कला-साहित्य-संस्कृति की वैचारिकी पत्रिका – सृजन परिप्रेक्ष्य अब ऑनलाइन हुई.

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पत्रिका – ‘सृजन परिप्रेक्ष्य’ का अंक…. ‘यहाँ देखें’

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2 thoughts on “कला-साहित्य-संस्कृति की वैचारिकी पत्रिका – सृजन परिप्रेक्ष्य अब ऑनलाइन हुई.

    drsbg said:
    May 31, 2009 at 5:55 PM

    राम राज प्रसाद जी,
    आप्के आलेख में, सारे के सारे उदाहरण्, व्यक्ति नाम आदि मार्क्स्वादि या पष्चिम के लेखकों के दिये गये है । ्क्या वास्तव में हम ( या कोई भी ), अपनी मां के बारे में जाने बिना , किसी भी मां या बाप या कुछ भी जान सकता है?
    यदि मार्क्स्वाद आदि पढने से पहले आपने ( सभी को ) अच्छी तरह से भारतीय-दर्शन, सान्ख्य, वैशेशिक ,न्याय ,मीमान्सा,वेदान्त एवम स्वयम वेदिक,उपनिषदिक साहित्य पढा होता तो अन्तर्द्रष्टि खुल जाती ओर पता होता कि समाज़ की व्याख्या सबसे पहले किसने की ,कामायनी की कथा कहां से आयी, कामायनी कौन्न थी ।
    व्याख्या, आलोचना ,समिक्षा आदि के लिये प्राचीन साहित्याचार्यों-आचार्य मम्मट,वामन,भोज,विश्वनाथ,दन्डी, हेम्चन्द, को पढें, आन्खें खुल जायेंगी,।
    हां आज की साहित्यिक स्थिति ठीक नहीं है यह सत्य है। आप्ने देखा है क्या, कि रूस या पश्चिम में गुट्वाज़ी नहीं है? न तो हमें मार्क्स से न योरोप के साहित्य से ,विचारॊ से उचित रास्ता प्राप्त होगा । इमीटेशन गहनों की बजाय शुद्द सोने के गहने प्रयोग करें, वे दुर्लभ व कष्टों से प्राप्त होते हैं, हर गली-चौराहे पर नहीं ।

    Shaheed Bhagat Singh Vichar Manch, Santnagar responded:
    May 31, 2009 at 10:35 PM

    इस टिपण्णी को ‘सृजन परिप्रेक्ष्य ‘ के पते srijanvaichariki@gmail.com पर भेजा जाना चाहिए था लेकिन इस पत्रिका का विज्ञापन इस ब्लॉग पर कुछ इस तरह से लग गया कि भ्रम पैदा हो जाना स्वाभाविक था कि यह इसी ब्लॉग की विषय सामग्री है. हालाँकि विज्ञापन की उस गेटअप को हटा दिया गया है फिरभी हम पाठको के ध्यान में लाना चाहते हैं कि अलग पत्रिका होने के कारण अपनी टिप्पणियां उपरोक्त पते पर ही भेजें.

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