कला-साहित्य के क्षेत्र में सामाजिक जनवादी प्रवृत्तियों का विरोध करो!

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एक नए सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन के वैचारिक सांस्कृतिक कार्यभार

(सांस्कृतिक मोर्चे पर नई शुरुआत के लिए एक प्रस्ताव)

कात्यायनी, सत्यम

जिस तरह राजनीति के क्षेत्र में, उसी तरह कला-साहित्य-संस्कृति के क्षेत्र में भी आज वामपन्थ के नाम पर सामाजिक जनवादी/संशोधनवादी प्रवृत्तियों का काफी बोलबाला है। इनके अनेक रूप हैं। सिर्फ कुछ प्रतिनिधि उदाहरणों की ही यहाँ चर्चा की जा सकती है।

अधिकांश कवि-लेखक-आलोचक आज अपने लेखन में यूरो कम्युनिज्म और पश्चिमी नववामपन्थ के नये-पुराने पुरोधाओं से निरे अनालोचनात्मक ढंग से काफी कुछ उधार लेते दीखते हैं। सोवियत संघ और चीन में सर्वहारा क्रान्तियों के बाद, समाजवादी संक्रमण के महान सामाजिक प्रयोगों के दौरान कला-साहित्य-नाटक-सिनेमा-संगीत आदि के क्षेत्र में जो भी सैद्धान्तिक और प्रयोगात्मक काम हुए थे, आम तौर पर उनके प्रति उपेक्षा का रुख दिखाई देता है। हम यह नहीं कहते कि उस दौर में गलतियाँ नहीं हुई, पर महान क्रान्तिकारी परिवर्तनों के दौर के कला-साहित्य का ऐतिहासिक-आलोचनात्मक अध्ययन अकादमिक वामपन्थी “मुक्त-चिन्तन” से उधार लेने के बजाय कहीं अधिक उपयोगी होगा।

नववाम के सुर में सुर मिलाते हुए ज्यादातर कवि-लेखक बुर्जुआ मानवतावादी स्वर में लिख-बोल रहे हें और वर्ग-संघर्ष और सर्वहारा अधिनायकत्व की निरन्तरता के बुनियादी उसूलों पर कायम सर्वहारा मानवतावाद को बिना सांगोपांग तर्क और आलोचना के खारिज करते प्रतीत होते हैं।

यह कला-साहित्य में सामाजिक-जनवादी प्रवृत्तियों के बोलबाले का ही नतीजा है कि न केवल संशोधनवाद और क्रान्तिकारी वामपन्थ की विभाजक रेखा कला-साहित्य में मिट सी गई प्रतीत होती है, बल्कि कल के लोहियावादी, “लघु मानव” वादी परिमलिये आज के स्थापित वामपन्थी समालोचक माने जा रहे हैं। रघुवीर सहाय की शिष्ट-संयमित मध्यवर्गीय असन्तोष की कविता और केदारनाथ सिंह की कुलीन, सजी-सँवरी कविता को आज सुधी आलोचकों का एक संगठित धड़ा वामपन्थी काव्य-धारा के प्रतिमान या प्रातिनिधिक प्रवृत्ति के रूप में प्रस्तुत कर रहा है और बहुतेरे नये कवि इन धाराओं को आदर्श मान रहे हैं। रेणु की जनपक्षधरता निस्सन्धिग्ध हो सकती है, लेकिन उनके प्रकृतवादी यथार्थवाद को और उनके लोहियावादी समाजवादी विचारों के निरूपण को प्रेमचन्द की राष्ट्रीय जनवादी धारा का विस्तार घोषित करना सर्वहारा साहित्य की वैचारिक समझ पर सवाल खड़े करता है। यथार्थ-चित्रण के नाम पर निषेधवादी-अनास्थामूलक दृष्टि से जनता के जीवन को प्रस्तुत करने वाले और कहीं-कहीं खिल्ली तक उड़ाने वाले श्रीलाल शुक्ल यदि उच्चासन पर बिठाए जा रहे हैं तो यह वामपन्थी कला-साहित्य की दुनिया में सामाजिक जनवादी प्रवृत्तियों के ज़बर्दस्त प्रभाव का ही द्योतक है।

इधर विस्मृत मार्क्सवादी आलोचकों-लेखकों के पुन:स्मरण का काम खूब हो रहा है। यह ज़रूरी और उपयोगी तभी हो सकता था जब इसे आलोचनात्मक, तर्कसम्मत पुनर्मूल्यांकन की दृष्टि से किया जाता। लेकिन प्राय: ऐसा नहीं हो रहा है और पुरानी पीढ़ी के मार्क्सवादी लेखकों के तमाम विचलनों को भी श्रद्धाभाव से स्वीकारा जा रहा है या फिर उनकी अनदेखी की जा रही है।

साहित्य के समाजशास्त्रीय अध्ययन के नाम पर एक नई नववामपन्थी प्रवृत्ति सामने आई है जो पुराने सामाजिक जनवादी विचारों को अकादमिक आडम्बरपूर्ण पण्डिताऊपन की चाशनी में लपेटकर परोस रही है और नयेपन के फैशनेबल आग्रहियों के मध्यवर्गीय मन को खूब भा रही है। `सन्धान´ पत्रिका इस धारा की अग्रणी प्रतिनिधि पत्रिका है। कला-साहित्य की क्रान्तिकारी वामपन्थी धारा का एक ज़रूरी कार्यभार है कि वह इस विचार-सरणि का सांगोपांग विश्लेषण प्रस्तुत करे और इनके द्वारा फैलाए जा रहे विभ्रमों के धुएँ-कोहरे को छाँटने का काम करे।

‘सृजन परिप्रेक्ष्य’ , शिशिर-बसंत 2002 से साभार

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3 thoughts on “कला-साहित्य के क्षेत्र में सामाजिक जनवादी प्रवृत्तियों का विरोध करो!

    nirmla said:
    June 12, 2009 at 9:31 AM

    विचा्रनीय् सार्थक प्रस्तुति आभार्

    manhanvillage said:
    November 15, 2009 at 9:38 PM

    भाई किसी मुल्क के साहित्य और उसकी बेहतर चीजों को अपनाना बहुत आवश्यक है किन्तु हमारे बामपन्थी भाईयों का मास्को या बीजिगं में पानी बरसने पर भारत के खुशनुमा मौसम में भी छाता लगाना मुझे बिल्कुल रास नही आता

    Shaheed Bhagat Singh Vichar Manch, Santnagar responded:
    November 16, 2009 at 6:35 PM

    बिल्कुल ठीक, क्योंकि क्रांति या समाजवाद जब आयात और निर्यात होने लगते हैं तो पूंजीवादी साम्राज्यवाद की तरह वे भी विस्तारवाद की दलदल में जा धंसते हैं.

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