प्रेम, परम्परा और विद्रोह

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कात्यायनी

बाबू बजरंगी आज एक राष्ट्रीय परिघटना बन चुका है। अहमदाबाद के इस शख्स का दावा है कि अब तक वह सैकड़ों हिन्दू कन्याओं को “मुक्त” करा चुका है। “मुक्ति” का यह काम बाबू बजरंगी मुस्लिम युवकों के साथ हिन्दू युवतियों के प्रेमविवाह को बलपूर्वक तुड़वाकर किया करता है। ज़ाहिर है कि अन्तरधार्मिक विवाहों, या यूँ कहें कि दो वयस्कों द्वारा परस्पर वैवाहिक सम्बन्ध कायम करने के स्वतन्त्र निर्णय को संवैधानिक अधिकार के रूप में मान्यता प्राप्त होने के बावजूद बाबू बजरंगी का “मुक्ति अभियान” यदि अब तक निर्बाध चलता रहा है तो इसके पीछे गुजरात की भाजपा सरकार द्वारा प्राप्त परोक्ष सत्ता-संरक्षण का भी एक महत्त्वपूर्ण हाथ है।

लेकिन बात सिर्फ इतनी ही नहीं है। नागरिकों का एक बड़ा हिस्सा, जो साम्प्रदायिक कट्टरपन्थी नहीं है, वह भी अपने रूढ़िवादी मानस के कारण, अन्तरजातीय-अन्तरधार्मिक प्रेम-विवाहों का ही विरोधी है और बाबू बजरंगी जैसों की हरकतों के निर्बाध जारी रहने में समाज के इस हिस्से की भी एक परोक्ष भूमिका होती है। समाज के पढ़े-लिखे, प्रबुद्ध माने जाने वाले लोगों का बहुलांश आज भी ऐसा ही है जो युवाओं के बीच प्रेम-सम्बन्ध को ही ग़लत मानता है और उसे अनाचार एवं अनैतिकता की कोटि में रखकर देखता है। बहुत कम ही ऐसे अभिभावक हैं जो अपने बेटों या बेटियों के प्रेम-सम्बन्ध को सहर्ष स्वीकार करते हों और अपनी ज़िन्दगी के बारे में निर्णय लेने के उनके अधिकार को दिल से मान्यता देते हों। यदि वे स्वीकार करते भी हैं तो ज्यादातर मामलों में विवशता और अनिच्छा के साथ ही। और जब बात किसी अन्य धर्म के या अपने से निम्न मानी जाने वाली किसी जाति (विशेषकर दलित) के युवक या युवती के साथ, अपने बेटे या बेटी के प्रेम की हो तो अधिकांश उदारमना माने जाने वाले नागरिक भी जो रुख अपनाते हैं, उससे यह साफ हो जाता है कि हमारे देश का उदार और सेक्युलर दिलो-दिमाग़ भी वास्तव में कितना उदार और सेक्युलर होता है! यही कारण है कि जब धर्म या जाति से बाहर प्रेम करने के कारण किसी बेटी को अपने ही घर में काटकर या जलाकर मार दिया जाता है या किसी दलित या मुस्लिम युवक को सरेआम फाँसी पर लटकाकर मार दिया जाता है या उसकी बोटी-बोटी काट दी जाती है या उसके परिवार को गाँव-शहर छोड़ने तक पर मज़बूर कर दिया जाता है तो ऐसे मसलों को लेकर केवल महानगरों का सेक्युलर और प्रगतिशील बुद्धिजीवी समुदाय ही (ग़ौरतलब है कि ऐसे बुद्धिजीवी महानगरीय बुद्धिजीवियों के बीच भी अल्पसंख्यक ही हैं) कुछ चीख़-पुकार मचाता है, शासन-प्रशासन को ज्ञापन सौंपकर दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई की माँग की जाती है, कुछ प्रतीकात्मक धरने-प्रदर्शन होते हैं, कुछ जाँच टीमें घटनास्थल का दौरा करती हैं, अखबारों में लेख-टिप्पणियाँ छपती हैं (और लगे हाथों फ्रीलांसर नामधारियों की कुछ कमाई भी हो जाती है), टी.वी. चैनलों को `मुकाबला´, `टक्कर´ या ऐसे ही नाम वाले किसी कार्यक्रम के लिए मसाला मिल जाता है और कुछ प्रचार-पिपासु, धनपिपासु सेक्युलर बुद्धिजीवियों को भी अपनी गोट लाल करने का मौका मिल जाता है। जल्दी ही मामला ठण्डा पड़ जाता है और फिर ऐसे ही किसी नये मामले का इन्तज़ार होता है जो लम्बा कतई नहीं होता।
मुद्दा केवल किसी एक बाबू बजरंगी का नहीं है। देश के बहुतेरे छोटे-बड़े शहरों और ग्रामीण अंचलों में ऐसे गिरोह मौजूद हैं जो धर्म और संस्कृति के नाम पर ऐसे कारनामों को अंजाम दिया करते हैं और बात केवल धार्मिक कट्टरपन्थी फासीवादी राजनीति से प्रेरित गिरोहों की ही नहीं है। ऐसे पिताओं और परिवारों के बारे में भी आये दिन खबरें छपती रहती हैं जो जाति-धर्म के बाहर प्रेम या विवाह करने के चलते अपनी ही सन्तानों की जान के दुश्मन बन जाते हैं। देश के कुछ हिस्सों में, विशेषकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा में जाति-बिरादरी की पंचायतों की मध्ययुगीन सत्ता इतनी मज़बूत है कि जाति-धर्म के बाहर शादी करना तो दूर, सगोत्रीय विवाह की वर्जना तक को तोड़ने के चलते पंचायतों द्वारा सरेआम मौत की सज़ा दे दी जाती है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुज़फ्ऱफरनगर, सहारनपुर, मेरठ आदि ज़िलों से लेकर हरियाणा तक से हर वर्ष ऐसी कई घटनाओं की खबरें आती रहती हैं और उससे कई गुना घटनाएँ ऐसी होती हैं जो खबर बन पाने से पहले ही दबा दी जाती हैं। इन सभी मामलों में पुलिस और प्रशासन का रवैया भी पूरी तरह पंचायतों के साथ हुआ करता है। अपने जातिगत और धार्मिक पूर्वाग्रहों के चलते पुलिस और प्रशासन के कर्मचारियों की सहानुभूति भी पंचायतों के रूढ़िवादी बड़े-बुजुर्गों के साथ ही हुआ करती है। यहाँ तक कि न्यायपालिका भी इन पूर्वाग्रहों से मुक्त नहीं होती। आये दिन दिल्ली-मुम्बई से लेकर देश के छोटे-छोटे शहरों तक में पार्कों-सिनेमाघरों-कैम्पसों आदि सार्वजनिक स्थानों पर  घुसकर बजरंगियों-शिवसैनिकों और पुलिस द्वारा प्रेमी जोड़ों की पिटाई को भी इसी आम सामाजिक प्रवृत्ति से जोड़कर देखा जाना चाहिए क्योंकि आम लोग ऐसी घटनाओं का मुखर प्रतिवाद नहीं करते।
कहा जा सकता है कि प्रेम करने की आज़ादी सहित किसी भी प्रकार की व्यक्तिगत आज़ादी, निजता और निर्णय की स्वतन्त्रता के विरुद्ध एक बर्बर किस्म की निरंकुशता पूरी भारतीय सामाजिक संरचना के ताने-बाने में सर्वव्याप्त प्रतीत होती है। सोचने की बात यह है कि उत्पादन की आधुनिक प्रक्रिया अपनाने, आधुनिकतम उपभोक्ता सामग्रियों का इस्तेमाल करने और भौतिक जीवन में आधुनिक तौर-तरीके अपनाने के बावजूद हमारे समाज में निजता, व्यक्तिगत आज़ादी, तर्कणा आदि आधुनिक जीवन-मूल्यों का सामाजिक-सांस्कृतिक वर्चस्व आज तक क्यों नहीं स्थापित हो सका? भारत में सतत विकासमान पूँजीवाद मध्ययुगीन मूल्यों-मान्यताओं के साथ इतना कुशल-सफल तालमेल क्यों और किस प्रकार बनाये हुए है? इस बात को सुसंगत ढंग से केवल ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में ही समझा जा सकता है।
यह सही है कि आज का पश्चिमी समाज समृद्धि के शिखर पर आसीन होने के बावजूद, आर्थिक स्तर पर असाध्य ढाँचागत संकट, राजनीतिक स्तर पर पूँजीवादी जनवाद के क्षरण एवं विघटन तथा सांस्कृतिक-सामाजिक स्तर पर विघटन, अलगाव, नैतिक अध:पतन और अराजकता का शिकार है। पारिवारिक ढाँचे का ताना-बाना वहाँ बिखर रहा है। अपराधों, मानसिक रोगों और आत्मिक वंचना का ग्राफ लगातार ऊपर की ओर बढ़ रहा है। पूरी दुनिया को लूटकर समृद्धि का द्वीप बसाने वाले पश्चिमी महाप्रभुओं से इतिहास उनकी करनी का वाजिब हिसाब वसूल रहा है। लेकिन इन सबके बावजूद इस तथ्य से इन्कार नहीं किया जा सकता कि पश्चिम में नागरिकों के आपसी रिश्तों और परिवार सहित सभी सामाजिक संस्थाओं में जनवाद के मूल्य इस तरह रचे-बसे हुए हैं कि कैथोलिक, प्रोटेस्टेण्ट, यहूदी, मुसलमान, श्वेत, अश्वेत – किसी भी धर्म या नस्ल के व्यक्ति यदि आपस में प्यार या शादी करें तो सामाजिक बहिष्कार या पंचायती दण्ड जैसी किसी बात की तो कल्पना तक नहीं की जा सकती। हो सकता है कि परिवार की पुरानी पीढ़ी कहीं-कहीं इस बात का विरोध करे, पर यह विरोध प्राय: उसूली मतभेद के दायरे तक ही सीमित रहता है। जहाँ तक समाज का सम्बन्ध है, लोग इसे किन्हीं दो व्यक्तियों का निजी मामला ही मानते हैं। यह सही है कि ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, अमेरिका आदि देशों में अश्वेतों और अन्य आप्रवासियों का पार्थक्य, दोयम दर्जे की आर्थिक स्थिति और उनके प्रति विद्वेष भाव लगातार मौजूद रहता है और पिछले कुछ दशकों के दौरान कुछ नवनात्सीवादी गिरोह इन्हें हिंसा और गुण्डागर्दी का भी शिकार बनाते रहे हैं। धनी-ग़रीब के अन्तर और वर्ग-अन्तरविरोध भी वहाँ तीखे रूप में मौजूद हैं। लेकिन सामाजिक ताने-बाने में वहाँ निजता और व्यक्तिगत आज़ादी के जनवादी मूल्य इस तरह रचे-बसे हैं कि धर्म या नस्ल के बाहर प्रेम या विवाह को मन ही मन ग़लत मानने वाले लोग भी इसका संगठित और मुखर विरोध नहीं करते। पश्चिम में `मैचमेकर्स´ द्वारा परिवारों के बीच बातचीत करके शादियाँ कराने की परम्परा उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त तक ही दम तोड़ने लगी थी। प्रेम और विवाह के मामलों में वहाँ के समाज में मुख्य और स्थापित प्रवृत्ति युवाओं को पूरी आज़ादी देने की है। इसका मुख्य कारण है कि मानववाद, इहलौकिकता, वैयक्तिकता और जनवाद के मूल्यों को सामाजिक-सांस्कृतिक आन्दोलनों और क्रान्तियों के कई शताब्दियों लम्बे सिलसिले ने यूरोपीय समाज के पोर-पोर में इस कदर रचा-बसा दिया था कि साम्राज्यवाद की एक पूरी सदी बीत जाने के बावजूद, पश्चिमी पूँजीवादी राज्यसत्ताओं के बढ़ते निरंकुश चरित्र और पूँजीवादी जनवाद के पतन-विघटन की प्रक्रिया के समापन बिन्दु के निकट पहुँचने के बावजूद, तमाम सामाजिक विषमताओं, आर्थिक लूट, सामाजिक- सांस्कृतिक-नैतिक अध:पतन तथा पण्यपूजा (कमोडिटी फेटिशिज्म) और अलगाव (एलियनेशन) के घटाटोप के बावजूद, वहाँ नागरिकों के आपसी रिश्तों और मूल्यों-मान्यताओं में व्यक्तियों की निजता और व्यक्तिगत आज़ादी को पूरा सम्मान देने की प्रवृत्ति आज भी इस तरह स्थापित है कि उसे वापस पीछे नहीं धकेला जा सकता। पंचायती न्याय की मध्ययुगीन कबीलाई बर्बरता के बारे में, अन्तरधार्मिक-अन्तरजातीय विवाह करने पर सामाजिक बहिष्कार, अपना गाँव-शहर छोड़ने के लिए विवश होने या हत्या से कीमत चुकाने के बारे में या प्रेमी जोड़ों की पार्कों में सामूहिक पिटाई जैसी घटना के बारे में वहाँ का एक आम नागरिक सोच तक नहीं सकता।
यूरोपीय पूँजीवादी समाज पुनर्जागरण-प्रबोधन-क्रान्ति (रेनेसाँ-एनलाइटेनमेण्ट- रिवोल्यूशन) की शताब्दियों लम्बी प्रक्रिया से गुज़रकर अस्तित्व में आया था। इस प्रक्रिया में अधिकांश मध्ययुगीन मूल्यों-मान्यताओं-संस्थाओं का वर्चस्व वहाँ लगभग समाप्त हो गया था। यद्यपि सत्तासीन होने के बाद यूरोपीय पूँजीपति वर्ग ने चर्च से “पवित्र गठबन्धन” करके तर्कणा और जनवाद के झण्डे को धूल में फेंक दिया और पुनर्जागरण-प्रबोधन के समस्त मानववादी-जनवादी आदर्शोँ को तिलांजलि दे दी, लेकिन ये मूल्य सामाजिक-सांस्कृतिक अधिरचना के ताने-बाने  में इस कदर रच-बस चुके थे कि सामाजिक जनमानस में इनकी अन्तर्व्याप्ति को समूल नष्ट करके मध्ययुग की ओर वापस नहीं लौटा जा सकता था। पूँजीवाद के ऐतिहासिक विश्वासघात और असली चरित्र को उजागर करने में उन्नीसवीं शताब्दी के आलोचनात्मक यथार्थवादी कला-साहित्य ने भी एक विशेष भूमिका निभायी। यह तुलनात्मक अध्ययन अलग से पर्याप्त गहराई और विस्तार की माँग करता है, जो यहाँ सम्भव नहीं है।
भारतीय इतिहास की गति और दिशा इस सन्दर्भ में यूरोप से सर्वथा भिन्न रही है। यहाँ मध्ययुगीन सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक संरचना का ताना-बाना जब अन्दर से टूटने-बिखरने की दिशा में अग्रसर था और इसके भीतर से प्रगतिशील पूँजीवादी तत्त्वों के उद्भव और विकास की प्रक्रिया गति पकड़ रही थी, उसी समय देश के उपनिवेशीकरण की प्रक्रिया शुरू हो गयी। उपनिवेशीकरण की व्यवस्थित प्रक्रिया ने एक शताब्दी के भीतर भारतीय समाज की स्वाभाविक आन्तरिक गति की हत्या कर दी और यहाँ की संक्रमणशील देशज सामाजिक- आर्थिक संरचना को नष्ट करके ऊपर से एक औपनिवेशिक सामाजिक-आर्थिक संरचना आरोपित कर दी। निश्चय ही भारतीय मध्ययुगीन सामाजिक-आर्थिक संरचना की अपनी विशिष्टताएँ थीं, यह यूरोपीय सामन्तवाद से काफी भिन्न था और यहाँ पूँजीवादी विकास की बहुतेरी बाधाएँ-समस्याएँ भी थीं। लेकिन ये बाधाएँ पूँजीवादी विकास को रोक नहीं सकती थीं। प्राक्-ब्रिटिश भारत में पूँजीवादी विकास के उपादान मौजूद थे। यदि भारत उपनिवेश नहीं बनता तो उत्पादक शक्तियों के विकास के साथ ही पूँजी भारतीय समाज के पोर-पोर में घुस जाती और फिर वह समय भी आता जब एक सर्वसमावेशी सामाजिक झंझावात के साथ यहाँ भी इतिहास को तेज़ गति देने वाला पूँजीवाद अपनी भौतिक-आत्मिक समग्रता के साथ अस्तित्व में आता। मध्ययुगीन समाज के परमाणु के नाभिक पर सतत प्रहार उसे विखण्डित कर देते और ऊर्जा का अजस्त्र स्रोत फूट पड़ता। मुख्यत: किसानों-दस्तकारों की शक्ति से संगठित मध्यकालीन भारत के भक्ति आन्दोलन और किसान-संघर्षों ने इस दिशा में एक पूर्वसंकेत दे भी दिया था। तमाम पारिस्थितिक भिन्नताओं के बावजूद भारतीय भक्ति आन्दोलन और यूरोपीय धर्म-सुधार आन्दोलन में तात्त्विक समानता के बहुतेरे अवयव मौजूद दीखते हैं। भारतीय इतिहास हूबहू पुनर्जागरण-प्रबोधन-बुर्जुआ क्रान्ति के यूरोपीय मार्ग का अनुकरण करता हुआ आगे बढ़ता, यह मानना मूर्खता होगी। रूस और जापान जैसे देशों ने भी पूँजीवादी विकास का अपना सापेक्षत: भिन्न मार्ग चुना था और यूरोप में भी जर्मनी और पूर्वी यूरोपीय देशों का रास्ता ब्रिटेन, फ़्रान्स, अमेरिका आदि देशों से काफी भिन्नता लिये हुए था। लेकिन इतना तय है कि यदि भारत का उपनिवेशीकरण नहीं होता तो अपनी स्वाभाविक गति और प्रक्रिया से यहाँ जो पूँजीवाद विकसित होता, वह आज के भारतीय पूँजीवाद जैसा रुग्ण-बौना-विकलांग नहीं होता। उसमें इतनी शक्ति होती कि वह मध्ययुगीन आर्थिक मूलाधार के साथ ही अधिरचना को भी चकनाचूर कर देता। यहाँ भी यूरोपीय पुनर्जागरण-प्रबोधन की भाँति कुछ आमूलगामी सामाजिक-सांस्कृतिक- वैचारिक तूफान उठ खड़े होते जो मानववाद, जनवाद और तर्कणा के मूल्यों को समाज के रन्ध्र-रन्ध्र में पैठा देते। ऐसी स्थिति में भारतीय मानस भी प्राचीन भारत की भौतिकवादी चिन्तन-परम्परा का पुन:स्मरण करता और दर्शन-कला-साहित्य से लेकर जीवन-मूल्यों तक के धरातल पर जुझारू भौतिकवादी चिन्तन की एक सशक्त आधुनिक परम्परा अस्तित्व में आती। लेकिन उपनिवेशीकरण ने इन सभी सम्भावनाओं को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया। अंग्रेज़ों ने न केवल पूरे देश को समुद्री डाकुओं से भी अधिक बर्बर तरीके से लूटा-खसोटा, बल्कि उनकी नीतियों ने यहाँ कृषि से दस्तकारी और दस्तकारी से उद्योग तक की स्वाभाविक यात्रा की सारी सम्भावनाओं की भ्रूण हत्या कर दी। भूमि के औपनिवेशिक बन्दोबस्त ने भारत में एक नये किस्म की अर्द्धसामन्ती भूमि-व्यवस्था को जन्म दिया। विश्व-प्रसिद्ध भारतीय दस्तकारी तबाह हो गयी और भारत की आर्थिक- सामाजिक संरचना अपनी स्वतन्त्र गति और स्वतन्त्र सम्भावनाओं के साथ अकाल मृत्यु का शिकार हो गयी। इसकी दिशा और नियति पूरी तरह से ब्रिटिश वित्तीय पूँजी के हितों के अधीन हो गयी।
जिसे भारतीय इतिहासकार प्राय: भारतीय पुनर्जागरणय् की संज्ञा से विभूषित करते हैं, उसमें यूरोपीय पुनर्जागरण जैसा क्रान्तिकारी कुछ भी नहीं था। वह कोई महान या प्रगतिशील जनक्रान्ति कतई नहीं थी। वह औपनिवेशिक सामाजिक- आर्थिक संरचना के भीतर पले-बढ़े एक छोटे से पढ़े-लिखे मध्य वर्ग की आवाज़ थी जो स्वामिभक्त ब्रिटिश प्रजा के रूप में कुछ अधिकारों की याचना कर रहा था। भारतीय समाज में सुधारों की इसकी माँग और इसके सुधार आन्दोलनों का प्रभाव शहरी मध्य वर्ग तक सीमित था और किसानों-दस्तकारों तथा आम मेहनतकश जनता उससे सर्वथा अछूती थी। आज़ादी की आधी सदी बाद भी भारतीय बौद्धिक जगत की निर्वीर्यता, जनविमुखता और कायरता इसी बात का प्रमाण है कि भारतीय इतिहास में पुनर्जागरण या प्रबोधन जैसी कोई चीज़ कभी घटित ही नहीं हुई। हमारी सामाजिक संरचना में जनवाद और तर्कणा के मूल्यों के अभाव और आधुनिक पूँजीवादी जीवन-प्रणाली के साथ मध्ययुगीन मूल्यों-मान्यताओं का विचित्र सहअस्तित्व भी दरअसल इसी तथ्य को प्रमाणित करता है।
औपनिवेशिक काल में भारत में जिस पूँजीवाद का विकास हुआ, वह किसी क्रान्तिकारी परिवर्तन का नहीं, बल्कि ब्रिटिश वित्तीय पूँजी के हितसाधन के लिए उठाये गये कदमों की गौण गति का परिणाम था जो उपनिवेशवादियों की इच्छा से स्वतन्त्र था। इस मरियल, रीढ़विहीन पूँजीवाद की स्वाभाविक गति को भी उपनिवेशवाद ने कदम-कदम पर नियन्त्रित और बाधित करने का काम किया। लेकिन इतिहास की गति शासक वर्गों की इच्छानुकूल नहीं होती और उनके द्वारा उठाया गया हर कदम स्वयंस्फूर्त ढंग से एक प्रतिरोधी गति एवं प्रभाव को गौण पहलू के रूप में जन्म देता है और फिर कालान्तर में यह गौण पहलू मुख्य पहलू भी बन जाया करता है। औपनिवेशिक काल में भारत में पूँजीवाद का विकास इसी रूप में हुआ और फिर उपनिवेशवाद के संकट, अन्तरसाम्राज्यवादी प्रतिस्पद्धा और विश्वयुद्धों का लाभ उठाकर भारतीय पूँजीपति वर्ग ने अपनी शक्ति बढ़ाने का काम किया। अपनी बढ़ती शक्ति के अनुपात में ही इसकी आवाज़ भी मुखर होती गयी और फिर एक दिन इसने राजनीतिक आज़ादी भी हासिल कर ली, लेकिन यह राष्ट्रीय जनवादी क्रान्ति जैसा कुछ भी नहीं था। भारतीय पूँजीवाद ने साम्राज्यवाद से निर्णायक विच्छेद करने के बजाय उसके कनिष्ठ सहयोगी की भूमिका निभायी और भूमि क्रान्ति के जनवादी कार्यभार को भी एक झटके के साथ पूरा करने के बजाय क्रमिक पूँजीवादी रूपान्तरण का दुस्सह यन्त्रणादायी प्रतिगामी पथ अपनाया। ज़ाहिर है कि ऐसी स्थिति में सामाजिक-सांस्कृतिक- वैचारिक अधिरचना में भी, औपनिवेशिक काल और उत्तर-औपनिवेशिक काल में कभी क्रान्तिकारी परिवर्तन की कोई प्रक्रिया घटित ही नहीं हुई। यूरोपीय पूँजीवाद कम से कम पुनर्जागरण-प्रबोधन-क्रान्ति की प्रक्रिया में जनता के साथ जुड़ा हुआ और प्रगतिशील मूल्यों का वाहक था। भारत में ऐसी कोई प्रक्रिया घटित ही नहीं हुई। भारतीय पूँजीपति वर्ग ने शुरू से ही प्राक्-पूँजीवादी मूल्यों- मान्यताओं के साथ समझौते का रुख़ अपनाया और साम्राज्यवाद की सदी में क्रमिक विकास की प्रक्रिया में जिन बुर्जुआ मूल्यों को इसने क्रमश: अपनाया, वे तर्कणा, मानववाद, जनवाद और जुझारू भौतिकवाद के मूल्य नहीं थे, बल्कि सड़े-गले प्रतिक्रियावादी बुर्जुआ मूल्य ही थे।

भारतीय पूँजीवाद कृषि से दस्तकारी और दस्तकारी से उद्योग की स्वाभाविक प्रक्रिया से नहीं जन्मा था। यह बर्गरों की सन्तान नहीं था। यह आरोपित औपनिवेशिक सामाजिक-आर्थिक संरचना की सन्तान था और इसका विकास उपनिवेशवाद के अनिवार्य आन्तरिक अन्तरविरोध का परिणाम था। क्रान्तिकारी संघर्ष के बजाय इसने `समझौता-दबाव-समझौता´ की रणनीति अपनाकर राजनीतिक स्वतन्त्रता तक की यात्रा तय की। इसका चरित्र शुरू से ही दुहरा था। राष्ट्रीय आन्दोलन की मुख्यधारा का नेतृत्व करते हुए इसने जिन वायदों-नारों पर जनसमुदाय को साथ लिया, उनसे बार-बार मुकरता रहा और विश्वासघात करता रहा। ज़ाहिर है कि औपनिवेशिक सामाजिक-आर्थिक संरचना के गर्भ से पैदा हुआ और साम्राज्यवादी विश्व-परिवेश में पला-बढ़ा पूँजीवाद ऐसा ही हो सकता था। भारतीय समाज के औपनिवेशिक अतीत की इस त्रासदी को समझना ही राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष के दौरान और आज के भारत में विभिन्न वर्गों की भूमिका को, उनके संघर्षों की कमज़ोरियों को, मूलाधार और अधिरचना के विविध पक्षों को, भावी परिवर्तन की दिशा और समस्याओं को तथा आज के आधुनिक पूँजीवादी समाज में पण्य-पूजा और अलगाव आदि पूँजीवादी विकृतियों के साथ-साथ मध्ययुगीन बर्बर परम्पराओं-रूढ़ियों-मान्यताओं के विचित्र सहमेल को समझने की एक कुंजीभूत कड़ी है। औपनिवेशिक अतीत के जन्मचिह्न  केवल भारतीय पूँजीपति वर्ग ही नहीं बल्कि अन्य वर्गों के शरीर पर भी अंकित हैं। पुनर्जागरण-प्रबोधन-क्रान्ति की प्रक्रिया के हाशिये पर खड़ा रूस बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ तक मध्ययुगीन बर्बरता के आगोश में जकड़ा हुआ था, लेकिन चूँकि औपनिवेशिक गुलामी ने उसकी स्वतन्त्र आन्तरिक गति का गला नहीं घोंटा था, इसलिए उस देश में हर्ज़ेन, बेलिंस्की, चेर्निशेव्स्की, दोब्रोल्यूबोव जैसे क्रान्तिकारी जनवादी विचारकों और पुश्किन, गोगोल, लर्मन्तोव, तुर्गनेव, तोल्स्तोय, दोस्तोयेव्स्की, कोरोलेंको, चेख़व आदि यथार्थवादी लेखकों ने अपने कृतित्व से तथा उन्नीसवीं शताब्दी के मध्यवर्गीय क्रान्तिकारियों ने अपने शौर्य से न केवल एक भावी युगान्तरकारी क्रान्ति की ज़मीन तैयार की, बल्कि क्रान्तिकारी जनवादी विचारों से पूरे सामाजिक मानस को सींचने का काम किया। चीन भी निहायत पिछड़ा और साम्राज्यवादी लूट-खसोट से तबाह देश था, लेकिन भारत की तरह उसका पूर्ण उपनिवेशीकरण नहीं हो सका। इसीलिए न केवल उस देश ने सुन यात-सेन, लू शुन और माओ जैसे जननायक पैदा किये, बल्कि वहाँ की कम्युनिस्ट पार्टी ने अन्तरराष्ट्रीय नेतृत्व पर अन्धी निर्भरता और अनुकरण के बजाय अपनी क्रान्ति का मार्ग स्वयं ढूँढ़ा। चीनी क्रान्ति ने आधी सदी के भीतर ही उत्पादन-सम्बन्धों के साथ-साथ चीनी जनमानस में गहराई तक पैठे मध्ययुगीन बर्बर मूल्यों, रहस्यवाद और धार्मिक रूढ़ियों को काफी हद तक उखाड़ फेंका था। इस तुलना के द्वारा (ध्यान रखते हुए कि हर तुलना लँगड़ी होती है) हम कहना यह चाहते हैं कि उपनिवेशीकरण की त्रासदी ने न केवल भारतीय पूँजीपति वर्ग को, बल्कि बुद्धिजीवियों और सर्वहारा वर्ग सहित हमारे समाज के सभी वर्गों को प्रभावित किया तथा उनके वैचारिक-सामाजिक-राजनीतिक आन्दोलनों को कमज़ोर बनाने का काम किया। निश्चय ही, राष्ट्रीय आन्दोलन और वर्ग-संघर्ष की ऊष्मा ने भारत में भी राधामोहन गोकुल और राहुल सांकृत्यायन जैसे उग्र परम्पराभंजक चिन्तक, भगत सिंह जैसे युवा विचारक क्रान्तिकारी और प्रेमचन्द जैसे महान जनवादी यथार्थवादी लेखक को जन्म दिया, लेकिन क्षितिज पर अनवरत प्रज्वलित इन मशालों की संख्या बहुत कम है, क्योंकि औपनिवेशिक भारत में किसी युगान्तरकारी वैचारिक- सामाजिक-सांस्कृतिक आन्दोलन की ज़मीन ही बहुत कमज़ोर थी। कोई आश्चर्य नहीं कि तिलक जैसे उग्र राष्ट्रवादी तथा युगान्तर-अनुशीलन के मध्यवर्गीय क्रान्तिकारी राष्ट्रीय मुक्ति का नया वैचारिक आधार तर्कणा एवं भौतिकवादी विश्वदृष्टि आधारित मानववाद-जनवाद के आधार पर तैयार करने के बजाय खोये हुए गौरवशालीय अतीत की पुनर्स्थापना और धार्मिक विश्वासों का सहारा लेते थे। गाँधी भारतीय परिस्थितियों में, बुर्जुआ मानववाद की प्रतिमूर्त कहे जा सकते हैं, लेकिन जनमानस को साथ लेने के लिए उन्होंने रूढ़ियों, धार्मिक अन्धविश्वासों और पुरातनपन्थी रीतियों का भरपूर सहारा लिया। इससे (महात्माय् बनकर) जनता को साथ लेने में तो वे सफल रहे लेकिन साथ ही, रूढ़ियों-परम्पराओं को पुन:संस्कारित करके नया जीवन देने में भी उनकी भूमिका अहम हो गयी। राष्ट्रीय आन्दोलन की विभिन्न धाराओं के अधिकांश मुख्य नायकों के विचारों की तुलना यदि वाल्तेयर, दिदेरो, रूसो या टॉमस पेन, जेफर्सन, वाशिंगटन या हर्ज़ेन, चेर्निशेव्स्की आदि के उग्र रूढ़िभंजक विचारों से करें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि राष्ट्रीय आन्दोलनकालीन अधिकांश भारतीय राष्ट्रीय जनवादी विचारकों ने काफी हद तक (भविष्य की कविता) के बजाय (अतीत की कविता) को अपना आदर्श और प्रेरक-स्रोत बनाया और फलत: अपने दौर में एक प्रगतिशील भूमिका निभाने के बावजूद, दूरगामी तौर पर, वस्तुगत रूप में पुनरुत्थानवादी और रूढ़िवादी यथास्थितिवाद की ज़मीन को ही मज़बूत करने का काम किया।
आज़ादी मिलने के बाद के छह दशकों के दौरान हमारे देश में सामन्ती भूमि- सम्बन्धों के टूटने और पूँजीवादी विकास की जो क्रमिक, मन्थर प्रक्रिया रही है, वह आर्थिक धरातल पर तो घोर यन्त्रणादायी और जनविरोधी रही ही है, मूल्यों- मान्यताओं-संस्थाओं के धरातल पर भी यह प्रक्रिया कुछ भी ऊर्जस्वी और सकारात्मक दे पाने की क्षमता से सर्वथा रिक्त रही है। भारतीय पूँजीपति वर्ग किसी भी सामाजिक आन्दोलन में जनसमुदाय की पहलकदमी और सृजनशीलता के निर्बन्ध होने से हमेशा ही आतंकित रहा है। इसीलिए हमारे देश में पूँजीवादी विकास का रास्ता “नीचे से” नहीं बल्कि “ऊपर से” अपनाया गया, यानी जन-पहलकदमी और सामाजिक आन्दोलनों के बजाय बुर्जुआ राज्यसत्ता की नीतियों पर अमल के द्वारा यहाँ पूँजीवाद का क्रमिक विकास हुआ, जिसकी सबसे तेज़ गति चार दशक बाद 1990 के दशक में देखने को मिली, जब पूरी दुनिया साम्राज्यवादी भूमण्डलीकरण की चपेट में आ चुकी थी।
ऐसी स्थिति में यह स्वाभाविक तौर पर समझा जा सकता है कि बुर्जुआ जनवाद के स्वस्थ-सकारात्मक मूल्य क्यों हमारे समाज के ताने-बाने में पैठ ही नहीं पाये। किसी नागरिक को जो सीमित जनवादी और नागरिक अधिकार तथा व्यक्तिगत आज़ादी संविधान की किताब और कानून की धाराएँ प्रदान करती भी हैं, उन्हें न केवल पुलिस और प्रशासन का तन्त्र उस तक पहुँचने नहीं देता, बल्कि मध्ययुगीन रूढ़ियों-परम्पराओं का सामाजिक-सांस्कृतिक वर्चस्व भी उन्हें निष्प्रभावी बनाने में एक अहम भूमिका निभाता है। रूढ़ियों का यह सामाजिक- सांस्कृतिक वर्चस्व ही वह प्रमुख उपादान है, जिसके ज़रिये प्रभुत्वशाली वर्ग और उसकी राज्यसत्ता आम जनता से अपने शासन के पक्ष में “स्वयंस्पफूर्त”-सी प्रतीत होने वाली सहमति प्राप्त करती है।

कहा जा सकता है कि भारतीय बुर्जुआ समाज क्लासिकी अर्थों. में, पूरी तरह से एक नागरिक समाज नहीं बन पाया है, क्योंकि न केवल प्राक्-बुर्जुआ समाज की विविध सामुदायिक अस्मिताएँ, बल्कि मूल्य-मान्यताएँ-संस्थाएँ भी आज प्रभावी और वर्चस्वकारी रूप में मौजूद हैं। लेकिन ये मूल्य-मान्यताएँ-संस्थाएँ किसी सामन्ती अभिजन समाज की नहीं, बल्कि भारतीय बुर्जुआ वर्ग या कहें कि भारतीय बुर्जुआ समाज के नये, आधुनिक अभिजन समाज की सेवा करती हैं। जो भारतीय बुर्जुआ वर्ग नये बुर्जुआ मूल्यों के सृजन में जन्मना असमर्थ था उसने एक क्रमिक प्रक्रिया में अर्द्धसामन्ती आर्थिक सम्बन्धों को तो नष्ट किया लेकिन सामन्ती मूल्यों-मान्यताओं-संस्थाओं को संकुचित संशोधन-परिष्कार के साथ अपना लिया और बुर्जुआ राज और समाज की सेवा में, या कहें कि पूँजीवाद की सेवा में सन्नद्ध कर लिया। यह कृषि और औद्योगिक उत्पादन में तो बुर्जुआ तर्कपरकता की शिक्षा देता है, लेकिन कला-साहित्य-संस्कृति और सामाजिक जीवन में अवैज्ञानिक मध्ययुगीन मूल्यों को अक्षत बने रहने देता है और न केवल बने रहने देता है, बल्कि उन्हें खाद-पानी देने का काम भी करता है।
कुछ उदाहरण लें। दहेज़ एक पुरानी सामन्ती संस्था है। लेकिन आज शहरों के आधुनिक मध्य वर्ग और व्यापारियों में इसका चलन सबसे ज्यादा है। दहेज़ के लिए स्त्रियाँ जला दी जाती हैं और फिर दहेज़ बटोरने के लिए एक और शादी का रास्ता साफ हो जाता है। यानी दहेज़, व्यापार या उद्यम के लिए पूँजी जुटाने का एक माध्यम बन गया है, न कि सामन्ती शान का प्रतीक रह गया है। यही कारण है कि पहले दहेज़ का खूब प्रदर्शन होता था, पर आज यह छिपाकर, पर्दे की ओट में ले लिया जाता है। सभी बुर्जुआ चुनावी पार्टियाँ अपनी नीतियाँ बुर्जुआ शासक वर्गों के हितसाधन के लिए तैयार करती हैं और आम लोग भी जानते होते हैं कि उनमें से कोई भी उनकी ज़िन्दगी में कोई महत्त्वपूर्ण बदलाव नहीं ला सकती, लेकिन भारत में वोट बैंक की राजनीति किसी भी लोकलुभावन आर्थिक वायदे या राजनीतिक नारे से अधिक जातिगत समीकरणों पर आधारित होती है। जातियों और उनकी पंचायतों के मुखियाओं के माध्यम से आम जनता की जातिगत एकता के संस्कारों का लाभ उठाकर, उनके वोट आसानी से हासिल कर लिये जाते हैं। भारत के चुनाव विशेषज्ञों की सारी विशेषज्ञता इस बात में निहित होती है कि वे जातिगत सामाजिक समीकरणों को किस हद तक समझते हैं। टेलीविज़न आधुनिकतम प्रौद्योगिकी-आधारित एक ऐसा माध्यम है जो जनमानस और सांस्कृतिक मूल्यों को बदलने में शायद सबसे प्रभावी भूमिका निभा सकता है। लेकिन टेलीविजन पर धार्मिक प्रचार के चैनलों की संख्या एक दर्जन के आसपास है, जबकि विज्ञान-तकनोलॉजी-वैज्ञानिक जीवनदृष्टि पर केन्द्रित एक भी चैनल नहीं है। न्यूज़ चैनलों से लेकर मनोरंजन के चैनलों तक सर्वाधिक सामग्री जादू-टोना, भूत-प्रेत, अन्धविश्वास, परम्परा-पूजा और रूढ़ियों के प्रचार से जुड़ी होती है।
इन सभी उदाहरणों के माध्यम से हम कहना यह चाहते हैं कि भारतीय समाज एक ऐसा, विशिष्ट प्रकृति का पूँजीवादी समाज है जिसमें उत्पादन और विनिमय की प्रणाली के स्तर पर पूँजी का, बाज़ार का वर्चस्व स्थापित हो चुका है, पर इस विशिष्ट प्रकृति के पूँजीवाद ने अधिकांश प्राक्-पूँजीवादी मूल्यों- मान्यताओं-संस्थाओं को तोड़ने की बजाय अपना लिया है तथा विविध रूपों में पूँजी और पूँजीवादी व्यवस्था की सेवा में सन्नद्ध कर दिया है। हमारे समाज में तमाम मध्ययुगीन स्वेच्छाचारी मूल्यों-मान्यताओं के साथ ही अलगाव, पण्य पूजा, व्यक्तिवाद और बुर्जुआ निरंकुशता जैसे पतनशील बुर्जुआ मूल्यों का एक विचित्र सहमेल मौजूद है। पुरानी बुराइयों के साथ नयी बुराइयों का यह सहअस्तित्व बुर्जुआ समाज के हर प्रकार के अन्याय को सामाजिक स्वीकृति प्रदान करने का काम करता है। यह एक ऐसा बुर्जुआ समाज है जिसमें प्राक्-नागरिक समाज के मूल्यों-मान्यताओं का सहारा लेकर शोषक वर्ग शासित वर्ग में यह भ्रम पैदा करता है कि व्यवस्था उनकी सहमति (कन्सेण्ट) से चल रही है। इस रूप में शासक वर्ग शासित वर्गों पर अपना वर्चस्व, यानी सहयोजन के साथ प्रभुत्व, स्थापित करता है, जैसाकि प्रत्येक नागरिक समाज में होता है। इस वर्चस्व के ज़रिये बुर्जुआ राज्य की रक्षा होती है और अपनी पारी में, राज्य अपनी संस्थाओं के ज़रिये इस वर्चस्व को बनाये रखने में भूमिका निभाता है। यानी भारत का बुर्जुआ समाज एक ऐसा नागरिक समाज है, जिसमें शासक वर्ग के वर्चस्व को बनाये रखने में प्राक्-नागरिक समाज की अस्मिताओं-मूल्यों-मान्यताओं-संस्थाओं की अहम भूमिका होती है। इन अर्थों में यहाँ की स्थिति यूरोपीय नागरिक समाजों से काफी हद तक भिन्न है।

लेकिन इसका मतलब यह कदापि नहीं है कि वैचारिक-सांस्कृतिक स्तर पर आज प्राक्-नागरिक समाज के मूल्यों-मान्यताओं के विरुद्ध संघर्ष करके एक यूरोपीय ढंग के नागरिक समाज (यानी बुर्जुआ समाज) के मूल्यों-मान्यताओं को स्थापित किया जा सकता है। इतिहास के इस दौर में यह सम्भव नहीं है। हम पीछे मुड़कर बुर्जुआ पुनर्जागरण-प्रबोधन-क्रान्ति की प्रक्रिया नये सिरे से शुरू नहीं कर सकते। इतिहास की विशिष्ट गति से आविर्भूत जो भी भारतीय बुर्जुआ समाज हमारे सामने मौजूद है, उसे नष्ट करके ही इसकी सभी बुराइयों से छुटकारा पाया जा सकता है जिनमें मध्ययुगीन मूल्य-मान्यताएँ भी शामिल हैं। नये सिरे से एक आदर्श बुर्जुआ समाज नहीं बनाया जा सकता। वर्तमान बुर्जुआ समाज का विकल्प एक ऐसा समाज ही हो सकता है, जिसमें उत्पादन मुनाफे के लिए नहीं बल्कि सामाजिक आवश्यकताओं को केन्द्र में रखकर होता हो, जिसमें उत्पादन, राजकाज और समाज पर बहुसंख्यक उत्पादक जनसमुदाय का नियन्त्रण कायम हो। ऐसे समाज में न केवल श्रम-विभाजन, अलगाव और पण्य पूजा की संस्कृति नहीं होगी, बल्कि तर्कणा, जनवाद और व्यक्तिगत आज़ादी का निषेध करने वाली सभी मध्ययुगीन मूल्यों-मान्यताओं-संस्थाओं का अस्तित्व भी समाप्त हो जायेगा। ज़ाहिर है कि यह सबकुछ एक झटके से नहीं हो जायेगा। राजनीतिक व्यवस्था- परिवर्तन और आर्थिक सम्बन्धों के परिवर्तन के साथ-साथ और उसके बाद भी सतत समाजिक-सांस्कृतिक क्रान्ति की एक लम्बी प्रक्रिया के बाद ही ऐसा सम्भव हो सकेगा।
हरेक राजनीतिक आन्दोलन की पूर्ववर्ती, सहवर्ती और अनुवर्ती सामाजिक- सांस्कृतिक आन्दोलन की स्वयंस्फूर्त धाराएँ अनिवार्यत: उपस्थित होती हैं। लेकिन इन सहवर्ती-अनुवर्ती धाराओं की स्वयंस्फूर्त गति एवं परिणति पर नियतत्त्ववादी ढंग से ज़ोर नहीं दिया जाना चाहिए। यानी, यह मानकर नहीं चला जाना चाहिए कि राजनीतिक व्यवस्था-परिवर्तन और आर्थिक सम्बन्धों के बदलने के साथ ही सामाजिक-सांस्कृतिक अधिरचनात्मक तन्त्र भी स्वत: बदल जायेगा। आर्थिक मूलाधार से आविर्भूत-निर्धारित होने के बावजूद अधिरचना की अपनी सापेक्षत:  स्वतन्त्र गति होती है और उसे बदलने के लिए अधिरचना के धरातल पर भी सचेतन प्रयास की, अधिरचना में क्रान्ति की, आवश्यकता होती है। राजनीतिक परिवर्तन की प्रक्रिया सामाजिक-सांस्कृतिक आन्दोलनों को जन्म और गति देती है और साथ ही सामाजिक-सांस्कृतिक आन्दोलन राजनीतिक परिवर्तन की प्रक्रिया को मज़बूत, गतिमान और गहरा बनाते हैं। भारत में औपनिवेशिक दौर, राष्ट्रीय आन्दोलन और उसके बाद पूँजीवादी समाज-विकास का जो विशिष्ट इतिहास रहा, आज के समाज में मध्ययुगीन मूल्यों-मान्यताओं-संस्थाओं की मौजूदगी उसी का एक प्रतिपफल है। जो काम राष्ट्रीय जनवादी क्रान्ति के दौर में हो सकता था, वह नहीं हुआ। सामाजिक-सांस्कृतिक जड़ता किंचित सुगबुगाहट और ऊपरी बदलावों के बावजूद बनी रही। अब एक प्रबल वेगवाही सामाजिक झंझावात ही इस जड़ता को तोड़कर भारतीय समाज की शिराओं में एक नयी ऊर्जस्विता और संवेग का संचार कर सकता है। यह तूफान पूँजीवादी सामाजिक-आर्थिक संरचना और राजनीतिक व्यवस्था के साथ ही उन सभी नये-पुराने मूल्यों और संस्थाओं को भी अपना निशाना बनायेगा जो इस व्यवस्था से सहारा पाते हैं और इसे सहारा देते हैं।

प्रेम की आज़ादी के प्रश्न को भी इसी ऐतिहासिक-सैद्धान्तिक परिप्रेक्ष्य में देखा-समझा जा सकता है। व्यक्तिगत और खण्डित संघर्ष इस प्रश्न को एजेण्डा पर उपस्थित तो कर सकते हैं, लेकिन हल नहीं कर सकते। सामाजिक ताने-बाने में जनवाद और व्यक्तिगत आज़ादी के अभाव और मध्ययुगीन कबीलाई, निरंकुश स्वेच्छाचारिता के प्रभुत्व को तोड़े बिना, परम्पराओं और रूढ़ियों की जकड़बन्दी को छिन्न-भिन्न किये बिना, प्रेम की आज़ादी हासिल नहीं की जा सकती। इसलिए यह सवाल एक आमूलगामी सामाजिक-सांस्कृतिक क्रान्ति का सवाल है। हमें भूलना नहीं होगा कि प्रेम और जीवनसाथी चुनने की आज़ादी का प्रश्न जाति-प्रश्न और स्त्री-प्रश्न से तथा धार्मिक आधार पर कायम सामाजिक पार्थक्य की समस्या से बुनियादी रूप से जुड़ा हुआ है। इन प्रश्नों पर एक व्यापक सामाजिक-सांस्कृतिक आन्दोलन ही समस्या के अन्तिम हल की दिशा में जाने वाला एकमात्र रास्ता है। और साथ ही, इसके बिना, राजनीतिक व्यवस्था-परिवर्तन की किसी लड़ाई को भी अंजाम तक नहीं पहुँचाया जा सकता। जो समाज अपनी युवा पीढ़ी को अपनी ज़िन्दगी के बारे में बुनियादी फैसले लेने तक की इजाज़त नहीं देता, जहाँ परिवार में पुरानी पीढ़ी और पुरुषों का निरंकुश स्वेच्छाचारी अधिनायकत्व आज भी प्रभावी है, जिस समाज के मानस पर रूढ़ियों-परम्पराओं की ऑक्टोपसी जकड़ कायम है, वह समाज बुर्जुआ समाज के सभी अन्याय-अनाचार को और बुर्जुआ राज्य के वर्चस्व को स्वीकारने के लिए अभिशप्त है। इसीलिए, कोई आश्चर्य नहीं कि संविधान और कानून की किताबों में व्यक्तिगत आज़ादी और जनवाद की दुहाई देने वाली बुर्जुआ राज्यसत्ता अपने तमाम प्रचार-माध्यमों के ज़रिये धार्मिक-जातिगत रूढ़ियों-मान्यताओं, अन्धविश्वासों और मध्ययुगीन मूल्यों को बढ़ावा देने का काम करती है, क्योंकि इन्हीं के माध्यम से वह जनसमुदाय से अपने शासन के लिए एक किस्म की “स्वयंस्फ़ूर्त” सहमति हासिल करती है और यह भ्रम पैदा करती है कि उनका प्रभुत्व जनता की सहमति से कायम है। जो समाज भविष्य के नागरिकों को रूढ़ियों के विरुद्ध विद्रोह करने की इजाज़त नहीं देता, वह अपनी गुलामी की बेड़ियों को खुद ही मज़बूत बनाने का काम करता है। इन्हीं रूढ़ियों-परम्पराओं के ऐतिहासिक कूड़े-कचरे के ढेर से वे फ़ासिस्‍ट गिरोह खाद-पानी पाते हैं जो मूलत: एक असाध्य संकटग्रस्त बुर्जुआ समाज की उपज होते हैं। “अतीत के गौरव” की वापसी का नारा देती हुई ये फ़ासिस्‍ट शक्तियाँ वस्तुत: पूँजी के निरंकुश सर्वसत्तावादी शासन की वकालत करती हैं और धार्मिक-जातिगत- नस्ली-लैंगिक रूढ़ियों को मज़बूत बनाकर व्यवस्था की बुनियाद को मज़बूत करने में एक अहम भूमिका निभाती हैं। बाबू बजरंगी और प्रेमी जोड़ों पर हमले करने वाले गुण्डागिरोह इन्हीं शक्तियों के प्रतिनिधि उदाहरण हैं।

प्रेम की आज़ादी का सवाल रूढ़ियों से विद्रोह का प्रश्न है। यह जाति-प्रथा के विरुद्ध भी विद्रोह है। सच्चे अर्थों में प्रेम की आज़ादी का प्रश्न स्त्री की आज़ादी के प्रश्न से भी जुड़ा है, क्योंकि प्रेम आज़ाद और समान लोगों के बीच ही वास्तव में सम्भव है। प्रेम के प्रश्न को हम सामाजिक-आर्थिक मुक्ति के बुनियादी प्रश्न से अलग काटकर नहीं देख सकते। सामाजिक-सांस्कृतिक क्रान्ति के एजेण्डा से हम इस प्रश्न को अलग नहीं कर सकते। इस प्रश्न को लेकर हमारे समाज में संघर्ष के दो रूप बनते हैं। एक,फौरी तथा दूसरा दूरगामी। फौरी तौर पर, जब भी कहीं कोई बाबू बजरंगी या धार्मिक कट्टरपंथियों का कोई गिरोह या कोई जाति-पंचायत प्रेमी जोड़ों को ज़बरन अलग करती है या कोई सज़ा सुनाती है, तो यह व्यक्तिगत आज़ादी या जनवादी अधिकार का एक मसला बनता है। इस मसले को लेकर क्रान्तिकारी छात्र-युवा संगठनों, सांस्कृतिक संगठनों, नागरिक अधिकार संगठनों आदि को आगे आना चाहिए और रस्मी कवायदों से आगे बढ़कर प्रतिरोध की संगठित आवाज़ उठानी चाहिए, संविधान और कानून रस्मी तौर पर हमें जो अधिकार देते हैं उनका भी सहारा लेना चाहिए और व्यापक आम जनता के बीच अपनी बात ले जाकर समर्थन हासिल करने की कोशिश करनी चाहिए। यह प्रक्रिया युवा समुदाय और समाज के प्रबुद्ध तत्त्वों की चेतना को `रैडिकल´ बनाने का भी काम करेगी। लेकिन मात्र इसी उपक्रम को समस्या का अन्तिम समाधान मान लेना एक सुधारवादी दृष्टिकोण होगा। यह केवल फौरी कार्यभार ही हो सकता है। इसके साथ एक दूरगामी कार्यभार भी है और वही फौरी कार्यभार को भी एक क्रान्तिकारी परिप्रेक्ष्य प्रदान करता है।
प्रेम की आज़ादी का प्रश्न बुनियादी तौर पर समाज के मौजूदा आर्थिक-सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक ढाँचे के क्रान्तिकारी परिवर्तन से जुड़ा हुआ है और इस रूप में यह बुर्जुआ समाज-विरोधी नयी मुक्ति-परियोजना का एक अंग है। जातिगत-धार्मिक रूढ़ियों से मुक्ति और स्त्रियों की आज़ादी के प्रश्न से भी यह अविभाज्यत: जुड़ा हुआ है। इस रूप में इस समस्या का हल एक दीर्घकालिक संघर्ष के परिप्रेक्ष्य के बिना सम्भव नहीं। व्यवस्था-परिवर्तन के क्रान्तिकारी संघर्ष की कड़ियों के रूप में संगठित युवाओं के आन्दोलन, सांस्कृतिक आन्दोलन, स्त्री-आन्दोलन और नागरिक अधिकार आन्दोलन की एक लम्बी और जुझारू प्रक्रिया ही इस समस्या के निर्णायक समाधान की दिशा में भारतीय समाज को आगे ले जा सकती है। यही नहीं, व्यवस्था-परिवर्तन के बाद भी समाज की हरावल शक्तियों को सामाजिक- सांस्कृतिक अधिरचना में सतत क्रान्ति की दीर्घकालिक प्रक्रिया चलानी होगी, तभी सच्चे अर्थों में समानता और आज़ादी की सामाजिक व्यवस्था कायम होने के साथ ही रूढ़ियों की दिमाग़ी गुलामी से और मानवद्रोही पुरातनपन्थी मूल्यों के सांस्कृतिक वर्चस्व से छुटकारा मिल सकेगा और सच्चे अर्थों में आदर्श मानवीय प्रेम को ज़िन्दगी की सच्चाई बनाया जा सकेगा, जो कम से कम आज, सुदूर भविष्य की कोई चीज़ प्रतीत होती है।
अब इस प्रश्न के एक और पहलू पर भी विचार कर लिया जाना चाहिए। चाहे अन्तरजातीय-अन्तरधार्मिक विवाह करने वाले किसी युवा जोड़े पर जाति- बिरादरी के पंचों द्वारा बर्बर अत्याचार का सवाल हो, चाहे एम.एफ. हुसैन के चित्रों के विरुद्ध हिन्दुत्ववादी फासिस्टों की मुहिम हो, या चाहे नागरिक अधिकार, जनवादी अधिकार और व्यक्तिगत आज़ादी से जुड़ा कोई भी मसला हो, इन सवालों पर पढ़े-लिखे मध्य वर्ग का या आम छात्रों-युवाओं का भी बड़ा हिस्सा संगठित होकर सड़कों पर नहीं उतरता। ऊपर हमने इसके सामाजिक-ऐतिहासिक कारणों की आम चर्चा की है। लेकिन उस आम कारण के एक विशिष्ट विस्तार पर भी चर्चा ज़रूरी है, जो आज के भारतीय समाज में प्रगतिशील एवं जनवादी माने जाने वाले बुद्धिजीवियों की स्थिति और आम जनता के विभिन्न वर्गो के साथ उनके रिश्तों से जुड़ी हुई है।
जब भी अन्तरजातीय-अन्तरधार्मिक प्रेम या विवाह करने वाले किसी जोड़े पर अत्याचार की या नागरिक अधिकार के हनन की कोई घटना सामने आती है तो दिल्ली या किसी राज्य की राजधानी या किसी अन्य महानगर की सड़कों पर कुछ थोड़े से मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी उसके प्रतीकात्मक विरोध के लिए आगे आते हैं। (दिल्ली में) मण्डी हाउस से होकर जन्तर-मन्तर तक, कहीं भी कुछ लोग धरने पर बैठ जाते हैं, किसी एक शाम को मोमबत्ती जुलूस या मौन जुलूस निकाल दिया जाता है, एक जाँच दल घटना-स्थल का दौरा करने के बाद वापस आकर प्रेस के लिए और बुद्धिजीवियों के बीच सीमित वितरण के लिए एक रिपोर्ट जारी कर देता है और कुछ जनहित याचिकाएँ दाखिल कर दी जाती हैं। इन सभी कार्रवाइयों का दायरा अत्यन्त सीमित और अनुष्ठानिक होता है। इनका कर्ता-धर्ता जो बुद्धिजीवी समुदाय होता है, वह केवल तात्कालिक और संकुचित दायरे की इन गतिविधियों से अपने कर्त्तव्यों की इतिश्री करके अपने प्रगतिशील और जनवादी होने का “प्रमाण” प्रस्तुत कर देता है। व्यापक आम आबादी तक अपनी बात पहुँचाने का, प्रचार और उद्वेलन की विविधरूपा कार्रवाइयों द्वारा उसे जागृत और संगठित करने का तथा ऐसे तमाम मुद्दों को लेकर सामाजिक- सांस्कृतिक आन्दोलन संगठित करने का कोई दूरगामी-दीर्घकालिक कार्यक्रम उनके एजेण्डे पर वस्तुत: होता ही नहीं। उनकी अपेक्षा केवल सत्ता से होती है कि वह संवैधानिक प्रावधानों-कानूनों का सहारा लेकर प्रतिक्रियावादी सामाजिक-राजनीतिक ताकतों के हमलों से आम लोगों के जनवादी अधिकारों और व्यक्तिगत आज़ादी की हिफाज़त सुनिश्चित करे। लोकतन्त्र के मुखौटे को बनाये रखने के लिए सरकार और प्रशासन तन्त्र भी कुछ रस्मी कार्रवाई करते हैं, कभी-कभार कुछ जाँच, कुछ गिरफ़्तारियाँ होती हैं और कुछ कानूनी कार्रवाइयाँ भी शुरू होती हैं और फ़िर समय बीतने के साथ ही सब कुछ ठण्डा पड़ जाता है।
दरअसल सत्ता और सभी पूँजीवादी चुनावी दलों के सामाजिक अवलम्ब ज़मीनी स्तर पर वही प्रतिगामी और रूढ़िवादी तत्त्व होते हैं, जो सामाजिक स्तर पर जाति-उत्पीड़न, स्त्री-उत्पीड़न और धार्मिक अल्पसंख्यकों के अलगाव एवं उत्पीड़न के सूत्रधार होते हैं। इसलिए हमारे देश की बुर्जुआ सत्ता यदि चाहे भी तो उनके विरुद्ध कोई कारगर कदम नहीं उठा सकती। यदि उसे सीमित हद तक कोई प्रभावी कदम उठाने के लिए मज़बूर भी करना हो तो व्यापक जन-भागीदारी वाले किसी सामाजिक आन्दोलन के द्वारा ही यह सम्भव हो सकता है। इससे भी अहम बात यह है कि ऐसा कोई सामाजिक आन्दोलन सत्ता के कदमों और कानूनों का मोहताज नहीं होगा, वह स्वयं नये सामाजिक मूल्यों को जन्म देगा, जनमानस में उन्हें स्थापित करेगा और रूढ़िवादी शक्तियों एवं संस्थाओं के वर्चस्व को तोड़ने की आमूलगामी प्रक्रिया को आगे बढ़ायेगा। इस काम को वह बुद्धिजीवी समाज कतई अंजाम नहीं दे सकता जो प्रगतिशील, वैज्ञानिक और जनवादी मूल्यों का आग्रही तो है, लेकिन समाज में उन मूल्यों को स्थापित करने के लिए न तो कोई तकलीफ झेलने के लिए तैयार है और न ही कोई जोखिम उठाने के लिए तैयार है।

जो बुद्धिजीवी आज वामपन्थी, प्रगतिशील, सेक्युलर और जनवादी होने का दम भरते हैं तथा तमाम रस्मी एवं प्रतीकात्मक कार्रवाइयों में लगे रहते हैं, उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति पर निगाह डालने से बात साफ हो जायेगी। प्राय: ये महानगरों में रहने वाले विश्वविद्यालयों-कॉलेजों के प्राध्यापक, मीडियाकर्मी, वकील, फ्रीलांसर पत्रकार व लेखक तथा एन.जी.ओ. व सिविल सोसाइटी संगठनों के कर्ता-धर्ता हैं। कुछ थोड़े से डॉक्टर, इंजीनियर जैसे स्वतन्त्र प्रोफेशनल्स और नौकरशाह भी इनमें शामिल हैं जो प्राय: प्रगतिशील लेखक या संस्कृतिकर्मी हुआ करते हैं। आर्थिक आय की दृष्टि से इनमें से अधिकांश का जीवन सुरक्षित है, इनकी एक सामाजिक हैसियत और इज्ज़त है। यह कथित प्रगतिशील जमात आज़ादी के बाद की आधी सदी, विशेषकर पिछले लगभग तीन दशकों के दौरान, तेज़ी से सुख-सुविधा सम्पन्न हुए मध्य वर्ग की उस ऊपरी परत का अंग बन चुकी है, जिसे इस पूँजीवादी व्यवस्था के भीतर आर्थिक सुरक्षा के साथ ही सामाजिक हैसियत की बाड़ेबन्दी की सुरक्षा और जनवादी अधिकार भी हासिल हैं। इस सुविधासम्पन्न विशेषाधिकार प्राप्त अल्पसंख्यक उपभोक्ता वर्ग में प्रोफेसर, मीडियाकर्मी, वकील आदि के रूप में रोज़ी कमाने वाले जो प्रगतिशील लोग शामिल हैं, वे अपने निजी जीवन में यदि जाति-धर्म को नहीं मानते हैं, स्वयं प्रेम-विवाह करते हैं, अपने बच्चों को इसकी इजाज़त देते हैं और प्रगतिशील आचरण करते हैं, तो भी वे इन मूल्यों को व्यापक आम आबादी के बीच ले जाने के लिए किसी सामाजिक-सांस्कृतिक मुहिम का भागीदार बनने की जहमत या जोखिम नहीं उठाते। साथ ही, इनमें कुछ ऐसे भी हैं जो प्रगतिशीलता की बात तो करते हैं, लेकिन अपनी निजी व पारिवारिक ज़िन्दगी में निहायत पुराणपन्थी हैं। चुनावी वामपन्थी दलों के नेताओं में से अधिकांश ऐसे ही हैं। इनमें से पहली कोटि के प्रगतिशीलों का कुलीनतावादी जनवाद और वामपन्थ हो या दूसरी कोटि के प्रगतिशीलों का दोगला-दुरंगा जनवाद और वामपन्थ मेहनतकश और सामान्य मध्य वर्ग के लोग उन्हें भली-भाँति पहचानते हैं और उनसे घृणा करते हैं। कुलीनतावादी प्रगतिशीलों और छद्म वामपिन्थयों का जीवन मुख्य तौर पर के ऊपरी पन्द्रह-बीस करोड़ आबादी के जीवन का हिस्सा बन चुका है, उस उच्च मध्यवर्गीय आबादी का हिस्सा बन चुका है जो एक लम्बी पीड़ादायी क्रमिक प्रक्रिया में, विकृत और आधे-अधूरे ढंग से, पूँजीवादी जनवादी क्रान्ति के कार्यभारों के पूरा होने के बाद, आम जनसमुदाय के साथ ऐतिहासिक विश्वासघात कर चुका है। उसे देश की लगभग पचपन करोड़ सर्वहारा- अर्द्धसर्वहारा आबादी या रोज़ाना बीस रुपये से कम पर जीने वाली चौरासी करोड़ आबादी के जीवन के अँधेरे और यन्त्राणाओं से अब कुछ भी लेना-देना नहीं रह गया है। एक परजीवी जमात के रूप में वह मेहनतकशों से निचोड़े गये अधिशेष का भागीदार बन चुका है। आर्थिक-सामाजिक दृष्टि से इस परजीवी वर्ग का हिस्सा बन चुके जो बुद्धिजीवी प्रगतिशील, जनवादी और सेक्युलर विचार रखते हैं, उनकी कुलीनतावादी, अनुष्ठानिक, नपुंसक प्रगतिशीलता आम लोगों में घृणा और दूरी के अतिरिक्त भला और कौन-सा भाव पैदा कर सकती है? इस तबके की जो स्त्रियाँ हैं, ऊपरी तौर पर आम लोगों को वे आज़ाद लगती हैं (हालाँकि वस्तुत: ऐसा होता नहीं) और यह आज़ादी उनकी विशेष सुविधा प्रतीत होती है जिसके चलते मेहनतकश और आम मध्य वर्ग की स्त्रियाँ (ऊपर से सम्मान देती हुई भी) उनसे बेगानगी या घृणा तक का भाव महसूस करती हैं तथा उन्हें अपने से एकदम अलग मानती हैं।
उपरोक्त पूरी चर्चा के ज़रिये हम इस सच्चाई की ओर ध्यान आकृष्ट करना चाहते हैं कि प्रेम करने की आज़ादी पर रोक सहित किसी भी मध्ययुगीन बर्बरता, धार्मिक कट्टरपन्थी हमले या जातिवादी उत्पीड़न के विरुद्ध कुलीनतावादी प्रगतिशीलों की रस्मी, प्रतीकात्मक कार्रवाइयों का रूढ़िवादी शक्तियों और मूल्यों पर तो कोई असर नहीं ही पड़ता है, उल्टे आम जनता पर भी इनका उल्टा ही प्रभाव पड़ता है। सुविधासम्पन्न, कुलीनतावादी प्रगतिशीलों का जीवन आम लोगों से इतना दूर है कि उनके जीवन-मूल्य (यदि वास्तविक हों तो भी) जनता को आकृष्ट नहीं करते।
एक दूसरी बात जो ग़ौरतलब है, वह यह कि आज के भारतीय समाज में मध्ययुगीन बुराइयों के साथ-साथ आधुनिक बुर्जुआ जीवन की तमाम बुराइयाँ और विकृतियाँ भी मौजूद हैं। आम लोगों को पुरानी बुराइयों के विकल्प के तौर पर समाज में आधुनिक बुर्जुआ जीवन की बुराइयाँ ही नज़र आती हैं। पुरानी बुराइयों के साथ जीने की उन्हें आदत पड़ चुकी है। उनसे उनका परिचय पुराना है। इसलिए नयी बुराइयाँ उन्हें ज्यादा भयावह प्रतीत होती हैं। आधुनिक बुर्जुआ जीवन की सामाजिक-सांस्कृतिक विकृतियों को देखकर वे पुराने जीवन-मूल्यों से चिपके रहने का स्वाभाविक विकल्प चुनते हैं। महानगरों में तरह-तरह के सेक्स रैकेट, प्रेम-विवाहों की विफलता, यौन अपराधों आदि की खबरें पढ़-सुनकर और मीडिया में बढ़ती अश्लीलता आदि देखकर आम नागरिक इन्हें आधुनिक जीवन का प्रतिफल मानते हैं और इनसे सहज प्रतिक्रियास्वरूप उन रूढ़ियों को अपना शरण्य बनाते हैं जिनके साथ जीने के वे शताब्दियों से और पीढ़ियों से आदी रहे हैं। इसका एक वस्तुगत कारण आज की ऐतिहासिक-सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों में भी मौजूद है, जब प्रगति की धारा पर विपर्यय और प्रतिगामी पुनरुत्थान की धारा हावी है और चतुर्दक गतिरोध का माहौल है। और मनोगत कारण यह है कि विपर्यय और गतिरोध के इस दौर में ऐतिहासिक परिवर्तन की वाहक मनोगत शक्तियाँ अभी बिखरी हुई और निहायत कमज़ोर हैं। नये सिरे से नयी ज़मीन पर उनके उठ खड़े होने की प्रक्रिया अभी एकदम शुरुआती दौर में है। ऐसी ही शक्तियाँ अपने विचार और व्यवहार के द्वारा जनता के सामने मध्ययुगीन और विकृत बुर्जुआ जीवन मूल्यों का नया, मानवीय और वैज्ञानिक विकल्प प्रस्तुत कर सकती हैं।
फ़िलहाल की गतिरुद्ध स्थिति के बारे में भगत सिंह का उद्धरण एकदम सटीक ढंग से लागू होता है और ऐसी स्थिति में नयी क्रान्तिकारी शक्तियों के दायित्व के बारे में भी यह एकदम सही बात कहता है : “जब गतिरोध की स्थिति लोगों को अपने शिकंजे में जकड़ लेती है तो किसी भी प्रकार की तब्दीली से वे हिचकिचाते हैं। इस जड़ता और निष्क्रियता को तोड़ने के लिए एक क्रान्तिकारी स्पिरिट पैदा करने की ज़रूरत होती है, अन्यथा पतन और बरबादी का वातावरण छा जाता है। लोगों को गुमराह करने वाली प्रतिक्रियावादी शक्तियाँ जनता को ग़लत रास्ते पर ले जाने में सफल हो जाती हैं। इससे इन्सान की प्रगति रुक जाती है और उसमें गतिरोध आ जाता है। इस परिस्थिति को बदलने के लिए यह ज़रूरी है कि क्रान्ति की स्पिरिट ताज़ा की जाये, ताकि इन्सानियत की रूह में हरकत पैदा हो।”

…इस आलेख का शेष भाग देखें : प्रेम, परम्‍परा और विद्रोह pdf file

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One thought on “प्रेम, परम्परा और विद्रोह

    suman said:
    May 13, 2009 at 6:17 AM

    good.suman.lokshanghaarsha

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