इस युग का प्रधान वैषम्य : जनतन्तर कथा (34) की हिफाजित में

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“कोट, कपड़ा, आदि उपयोग-मूल्य, अर्थात पण्यों के ढांचे, दो तत्त्वों के योग होते हैं – पदार्थ और श्रम के. उन पर जो उपयोगी श्रम खर्च किया गया है, यदि आप उसे अलग कर दें, तो एक ऐसा भौतिक आधार-तत्त्व हमेशा बचा रहेगा, जो बिना मनुष्य की सहायता के प्रकृति से मिलता है. मनुष्य केवल प्रकृति की तरह काम कर सकता है, अर्थात वह भी केवल पदार्थ का रूप बदलकर ही काम कर सकता है. यही नहीं रूप बदलने के इस काम में उसे प्रकृति की शक्तियों से बराबर मदद मिलती है. इस प्रकार हम देखते हैं कि अकेला श्रम भौतिक संपत्ति का, अथवा श्रम के पैदा किये हुए, उपयोग-मूल्यों का एकमात्र स्रोत नहीं है जैसा कि विलियम पैटी ने कहा है, श्रम उसका बाप है और पृथ्वी उसकी माँ है. (मार्क्स, पूँजी, खंड 1, पृ. ६३)

“विश्व की सभी परिघटनाएं , चाहे वे मनुष्य के हाथ का फल हों अथवा प्रकृति के सार्विक नियमों का परिणाम, वास्तव में सृजन नहीं बल्कि पदार्थ के रूपों में परिवर्तन है. मानव बुद्धि जब कभी उत्पादन के विचार का विश्लेषण करती है, तो उसे केवल दो ही तत्त्व दिखाई पड़ते हैं – एक जोड़ना, दूसरा तोड़ना; यही बात मूल्य ” (उपयोग-मूल्य, हालाँकि फिजियोक्रेटों के साथ वाद-विवाद के इस अंश में वेर्री के मन में भी यह बात पूरी तरह साफ़ नहीं है कि वह किस प्रकार के मूल्य की चर्चा कर रहा है) “अथवा धन के उत्पादन के संबंध में भी लोगू होती है, जब मनुष्य द्वारा पृथ्वी, वायू, और जल को अनाज में रूपांतरित कर दिया जाता है, या एक कीड़े के चेपदार स्त्राव को रेशम में, या धातु  के अलग-अलग टुकडों को एक घड़ी में बदल दिया जाता है.” _Pietro Verri, Meditazioni sulla Economia Politica (मार्क्स, पूँजी, खंड 1, पृ. ६३)

श्रम और पण्य-मूल्य दोनों का चरित्र दुहरा है लेकिन हम यहाँ पण्य-मूल्य के दुहरे चरित्र के सामान्य विश्लेषण तक सीमित  रहेंगे. पण्य-मूल्य के दोहरे चरित्र में पहली विशेषता उसके उपयोग मूल्य से है जैसे पानी, धुप, वायू, आदि. ये सभी धन का एक रूप हैं लेकिन ये पण्य इसलिए नहीं हैं क्योंकि इसमें मानवी श्रम नहीं लगा है और इन्हें हासिल करने के लिए भुगतान के किसी भी रूप की आवश्यकता नहीं पड़ती.

पण्य की दूसरी विशेषता उसमें लगे मानवीय श्रम से सम्बंधित है जिस कारण उसका विनिमय मूल्य होता है.

अरस्तू का हवाला देते हुए मार्क्स लिखते हैं.”अरस्तू कहते हैं कि विनिमय समानता के बिना नहीं हो सकता, और समानता उस वक्त तक नहीं हो सकती, जब तक की दोनों वस्तुएं एक ही मापदंड से न मापी जा सकती हों.” “लेकिन यहाँ आकर वे (अरस्तू) ठहर जाते हैं और मूल्य के रूप का आगे विश्लेषण करना बंद कर देते हैं.

मार्क्स आगे लिखते हैं ,” अरस्तू की प्रतिभा का चमत्कार इसी बात में प्रकट होता है कि उन्होंने पण्यों के मूल्यों के अभिव्यक्ति में समानता का सम्बन्ध देखा. वह जिस समाज (गुलाम और मालिक-गुलाम) में रहते थे, केवल उसकी विशेष परिस्थितियों ने ही उन्हें यह पता नहीं लगाने दिया कि इस समानता की तह में ‘सचमुच” क्या था.(मार्क्स, पूँजी, खंड 1, पृ. 79)

“महालक्ष्मी को वह स्थान प्रिय नहीं, जहां सामंजस्य और सौन्दर्य नहीं।” सूत जी [इस युग का प्रधान वैषम्य : जनतन्तर कथा (34)] द्वारा पांडे जी के  इस कथन की स्वीकृति के  साथ हम भी सहमत हैं लेकिन यह भी जोड़ देना चाहते हैं कि यह “सामंजस्य और सौन्दर्य” गति में होने के कारण हमेशा बना नहीं रह सकता क्योंकि पांडे जी के परदादा जो  कुरता पहना करते थे वह बामुश्किल दस या पंद्रह लोगों की श्रम का फल था और अंत में जिसके पास इसे बेचने का अधिकार (अगर था तो ) वह  दस या पंद्रह पर एक  का ही था. लेकिन आज इन्होने जिस 100 रूपए की शर्ट को पहना हुआ है उस पर लगी हुई श्रम, अगर हम कहें कि, विश्व के सौ करोड़ लोगों की श्रम है तो अतिश्योक्ति नहीं होगी.

पूँजीवाद की सबसे बड़ी विसंगतियों में एक श्रम का इतने उच्च धरातल पर समाजीकरण परंतु इसके विपरीत श्रम के उत्पादों पर मुट्ठीभर लोगों का मालिकाना हक़ जिनकी संख्या निरंतर घटती जा रही  है …. यह “सामंजस्य और सौन्दर्य” दिन-प्रतिदिन घटता जा रहा है जबकि यह विसंगति और अधिक गहराती जा रही है …देखना है कि इसका क्लाईमैक्स कहाँ होता है

उपरोक्त वस्तुगत और साक्षात उदाहरण उन बुद्दिजीवियों के मुहं पर तमाचा है जो मार्क्सवाद को आयातित और अप्रासंगिक बताते हैं. बल्कि यह साम्राज्यवादी शक्तियों द्वारा शोषित  भारत जैसी अर्थव्यवस्थाओं के लिए पहले से अधिक, कहीं अधिक प्रासंगिक है.  इस बात को लेनिन ने नोट कर लिया था और मार्क्स के  शब्द “कम्युनिस्म का हौवा यूरोप पर मंडरा रहा है”  को दरुस्त करते हुए, बदले हुए हालात में उन्होंने कहा कि,” विश्व पूँजी के साम्राज्यवाद में प्रवेश करने के कारण क्रांतियों का धुरा अब यूरोप न होकर पूर्व है.”

ज्ञानदत्त पाण्डेय जी आपके इतना भर लिख देने से कि  “महालक्ष्मी श्रम से उत्पन्न नहीं होतीं, वे श्रम के लिये मानव को प्रेरित करती हैं। महालक्ष्मी को वह स्थान प्रिय नहीं, जहां सामंजस्य और सौन्दर्य नहीं।” काम नहीं चलेगा. बात को तर्क-वितर्क से आगे बढाएं.

और आपका फ़िक्र कि “सूत जी सठिया गये हैं!” का फ़िक्र करते-करते … आपके ज्ञान की विशालता कहीं आपके नाम ज्ञानदत्त के लिए खतरा न बन जाये, ज़रा संभल कर … और किसी साईकैट्रिस्ट के संपर्क में रहीएगा.

….मार्क्स के इन शब्दों “To leave an error unrefuted is to encourage intellectual immorality. ...के साथ हम अपने आलेख को विराम देते हैं और पांडे जी से आशा करतें हैं कि वे बहस को आगे बढाएँगे.

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10 thoughts on “इस युग का प्रधान वैषम्य : जनतन्तर कथा (34) की हिफाजित में

    भाई,
    इस आलेख से 99% सहमति है, निम्न एक चरण को छोड़ कर ….

    “और आपका फ़िक्र कि “सूत जी सठिया गये हैं!” का फ़िक्र करते-करते … आपके ज्ञान की विशालता कहीं आपके नाम ज्ञानदत्त के लिए खतरा न बन जाये, ज़रा संभल कर … और किसी साईकैट्रिस्ट के संपर्क में रहीएगा.”

    वास्तव में सूत जी नैमिषारण्य जाने की जल्दी में सनत को लक्ष्मी के भेद का अध्याय गोल कर गए। तो ज्ञानदत्त जी या किसी अन्य का उस से भ्रमित हो उठना स्वाभाविक है। सूत जी के इस आख्यान पर ताऊ की टिप्पणी बहुत कीमती है….

    “भाई आप श्रम से कितनी बडी लक्षमी पैदा कर सकते हैं? वो तो बिना ताऊपने के नही आसकती. यह गारंटी है. भले धीरु भाई की हिस्ट्री देख लिजिये. जो कि महान ताऊ थे ……..”

    यह सूत जी द्वारा गोल किए गए अध्याय की ओर स्पष्ट संकेत भी है। सूत जी नैमिषारण्य पहुँच गए होंगे। उन से चल-दूरभाष पर गोल किए गए अध्याय का भेद पूछा जा सकता है।

    सूत जी के प्रति सठिया जाने की टिप्पणी के प्रतिवाद में इस आलेख का उदृत चरण अत्यन्त कठोर है और उचित नहीं है। इस से विमर्श को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। मेरा अनुरोध है कि इस चरण को हटा दिया जाए।
    मेरा अनुरोध है कि

    Shaheed Bhagat Singh Vichar Manch, Santnagar responded:
    May 26, 2009 at 9:31 PM

    इस मंच की नीति अनुसार सैद्धांतिक आलोचना करते हुए किसी प्रकार की छूट नहीं दी जा सकती. जब लाल फ्राक वाली बहनों के इतने दल हों और वाम के अनगिनत ट्रेंड हों, विपर्य के इस दौर में जब सर्वहारा सुप्त अवस्था में हो तो उस वक्त हम एंगेल्स के इन शब्दों “चिन्तनं का सबसे गंभीर कार्य विपर्य के दौर में होता है’ का हवाला देना चाहेंगे और साथ ही हम स्पष्ट कर देना चाहेंगे कि जिस मार्क्सवाद को मार्क्स, एंगेल्स, स्तालिन और माओ ने विकसित किया है, उसकी हिफाजित खुशामद से नहीं हुई थी, भारत की तरह यूरोप का रेनेसां युग का बुद्धिजीवी बौना नहीं था और न ही नर्म शब्दों में बात करने की मार्क्सवादी परम्परा थी.

    भारत के बुद्धिजीवी वर्ग के बौने होने का कारण उसकी व्यक्तिगत कमजोरी न होकर उसके वस्तुगत ऐतिहासिक विकास में निहित है.अंग्रेजी साम्राज्यवाद ने यहाँ कब्जे द्वारा इसे कालोनी बनाकर इसकी पूंजीवाद के विकास की ओर अग्रसर स्वाभाविक और आन्तरिक गति को अवरुद्ध कर दिया जिसका एक परिणाम यहाँ के बुद्धिजीवी वर्ग में बौनेपन और कुंठाग्रस्त प्रवृति की विकृति के रूप में सामने आया. अंतर्जाल पर जारी चर्चाओं – टिप्पणियों में एक दूसरे को यूं ही ‘मस्का लगाना और साधुवाद’ इसी बौनेपन का एक द्योतक है. ऐसे में व्यक्तिगत टिपण्णी केवल पाण्डेय जी के व्यक्तित्व पर कुठारघात नहीं है बल्कि इस की जद में हम सभी शामिल हैं.

    ‘साधुवाद’ और ‘धन्यवाद’ जैसे शब्दों द्वारा आप मार्क्सवाद की हिफाजित नहीं कर सकते. भारतीय बुद्धिजीवियों के बौनेपन को नंगा करने का कार्यभार भी अब सर्वहारा के उन्नत कन्धों पर है.

    और अंत में जब तक विचारधारा के क्षेत्र में आप सभी समान दीखने वाली विचारधाराओं को हरा नहीं देते, दो लाईनों के संघर्ष में सही लाइन “होलसेल’ नहीं बन जाती और जब तक मार्क्सवाद विकसित होकर अगली उच्चतर बुलंदियों को नहीं छूता , जब तक गुणात्मकता की उच्चतर बुलंदी संख्यात्मक वृद्धि की गारंटी नहीं होती, मार्क्सवाद एक अकेडमिक विषय बना रहेगा, मार्क्स के अनुसार यह विज्ञान ‘कर्मों का मार्गदर्शक” नहीं बन पायेगा.

    इसके अलावा, अगर आप को लगे की हम ‘वामपंथी कम्यूनिस्म, एक बचकाना मर्ज़’ की और अग्रसर हैं तो ज़रूर आगाह कीजिएगा.

    दिनेशराय द्विवेदी said:
    May 26, 2009 at 11:00 PM

    मुझे नहीं लगता कि

    “सूत जी सठिया गये हैं!”

    और

    “सूत जी सठिया गये हैं!” का फ़िक्र करते-करते … आपके ज्ञान की विशालता कहीं आपके नाम ज्ञानदत्त के लिए खतरा न बन जाये, ज़रा संभल कर … और किसी साईकैट्रिस्ट के संपर्क में रहीएगा.”

    जैसी टिप्पणियाँ किसी वैचारिक संघर्ष का हिस्सा हो सकती हैं।

    Shaheed Bhagat Singh Vichar Manch, Santnagar responded:
    May 26, 2009 at 11:32 PM

    दरुस्त,
    “सूत जी सठिया गये हैं!” और “सूत जी सठिया गये हैं!” का फ़िक्र करते-करते … आपके ज्ञान की विशालता कहीं आपके नाम ज्ञानदत्त के लिए खतरा न बन जाये, ज़रा संभल कर … और किसी साईकैट्रिस्ट के संपर्क में रहीएगा.”

    इस एक टिपण्णी जो मार्क्सवाद में कोई इजाफा तो करती नहीं पर यूं ही पीडा का सबब बनी हुई है. इसे हटी हुई
    समझिये. हम इसे वापस लेते हैं.

    रंगनाथ सिंह said:
    May 27, 2009 at 12:45 AM

    संभवतः यह हिन्दी का पहला ब्लाॅग है जिसपे कहने से ज्यादा सुनना ही ठीक है। अब इसे नियमित रूप से पढ़ुंगा। कभी कभी अपनी शंकाएं और प्रश्न रखने की कोशिश करूंगा।

    jagseer said:
    May 27, 2009 at 6:43 AM

    ज्ञानदत्त पाण्डेय विरोधों की एकता को “सामंजस्य और सौन्दर्य” नाम देकर इसकी धार के तीखेपन को हल्का बनाने के लिए प्रतिबद्ध दिखते हैं.

    मैं बहुत आभारी हूँ आप का कि आप ने उस अंश को हटाया।

    वास्तव में जब भी हम विमर्श के लिए कोई ज्वलंत प्रश्न सामने रखते हैं तो उस पर विमर्श से बचने वाले लोग विमर्श की दिशा बदलने के लिए इसी तरह की बात करते हैं। जिस से ध्यान महत्वपूर्ण बिंदु से हट जाए।

    यदि कोई किसी बिंदु को विमर्श के लिए लोगों के बीच लाता हैं तो यह दायित्व भी उस का ही है कि वह इस बात की रक्षा करें कि विमर्श के लिए प्रस्तुत बिंदु ही विमर्श से गायब न हो जाए। इस कारण से मेरी व्यक्तिगत समझ है कि व्यक्तिगत आक्षेपों को किनारे कर देना ही ठीक है। इस विनम्रता से आक्षेप करने वाले को ही लज्जा का अनुभव होगा और विमर्श के मूल विषय से भटकाव भी नहीं होगा।

    Shaheed Bhagat Singh Vichar Manch, Santnagar responded:
    May 27, 2009 at 9:32 AM

    रंगनाथ सिंह जी,
    मंच पर आपका हार्दिक स्वागत है.

    Shaheed Bhagat Singh Vichar Manch, Santnagar responded:
    May 27, 2009 at 9:52 AM

    इस अमूल्य मार्गदर्शन के लिए हार्दिक धन्यवाद. आशा है कि आप भविष्य में भी अपनी आपत्तियां दर्ज कराते रहेंगे.

    जैसे “महालक्ष्मी को वह स्थान प्रिय नहीं, जहां सामंजस्य और सौन्दर्य नहीं।” एक वैचारिक जुमला है, जिससे विमर्श में कोई योगदान नहीः होता, पर एक बौद्धिक आतंक पैदा होता है।

    उसी तरह “सूत जी सठिया गये हैं!” एक व्यक्तिगत जुमला है, जिससे विमर्श में कोई योगदान नहीं होता, पर व्यक्तित्व को निशाने पर ला कर उसके कथ्य को कमजोर करने का शुभ कार्य तो संपन्न होता ही है।

    ज्ञान जी ने एक साथ दोनों हथियार चलाए हैं….
    जाहिरा तौर पर दोनो का प्रतिकार कोई गलत बात नहीं है।

    विनम्रता अपनी जगह है ही, और दोनो ही कार्य इसके साथ ही संपन्न किए जा सकते हैं, किए जाने ही चाहिएं।

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