न तो इतिहासग्रस्त, न ही इतिहास विमुख!

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एक नए सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन के वैचारिक सांस्कृतिक कार्यभार

(सांस्कृतिक मोर्चे पर नई शुरुआत के लिए एक प्रस्ताव)

कात्यायनी, सत्यम

पूर्वोक्त चर्चा से इतिहास के प्रति हमारा दृष्टिकोण भी स्पष्ट हो जाना चाहिए, लेकिन हम, कुछ ठोस उदाहरणों सहित, अलग से इस विषय को रेखांकित करना ज़रूरी समझते हैं। इतिहास के प्रति एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण तो हर-हमेशा ज़रूरी होता है, लेकिन ख़ास तौर पर नई शुरुआतों या इतिहास के किसी नये दौर की भौतिक-आत्मिक स्थितियों को जानने-समझने के दौर में, द्वन्द्वात्मक भौतिकवादी इतिहास-दृष्टि से सूक्ष्म विचलन भी हमें कालान्तर में लक्ष्य से कोसों दूर लेकर चला जाता है। निरन्तरता और नूतनता के द्वन्द्व से इतिहास आगे डग भरता है। इसमें भी कभी निरन्तरता का पक्ष प्रमुख होता है तो कभी नूतनता का। निर्णय की जटिलता तब अधिक होती है जब नूतनता का पक्ष प्रमुख होता है।

अतीत के शरणागत या इतिहासग्रस्त होने से कम हानिकारक इतिहास-विमुख होना नहीं होता। जैसा कि अबू तालिब ने फर्माया है, `यदि तुम इतिहास पर पिस्तौल से गोली चलाओगे तो भविष्य तुम पर तोप से गोल बरसाएगा।´

इसी दृष्टि से, आज परम्परा और परिवर्तन के द्वन्द्वों को पहचानते हुए, परम्परा के ज़रूरी अवदानों की पहचान करते हुए साहित्य-कला-संस्कृति के इतिहास के पुनर्मुल्यांकन की ज़रूरत है। प्रश्न चाहे इतिहास के हों या साहित्येतिहास के, ग़लत सैद्धान्तिक फ्रेम, अधूरे तथ्य-संग्रह और अटकलबाज़ी के द्वारा अपने अतीत और नायकों का अनावश्यक महिमा-मण्डन सर्वहारा क्रान्ति और साहित्य-कला-संस्कृति के वर्तमान और भविष्य को भयंकर क्षति पहुँचाएगा, और यहाँ तक कि ऐसे तर्कों और निष्पत्तियों का पुनरुत्थानवादी शक्तियाँ भी लाभ उठाएँगी। परम्परा के प्रति सही रुख का यह सवाल हिन्दी साहित्येतिहास के पुनर्मुल्यांकन से जुड़ा हुआ एक ज़रूरी और अतिप्रासंगिक प्रश्न बना हुआ है।

इसके अतिरिक्त, इतिहास के प्रति सही दृष्टिकोण के सवाल को हमें और व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखना होगा। यह और भी ज़रूरी इसलिए है कि आज प्राच्यवाद, उत्तर आधुनिकतावाद, उत्तर-मार्क्सवाद, `सब आल्टर्न´ इतिहास-दृष्टि और क्वाण्टम भौतिकी के कोपेनहेगन स्कूल के अनिश्चितता सिद्धान्त के सामाजिक अनुप्रयोग आदि के प्रहार का मूल लक्ष्य ही है – इतिहास-विकास के नियमों की द्वन्द्वात्मक भौतिकवादी अवधारणा। इन लोकवादी, बुर्जुआ समाजशास्त्रीय और “नववामपन्थी” इतिहास-दृष्टियों के विरुद्ध विचारधारात्मक संघर्ष का मुख्य रणक्षेत्र संस्कृति का प्रदेश ही बन रहा है।

साथ ही, यह आज के सर्वहारा नवजागरण का मूलभूत कार्यभार है कि सर्वहारा विचारधारा, क्रान्तियों के इतिहास और सर्वहारा कला-साहित्य की महान उपलब्धियों को विस्मृति के अन्धकार से बाहर लाया जाए और इनके बारे में फैलाए जा रहे तमाम विभ्रमों की धूल-राख को झाड़कर वास्तविकता को सामने प्रस्तुत किया जाए। बीसवीं शताब्दी में पूरी दुनिया में सर्वहारा कला-साहित्य के क्षेत्र में जो काम और प्रयोग हुए, उनकी पुनर्प्रस्तुति बेहद ज़रूरी है। आज बेशक उन्हें मॉडल मानकर उनका अनुकरण करने से हमारा अभीष्ट नहीं प्राप्त होगा, पर उनसे परिचित हुए बिना भी आगे कदम बढ़ाना हद दर्जे का बचकानापन ही होगा। हमारे देश में प्रगतिशील सांस्कृतिक आन्दोलन का जो इतिहास रहा है, उसका भी इसी दृष्टि से अध्ययन ज़रूरी है।

इतिहास की वास्तविकताएँ भी निश्चल-निरपेक्ष नहीं होतीं। इतिहास के हर मोड़ पर, हर नये चरण की पूर्वबेला में हम मानव सभ्यता के अतीत और जातीय-देशीय स्मृतियों की पुनर्यात्रा करते हैं, और हर बार, सम्मुख उपस्थित कार्यभारों की दृष्टि से इतिहास की “नये सिरे से खोज करते हैं” और उसके उन पक्षों पर ध्यान देते हैं, जो विगत इतिहास-यात्राओं में अनालोकित-उपेक्षित रह गए थे। जीवन के विकास की नई मंज़िलें और सम्भावित दिशाएँ हमारे सामने अतीत के नये-नये आयामों-पक्षों को देखने की नई सूक्ष्मदर्शता और व्यापकता देती चलती हैं और फिर अपनी पारी में, अतीत का हर नया पर्यवेक्षण विकास की दिशाओं की समझदारी को ज्यादा ठोस, ज्यादा उन्नत बनाता चलता है।

‘सृजन परिप्रेक्ष्य’, शिशिर-बसंत 2002 से साभार

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2 thoughts on “न तो इतिहासग्रस्त, न ही इतिहास विमुख!

    जाकिर अली 'रजनीश' said:
    June 16, 2009 at 9:56 AM

    गम्‍भीर विमर्श।

    -Zakir Ali ‘Rajnish’
    { Secretary-TSALIIM & SBAI }

    परमजीत बाली said:
    June 16, 2009 at 2:53 PM

    बढिया आलेख।

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