वामपन्थी” कलावाद-रूपवाद और मध्यवर्गीय लम्पटता का विरोध करो!

Posted on Updated on

एक नए सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन के वैचारिक सांस्कृतिक कार्यभार

(सांस्कृतिक मोर्चे पर नई शुरुआत के लिए एक प्रस्ताव)

कात्यायनी, सत्यम

यह बिन्दु भी उपरोक्त बिन्दु से जुटा हुआ है। सर्वहारा क्रान्तियों के प्रथम चक्र की पराजय और क्रान्तिकारी वामपन्थी आन्दोलन की विघटन-विफलता के परिणाम जिन रूपों में सामने आए हैं, उनमें से एक यह भी है कि वामपन्थी और जनवादी का लेबल लगाकर घूमने वाले ऐसे “छैलों” की कविता-कहानी-नाटक की दुनिया में भरमार है जो अपने जीवन में तो हर तरह का अवसरवादी कुकर्म करते ही हैं, रचना के धरातल पर भी उनके मूल आग्रह कलावादी होते हैं। ख़ास तौर पर कविता के क्षेत्र में तो रूपवादी “वामपन्थ” का ज़ोर इतना अधिक है कि पुरोगामी और प्रतिगामी की विभाजक रेखा ही वहाँ धूमिल कर दी गई है। इसी तरह कहानी के क्षेत्र में यथार्थवाद के नाम पर प्रकृतवादी आग्रहों के बोलबाले का एक रूप मध्यवर्गीय लम्पटता का घटाटोप भी है। भारतीय जन-जीवन और संस्कृति की तबाही के सबसे नंगे, बर्बर और तेज़ रफ़्तार दौर में फूहड़-कामुक, यौनलोलुप और रुग्ण विवरण “यथार्थ-चित्राण” के नाम पर कहानियों से लेकर आत्मकथाओं के “भोगे हुए यथार्थ” और संस्मरणों के “बनारसी ठाठ” के रूप में खूब प्रस्तुत किए जा रहे हैं।

इन घटिया प्रवृत्तियों के वास्तविक स्रोत को, इनके वर्ग-चरित्र को सविश्लेषण उजागर करना होगा, सर्वहारा संस्कृति के इन रेशमी रूमालधारियों को, इन भंड़ैतों, छैलों और रागरंग-प्रेमियों को बेनकाब करना होगा और इनके विरुद्ध समझौताविहीन संघर्ष चलाना होगा।

‘सृजन परिप्रेक्ष्य’, शिशिर-बसंत 2002 से साभार

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s