मई दिवस का इतिहास

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अलेक्जेण्डर ट्रैक्टनबर्ग

अनुवाद : अभिनव सिन्हा

मई दिवस का जन्म काम के घण्टे कम करने के आन्दोलन से अटूट रूप से जुड़ा हुआ है। काम के घण्टे कम करने के इस आन्दोलन का मज़दूरों के लिए बहुत अधिक राजनीतिक महत्त्व है। जब अमेरिका में फैक्ट्री-व्यवस्था शुरू हुई, लगभग तभी यह संघर्ष उभरा।

हालाँकि अमेरिका में अधिक तनख्वाहों की माँग, शुरुआती हड़तालों में सबसे ज्यादा प्रचलित माँग थी, लेकिन जब भी मज़दूरों ने अपनी माँगों को सूत्रबद्ध किया, काम के घण्टे कम करने का प्रश्न और संगठित होने के अधिकार का प्रश्न केन्द्र में रहा। जैसे-जैसे शोषण बढ़ता गया, मज़दूरों को अमानवीय रूप से लम्बे काम के दिन और भी बोझिल महसूस होने लगे। इसके साथ ही मज़दूरों की काम के घण्टों में आवश्यक कमी की माँग भी मजबूत होती गयी।

उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में ही अमेरिका में मज़दूरों ने “सूर्योदय से सूर्यास्त” तक के काम के समय के विरोध में अपनी शिकायतें जता दी थीं। “सूर्योदय से सूर्यास्त” तक – यही उस समय के काम के घण्टे थे। चौदह, सोलह और यहाँ तक कि अट्ठारह घण्टे का कार्यकाल भी वहाँ आम बात थी। 1806 में अमेरिका की सरकार ने फ़िलाडेल्फिया के हड़ताली मोचियों के नेताओं पर साजिश के मुकदमे चलाए। इन मुकदमों में यह बात सामने आई कि मज़दूरों से उन्नीस या बीस घण्टों तक काम कराया जा रहा था।

उन्नीसवीं सदी के दूसरे और तीसरे दशक काम के घण्टे कम करने के लिए हड़तालों से भरे हुए थे। कई औद्योगिक केन्द्रों में तो एक दिन में काम के घण्टे दस करने की निश्चित माँगें भी रखी गयीं। `मैकेनिक्स यूनियन ऑफ फ़िलाडेल्फिया´ को , जो दुनिया की पहली ट्रेड यूनियन मानी जाती है, 1827 में फ़िलाडेल्फिया में काम के घण्टे दस करने के लिए निर्माण-उद्योग के मज़दूरों की एक हड़ताल करवाने का श्रेय जाता है। 1834 में न्यूयॉर्क में नानबाइयों की हड़ताल के दौरान `वर्किँग मेन्स एडवोकेट´ नामक अखबार ने छापा था – “पावरोटी उद्योग में लगे कारीगर सालों से मिड्ड के गुलामों से भी ज्यादा यातनाएँ झेल रहे हैं। उन्हें हर चौबीस में से औसतन अट्ठारह से बीस घण्टों तक काम करना होता है।”

उन इलाकों में दस घण्टे के कार्य-दिवस की इस माँग ने जल्दी ही एक आन्दोलन का रूप ले लिया। इस आन्दोलन में हालाँकि 1837 के संकट से बाधा पड़ी, लेकिन फ़िर भी यह आन्दोलन दिन-पर-दिन विकसित होता गया, और इसी के चलते वांन ब्यूरेन की संघीय सरकार को सभी सरकारी कर्मचारियों के लिए काम के घण्टे दस करने की घोषणा करनी पड़ी। पूरे विश्व-भर में काम के घण्टे दस करने का संघर्ष अगले कुछ दशकों में शुरू हो गया। जैसे ही यह माँग कई उद्योगों में मान ली गई, वैसे ही मज़दूरों ने काम के घण्टे आठ करने की माँग उठानी शुरू की। पचास के दशक के दौरान लेबर यूनियनों को संगठित करने की गतिविधियों ने इस नयी माँग को काफी बल दिया, हालाँकि 1857 के संकट से इसमें भी अवरोध आया था। यह माँग कुछ सुसंगठित उद्योगों में इस संकट के आने से पहले ही मान ली गयी थी। यह आन्दोलन मात्र अमेरिका तक ही सीमित नहीं था। यह आन्दोलन हर उस जगह प्रचलित हो चला था जहाँ उभरती हुई पूँजीवादी व्यवस्था के तहत मज़दूरों का शोषण हो रहा था । यह बात इस तथ्य से सामने आती है कि अमेरिका से पृथ्वी के दूसरे छोर पर स्थित आस्ट्रेलिया में निर्माण उद्योग के मज़दूरों ने यह नारा दिया – “आठ घण्टे काम, आठ घण्टे मनोरंजन, आठ घण्टे आराम” और उनकी यह माँग 1856 में मान भी ली गई।

`काम के घण्टे आठ करो´ आन्दोलन की अमेरिका में शुरुआत

वह संघर्ष, जिससे `मई दिवस´ का जन्म हुआ, अमेरिका में, 1884 में, `काम के घण्टे आठ करो´ आन्दोलन से शुरू हुआ। हालाँकि इससे एक पीढ़ी पहले भी एक राष्ट्रीय श्रम संगठन, `नेशनल लेबर यूनियन´ ने, जिसने एक जुझारू सांगठनिक केन्द्र के रूप में विकसित होने की आशा जगाई थी, छोटे कार्य दिवस का प्रश्न उठाया था और इस पर एक आन्दोलन खड़ा करने का प्रस्ताव रखा था। गृहयुद्ध के पहले साल (1861-62) ने कुछ राष्ट्रीय ट्रेड यूनियनों का लोप होते देखा। ये युद्ध शुरू होने के ठीक पहले बनी थीं। इनमें `मोल्डर्स यूनियन´, `मेकिनिस्ट्स और ब्लैकस्मिथस यूनियन´ प्रमुख थीं। लेकिन आने वाले कुछ सालों में कई स्थानीय श्रमिक संगठनों का राष्ट्रीय स्तर पर एकीकरण भी हुआ। इन यूनियनों को एक राष्ट्रीय संघ की जरूरत साफ दिखाई देने लगी। 20 अगस्त, 1866 को `नेशनल लेबर यूनियन´ बनाने वाली तीन ट्रेड यूनियनों के प्रतिनिधि बाल्टीमोर में मिले। राष्ट्रीय संगठन के निर्माण के लिए जो आन्दोलन चला था उसका नेतृत्व विलियम एच. सिल्विस ने किया था। वह पुनर्गठित `मोल्डर्स यूनियन´ का नेता था। सिल्विस हालाँकि एक नौजवान आदमी था लेकिन उस समय के श्रमिक आन्दोलनों में उसकी एक महत्त्वपूर्ण भूमिका रही थी। सिल्विस का प्रथम कम्युनिस्ट इण्टरनेशनल के नेताओं से भी सम्पर्क था जो लन्दन में थे। उसने `नेशनल लेबर यूनियन´ को इण्टरनेशनल की जनरल काउंसिल से सम्बन्ध स्थापित करने के लिए प्रेरित किया और उसमें मदद भी की।

1866 में `नेशनल लेबर यूनियन´ के स्थापना समारोह में यह प्रतिज्ञा ली गई: “इस देश के श्रमिकों को पूँजीवादी गुलामी से मुक्त करने के लिए, वर्तमान समय की पहली और सबसे बड़ी जरूरत यह है कि अमेरिका के सभी राज्यों में आठ घण्टे के कार्य दिवस को सामान्य कार्य दिवस बनाने का कानून पास कराया जाए। जब तक यह लक्ष्य पूरा नहीं होता, तब तक हम अपनी पूरी शक्ति से संघर्ष करने के लिए प्रतिज्ञाबद्ध हैं।”

इसी समारोह में कार्य दिवस को आठ घण्टे करने का कानून बनाने की माँग के साथ ही स्वतंत्र राजनीतिक गतिविधियों के अधिकार की माँग को उठाना भी बहुमत से पारित हुआ। साथ ही यह तय हुआ कि इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए “ऐसे व्यक्तियों का चुनाव किया जाए जो औद्योगिक वर्गों के हितों को प्रोत्साहित करने और प्रस्तुत करने के लिए प्रतिज्ञाबद्ध हों।”

`आठ-घण्टा दस्तों´ (आठ घण्टे के कार्य दिवस की माँग के लिए बने मज़दूर संगठन) का यह निर्माण `नेशनल लेबर यूनियन´ द्वारा किए गए आन्दोलन का ही परिणाम था। और `नेशनल लेबर यूनियन´ की इन गतिविधियों के ही परिणामस्वरूप कई राज्य सरकारों ने आठ घण्टे के कार्य दिवस का कानून पास करना स्वीकार कर लिया था। अमेरिकी कांग्रेस ने ठीक वैसा ही कानून 1868 में पारित कर दिया। इस `काम के घण्टे आठ करो´ आन्दोलन की उत्प्रेरक नेता थीं बोस्टन की मेकेनिस्ट इरा स्टीवर्ड

हालाँकि शुरुआती दौर के श्रमिक आन्दोलन का कार्यक्रम और नीतियां प्राथमिक स्तर थीं और हमेशा उनका प्रभाव नहीं दिखता था, लेकिन फ़िर भी वह स्वस्थ सर्वहारा नैसर्गिकता पर आधारित थीं। वे एक जुझारू मज़दूर आन्दोलन की नींव बन सकतीं थीं। लेकिन बाद में सुधारवादी नेता और पूँजीवादी राजनीतिज्ञ इन संगठनों में घुस गये और उन्हें गलत मार्ग पर अग्रसर कर दिया। बहरहाल, चार पीढ़ियों पहले, अमेरिकी श्रमिकों के राष्ट्रीय संगठन एन. एल. यू., यानी `नेशनल लेबर यूनियन´ ने स्वयं को “पूंजीवादी गुलामी” के विरुद्ध घोषित किया और स्वतंत्र राजनीतिक गतिविधि के अधिकार की माँग की।

सिल्विस का लन्दन में इण्टरनेशनल के साथ सम्पर्क जारी था। चूंकि सिल्विस `नेशनल लेबर यूनियन´ का अध्यक्ष था, एन. एल. यू. ने, 1867 के अपने सम्मेलन में अन्तरराष्ट्रीय मज़दूर वर्ग आन्दोलन के साथ सहयोग करने के प्रस्ताव को स्वीकार किया, और 1869 में इण्टरनेशनल की जनरल काउंसिल के आमन्त्रण को स्वीकार किया और इण्टरनेशनल के बेसिल कांग्रेस में अपना एक प्रतिनिधि भी भेजा। दुर्भाग्य से, सिल्विस की एन. एल. यू. के सम्मेलन से पहले ही मृत्यु हो गयी और शिकागो से छपने वाले `वर्किन्गमेन्स एडवोकेट´ के सम्पादक ए. सी. कैमरॉन सिल्विस के स्थान पर प्रतिनिधि के रूप में सम्मेलन में गए। जनरल काउंसिल ने एक विशेष प्रस्ताव के तहत अपने इस आशावादी नौजवान अमेरिकी श्रमिक नेता की मृत्यु पर शोक जताया-

“सबकी आँखें सिल्विस पर रुक गई थीं। सिल्विस के पास अपनी महान क्षमताओं के अलावा अपनी सर्वहारा सेना के जनरल के रूप में दस वर्ष का अनुभव था – और सिल्विस अब नहीं रहे।” सिल्विस की मौत `नेशनल लेबर यूनियन´ के ह्रास का एक बहुत बड़ा कारण बनी। और यह ह्रास जल्दी ही एन. एल. यू. के अन्त के रूप में सामने आया।

`काम के घण्टे आठ करो´ आन्दोलन पर मार्क्स के विचार

आठ घण्टे के कार्य दिवस की माँग करने का निर्णय `नेशनल लेबर यूनियन´ ने अगस्त, 1866 में लिया। उसी वर्ष सितम्बर में पहले इण्टरनेशनल की जेनेवा कांग्रेस में इस आठ घण्टे के कार्य दिवस की माँग निम्न रूप से दर्ज हुई – “काम के दिन की वैध सीमा तय करना एक प्राथमिक शर्त है जिसके बिना मज़दूर वर्ग की स्थिति में सुधार या उसकी मुक्ति का कोई भी प्रयास सफल नहीं हो सकता….. यह कांग्रेस आठ घण्टे के कार्य दिवस का प्रस्ताव रखती है।

” 1867 में प्रकाशित `पूँजी´ के पहले खण्ड के “कार्य दिवस” पर आधारित अध्याय में मार्क्स ने `नेशनल लेबर यूनियन´ द्वारा शुरू किए गए `काम के घण्टे आठ करो´ आन्दोलन की ओर ध्यान दिलाया हैं। `पूँजी´ का यह हिस्सा काफी प्रसिद्ध है क्योंकि इसमें मार्क्स ने काले मज़दूरों और श्वेत मज़दूरों के वर्ग हितों की एकता के बारे में लिखा है। उन्होंने लिखा है:

“जब तक दास प्रथा गणराज्य के एक हिस्से पर कलंक के समान चिपकी रही, तब तक अमेरिका में कोई भी स्वतंत्र मज़दूर आन्दोलन पंगु बना रहा। सफेद चमड़ी वाला मज़दूर कभी भी स्वयं को मुक्त नहीं कर सकता जब तक काली चमड़ी वाले मज़दूरों को अलग करके देखा जाएगा। लेकिन दास प्रथा की समाप्ति के साथ ही एक नए ओजस्वी जीवन के अंकुर फूटे। `काम के घण्टे आठ करो´ आन्दोलन के साथ ही वहाँ गृह-युद्ध का श्रीगणेश हुआ। `काम के घण्टे आठ करो´ आन्दोलन – एक ऐसा आन्दोलन था जो तेजी के साथ अटलांटिक से हिन्द तक, न्यू इंग्लैण्ड से कैलिफोर्निया तक फैल गया।”

मार्क्स ने इस बात की ओर ध्यान खींचा कि, किस तरह लगभग साथ-साथ, वास्तव में दो हफ्रतों के अन्दर, बाल्टीमोर में एक मज़दूर सम्मेलन ने आठ घण्टे के कार्य दिवस को बहुमत से पारित किया और इण्टरनेशनल की जेनेवा कांग्रेस ने ठीक वैसा ही निर्णय लिया। “इस तरह अटलांटिक के दोनों ओर मज़दूर आन्दोलन ने `उत्पादन की परिस्थितियों´ में गुणात्मक विकास किया।” यह कथन इसी बात को बताता है कि किस तरह कार्य दिवस की सीमाओं को तय करने का आन्दोलन चला और `काम के घण्टे आठ करो´ आन्दोलन के रूप में साकार हुआ।

जेनेवा कांग्रेस का निर्णय अमेरिकी `नेशनल लेबर यूनियन´ के निर्णय से कैसे मेल खाता है, उसे इस कथन में देखा जा सकता है – “चूँकि कार्य दिवस की सीमाएँ तय करने की माँग पूरे अमेरिका के मज़दूरों की माँगों को प्रस्तुत करती है, इसलिए यह कांग्रेस इस माँग को पूरी दुनिया के मज़दूरों के एक आम मोर्चे का रूप देती है।” इण्टरनेशनल की कांग्रेस पर, इसी मुद्दे पर अमेरिकी मज़दूर आन्दोलन का और जबर्दस्त प्रभाव पड़ा, लेकिन 23 साल बाद।

अमेरिका में मई दिवस का जन्म

1872 में जब पहले इण्टरनेशनल का हेडक्वार्टर लन्दन से न्यूयार्क आया, तो पहला इण्टरनेशनल एक अन्तरराष्ट्रीय संस्था के रूप में समाप्त हो गया, लेकिन औपचारिक रूप से इसका अस्तित्व 1876 तक बना रहा। इण्टरनेशनल पुन: गठित हुआ और दूसरे इण्टरनेशनल के नाम से प्रसिद्ध हुआ। दूसरे इण्टरनेशनल की पेरिस कांग्रेस (1889) में पहली मई को उस दिन का रूप दिया गया जिस दिन दुनिया भर के मज़दूर अपनी-अपनी राजनीतिक पार्टियों और ट्रेड-यूनियनों के रूप में संगठित हों, और अपनी सबसे महत्त्वपूर्ण राजनीतिक माँग – आठ घण्टे के कार्य दिवस की माँग के लिए संघर्ष करें। पेरिस कांग्रेस का यह महत्त्वपूर्ण निर्णय, शिकागो में पांच साल पहले लिए गए एक निर्णय से प्रभावित था। यह निर्णय पांच साल पहले शिकागो में एक नवनिर्मित अमेरिकी मज़दूर संगठन-`द फेडरेशन ऑफ ऑर्गनाइज्ड ट्रेड एण्ड लेबर यूनियन्स ऑफ द यूनाइटेड स्टेट्स एण्ड कनाडा´ जो बाद में अपने संक्षिप्त नाम `द अमेरिकन फेडरेशन ऑफ लेबर´ के नाम से प्रसिद्ध हुआ, के प्रतिनिधियों ने लिया था। 7 अक्टूबर, 1884 को इस संगठन के चौथे सम्मेलन में निम्न प्रस्ताव पारित हुआ:

“फेडरेशन ऑफ ऑर्गनाइज्ड ट्रेड एण्ड लेबर यूनियन्स ऑफ द यूनाइटेड स्टेट्स एण्ड कनाडा” यह तय करती है कि, पहली मई, 1886 से आठ घण्टे का कार्य दिवस वैध कार्य दिवस होगा और हम मज़दूर संगठनों से आग्रह करते हैं कि, वे अपने अधिकारक्षेत्र के अनुसार, अपने नियमों को ऐसे निर्धारित करें कि वे इस प्रस्ताव के अनुकूल हों।”

लेकिन इस प्रस्ताव में कहीं भी यह नहीं बताया गया था कि किस तरह यह संगठन पहली मई को `आठ घण्टा दिवस´ के रूप में प्रचलित करेगा। यह बात खुद इस बात की गवाह है कि जो संगठन 50,000 से ज्यादा सदस्यों का भी नहीं है, वह बिना उन फैक्टरियों, मिलों और खदानों में संघर्ष किए, जिनमें उसके सदस्य काम करते थे, और `काम के घण्टे की आठ करो´ आन्दोलन को बिना मज़दूरों की और बड़ी आबादी में प्रसारित किए यह कैसे घोषित कर सकता था कि “आठ घण्टे का कार्य दिवस वैध कार्य दिवस होगा।” इस प्रस्ताव का यह कथन कि “फेडरेशन से जुड़ी सभी यूनियनें ” अपने नियमों को इस प्रकार निर्धारित करें कि वे इस प्रस्ताव के अनुकूल हों”, इस बात से सम्बन्धित है कि वे यूनियनें अपने सदस्यों को विशेष हड़ताल-सहायता देंगी जो पहली मई, 1886 से हड़ताल पर जा रहे हैं। हो सकता है कि वे इतने अधिक समय तक हड़ताल पर रहें कि उन्हें यूनियन से सहायता की जरूरत पड़े। चूंकि हड़ताल के समय में मज़दूरों के पास जीविका चलाने का कोई साधन नहीं होता था, इसलिए यूनियनें उन्हें हड़ताल के समय विशेष सहायता देतीं थीं। चूंकि यह हड़ताल राष्ट्रीय स्तर पर थी, और उन सभी संगठनों को शामिल करती थी जो फेडरेशन से जुड़ी हुई थीं, अत: इन सभी यूनियनों को अपने नियमानुसार अपने सदस्यों से हड़ताल के लिए स्वीकृति प्राप्त कर लेनी थी, ख़ासकर इसलिए भी क्योंकि, इन हड़तालों में उनके फंडों का खर्चा भी शामिल था। यह बात जरूर याद रहे कि यह फेडरेशन यानी आज का `अमेरिकन फेडरेशन ऑफ लेबर´ स्वैच्छिक और संघीय आधार पर बना था, और राष्ट्रीय सम्मेलन के निर्णय सिर्फ फेडरेशन से जुड़ी यूनियनों पर लागू थे, वह भी तब, जब यूनियनें उन निर्णयों का समर्थन करें।

मई दिवस की तैयारियां

1877 में जबरदस्त हड़तालें हुई। इन हड़तालों के दमन के लिए बड़े पूँजीवादी कारपोरेशनों और सरकार ने सैनिक दस्ते भेजे, जिनका रेलवे और स्टील कारखानों के दसियों हज़ार मज़दूरों ने बहादुरी से प्रतिरोध किया। इन संघर्षों का पूरे मज़दूर आन्दोलन पर गहरा प्रभाव पड़ा। यह अमेरिका में पहला ऐसा जन-उभार था जो राष्ट्रीय पैमाने पर हुआ था और अमेरिकी मज़दूर-वर्ग द्वारा संचालित था। इन संघर्षों में ये मज़दूर राज्य और पूँजी की मिली हुई शक्तियों से भले ही हार गए, लेकिन इस दौर के बाद अमेरिकी मज़दूर समाज अपनी वर्ग स्थिति की ज्यादा गहरी समझ, एक बेहतर जुझारूपन और बहुत ऊँचे हौसले के साथ उभरा। यह एक तरह से पेन्सिलवेनिया के उन कोयला मालिकों को एक उत्तर था जिन्होंने एन्थ्रासाइट क्षेत्र के खदानकर्मियों के संगठन को तोड़ने की कोशिश में दस जुझारू खदानकर्मियों को फांसी दे दी थी।

हालाँकि 1880-90 का दशक अमेरिकी उद्योग और घरेलू बाजार के विकास के नजरिए से सर्वाधिक सक्रिय दशक था, लेकिन 1884-85 के वर्ष में मन्दी का एक झोंका आया। वास्तव में यह 1873 के संकट के बाद आवर्ती चक्रीय क्रम में आई हुई मन्दी का ही दौर था। इस दौर में मौजूद बेरोज़गारी और जनता द्वारा झेली जा रही कठिन तकलीफों ने छोटे कार्य दिवस के आन्दोलन को एक नई गति दी।

जल्दी ही बने मज़दूरों के उस संगठन, `अमेरिकन फेडरेशन ऑफ लेबर´ ने उस समय यह संभावना देखी कि `आठ घण्टे के कार्य दिवस´ के नारे को एक ऐसे नारे की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है जो उन सारे मज़दूरों को एक झण्डे के नीचे ला सकता है जो न ही फेडरेशन में हैं न ही `नाइट्स ऑफ लेबर´ में। `नाइट्स ऑफ लेबर´ मज़दूरों का एक बहुत पुराना संगठन था जो लगातार बढ़ रहा था। फेडरेशन यह समझ चुका था कि सभी मज़दूर संगठनों के साथ मिलकर ही आठ घण्टे के कार्य दिवस के आन्दोलन को सफल बनाया जा सकता है। यही समझकर `अमेरिकन फेडरेशन ऑफ लेबर´ ने `नाइट्स ऑफ लेबर´ से इस आन्दोलन में सहयोग की अपील की।

फेडरेशन के 1885 के सम्मेलन में आने वाले साल की पहली मई को हड़ताल पर जाने का संकल्प दोहराया गया। कई राष्ट्रीय यूनियनों ने, ख़ासकर बढ़इयों की और सिगार बनाने वालों की यूनियनों ने तो हड़ताल की तैयारियों के कदम भी उठा दिए। पहली मई की हड़ताल के लिए हो रहे आन्दोलनों ने तुरन्त असर दिखाना शुरू कर दिया। हड़ताली यूनियनों के सदस्यों की संख्या में लगातार बढ़ोत्तरी होने लगी। `नाइट्स ऑफ लेबर´ संगठन ने अपने विकास में कई छलांगें लगाईं। नतीजतन 1886 में मज़दूरों का यह जुझारू संगठन अपने शीर्ष पर था। यह बात सामने आई कि उस दौरान `नाइट्स ऑफ लेबर´ ने, जो फेडरेशन से ज्यादा प्रसिद्ध था, और एक बेहद जुझारू संगठन के रूप में जाना जाता था, अपने सदस्यों की संख्या दो लाख से बढ़ा कर सात लाख कर ली थी। फेडरेशन वह संगठन था जिसने इस आन्दोलन की शुरुआत की थी, और हड़ताल की तारीख निश्चित की थी, उसके सदस्यों की संख्या में भी वृद्धि हुई, और मज़दूरों की विशाल आबादी में उसका सम्मान भी काफी बढ़ा।

जैसे-जैसे हड़ताल की तारीख करीब आती जा रही थी, यह बात सामने आ रही थी कि `नाइट्स ऑफ लेबर´ का नेतृत्व, ख़ासकर टेरेंस पाउडरली का नेतृत्व आन्दोलन को नुकसान पहुंचा रहा है, और यही नहीं वह अपने से जुड़ी यूनियनों को हड़ताल में हिस्सा न लेने की सलाह दे रहा है। फेडरेशन अभी भी लगातार मज़दूरों के बीच लोकप्रिय होता जा रहा था। दोनों संगठनों के जुझारू मज़दूर सदस्यों की कतारें लगातार, उत्साहपूर्वक हड़ताल की तैयारियां कर रहीं थीं। कई शहरों में `आठ-घण्टा दस्ते´ और इसी तरह के अन्य जत्थे उभरे। इनके उभरने से पूरे आन्दोलन में मज़दूरों के बीच जुझारूपन की भावना में जबर्दस्त बढ़ोत्तरी हुई। इस लहर से असंगठित मज़दूर भी अछूते नहीं रहे।, वे भी बढ़-चढ़ कर आन्दोलन में हिस्सा लेने लगे। अमेरिकी मज़दूर वर्ग के लिए एक नई सुबह आ रही थी।

मज़दूरों के मिजाज को समझने का सबसे अच्छा रास्ता है कि, उनके संघर्षों की गम्भीरता और विस्तार के बारे में अध्ययन किया जाये, उसे समझा जाये। एक समय में मज़दूरों के लड़ाकू मिजाज को उस दौरान हुई हड़तालों की संख्या से समझा जा सकता है। पिछले सालों में हुई हड़तालों की संख्या के मुकाबले 1885 से 1886 के दौरान हुई हड़तालों की संख्या, उस समय के मज़दूरों के उस जबर्दस्त लड़ाकूपन को दर्शाती है जो उस समय आन्दोलन को आगे बढ़ा रहा था। मज़दूर पहली मई 1886 की महान हड़ताल की तैयारियां तो कर ही रहे थे, लेकिन 1885 में ही हड़तालों की संख्या में जबरदस्त बढ़ोत्तरी हो गयी थी। 1881 से 1884 के दौरान हड़तालों और तालाबन्दियों का औसत था मात्र 500 प्रति वर्ष, और उसमें भाग लेने वाले मज़दूर थे औसतन 1,50,000 प्रति वर्ष। 1885 में हड़तालों और तालाबन्दियों की गिनती 700 तक जा पहुंची और भाग लेने वाले मज़दूरों की संख्या बढ़कर हो गई 2,50,000। 1886 में तो हड़तालों की संख्या 1885 की तुलना में दोगुनी होकर 1,572 जा पहुंची और उसी अनुपात में हड़तालों और तालाबन्दियों में हिस्सा लेने वाले मज़दूरों की संख्या भी बढ़कर 6,00,000 हो गयी। इन हड़तालों की व्यापकता का अन्दाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 1885 में इन हड़तालों से प्रभावित प्रतिष्ठानों की संख्या 2,467 थी और अगले साल ही यह संख्या बढ़कर 11,562 जा पहुंची। `नाइट्स ऑफ लेबर´ के नेतृत्व की खुली गद्दारी के बावजूद यह अन्दाजा लगाया गया कि, लगभग 5 लाख मज़दूर `काम के घण्टे आठ करो´ आन्दोलन में सीधे शिरकत कर रहे थे।

हड़ताल का केन्द्र शिकागो था, जहाँ हड़ताल सबसे ज्यादा व्यापक थी, लेकिन पहली मई को कई और शहर इस मुहिम में जुड़ गए थे। न्यूयार्क, बाल्टीमोर, वाशिंगटन, मिलवॉकी, सिनसिनाटी, सेंट लुई, पिट्सबर्ग, डेन्ट्राइट समेत अनेक शहरों में शानदार हड़तालें हुईं। इस आन्दोलन की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि इसने अकुशल और असंगठित मज़दूरों को भी हड़ताल में खींच लिया था। उस दौरान वे अनुनादी हड़तालें काफी प्रचलित थीं। पूरे देश में एक विद्रोही भावना फैल चुकी थी, बुर्जुआ इतिहासकार “सामाजिक युद्ध” और “पून्जी से घृणा” की बातें कर रहे थे, जो उस दौरान सुस्पष्ट होकर सामने आ चुकीं थीं। साथ ही वे मज़दूरों की उन कतारों की बातें कर रहे थे, जो उस समय आन्दोलन के रथ को आगे बढ़ा रहीं थीं। यह कहा जा सकता है कि पहली मई को हड़ताल करने वाले मज़दूरों को आधी सफलता मिली और जहाँ वे आठ घण्टे के कार्य दिवस की माँग नहीं मनवा सके, वहाँ भी वह काम के घण्टों में पर्याप्त कमी करवाने में सफल रहे।

शेष अगली पोस्ट में …यहाँ देखें

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