मार्क्सवादी पारिभाषिक शब्दावली – कुछ विरासत से और कुछ …

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कुछ  मार्क्सवादी पारिभाषिक शब्दों  को परिभाषित करने की एक कोशिश लेकिन बहुत से मतभेद हो सकते हैं. आओ,  सब मिलकर मार्क्सवादी पारिभाषिक शब्दों को परिभाषित करें.

वैज्ञानिक समाजवाद : ‘यूटोपिया’ और आदर्श समाजवाद के विपरीत मार्क्स एंगेल्ज़ द्वारा परिभाषित समाजवाद- पूंजीवाद और साम्यवाद के बीच की स्टेज. एक संक्रमण काल. पूंजीवाद  से इस लिए अलग कि सत्ता पर कब्जा सर्वहारा वर्ग का, इसलिए सर्वहारा का जनतंत्र या सर्वहारा का बुर्जुआ पर अधिनायकवाद वैसे ही जैसे बुर्जुआ वर्ग के अधिनायकवाद के चलते  पूंजीवादी बुर्जुआ जनतंत्र. साम्यवाद से दोनों भिन्न क्योंकि दोनों में वर्गों का सतत संघर्ष जारी. इतिहास की कुटील और टेडी-मेढी चाल के चलते ‘वैज्ञानिक समाजवाद’ का ऐतिहासिक रूप से एक बार हारना – एक कड़वी सच्चाई. कुछ विद्वानों और विशेषकर बुर्जुआ चाटुकार बुद्धिजीवियों द्वारा साम्यवाद को बदनाम करने के लिए इस “वैज्ञानिक समाजवाद ” को ही साम्यवाद का नाम देना.

चीन में भी,नकली समाजवाद का चरित्र आज पूरी तरह बेनकाब हो चुका है। चीन में समाजवाद की सारी उपलब्धियाँ समाप्त हो चुकी है। कम्यूनों का विघटन हो चुका है। खेती और उद्योग में समाजवाद के राजकीय पूँजीवाद में रूपान्तरण के बाद अब निजीकरण और उदारीकरण की मुहिम बेलगाम जारी है। अब यह केवल समय की बात है कि समाजवाद का चोंगा और नकली लाल झण्डा वहाँ कब धूल में फेंक दिया जायेगा। माकपा और भाकपा अपने असली चरित्र को ढँकने के लिए आज चीन के इसी “बाज़ार समाजवाद” के गुण गाती हैं।

संशोधनवाद : संशोधनवाद उस सिद्धांत का प्रतिनिधि जो मार्क्सवादी सिद्धांतों को तोड़-मरोड़ कर विकृत करता है ताकि यह (मार्क्सवाद) बुर्जुआ वर्ग के हितों के लिए नुकसान रहित बन जाये. प्राय: यह मार्क्सवाद को सुधारवाद बना देता है. संशोधनवाद का सम्बन्ध स्तालिन की मृत्यु के बाद ख्रुश्चेव और माओ त्से तुङ के बाद देङपंथी टोली से भी लिया जाता है जिनके नेतृत्व में बुर्जुआ वर्ग सर्वहारा वर्ग पर पुन: अधिनायकवाद स्थापित कर सका.

वामपंथी कम्युनिज्म या दुस्साहसवाद : लेनिन की एक उक्ति है कि किसी भी दल में संशोधनवाद के कर्मों की सजा  कतारें वामपंथी कम्युनिज्म या दुस्साहसवाद में चुकाती हैं. भारत में अगर नकसलबाडी जैसा वामपंथी कम्युनिज्म या दुस्साहसवाद उभरा तो निश्चित रूप से इसके दूसरे सिरे (ध्रुव) पर संशोधनवाद था. वामपंथी कम्युनिस्टों में अधिकतर मिडल क्लास के लोग आते हैं – पूँजी के सताए ये लोग क्रांति के एजेंडा पर तो तुंरत पहुँच जाते हैं लेकिन अवाम को चेतन करने की लंबी और मुश्किल रणनीति या प्रोग्राम बनाने से घबराते हैं.

विरोधों की एकता : ब्रहामंड में विद्यमान पदार्थ, व्यापार (phinomenon), व्यक्ति, समाज, अवधारणा आदि को समझने के लिए दो मुख्य विरोधी ध्रुवों की निशानदेही. किसी भी व्यापार के अस्तित्व या गतिशीलता (dynamism) की ज़रूरी शर्त. अन्य गौण विसंगतियां या ध्रुवों द्वारा किसी एक के साथ अभेद होना.

उदाहरण के लिए पूंजीवाद विवाह संस्था जिसमें विवाह एक अवधारणा है जिसका एक सिरा दो व्यक्तियों के मिलन का तो दूसरा दो बराबर की पूंजियों के मिलन का है. देखना यह है कि इन दोनों सिरों से गतिमान विवाहिक सम्बन्धों की विसंगति (contradiction) किसके पक्ष में हल होती है. यह इस बात पर निर्भर करता है कि कौन सा सिरा प्रधान है और कौनसा गौण. चूंकि पूंजीवाद में दो पूंजियों के मिलन का सिरा प्रधान होता है इसलिए इसे दो व्यक्तियों का मिलन नहीं बल्कि दो पूंजियों का मिलन ही कहा जाता है जबकि गौण सिरे पर दो व्यक्ति भी मिलते हैं- प्यार करते हैं, बच्चे पैदा करते हैं – ये बच्चे पूंजी के सच्चे वारिस होते हैं. अगर ऐसा नहीं होता है तो .. तो.. बच्चों को बागी करार दिया जाता है.

गोर्की ने कहा था कि इस संसार को परिभाषित करना बड़ा ही आसान है क्योंकि लोग दो कामों में लगे हुए हैं :

१. धन के ढेर लगाना और

२. अपने हिस्से के श्रम को दूसरों से करवाना.

यही पागलपन इस दुनिया की सच्चाई है पर इसे ही आदर्श माना जाता है.

जुन्कर या प्रशियाई : प्रशिया -जर्मनी के अधीन एक राज्य, यूरोप के अन्य देशों के विपरीत, बिस्मार्क की अगुआई में यहाँ, पूंजीवाद ने सामंती व्यवस्था को  क्रांतिकारी ढंग से तबाह न करके, बुर्जुआ जनतंत्र के विकास का एक लम्बा और पीडादायक तरीका अपनाया. भारत की आज़ादी की क्रांतिकारियों की अगुआई में जारी लहर कांग्रेस की अगुआई में जारी लहर से हार गयी. भगत सिंह का यह शक कि कांग्रेस अंग्रेजों से समझौता कर लेगी, का सच होना भी एक कड़वी सच्चाई है, आज़ादी के बाद क्रांतिकारी दलों की दयनीय स्थिति और भारत के बुर्जुआ राज्य का विकास जुन्कर या प्रशियाई विकास से मिलता जुलता,  या सामंती समाज की कोशिकायों को तबाह न करते हुए उन्हीं कोशिकायों में बुर्जुआ समाज की कोशिकायों की  घुसपैठ – यही कारण है कि भारत इस इक्कीसवीं सदी में भी एक विकसित बुर्जुआ राज्य होते हुए भी सामंती बुराईयों-कद्रों-कीमतों को, व्यक्तिगत तौर पर ही नहीं बल्कि संस्थागत तौर पर भी संभाले हुए है. देखे : 1857, आरंभिक देशभक्ति और प्रगतिशीलता

आधार : सभ्य समाज में उत्पादक शक्तियों के विकास की स्टेज, उत्पादन के साधनों पर किस वर्ग का कब्ज़ा, मनुष्यों के आपसी उत्पादन सम्बन्ध या आर्थिक सम्बन्ध. “राजनितिक अर्थशास्त्र जिंसों के आपसी संबंधों का अध्ययन न होकर मनुष्यों के आपसी संबंधों का विज्ञान है”- एंगेल्स

अधिरचना : आधार तय करता है कि अधिरचना कैसी हो. न्यायपालिका, विधानपालिका, कार्यपालिका, धर्म, नैतिकता, दर्शन और स्वयं राज्य रुपी संस्था अधिरचना के ही अंग है.

विचारवादियों के विपरीत मार्क्सवादियों के अनुसार इनका विकास ऐतिहासिक है जबकि विचारवादियों के अनुसार अधिरचना के ये अंग सदैव विद्यमान रहें हैं. वर्ग-संघर्ष के इतिहास अनुसार जब आधार के दोनों विरोधी ध्रुवों से गतिमान इस आधार की विसंगति किसी एक के पक्ष में हल होना छोड़ देती है तो उसी वक्त अधिरचना में तनाव आ जाता जिसे आधार और अधिरचना का द्वंद इन्कलाब द्वारा सुलझा लेता है. अगर ऐसा नहीं होता तो भी धीरे-धीरे, पीडादायक तरीके से विसंगतियाँ हल तो हो ही जाती हैं. इस पीडा से बचने के लिए क्रांतिकारी चेतना की शक्ति का प्रयोग करते हैं ताकि इन्कलाब हो. चेतना की भूमिका उसी प्रकार जैसे किसी संवेदनशील पदार्थ पर बाहर से इलेक्ट्रोन की बमबारी करके पदार्थ की प्रकृति को बदला जा सकता है या फिर जैसे एक बीज जो खोल में सुरक्षित है, उसे भिगोकर, बीजकर उसके विरोधों की एकता को भंग किया जा सकता है, बीज का निषेध ही पौधा है, पौधे का निषेध, फूल….फल…और फिर बीज, लेकिन बीज वही बीज नहीं जो पहले था, यह ज्यादा विकसित है.

आधार और अधिरचना पर मार्क्स द्वारा लिखित ‘पूंजी’ पृ. 100, नोट- 32, देखें ;

“अर्थशास्त्रियों का तर्क-वितर्क अजीब ढंग का होता है. उनके लिए केवल दो प्रकार की ही संस्थाएं हैं : बनावटी संस्थाएं और प्राकृतिक संस्थाएं. सामंती संस्थाएं बनावटी संस्थाएं हैं, बुर्जुआ सस्थाएं प्राकृतिक संस्थाएं हैं. इस बात में वे धर्मशास्त्रियों से मिलते हैं. वे लोग भी दो प्रकार के धर्म मानते हैं. उनके अपने धर्म छोड़कर उनकी दृष्टि में बाकी हर धर्म मनुष्यों की मनगढ़ंत है, जब के अपने धर्म के बारे में वे समझते  हैं की वह ईश्वर से उद्भूत हुआ है.-(Karl Marx, Misere de la Philosophie, Response a la philosophie de la misere par M. Proudhon, 1847, p. 113) मि. बस्तिया के हाल पर सचमुच हंसी आती है. उनका ख्याल है की प्राचीन काल में यूनानी और रोमन लोग केवल  लूट-मार के सहारे ही जीवन बसर करते थे. लेकिन जब लोग सदियों तक लूट-मार करते हैं , तो कोई ऐसी चीज हमेशा होनी चाहिए , जिसे वे लूट सकें; लूटमार की चीजों का लगातार पुनरुत्पादन होते रहना चाहिए. परिणाम स्वरूप इससे ऐसा लगेगा कि यूनानियों और रोमनों के यहाँ भी उत्पादन की क्रिया थी. चुनांचे उनके यहाँ कोई अर्थव्यवस्था भी रही होगी, और जिस प्रकार बुर्जुआ अर्थव्यवस्था हमारी आधुनिक दुनिया का भौतिक आधार है, उसी प्रकार वह अर्थव्यवस्था यूनानियों और रोमनों की दुनिया का भौतिक आधार रही होगी. या शायद बस्तिया के कथन का अर्थ यह है कि दास प्रथा पर आधारित उत्पादन विधि लूटमार की प्रणाली पर आधारित होती है ? यदि यह बात है, तो बस्तिया खतरनाक ज़मीन पर पांव रख रहे हैं. यदि अरस्तू जैसा महान विचारक दासों के श्रम को समझने में गलती कर गया, तो बस्तिया जैसा बौना अर्थशास्त्री मजदूरी लेकर काम करने वाले मजदूरों के श्रम को कैसे सही तौर पर समझ सकता है ? मैं इस अवसर से लाभ उठाकर अमेरिका में प्रकाशित एक जर्मन पत्र के उस एतराज का संक्षेप में जवाब देना चाहता हूँ, जो उसने मेरी रचना, Zur Kritik der Politschen Oekonomie, 1859 पर किया है. मेरा मत है कि प्रत्येक विशिष्ट उत्पादन-प्रणाली  और उसके अनुरूप सामाजिक सम्बन्ध, या संक्षेप में कहें, तो समाज का आर्थिक ढांचा ही वह वास्तविक आधार होता है, जिस पर कानूनी और राजनीतिक उपरी ढांचा खडा किया जा सकता है और जिसके अनुरूप चिंतन के भी कुछ निश्चित सामाजिक रूप होते हैं; मेरा मत है कि उत्पादन की प्रणाली आमतौर पर सामाजिक, राजनितिक एवं बौद्धिक जीवन के स्वरूप को निर्धारित करती है. इस पत्र की राय में, मेरा यह मत हमारे अपने ज़माने के लिए तो बहुत सही है, क्योंकि उसमें भौतिक स्वार्थों का बोलबाला है, लेकिन वह मध्य युग के लिए सही नहीं है, जिसमें कैथोलिक धर्म का बोलबाला था, और वह एन्थेंस और रोम के लिए भी सही नहीं है, जहाँ राजनीति का ही डंका बजता था. अब सबसे पहले तो किसी का यह सोचना सचमुच बड़ा अजीब लगता है कि मध्य युग और प्राचीन संसार के बारे में ये पिटी-पिटाई बातें किसी दूसरे को मालूम नहीं है. बहरहाल इतनी बात तो स्पष्ट है कि मध्य युग के लोग केवल कैथोलिक धर्म के सहारे या प्राचीन संसार के लोग केवल राजनीति के सहारे जिंदा नहीं रह सकते थे. इसके विपरीत, उनके जीविका कमाने के ढंग से ही यह बात साफ़ हो जाती है कि क्यों एक काल में राजनीति और दूसरे काल में कैथोलिक धर्म की मुख्य भूमिका थी. जहाँ तक बाकी बातों का सम्बन्ध है, तो, उदाहरण के लिए, रोमन गणतंत्र के इतिहास की मामूली जानकारी भी यह जानने के लिए काफी है कि रोमन गणतंत्र का गुप्त इतिहास वास्तव में उसकी भूसंपत्ति का इतिहास है. दूसरी और, डॉन क्विकज़ोट बहुत पहले अपनी इस गलत समझ का खामियाजा अदा कर चूका है कि मध्य युग के सूरमा-सरदारों जैसा आचरण समाज के सभी आर्थिक रूपों से मेल खा सकता है.

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4 thoughts on “मार्क्सवादी पारिभाषिक शब्दावली – कुछ विरासत से और कुछ …

    Girijesh Rao said:
    June 10, 2009 at 9:46 AM

    अच्छी बात । अब पढ़ कर धीरे धीरे समझना हो सकेगा ।
    इसे एक श्रृंखला या माला के तौर पर चालू रखें।

    यह मान कर चलें कि शब्दों के समाजवादी और पारम्परिक अर्थों में विभेद हो सकते हैं।वैसे ही जैसे संस्कृत में आत्मा पुल्लिंग है तो हिन्दी में स्त्रीलिङ या बलात्कार शब्द के संस्कृत में बहुत ही व्यापक अर्थ हैं लेकिन हिन्दी में इसका अर्थ यौन अपराध के रूप में रूढ़ हो चुका है।
    इसलिए बहुत ही सामान्य लगते शब्दों को परिभाषित करते चलें। जैसे – समाजवाद और साम्यवाद के अर्थ और अंतर, प्रतिक्रियावादी कौन है आदि।

    शुभकामनाएं।

    बालसुब्रमण्यम said:
    June 10, 2009 at 10:28 AM

    बहुत अच्छा प्रयास है। बुर्जुआ, सर्वहारा, हीगलवाद, आदि सरल शब्दों को भी इस सूची में शामिल करें।

    डा. रामविलास शर्मा ने मार्क्सवाद पर विशद रूप से हिंदी में लिखा है। इस विषय पर उनकी सौ से भी ज्यादा किताबें प्रकाशित हुई है, अधिकतर राजकमल प्रकाशन और वाणी प्रकाशन से। उन्होंने मार्क्सवाद के सिद्धांतों को समझाने के लिए जो शब्दावली प्रयोग की है, जहां तक हो सके, उन्हीं का अनुसरण करें। इससे इनकी एकरूपता बनी रहेगी।

    डा. शर्मा ने मार्क्स की प्रसिद्ध पु्स्तक “पूंजी” को भी हिंदी में अनुवाद किया है।

    Sudhir Kumar said:
    June 10, 2009 at 12:56 PM

    पहली बार आपके ब्लॉग पर विचरण किया और अफसोस हुआ कि इतनी देर क्यों. खैर स्नातक की पढाई के दौरान मार्क्सवाद के बारे में पढा था लेकिन उसका उद़देश्य केवल परीक्षा पास करना ही रहा. इसे मैं बेझिझक स्वीकार करता हूं. बहरहाल आपके इस ब्लाग से मैं अब मार्क्स को समझने की कोशिश तो कर सकता हूं. मार्क्स या उनके वाद की चर्चा के दौरान आपसे उम्मीद रहेगी कि उसे आप वर्तमान परिप्रेक्ष्य में जरुर रेखांकित करेंगे. कभी मेरे ब्लाग पर भी आइये और कुछ टिप्पणियों से उसकी दिशा तय कीजिए.

    दिनेशराय द्विवेदी said:
    June 10, 2009 at 4:20 PM

    इस व्याख्या के लिए धन्यवाद! हालांकि मेरी मान्यता है कि इसे और सरल व बोधगम्य बनाया जा सकता था।

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