धार्मिक कट्टरपन्थ फ़ासीवाद के विरुद्ध सांस्कृतिक मोर्चे पर सही क्रान्तिकारी रणनीति अपनाओ!

Posted on Updated on

एक नए सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन के वैचारिक सांस्कृतिक कार्यभार

(सांस्कृतिक मोर्चे पर नई शुरुआत के लिए एक प्रस्ताव)

कात्यायनी, सत्यम

कला-साहित्य-संस्कृति के मोर्चे पर समकालीन धार्मिक कट्टरपन्थी फ़ासीवादी उभार की वैचारिक-ऐतिहासिक समझ में गम्भीर दृष्टि-दोष दीखते हैं और इनका प्रतिरोध भी प्राय: रस्मी, प्रतीकात्मक और कुलीनतावादी सीमान्तों में कैद दीखता है।

नाटकों, कविताओं और कहानियों में प्राय: हिन्दुत्ववादी कट्टरपंथियों का विरोध `सर्वधर्म समभाव´ की ज़मीन से या बुर्जुआ मानवतावाद या बुर्जुआ जनवाद की ज़मीन से करने की प्रवृत्तियाँ दिखाई देती हैं। यह सर्वहारा संस्कृतिकर्मी का सिरदर्द नहीं है कि संघ परिवार ने संविधान और न्यायतंत्र को ख़तरे में डाल दिया है। इसकी चिन्ता संविधान और न्यायतंत्र के पहरुए करें। हम यदि इसका हवाला भी देंगे तो पूरी व्यवस्था के चरित्र और फ़ासीवाद के चरित्र को समझाने और `एक्सपोज़र´ के नज़रिए से देंगे। लोगों की निजी धार्मिक आस्थाओं के अनुपालन के जनवादी अधिकार के प्रति अपनी पूर्ण प्रतिबद्धता ज़ाहिर करते हुए भी, हमें “उदार हिन्दू” या “रैडिकल हिन्दू” का रुख अपनाने के बजाय धर्म के जन्म और इतिहास की भौतिकवादी समझ का प्रचार करना होगा, धर्म के प्रति सही सर्वहारा नज़रिए को स्पष्ट करना होगा, धर्म और साम्प्रदायिकता के बीच के फर्क को स्पष्ट करते हुए एक आधुनिक परिघटना के रूप में साम्प्रदायिकता की समझ बनानी होगी तथा संकटग्रस्त पूँजीवाद की विचारधारा और राजनीति के रूप में साम्प्रदायिक फ़ासीवादी उभार का विश्लेषण प्रस्तुत करना होगा। हमें यह स्पष्ट करना होगा कि भारत में धार्मिक कट्टरपन्थी फ़ासीवादी उभार यहाँ की पूँजीवादी व्यवस्था के सर्वग्रासी संकट की राजनीतिक-सांस्कृतिक अभिव्यक्ति होने के साथ ही, पुनरुत्थान और विपर्यय के इस विश्व-ऐतिहासिक दौर में, धार्मिक कट्टरपन्थ के विश्वव्यापी उभार का भी एक हिस्सा है। इसका सम्बन्ध मूलगामी तौर पर, विश्व पूँजीवाद के ढाँचागत संकट से है, आर्थिक कट्टरपन्थ की वापसी के दौर से है तथा बुर्जुआ जनवाद के निर्णायक विश्व-ऐतिहासिक पराभव के दौर से है।

यह सर्वहारा की अवस्थिति नहीं हो सकती कि वह निर्गुण भक्ति आन्दोलन के सहारे, गांधीवादी मानवतावाद के सहारे या नेहरूवादी धर्मनिरपेक्षता के सहारे या संविधान पर ख़तरे की दुहाई देते हुए साम्प्रदायिक फ़ासीवाद का विरोध करे। कबीर और निर्गुण भक्ति आन्दोलन की सन्त परम्परा जनता की महान सांस्कृतिक परम्परा है, पर यह आन्दोलन मध्ययुगीन सामन्ती निरंकुश स्वेच्छाचारिता, ब्राह्मणवादी जातिगत उत्पीड़न और कर्मकाण्डों के विरुद्ध किसानों-दस्तकारों के “नये धार्मिक” तर्कों पर ही आधारित था। आज का धार्मिक कट्टरपन्थ मध्ययुगीन प्रतिक्रियावादी अधिरचना के बहुतेरे तत्त्वों को अपनाए हुए है, लेकिन यह एक आधुनिक परिघटना है, इसकी जड़ें वित्तीय पूँजी के वैश्विक तंत्र और भारतीय पूँजीवादी राज, समाज, उत्पादन और संस्कृति की रुग्णता में हैं। गांधी की आत्मा का आवाहन भी साम्प्रदायिकता के प्रेत से निपटने में काम नहीं आ सकता, क्योंकि गांधी के मानवतावाद में धार्मिक पुराणपन्थ और धार्मिक `यूटोपिया´ का जो स्थान था, उसके चलते धर्म के धार्मिक कट्टरपन्थी इस्तेमाल के विरुद्ध वह आज जनता के वैचारिक सांस्कृतिक अस्त्र की भूमिका निभाने में कतई अक्षम हो चुका है। एक मरियल किस्म के भौतिकवाद की ज़मीन पर खड़ी नेहरू की धर्मनिरपेक्षता को भी आज पुनर्जीवित कर पाना ठीक उसी प्रकार सम्भव नहीं है जिस प्रकार नेहरूवादी “समाजवाद” के दिनों को वापस लौटा लाना।

यह इतिहास और सामाजिक-आर्थिक संरचना की सुसंगत समझ का अभाव ही है कि भगवान सिंह जैसे रचनाकार साम्प्रदायिकता को सुनिश्चित सामाजिकार्थिक भौतिक आधार से उद्भूत सांस्कृतिक-राजनीतिक परिघटना के रूप में नहीं बल्कि एक मनोवैज्ञानिक समस्या या रुग्णता के रूप में देखते हैं (`उन्माद´ उपन्यास)।

जहाँ तक धार्मिक कट्टरपन्थ के विरुद्ध सांस्कृतिक मोर्चे पर व्यावहारिक-आन्दोलनात्मक कार्रवाइयों का सम्बन्ध है, इनका स्वरूप अत्यन्त संकुचित, अनुष्ठानिक और कुलीनतावादी है तथा इनकी अन्तर्वस्तु मुख्यत: सामाजिक जनवादी है। वामपन्थी संस्कृतिकर्मियों की अधिकांश कार्रवाइयाँ शहरी मध्यवर्ग तक सीमित हैं। संघ परिवारी फ़ासिस्टों की आक्रामक कार्रवाइयों के विरुद्ध दिल्ली-बम्बई के अभिजात सांस्कृतिक अड्डों पर रस्मी विरोध-प्रदर्शन, साम्प्रदायिक दंगा ग्रस्त क्षेत्रों में टीमें भेजना और रिपोर्टें (वह भी प्राय: अंग्रेज़ी में) जारी करना, उन्नत चेतना वाले शिक्षित मध्यवर्ग तक सीमिति साहित्यिक पत्रिकाओं में कविताएँ-कहानी-निबन्ध आदि लिखना, कुछ गोष्ठी-सेमिनार व अन्य आयोजन तथा कभी-कभार कुछ नुक्कड़ नाटक जैसे कार्यक्रम – विगत लगभग डेढ़ दशक के फ़ासीवादी उभार के ग्राफ के समान्तर हमारी सांस्कृतिक जन-कार्रवाइयों की यही स्थिति है। दरअसल, राजनीतिक दायरे में संसदमार्गी वामपन्थ संसदीय-संवैधानिक सीमान्तों के भीतर, मुख्यत: संसदीय जनवाद की हिफ़ाज़त के नारे के साथ, मतदान की राजनीति को धुरी बनाकर, फ़ासीवाद का जैसा विरोध कर रहा है, काफी कुछ वैसा ही सांस्कृतिक मोर्चे पर भी हो रहा है।

फ़ासीवाद की वैचारिक समझ के लिए गम्भीर विमर्श और जनता के जनवादी अधिकारों पर फ़ासिस्ट डकैती का फौरी विरोध ज़रूरी है, लेकिन सवाल यह है कि फासिज्म के विरुद्ध निर्णायक संघर्ष करने वाले मज़दूर वर्ग और बहुसंख्यक मेहनतकश आबादी को जागृत, शिक्षित और गोलबन्द करने के लिए हम क्या कर रहे हैं? धार्मिक कट्टरपन्थ के हर पहलू पर सीधी-सादी भाषा में पर्चे, पुस्तिकाएँ लिखकर उनका व्यापक वितरण, औद्योगिक क्षेत्रों में और गाँव के ग़रीबों के बीच गीतों-नाटकों आदि के ज़रिए व्यापक शिक्षा और प्रचार के काम क्यों नहीं संगठित हो पा रहे हैं? क्या इसके लिए वामपन्थी लेखकों-संस्कृतिकर्मियों के भीतर व्याप्त मध्यवर्गीय कुलीनता-कायरता और सुविधाभोगी स्वार्थपरता ज़िम्मेदार नहीं है?

हमें याद रखना होगा कि मज़दूरों और अन्य मेहनतकश वर्गों के बीच धार्मिक कट्टरपन्थी फ़ासीवादी राजनीति के असली “चाल-चेहरे-चरित्र” को नंगा करना हमारा सर्वोपरि दायित्व है। सच्चे वामपन्थी संस्कृतिकर्मियों को याद रखना होगा कि फ़ासीवाद के रस्मी सामाजिक जनवादी संशोधनवादी विरोधों ने प्रकारान्तर से उसकी मदद ही की है। सामाजिक-जनवादी विभ्रमों से छुटकारा पाए बग़ैर मध्यवर्ग का रैडिकल जनवादी हिस्सा भी धार्मिक कट्टरपन्थ के विरुद्ध आर-पार की लड़ाई के लिए तैयार नहीं हो सकेगा और सर्वहारा वर्ग के साथ क्रान्तिकारी संयुक्त मोर्चा में शामिल नहीं हो सकेगा। तकरीबन 75 वर्षों पहले कही गई भगतसिंह की ये बातें आज भी प्रासंगिक हैं और सांस्कृतिक मोर्चे के सेनानियों को भी इन पर अवश्य ही ग़ौर करना चाहिए, “लोगों को परस्पर लड़ने से रोकने के लिए वर्ग-चेतना की ज़रूरत है। ग़रीब मेहनतकशों और किसानों को स्पष्ट समझा देना चाहिए कि तुम्हारे असली दुश्मन पूँजीपति हैं। इसलिए तुम्हें इनके हथकण्डों से बचकर रहना चाहिए। और इनके हत्थे चढ़ कुछ नहीं करना चाहिए। संसार के सभी ग़रीबों के, चाहे वे किसी भी जाति, रंग, धर्म या राष्ट्र के हों, अधिकार एक ही हैं। तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम धर्म, रंग, नस्ल और राष्ट्रीयता और देश के भेदभाव मिटाकर एकजुट हो जाओ और सरकार की ताकत अपने हाथ में लेने का यत्न करो। इन यत्नों से तुम्हारा नुकसान कुछ नहीं होगा। इससे किसी दिन तुम्हारी ज़ंजीरें कट जाएँगी और तुम्हें आर्थिक स्वतंत्रता मिलेगी…” (साम्प्रदायिक दंगे और उनका इलाज´)

‘सृजन परिप्रेक्ष्य’, शिशिर-बसंत 2002 से साभार

Advertisements

4 thoughts on “धार्मिक कट्टरपन्थ फ़ासीवाद के विरुद्ध सांस्कृतिक मोर्चे पर सही क्रान्तिकारी रणनीति अपनाओ!

    दिनेशराय द्विवेदी said:
    June 13, 2009 at 6:33 AM

    बिलकुल सही कि “लोगों को परस्पर लड़ने से रोकने के लिए वर्ग-चेतना की ज़रूरत है।

    Girijesh Rao said:
    June 13, 2009 at 7:45 AM

    तमाम वैचारिक मतभेद के बिन्दु होते हुए भी मैं इस ब्लॉग का नियमित पाठक हूँ।

    ‘ज़िन्दगी के सर्द रुखसारों’ पर ‘बात और बहस’ छेड़ने की यह मुहिम बहुत अच्छी लगती है ।

    SHAHI said:
    June 13, 2009 at 9:55 AM

    “तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम धर्म, रंग, नस्ल और राष्ट्रीयता और देश के भेदभाव मिटाकर एकजुट हो जाओ और सरकार की ताकत अपने हाथ में लेने का यत्न करो। इन यत्नों से तुम्हारा नुकसान कुछ नहीं होगा।”

    मैं भी इस बात का समर्थन करता हूँ की हम सब को देश और धर्म भुलाकर एकजुट हो जाना चाहिए…..अगर सारी दुनिया मे एक ही धर्म होता कोई दूसरा देश ना होता तब तो ये धारणा सोची जा सकती थी…..पर आज के समय मे ऐसी बाते करना शेर के मुँह मे अपना सिर देने से कम नही है……….

    एक बात बताओ पिछले हज़ारों सालों से ये शिक्षा सिर्फ़ हमें ही क्यों दी जाती है किसी मुस्लिम यहूदी या क्रिस्चियन देश को क्यों नही दी जाती…… क्या ये बात सिर्फ़ बेवकूफ़ हिंदुओं पर ही लागू होती है क्योंकि आज तक वो नरम दिल और सेक्युलर है…जो किसी के भी झाँसे मे आ जाता है…..मुस्लिमों की तरह कट्टर नही होने की वजह से ही तुम जैसे लोग उनके सीधेपन का फायेदा उठाते हो…..और इसी देश के विरुढ़ बिगुल फूँकते हो….

    माना की हम अपनी देशभक्ति छोड़ दे और इस देश को चीन का गुलाम बनने के लिए राज़ी हो जाए जैसा की तुम और तुम्हारे चीनी आका चाहते है……

    और तिब्बत की तरह एक गुलाम और बेरहम चीनी शॅशन मे जिएं….क्या यही नीति तुम चीन को अपनाने के लिए बोल सकते हो जो अपनी मत्र्भूमि के एकीकरण और विकाश के लिए वचनबध है……

    वो तुम कुत्तों को इसीलिए पाल रहा है ताकि भारतिया जनता का देश के प्रति प्रेम कम किया जा सके और भविस्य मे होने वाले चीनी आक्रमण के लिए जमीन तैयार की जा सके ……

    वैसे भी चीन द्वारा सारे भारत को चारो तरफ से घेरने के बाद अब हमारे पास कोई नीतीनिर्माता तो है नही सो तुम लोग देश की बाट लगाते रहो……एक और विनाश तक ….

    शायद तब तुम्हे अहसास होगा की भारतीयों के अंदर का देश प्रेम तो कम किया जा सकता है …
    पर क्या दुनिया के तमाम देश भी अपने देश के प्रति गद्दारी करेंगे शायद नही वे भारत को ही कमजोर पाकर एक बार फिर गुलामी की ज़ंजीरों मे जाकड़ देंगे….

    तब क्या ये भगत सिन्ह अपने देश और धर्म को भुला देगा?

    Shaheed Bhagat Singh Vichar Manch, Santnagar responded:
    June 13, 2009 at 12:52 PM

    आपने लिखा,
    मैं भी इस बात का समर्थन करता हूँ कि हम सब को देश और धर्म भुलाकर एकजुट हो जाना चाहिए”

    लेकिन हम समर्थन नहीं करते क्योंकि पूँजी ने पहले ही लोगों को वर्गों में बाँट रखा है. हमारे चलाए बिना भी वर्ग संघर्ष जारी है. इस संघर्ष में हम मजदूर के दृष्टिकोण को अपनाए हुए हैं. बुर्जुआ लोगों का राष्ट्रवाद और हमारी देशभक्ति में बहुत फर्क है. आप उसे जानबूझकर समझना नहीं चाहते. बुर्जुआ लोगों के राष्ट्रवाद अनुसार दुश्मन बाहरी ही होता है जबकि हमारी देशभक्ति अनुसार देश की पूंजी और साम्राज्यवादी पूंजी दोनों ही श्रम की दुश्मन हैं.

    वर्गों के इस दृष्टिकोण के हिसाब से देश की पूंजीपति जमात पहले से ही हथियारबंद हैं. क्या पुलिस, फौज और पूंजीपति लोगों के पास जमा जायज-नाजायज हथियार इसलिए नहीं कि इससे निजी जायदाद की रक्षा की जा सके ? उसी निजी जायदाद की जो श्रमिकों द्वारा पैदा की गयी है और उसे पूंजीपतियों ने लूट लिया है ?

    मजदूर जिनकी संख्या ७४ प्रतिशत है और जिनकी आय २० रूपए प्रति व्यक्ति है – क्या उन्हें उपरोक्त संस्थाओं या हथियारों द्वारा कोई सुरक्षा मिलती है या फिर इन संस्थाओं या हथियारों का प्रयोग इन्हें दबाने के लिए नहीं किया जाता है ?

    रही बात धर्म की. इसे सांप्रदायिक रंग देने वाली बुर्जुआ जमात ही रही है. इतिहास गवाह है कि साम्प्रदायिकता से नुकसान मेहनतकश अवाम का ही हुआ है. बल्कि इसका प्रयोग मेहनतकश अवाम को आपस में बाँटने के लिए ही हुआ है. मुस्लिम, क्रिश्चिन और हिन्दू साम्प्रदायिकता – हर तरह की साम्प्रदायिकता और अंध राष्ट्रवाद देश की मेहनतकश जनता के दुश्मन हैं. अल्पसंख्यकों की साम्प्रदायिकता भी मेहनतकशों की दुश्मन है लेकिन बहुसंख्यकों की साम्प्रदायिकता तो फासिज्म का रूप धारण कर लेती है. भारतीय पूंजीवाद के लिए फासीवाद जंजीर से बंधा शिकारी कुत्ता है, जिसे वह मौका पकड़ने पर मेहनतकश के आंदोलनों को कुचलने के लिए हमेशा तैयार रखना चाहता है.

    आर्थिक नीतियों से पैदा होने वाला संकट, बेरोजगारी, निराशा और असुरक्षा लगातार फासीवादी प्रवृत्तियों के पैदा होने और फैलाने की जमीन तैयार कर रहा है. लेकिन मेहनतकश को इस सांप्रदायिक जुनून की लहर में बहने से बचाना होगा और यह समझ लेना होगा कि जाति-धर्म-भाषा-क्षेत्र आदि-आदि के नाम पर लोगों को आपस में बांटने और लड़ाने की सारी राजनीती का एक मकसद होता है–आम मेहनतकश गरीब आबादी को एकजुट होने से रोकना, ताकि यह लुटेरा निजाम जारी रहे और गरीब जनता बदहाली, गुलामी और जिल्लत की ज़िन्दगी से बाहर न निकल सके. इतिहास में हमेशा मेहनतकशों ने ही फासिस्टों को फैसलाकुन शिकस्त दी है और भारत में भी जब मेहनतकश अवाम एकजुट और संगठित हो जाएगा तो वही लोहे के झाडू से इस साम्प्रदायिक कचडे की सफाई करेगा.

    इसके अलावा,

    मजदूर अलग बोली बोलता है. मजदूर और बुर्जुआ के विचार और कल्पनाएँ परस्पर विरोधी होती हैं. उनकी आदतें, नैतिक सिद्धांत, धार्मिक और राजनीतिक दृष्टिकोण एकदम भिन्न होते हैं. बुर्जुआ और सर्वहारा पृथक राष्ट्र होते हैं. वे एक दूसरे से इतना अलग होते हैं कि उन्हें दो प्रजातियाँ कहा जा सकता है. डिज़रायली का उपन्यास सिविल, ऑर द टू नेशन की रचना 1845 में की गयी थी. उसी समय यानि कम्युनिस्ट घोषणापत्र के प्रकाशन के तीन साल से भी कम समय पहले अंग्रेज़ मजदूर वर्ग की स्थिति पर एंगेल्स की पुस्तक की रचना की गयी थी. डिज़रायली ने पुराणी पारिभाषिक शब्दावली का प्रयोग किया था और अपने पाठकों को बताया था कि “अमीर” और ‘गरीब” ही दो राष्ट्र होते हैं.

    आपका बार -बार चीन को हमारा आका कहना आपकी हलकी जहनियत का प्रगटावा करता है जबकि हम चीन को एक बुर्जुआ देश मानते हैं. वह देश क्यों हमारी सहायता करेगा जिसकी नीतियों की हम खुलेआम आलोचना करें?

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s