मजदूर पूंजीपति को उधार देता है

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21.  ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ पर डेविड रियाजानोव

की व्याख्यात्मक टिप्पणियां

“ऐसे प्रत्येक देश में, जिसमें पूंजीवादी ढंग का उत्पादन पाया जाता है, यह रिवाज होता है कि जब तक श्रम-शक्ति का करार में निश्चित समय तक, जैसे, मिसाल के लिए, एक सप्ताह तक प्रयोग नहीं कर लिया जाता, तब तक उसके दाम नहीं दिए जाते. इसलिए, हर जगह मज़दूर अपनी श्रम-शक्ति का उपयोग-मूल्य पूंजीपति को पेशगी दे देता है, मज़दूर अपनी श्रम-शक्ति के क्रेता को दाम पाने के पहले ही उसके उपयोग की इजाज़त दे देता है; हर कहीं मज़दूर पूंजीपति को उधार देता है. यह उधार महज़ कोई हवाई चीज नहीं होता, इसका सबूत सिर्फ यह है कि पूंजीपति का दिवाला निकलने पर मजदूरी के पैसे अक्सर डूब जाते हैं बल्कि यह भी कि उसके इससे कहीं अधिक स्थायी अनेक दूसरे नतीजे भी होते हैं.” (मार्क्स, कैपिटल, खंड 1, पृ. 162)
मार्क्स यहाँ पर एक टिप्पणी देते हैं जिसमें वह आंकडे देते हुए यह सिद्ध करते हैं कि उन मज़दूरों से जिन्हें एक सप्ताह बाद मजदूरी मिलती है, दूकानदार ज़्यादा दाम वसूल करता है क्योंकि उन्हें अपनी ज़रुरत की चीजें उधार पर लेनी पड़ती हैं.
उस मज़दूर की स्थिति और ज़्यादा ख़राब होती है जो अपनी मजदूरी एक पखवाड़े या एक महीने के बाद पाता है. वह चीजों की और ज़्यादा कीमत चुकाने के लिए बाध्य हो जाता है और वास्तव में उस दूकानदार का गुलाम बन जाता है जो उसे चीजें उधार देता है. मज़दूर जो माल खरीदता है वे यदि वास्तव में मिलावटी नहीं होते तो निम्न गुणवत्ता के होते हैं. उन्नीसवीं शताब्दी के दौरान खाद्य सामग्री की मिलावट ने विकराल रूप धारण कर लिया था. इसी प्रकार आवास के मामले में मज़दूर भवन स्वामी की दया पर निर्भर रहता है. आवास जितना घटिया होता उतना अधिक उसकी मरम्मत पर खर्च आता है और असंदिग्ध रूप से सर्वाधिक मंहगे वे आवास होते हैं जिसमें आबादी का निर्धनतम वर्ग निवास करता है. “आवासों के सट्टेबाज गरीबी की इन खानों से इतना अधिक मुनाफा कमाते हैं कि पोटोसी की चांदी की खानों के मालिकों के मुहं में भी पानी आ जाये.”(मार्क्स, कैपिटल, खंड 1, पृ. 727)

22. निम्न और मध्यम बुर्जुआ सर्वहारा की कतारों में शामिल होते हैं

“समाज के उच्चतर संस्तरों से आये लोगों से भी मज़दूर वर्ग की संख्या में वृद्धि होती है. ढेरों छोटे उद्यमी और अनर्जित आय के छोटे हिस्सेदार सर्वहारा की कतारों में शामिल होते जाते हैं और अपने श्रम को श्रम बाज़ार में बिक्री के लिए मज़दूरों के साथ-साथ पेश कर देते हैं. काम की याचना में ऊपर उठे हाथों का जंगल लगातार ज़्यादा घना होता जाता है जबकि ये हाथ लगातार पतले होते जाते हैं. यह बात एकदम साफ़ है कि जब सफलता की पहली शर्त बड़े पैमाने का उत्पादन हो तो छोटा उत्पादक स्पर्द्धा में टिक नहीं सकता. दूसरे शब्दों में कोई भी इंसान एक ही वक्त में छोटे उत्पादक के साथ-साथ बड़ा उत्पादक नहीं बना रह सकता. इस तथ्य के विस्तृत निरूपण की आवश्यकता नहीं है कि पूंजी पर ब्याज उसी अनुपात में घटता जाता है जिस अनुपात में पूंजी में वृद्धि होती जाती है अर्थात पूंजी की मात्रा और उसके क्षेत्र के विस्तार में वृद्धि होती जाती है. अनर्जित आय के छोटे हिस्सेदारों के लिए अपनी पूंजी के ब्याज से जीवनयापन कर पाना मुश्किल होता जाता है. इसलिए वह औद्योगिक प्रक्रिया में सक्रीय भागीदार बनने के लिए विवश कर दिया जाता है अर्थात यह छोटे कारखाना मालिकों की खाली जगह को भरता जाता है जो खुद भी सर्वहारा वर्ग में भरती के लिए विवश होते जाते हैं.” (मार्क्स, Lohnarbeit and Kapital, पृ. 39)

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One thought on “मजदूर पूंजीपति को उधार देता है

    बहुत महत्वपूर्ण अंश।

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