तिकामी जनता की सांस्कृतिक विरासत। यही संस्कृति के क्षेत्र में सर्वहारा वर्ग का सही-सन्तुलित अन्तरराष्ट्रीयतावादी नज़रिया है।

जब हम सांस्कृतिक क्षेत्र में सर्वहारा वर्ग के अन्तरराष्ट्रीयतावादी नज़रिए की बात करते हैं तो उसका मतलब सिर्फ यही नहीं होता कि पूरी दुनिया के सर्वहारा वर्ग के कला-साहित्य की समृद्ध सम्पदा को हम अपनी विरासत के रूप में स्वीकार करते हैं, इसका मतलब यह भी होता है कि यूरोपीय पुनर्जागरण और प्रबोधन काल के मानवतावादी, जुझारू भौतिकवादी, जनवादी साहित्य तथा उन्नीसवीं शताब्दी के यूरोप और रूस के महान यथार्थवादी और क्रान्तिकारी जनवादी साहित्य की पूरी परम्परा का हम अपने को उत्तराधिकारी मानते हैं। इसका मतलब यह भी होता है कि समूचे विश्व के समग्र क्लासिकीय साहित्य-सम्पदा को हम अपनी विरासत मानते हैं। इसका मतलब यह भी होता है कि किसी भी देश के सर्वहारा का क्रान्तिकारी सांस्कृतिक आन्दोलन विश्व मज़दूर आन्दोलन के अतिरिक्त, सभी देशों के राष्ट्रीय मुक्ति युद्धों, प्रतिरोध संघर्षों और जन-आन्दोलनों के दौर के कला-साहित्य की विरासत को अपनाता है, उनका द्वन्द्वात्मक विश्लेषण करता है तथा उनके ज़रूरी अवयवों को आत्मसात कर लेता है। यह महज़ एक सैद्धान्तिक `अप्रोच´ का सवाल नहीं, ठोस व्यावहारिक कार्रवाई का मुद्दा है। एक उदाहरण लें। अफ्रीकी जनता के प्रतिरोध-संगीत, अमेरिकी अश्वेतों के प्रतिरोध संगीत, मेक्सिको व लातिन अमेरिकी देशों की अधूरी क्रान्तियों और किसान संघर्षों के दौरान सृजित क्रान्तिकारी संगीत – इन सभी में पूंजी की सत्ता, वर्चस्व और उत्पीड़न के प्रतिरोध के तत्त्व हैं, समानता के स्वप्न हैं, संघर्ष की आग है। भारतीय सर्वहारा का संगीत आन्दोलन अपने देश के जन संघर्षों के गीत-संगीत और लोक संगीत के अतिरिक्त उपरोक्त अन्तरराष्ट्रीय विरासत को भी अपनाएगा और इस सतत्-सुदीर्घ प्रक्रिया में सर्वहारा संगीत की सार्वभौमिक सम्प्रेषणीयता, उसकी एक सच्ची “अन्तरराष्ट्रीय भाषा” विकसित होगी। यही बात सर्वहारा के समाजवादी यथार्थवादी थिएटर और सिनेमा के लिए, तथा साहित्य के लिए भी लागू होती है।

‘सृजन परिप्रेक्ष्य’ , शिशिर-बसंत 2002 से साभार

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