स्वतंत्रता सेनानी और गदर पार्टी के आखिरी चिराग बाबा भगत सिंह बिलगा के निधन पर

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baba bhagat singh bilga at his 102nd year
बाबा भगत सिंह बिलगा अपने 102वें वर्ष में

स्वतंत्रता सेनानी और गदर पार्टी के आखिरी चिराग बाबा भगत सिंह बिलगा का शुक्रवार इंग्लैंड के बरमिंघम में एक निजी अस्पताल में निधन हो गया। वे करीब 102 साल के थे और उनकी सेहत खराब होने के कारण उन्हें कुछ दिन पहले अस्पताल में दाखिल करवाया गया था।बाबा जी का निधन इंग्लैंड में वहां के समय अनुसार सुबह 22 मई के दिन शुक्रवार को 11 बजे हुआ।  उनके बेटे कुलबीर सिंह ने फोन पर देश भगत यादगार कमेटी जालंधर को दी। बाबा बिलगा देश भगत यादगार कमेटी के प्रधान भी थे। उनका जन्म जालंधर के ही गांव बिलगा में अप्रैल 1907 में हुआ था।

स्वतंत्रता संग्राम में अहम भूमिका अदा करने वाले बाबा जी ने समूचे समाज को एक दिशा प्रदान की। पिता हीरा सिंह के पथ पर चल कर बाबा जी ने सदैव अपनी नहीं, बल्कि समूचे समाज की सोची। अपने जीवन के सफर में उन्हें यह चिंता सदैव सताती रही कि बेमिसाल कुर्बानियों के बावजूद देश में इंकलाबी लहर को मजबूत नहीं कर पाए। लेखन के माध्यम से इतिहास को संजोने के साथ-साथ उन्होंने लोगों को भी लिखने को प्रेरित किया। 2 अप्रैल 1907 को जन्में बाबा जी का जीवन समूचे समाज के लिए प्रेरणा स्त्रोत है।

1926 में वह अर्जेंटाइना गए और वहीं पर 1928 में गदर पार्टी से जुड़ गए और अर्जेंटाइना ब्रांच के महासचिव बन गए। इसके बाद से लगातार गदर पार्टी के सिद्धांतों के लिए संघर्ष करते रहे।

देश के स्वतंत्रता संग्राम में भी उनकी अहम भूमिका रही। 1931 में उनकी मुलाकात शहीद भगत सिंह के चाचा अजीत सिंह से हुई व देश लौटकर आजादी की लड़ाई में कूद पड़े।

आजादी की लड़ाई में उन्होंने क्रांतिकारी संगठनों के साथ भूमिगत होकर कलकत्ता, कानपुर और पंजाब में 1934-36 तक संघर्ष किया व अक्तूबर 1936 में वह अपने साथियों समेत अमृतसर में पकड़े गए।

इस पर उन्हें लाहौर किले के टॉर्चर सैंटर में दो महीने तक रखा गया। यहां से रिहाई के बाद उन्हें गांव बिलगा में ही एक साल तक रहने के आदेश दिए गए। 1938 में वह जिला जालंधर कांग्रेस कमेटी के महासचिव बने। पंजाब कांग्रेस प्रोविनशियल कमेटी लाहौर के सदस्य बने और ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी के सदस्य भी बने। 1939 में युद्ध बंधी बनाया गया और तीन साल तक चम्बलपुर जेल में बंद रखा गया।

1942 में रिहाई के बाद दोबारा अंग्रेज राज्य के खिलाफ कार्रवाई के लिए एक साल की जेल भेज दिया गया। 1971-72 में नक्सलाइट मूवमैंट के दौरान भी गिरफ्तार किए गए और दो महीनों तक पटियाला जेल में रखा गया। 1947-48 के साम्प्रदायिक दंगों के खिलाफ संघर्ष किया और इस पर उन्हें एक साल जेल भी जाना पड़ा।

1977-78 में देश भगत यादगार कमेटी के जनरल सैक्रेटरी बने और अपने अंतिम समय तक इसके प्रधान रहे। देश भगत यादगार हाल के निर्माण में भी उनकी अहम भूमिका रही।

शायद 2004 के नवम्बर महीने की पहली तारीख थी जब देश भगत यादगार भवन जालंधर के प्रांगन में गदरी सेनानियों की याद में आयोजित मेले में उन्होंने लगभग एक घंटे की तक़रीर के दौरान स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारियों की भूमिका और वर्तमान में मेहनतकश अवाम की दुर्दशा और उनके राजनैतिक दलों की खस्ता हालत तक के पहलुओं को छूआ. इस ‘मंच’ के सदस्य आश्चर्यचकित थे कि किस तरह कोई व्यक्ति अपनी उम्र के इस पड़ाव पर इतना अलर्ट, इतना जीवंत हो सकता है जबकि अधिकतर लोग 60-70 के बाद, जिसे कहते हैं, सठिया जाते हैं. लेकिन साथ ही  किसी व्यक्ति द्वारा मार्क्स से पूछे गए प्रश्न कि जिन्दगी ने उन्हें भूख और गरीबी के सिवाय क्या दिया के जवाब में उनका उत्तर कि वे दुनिया के सबसे प्रसन्नचित लोगों में से एक हैं क्योंकि उनका, “अनुभव यह कहता है कि सबसे बड़ी ख़ुशी समाज के सांझे हितों के लिए काम करने में निहित है” हमारे कानों में गूँज रहे थे. बाबा बिलगा और मार्क्स के जीवन की खुशियों और कम्युनिज्म के इस मर्म को केवल वे ही अनुभव कर सकते हैं जो उनकी तरह जिए हों.

शहीद भगत सिंह विचार मंच, संतनगर के सभी सदस्य उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं और प्रतिज्ञा करते हैं कि वर्ग रहित समाज के निर्माण के लिए बाबा जी द्वारा उठाई गई मशाल को कभी बुझने नहीं दिया जाएगा।

सुने : कारवां चलता रहेगाhttp://sites.google.com/site/bigulfebruary2009/Home/karvanchaltarahega.mp3?attredirects=0

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