कांग्रेस की जीत पर अफलातून और सुरेश चिपलूनकर के दुःख में हम भी शरीक होते मगर …

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जिस देश का प्रधानमंत्री स्वयं स्वीकार करे की देश की 7० प्रतिशत जनता 20 या 20 रूपए से कम पर गुज़ारा करती हैं वहां सुरेश चिपलूनकर [ कांग्रेस के झूठ को पहचानना जरूरी है ] का यह कहना कि जनता को अपनी गरीबी या महंगाई जैसे मुद्दों से कोई वास्ता नहीं हैं, बात ज़रा गले से उतरी नहीं.

वैसे उन्होंने स्वयं स्वीकार कर लिया है कि वे भारतीय जनता पार्टी की हार से दुखी हैं, ऐसे में जनता जनार्दन को दोषी करार दे देना ! कहीं उन्हें यह भ्रम तो नहीं कि वे सर्वज्ञाता हैं और जनता बेवकूफ.

वैसे आज से 40-50 साल पहले देहाती विशेषकर किसान को बेवकूफ समझा जाता था, इसलिए नहीं कि वास्तव में किसान या देहाती बेवकूफ होते हैं. उस ज़माने में किसान, मजदूर और देहाती का चरित्र मेहनतकश का था और मेहनतकश परजीवी वर्गों को हमेशा बेवकूफ दीखते हैं चाहे वह किसान रहा हो जो बीज को शुष्क, या भिगोकर, गहरे में या धरती के ऊपर बिखेरकर और हर मौसम, हर प्रकार की भूमि में उसे उगाने का ज्ञान रखता था.

समाज शास्त्र कभी जनता को दोषी नहीं ठहराता अलबता वह सोई हुई हो सकती है, सोना कोई बुरी बात नहीं, किसी को उसे उठाना नहीं आता और वह मनोगत तरीके से दोष जनता पर मढ़ दे ? अगर हम समझतें हैं कि जनता हमारी मनोगत इच्छाओं का ख्याल करे, तो हमारी ओर लाखों नहीं करोडों उँगलियाँ उठ जाएँगी लेकिन अपनी इस मनोगत बीमारी की वजह से हो सकता है हमें एक भी दिखाई न दे.

वैसे सुरेश जी महंगाई से अनुभववादी तरीके से परेशान हो जाते हैं, ये महंगाई, ज़रा खोलकर हमें भी बताएं कि महंगाई कम होगी तो उस मजदूर वर्ग की जिसे प्रधानमंत्री 20 रूपए से कम पर गुजारा करते बताते हैं मजदूरी कम क्यों नहीं होगी ? बात ज़रा सिद्धांत की है सिद्धांत के क्षेत्र में रहकर एक राजनितिक अर्थशास्त्री की नज़र से ज़बाब दीजिएगा. और आतंकवाद पर वे चिंतित हैं मगर एकांगी तरीके से, समग्रता से नहीं, उन्हेँ हम दीपायन बोस के आतंकवाद के बारे में विभ्रम और यर्थाथ के अध्ययन की सलाह देंगे और इस पर एक विस्तृत टिपण्णी की अपेक्षा भी करेंगे.

अफलातून जी वास्तव में अफलातून हैं, उसी यूनानी परम्परा के जिसने जेल से भागने से इंकार कर दिया था कि इससे राज्य का पवित्र कानून टूटता है, उसी राज्य का जिसमें गुलाम और मालिक दो वर्ग थे और जहर का प्याला अपने लबों से लगा लिया मगर राज्य के तर्क पर आंच नहीं आने दी. ये बात करेंगे मगर शब्दों के हेरफेर के साथ. अब इन्होनें एक नया शब्द जोड़ बिठा दिया  “संघर्षशील प्रतिपक्ष” ? इसे अगर परिभाषित कर लें तो हम भी कुछ आगे बढ़ें.

वैसे सुरेश जी की एक बात से “लेकिन एकमात्र खुशी इस चुनाव रिजल्ट की यही है कि इन तीनों से पीछा छूटा” हम भी सहमत हैं लेकिन इसके साथ हम ये भी जोड़ देना चाहते हैं कि वामपंथी, समाजवादी, कम्युनिस्ट, जनशक्ति, बहुज़न जैसे शब्दों का प्रयोग करने से आप और हम (अवसरवादी) वे नहीं हो जाते जो इन शब्दों के अर्थ हैं लेकिन आप जैसे विचारवादी या आदर्शवादी लोग जो विचार को प्रथम और पदार्थ को गौण मानते हैं मानेंगे थोड़े ही. कोई लाख सर पटक ले तब भी आप नहीं मानेगे कि मनुष्य को उसके भौतिक हालात ही किसी विचार का कायल बनाते हैं. हाँ अपवाद हो सकतें हैं लेकिन हम वर्ग की बात कर रहें हैं. यहाँ अटल जी, मनमोहन सिंह और बहुतेरे वामपंथी, (एक का ज़िक्र हमने भी किसी अख़बार में पढ़ा कि वे राजस्थान से विधायक हैं परंतु पीले कार्डधारी हैं, खजाने से तनख्वाह नहीं लेते और राशन की दुकान पर उन्हें लाईन में खड़े देखा जा सकता है ), साफ़ और स्वच्छ छवि के हैं.

आप मिलना चाहेंगे उनसे ? मगर क्या फायदा. असल सवाल तो उन दलों का है – उनके चरित्र का है और साथ ही क्या बुर्जुआओं को साफ़ और स्वच्छ छवि के सेवक नहीं चाहिएँ?

एक कन्फ्यूजन हो सकता है कि कहीं हमने कांग्रेस को उस 70 प्रतिशत का सच्चा प्रतिनिधि तो घोषित नहीं कर दिया. बिल्कुल नहीं. बस विकल्पहीनता.

कुछ भविष्यवाणी हो सकती है. 20 प्रतिशत लोगों का लोकतंत्र जिसे हम बुर्जुआ अधिनायकवाद कहते हैं (इसलिए नहीं कि ऐसा हम कहते हैं यह तो हर कोई बगैर सिद्धांत के अपने अनुभव से ही समझता है) और अधिक मज़बूत हुआ है और आने वाले समय में श्रम और पूँजी की झड़पें त्वरित होंगी. इसके लिए हमें तैयार रहना चाहिए.

मार्क्सवाद से तो तथाकथित मार्क्सवादी भी मुनकर हो गएँ हैं आप की तो बात छोड़िए. लेकिन लेनिन द्वारा गद्दार कायुत्सकी के लिए कहे गए शब्द कि बुर्जुआ लोकतंत्र जहाँ पूँजी का राज होता है वहां मजदूर वर्ग संसदीय ढंग से सत्ता हासिल कर लेगा यह कोई लुच्चा और शोहदा ही कह सकता है. और लेनिन के यह शब्द उनकी मृत्यु के बाद चिल्ली और इंडोनेशिया में (केवल इंडोनेशिया में जहाँ कम्युनिस्ट संसदीय ढंग से मज़बूत हो रहे थे, 10 लाख लोगों को यह कहकर कत्ल कर दिया गया कि वे कम्युनिस्ट हैं) सही साबित हुए.

हाँ आप गलती न करें कि हम कोई भारतीय माओवाद या नकसलवाद का नया संस्करण हैं इसके लिए आप हमारा नक्सलबाड़ी और उत्तरवर्ती चार दशक-1 देखें.

और अब दो टूक बात. बुर्जुआ दलों का तो ऐसा होता ही है लेकिन भारतीय कम्युनिस्ट दलों का स्वरूप भी संघाधिपत्यवादी रहा है. आप दो लाईनों के बीच लम्बा और सतत संघर्ष चलाए बगैर किसी बोलेश्विक चरित्र की पार्टी के निर्माण की प्रक्रिया पूरी नहीं कर सकते. यह गैर वैज्ञानिक है, गैर मार्क्सवादी है, विचारवादी और आदर्शवादी तरीका है जिसकी परणिति संशोधनवाद और दुस्साहसवाद ही होती है.

शहीद भगत सिंह विचार मंच उन बुद्धिजीवियों से यह स्पष्ट कर देना चाहता है कि भारत की वे पार्टियाँ जिन्हें कम्युनिस्ट पार्टियाँ कहा जाता (और यहाँ तक की विश्व की 99 प्रतिशत कम्युनिस्ट पार्टियाँ भी) अपने उल्ट में बदल चुकीं हैं. हमें इसका अफ़सोस नहीं करना चाहिए क्योंकि सिद्धांत कहता है कि चीजें देर-सवेर अपने विपरीत में बदल जाती हैं. आज बीते युग की तथाकथित कम्युनिस्ट पार्टियों को इकठ्ठा करके भानुमती का कुनबा जोड़ने से कुछ हासिल नहीं होने वाला. आज पार्टी गठन की अपेक्षा पार्टी निर्माण प्रमुख है.

हम उन बुद्धिजीवियों से जो श्रम को धन (यहाँ श्रीमान अफलातून द्वारा प्रस्तुत सुनील जी के उस लेख [ तलाश एक नए मार्क्सवाद की (२) : ले. सुनील ] का जिक्र भी करना ज़रूरी समझेंगे जिसमें उन्होंने बिना पूँजी और मार्क्स पढ़े किसी नए सिद्धांत को लिखने की सलाह दे डाली थी, उसमें उन्होंने मार्क्स  पर आरोप लगाया था कि वे श्रम की बिनाह पर धन के स्रोत में प्रकृति की भूमिका से मुनकर हैं जबकि पूंजी के प्रथम खंड के प्रथम अध्याय में मार्क्स ने उन अर्थशास्त्रियों को गलत ठहराया था जो श्रम को ही एकमात्र धन का स्रोत मानते थे) और ज्ञान का स्रोत मानते हैं, इस लम्बी और पीडादायक प्रक्रिया का हिस्सा बनने का आह्वान करते हैं ताकि वे अपने सर पर ज्ञान के इस क़र्ज़ का कुछ भुगतान करके सर्वहारा की अदालत में अपने कर्मों द्वारा कुछ तो सच्चे हों.
आमीन !

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14 thoughts on “कांग्रेस की जीत पर अफलातून और सुरेश चिपलूनकर के दुःख में हम भी शरीक होते मगर …

    सुबह सुबह यह खोपड़ी हिलाऊ आलेख पढ़ कर काम पर जा रहा हूँ। इस आलेख पर टिप्पणी करने को फिलहाल कुछ नही।

    Upadhyayjee said:
    May 19, 2009 at 8:58 AM

    देखिये कांग्रेस ने जनता को इतने वर्षो तक गुमराह किया है उससे खुश होने वाली कोई बात नहीं है. पूरा चुनाव में कंधार , बाबरी और कमुनालिस्म का बहस करते रहे और चुनाव जीतते राहुल और विकास चिला रहे हैं. इसी को कहते हैं राजनीति.

    Shahi said:
    May 19, 2009 at 10:38 AM

    I read
    “aatankwad ke bare me vibhram aur yatharth” by deepayan Bose .
    Ek baat jo saaf samajh me aati hai vo ye hai ki aap log poori tarah se bike hue hain Dushmano ke hathon vo aapko karodo rupee de rahi hai bharat ke kisano aur majdooron ko bhadkane ke liye.

    Are yahan ke kisan aur majdoor itne hi samjhdar hote ki itni kathin language me likhe is ghosnapatr ko samjh pate to aaj unki ye halat na hoti jo aap logon ne kar rakhi hai.

    Nepal , Russia ,China , India me jahan kahi bhi Marxists aandolan hue kewal lakhon bargalaye gaye majdooron aur kisanon ki maut ke siwaye unhe kuch mila ho to bata do.

    Are Jis mahan Bhagat singh ke naam par tumne ye blog likha hai usi ki kuch laaj rakh lete. Jisne apni maatrbhoomi ke liye apne praan tyage na ki apne sathion ko tumhari tarah bargalane ke liye.

    Sirf ek cheej hi aisi hai jiska tum log fayeda utha rahe ho vo hai in kisanon aur majdooron ka anpadh hona jis din vo padh likh jayenge ve Marxism naam ki is burai ko jad se ukhad fenkenge jaise duniya ke doosre deshon me kia.

    Are bewk…f insaan in lakhon gareeb logon ko maut se bachane ke liye hi loktantra bana hai taki vo apni sarkar bana sake aur apni halat sudhar saken.Ab tum itna bhi nahi karwa sakte in netaon se to tum aandolan kya chalaoge….!!!!

    Agar ek anpadh majdoor hi is desh par raj karega to ye dessh agle hi din gulam bana liya jayega paschimi duniya ke deshon dwara. Jaisa ki doosre communist countries me hua hai.

    AGAR ITNI HI HAMDARDI HAI IN MAJDOORON SE TO INKI SAKCHARTA,SALARY BADHANE KE LIYE ANDOLAN KHADA KARO NA KI INKO BARGALA KAR MAUT KE MUNH ME DALNE KE LIYE.

    AGAR AAJ TUM LOGON NE YE SAKARATMAK AANDOLAN KIYE HOTE TO INKI JINDAGI SAYAD SUDHAR GAYI HOTI IS DESH ME TUMHARA BHI NAAM AUR SAMMAAN HOTA .

    EK BAAT AUR YE “AAMIN” SABD LAST ME IATEMAL KARNE KA KYA MATLAB HAI KAHIN IN MAJDOOR BHAION KA DHARM PARIVARTAN TO NAHI KARWANE JA RAHE HO? KYONKI KOI MUSLIM DESH YA MUSALMAN TUMHARI IS CHAAL ME PHANSNE WALA NAHI HAI KOI HO TO BATANA JAROOR.

    JAI HIND.

    suresh chiplunkar said:
    May 19, 2009 at 11:16 AM

    सबसे पहले मेरे चिठ्ठे का उल्लेख करने हेतु धन्यवाद। एक बार और ध्यान से पढ़िये मैंने कहीं भी “जनता जनार्दन” को “दोषी” करार नहीं दिया है, अलबत्ता मैं “आश्चर्यचकित” अवश्य हूँ। आश्चर्यचकित होने और जनता पर दोष मढ़ने में काफ़ी अन्तर है। रही बात “सर्वज्ञाता” होने की, तो मुझे इस बात का बि्लकुल भ्रम नहीं है, क्योंकि “सर्वज्ञाता” होने का एकमात्र हक “हँसिये-हथौड़े” वालों को ही है। कल ही एक और महान “सेकुलर” चिठ्ठे पर भी मैंने टिप्पणी की है कि “मैं तो एक मूढ़ व्यक्ति हूँ”, न तो मैं बड़ी-बड़ी ना समझ में आने वाली पुस्तकें पढ़ता हूँ, न ही वैसा लिख पाता हूँ… :)। मैंने तो अपनी असफ़लता को भी खुल्लमखुल्ला स्वीकार किया है कि “हम हिन्दुओं में स्वाभिमान जगाने में, उन्हें देश के भीतर पनप रहे “खामोश देशद्रोह” के बारे में समझाने में फ़िलहाल असफ़ल हैं…”, फ़िर हम काहे के सर्वज्ञाता? सर्वज्ञाता तो आप हैं, क्योंकि आप “समाजशास्त्र”, “मार्क्सवाद”, “यूनानी परम्परा” आदि सभी पढ़े हुए हैं और जिन्हें सभी समस्याओं का हल मालूम है…

    बहरहाल, अकेले प्याज़ के मुद्दे पर जब भाजपा सरकार गिर सकती है तो सभी वस्तुओं के गत 5 साल में तीन गुना महंगे होने पर भी सरकार का न गिरना “आश्चर्यजनक” क्यों नहीं है, यह मैं समझना चाहूँगा… वह भी आसान भाषा में, बोझिल भाषा में नहीं…।

    Shahi said:
    May 19, 2009 at 11:39 AM

    Lagta hai meri baton ka in Commies ke pas hindi me koi jawab nahi hai tabhi to ye itni kathin language me apni baten rakhte hain taki desh ke anpadh majdoor ko murkh banaya ja sake……

    GAREEBON KE IN MASEEHAON NE HI UNKI SABSE JYADA BAAT LAGAYI HAI…..

    YAKEEN NA HO TO BENGAL JAKAR DEKH LO JAHAN SARE SABHYA BANGALI RAJYA CHOD KE BHAG RAHE HAIN AUR YE RAJYA KE SARVHARA SAMAJ KO AUR KANGAL BANANE ME LAGE HAIN…….

    JAI HO SARVHARA SAMAJ KI JO INHE APNE SIR PE LADE HUE BOJH TALE DABA JA RAHA HAI…..

    JANTA AB JAAG RAHI HAI……INKE DIN LADNE ME AB DER NAHI….

    JHOOTH KE PULINDE AUR NAFRAT PE TIKE AANDOLAN JYADA DINO TAK NAHI CHALTE…

    manoj said:
    May 19, 2009 at 5:26 PM

    जुते मारो सालो को देश के इन गद्दारो को, केवल चुनाव जीत जाने से इनके अपराध कम नहीं होंगे

    E-Guru Rajeev said:
    May 19, 2009 at 10:10 PM

    Main Chiploonkar ji se sahmat hoon, Aap ka gyan bhi aadar ka patr hai .
    Par Chiploonkar ji satya ke jyada kareeb hain.

    E-Guru Rajeev said:
    May 19, 2009 at 10:16 PM

    Sambhav hai ki meri soch galat ho, par jo hai so aapke samne hai. 🙂

    kumarendra singh sengar said:
    May 20, 2009 at 12:32 AM

    चलिए अब यह बकवास बन्द कीजिए और चापलूसी के उस नाटक का हिस्सा बनिए जिसमें अब राहुल बाबा, मीडिया के युवराज को मंलिमंडल में शामिल किये जाने के दृश्य दिखाई देंगे।
    ‘‘जय हो चारण-भाट परम्परा की’’

    दिनेश जी ने सुबह पढा मुझे अभी मिला समय रात के तीन से ज़्यादा बज चुके हैं अब टिपियाने की हिम्मत नहीं

    vijayshankar said:
    May 20, 2009 at 3:29 AM

    क्या बात करते हैं चिपलूणकर जी, आप तो लोगों को इतने वर्षों तक जोड़े रहने वाली मजार के नाम पर भी गलत-सलत लेख लिखा करते हैं. आप देश की हर जुड़ने वाली धमनी और शिरा को तोड़ देना चाहते हैं. मैं जानता हूँ कि आप जैसे भगोड़े लोग अपने आकाओं को खुश करने के लिए यह काम करते हैं. एक लेख में आपने आरक्षण का विरोध इसलिए किया कि आपके बेटे या भतीजे को पिछड़ना पड़ा. आप व्यक्तिगत स्वार्थों को समाज से जोड़ देते हैं! भारतीय समाज के बारे में सोचना शुरू कीजिये. दिल को तस्कीन हासिल होगी. किसी मानव-मात्र या जीव-जगत के प्रति इतनी घृणा रखना महाकाल को भी अच्छा नहीं लगता!
    अन्यथा आपके फार्मूले के हिसाब से आपको तो मध्य प्रदेश जैसी पवित्र और निर्विवाद जगह से घर-बार बेचकर महाराष्ट्र में नफ़रत की नई भट्टी सुलगानी चाहिए.
    माना कि संघ ने आपको जीते जी नरपिशाच बना दिया है लेकिन अब भी मनुष्य बनाने का अवसर है. भारतीय हिन्दू आपको माफ़ कर देगा. लेकिन रावण को कितना समझाया गया था! कुछ हुआ?

    अब आप कितनी नफ़रत फैलायेंगे. वैज्ञानिक तथ्य यह है कि एक हद के बाद दूसरों से नफ़रत करने वाला आदमी अपने प्रिय लोगों से भी नफ़रत करने लगता है और उसे इसका पता भी नहीं चलता. यह खतरनाक मनोवैज्ञानिक स्थिति होती है!!

    समय said:
    May 27, 2009 at 12:29 PM

    बहुत खूब.
    शशि जी ने क्या खूब कहा है कि ये लोग इतनी कठिन भाषा में अपनी बात रखते हैं ताकि देश के अनपढ़ मजदूर को मूर्ख बनाया जा सके.
    भई वाह.
    यह कठिन शब्दाबली इन जैसे समझदारों तक को तो समझ नहीं आती, इनके ऊपर से निकल जाती है..और अनपढ़ मजदूर इसी कठिन भाषा को समझ कर
    बरगला रहे हैं..
    अब क्या कहा जा सकता है?

    जनता जब वाकई में जागेगी, तब वह आसानी से तय कर लेगी कि किनके दिन लदने वाले हैं.

    शायद आपने इन लोगों को जबाब देने लायक भी नहीं समझा, एकदम ठीक है.

    jagseer said:
    May 27, 2009 at 3:09 PM

    कई महीनों पहले श्री सत्यम वर्मा द्वारा प्रेषित यह ईमेल प्राप्त हुई थी;

    नई दिल्ली, 10 जनवरी।
    भगतसिंह जन्मशताब्दी वर्ष के अवसर पर प्रगतिशील साहित्य के प्रमुख वितरक `जनचेतना´ की ओर से आयोजित साहित्य प्रदर्शनी पर मथुरा में संघ परिवार से जुड़े कुछ तत्त्वों ने कल हगामा मचाया और मजदूर अखबार `बिगुल´ की प्रतियां जला डालीं।

    जनचेतना तथा राहुल फाउण्डेशन ने इस घटना की कड़ी निन्दा करते हुए उक्त साम्प्रदायिक तत्वों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की है।

    कल दोपहर मथुरा शहर के बी.एस.ए. डिग्री कालेज के गेट पर जनचेतना की पुस्तक प्रदर्शनी चल रही थी कि अपने आपको संघ परिवार से जुड़ा बताने वाले कुछ युवकों ने आकर वहां प्रदर्शित `बिगुल´ अखबार के दिसंबर अंक में गुजरात चुनाव के सम्बन्ध में प्रकाशित समाचार को लेकर हंगामा शुरू कर दिया। वे धमकियां दे रहे थे कि “हिन्दुत्व´´ के खिलाफ प्रचार करने वालों का गुजरात के मुसलमानों और उड़ीसा के ईसाइयों से भी बुरा हाल करेंगे। कालेज के एक शिक्षक तथा छात्रों द्वारा बीच-बचाव की कोशिशों के बावजूद उन्होंने हंगामा और गाली-गलौच जारी रखा तथा बिगुल अखबार की सभी प्रतियों को जला दिया।

    उन्होंने प्रदर्शनी में भगतसिंह की `मैं नास्तिक क्यों हूँ´ और `जाति-धर्म के झगड़े छोड़ो, सही लड़ाई से नाता जोड़ो´ जैसी पुस्तिकाओं और राधामोहन गोकुलजी, राहुल सांकृत्यायन आदि सहित अन्य पुस्तकों को भी फाड़ने की कोशिश की और प्रदर्शनी वाहन में तोड़फोड़ का प्रयास किया और उसे आग लगाने की धमकी दी।

    स्थानीय नागरिकों के एक प्रतिनिधि मंडल द्वारा आज मथुरा के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक से मिलने के बाद एस.एस.पी. ने इस मामले में तत्काल प्राथमिकी दर्ज करके कार्रवाई के आदेश दिए हैं।

    इस बीच उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती तथा केंद्रीय गृह मंत्री को `जनचेतना´ द्वारा भेजे गए ज्ञापन में कहा गया है कि पिछले कुछ माह के दौरान `जनचेतना´ की सचल पुस्तक प्रदर्शनियों को साम्प्रदायिक तत्वों बार-बार निशाना बनाए जाने तथा सभी जगह हंगामा करने वालों की एक जैसी भाषा से स्पष्ट है कि एक सुनियोजित षड्यंत्र के तहत ऐसा किया जा रहा है।

    मालूम हो कि भगतसिंह जन्मशताब्दी वर्ष के अवसर पर `जनचेतना´ द्वारा पूरे हिंदी भाषी क्षेत्र में प्रगतिशील तथा क्रान्तिकारी साहित्य की सचल पुस्तक प्रदर्शनियां आयोजित की जा रही हैं। इन प्रदर्शनियों में जगह-जगह बजरंग दल, विहिप और संघ से जुड़े लोग धमकियाँ देते रहे हैं या हंगामा करने की कोशिश करते रहे हैं। पिछले 11 अक्टूबर को मेरठ में बजरंग दल के लोगों ने राहुल फाउण्डेशन द्वारा प्रकाशित भगतसिंह, राधामोहन गोकुलजी, राहुल सांकृत्यायन आदि की पुस्तकों तथा साम्प्रदायिकता विरोधी पर्चों-पुस्तिकाओं को लेकर हंगामा किया था तथा पुलिस में झूठी शिकायत दर्ज कराई थी। उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर, हापुड़, मुरादाबाद आदि शहरों के अलावा जयपुर में `जनचेतना´ की प्रदर्शनियों के दौरान संघ परिवार से जुड़े लोग आकर बार-बार उलझते और धमकियाँ देते रहे हैं। गत नवंबर में दिल्ली के रोहिणी क्षेत्र में आयोजित पुस्तक प्रदर्शनी में कुछ लोगों ने “बजरंग दल वालों” को भेजने और “देख लेने” की धमकी दी थी।

    जनचेतना की अध्यक्ष एवं सुपरिचित लेखिका कात्यायनी ने कहा है कि हर प्रकार के प्रगतिशील, जनपक्षधर, क्रान्तिकारी साहित्य को जन-जन तक पहुंचाने के जनचेतना एवं राहुल फाउण्डेशन के अभियान को ऐसी धमकियों से हरगिज रोका नहीं जा सकता। उन्होंने कहा कि ऐसी कार्रवाइयां साम्प्रदायिक व फासिस्ट ताकतों की बौखलाहट को ही दर्शाती हैं। इस मुहिम को अब और तेज किया जाएगा। उन्होंने सभी जनपक्षधर लेखकों, पत्रकारों, प्रकाशकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं जनसंगठनों से जनचेतना पर इन हमलों का विरोध करने की अपील की है।
    सत्यम
    कृते, जनचेतना फोन : 9910462009/27296559 •

    डी-68, निरालानगर, लखनऊ-226020 •
    सी-74, एस.एफ.एस. फ्लैट्स, सेक्टर-19, रोहिणी, दिल्ली-110089 •
    जाफरा बाजार, गोरखपुर-273001

    अब समझ में आया की ये लोग क्यों ‘सरस्वती’ के दुश्मन हैं.

    Suresh Chiplunkar said:
    June 7, 2009 at 7:46 PM

    काफ़ी दिनों बाद इधर आना हुआ। विजयशंकर जी ने मुझे “भगोड़ा”, “नरपिशाच”, “रावण” घोषित कर दिया, मैं बुरा नहीं मानता… क्योंकि जैसा उन्होंने मेरी मनोवैज्ञानिक स्थिति के बारे में कहा है, मैं भी उनके बारे में वैसा ही सोचता हूँ… इसलिये माफ़ किया…। लेकिन एक बात अवश्य कहना चाहूँगा कि विचारों के दो छोर पर खड़े लोग क्यों खामखा अपनी टिप्पणी इधर-उधर करते रहें, ना तो विजयशंकर जी की बातों से मैं बदलने वाला हूँ, ना ही मेरी बातों से विजयशंकर जी प्रभावित होंगे… इसलिये अपने-अपने रास्ते चलें यही ठीक रहेगा… मैं अपना लिखूं आप अपना लिखें, जिसे पढ़ना होगा वह पढ़ेगा, काहे व्यर्थ में बहस करके एक दूसरे को रावण और नरपिशाच कहें…। वैसे संघ परिवार को “संस्कार” सिखाने के बहाने कई विद्वान लेख लिखते रहते हैं लेकिन खुद अपनी भाषा पर उनका ध्यान नहीं जाता। बहरहाल… हो सकता है कि यह मेरी इधर की आखिरी विजिट हो और विजय जी भी शायद मेरे ब्लॉग पर नहीं आयेंगे क्योंकि नरपिशाच के ब्लॉग पर जाकर क्या फ़ायदा। आप अपने घर में खुश… मैं अपने घर में, नमस्कार और अलविदा…

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