कारखाने का निरंकुशतंत्र

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19. ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ पर डेविड रियाजानोव

की व्याख्यात्मक टिप्पणियां

श्रम के साधन की अपरिवर्ती गति के तहत मज़दूरों की यांत्रिक अधीनता और काम करने वाले समुदाय की विचित्र बुनावट (जो भिन्न-भिन्न वर्ग के स्त्री और पुरुष से मिलकर बनती है) के कारण बैरक जैसा अनुशासन पैदा हो जाता है. यह अनुशासन फैक्टरी में पूर्ण व्यवस्था का रूप ले लेता है और उसमें दूसरों के काम की देखरेख करने का उपर्युक्त श्रम पूरी तरह से विकसित हो जाता है. इससे मज़दूर काम करने वालों और काम की देखरेख करने वालों, औद्योगिक सेना के साधारण सिपाहियों और हवलदारों में बंट जाता है… फैक्टरी नियमावली (जिसमें पूंजी निजी कानून बनाने वाले व्यक्ति की तरह और अपनी इच्छा के अनुसार मज़दूरों पर कायम अपने निरंकुश शासन को कानून का रूप देती है. परन्तु इस निरंकुशता के साथ उतरदायित्व का वह विभाजन जुड़ा हुआ नहीं होता है, और न ही उसके साथ प्रतिनिधिमूलक प्रणालियाँ जुडी होती हैं जो अन्य मामलों में बुर्जुआ वर्ग को बहुत पसंद होती हैं) श्रम-प्रक्रिया के उस सामाजिक नियमन का पूंजीवादी प्रहसन मात्र होता है जो विशाल पैमाने की सहकारिता के लिए और श्रम के औज़ारों के – विशेषकर मशीनों के – सामूहिक उपयोग के लिए आवश्यक होता है. मार-मारकर गुलामों से काम लेने वाले सरदार के कोड़ों का स्थान फोरमैन के जुमानों का रजिस्टर ले लेता है. सभी प्रकार के दंड स्वाभाविक रूप से जुर्मानों और उज़रत में कटौती का रूप धारण कर लेते हैं, और फैक्टरी लाइकरगसों की विधायी प्रतिभा ऐसी व्यवस्था करती है कि उनके बनाये कानूनों के कठोर अनुपालन की अपेक्षा उनके उल्लंघन से सेवायोजक को अधिक लाभ होता है.” (मार्क्स, कैपिटल, खंड 1, 453-4)
मार्क्स इस सम्बन्ध में एंगेल्स को उद्धृत करते हैं जिन्होंने इंग्लैंड में मज़दूर वर्ग की जीवन स्थितियों के बारे में लिखी पुस्तक में, बीस साल पहले, कारखानों में कायम निरंकुशता का सजीव चित्रण किया था : “बुर्जुआ वर्ग ने सर्वहारा को जिस गुलामी की जंजीर से जकड़ दिया है, उस पर जितना अधिक प्रकाश फैक्टरी-व्यवस्था में पड़ता है, उतना और कहीं नहीं पड़ता. इस व्यवस्था में हर प्रकार की स्वाधीनता – कानूनी तौर पर और वास्तव में दोनों तरह – ख़त्म हो जाती है. मज़दूर को सुबह साढे पॉँच बजे फैक्टरी में हाज़िर होना पड़ता है. यदि उसे दो चार मिनट की देर हो जाती है तो उस पर जुर्माना किया जाता है. यदि वह दस मिनट देर से पहुँचता है तो उसे नाश्ते के समय तक घुसने नहीं दिया जाता और उसकी एक चौथाई मज़दूरी काट ली जाती है. उसे मालिक के हुक्म पर खाना, पीना और सोना पड़ता है…फैक्टरी की निरंकुश सीटी उसे बिस्तर से उठा देती है, नाश्ता और खाना बीच में छुड़ा देती है. और कारखानें में उस पर क्या गुजरती है ? यहाँ पर कारखाने का मालिक निरंकुश विधि-निर्माता होता है. वह जैसे चाहता है, वैसे नियम बनाता है, नियमावली में अपनी इच्छानुसार परिवर्तन करता रहता है और नयी बातें जोड़ता रहता है, और अगर वह बिलकुल बेहूदा बातें उसमें शामिल कर लेता है, तब भी अदालतें मज़दूर से यही कहती हैं, कि : ‘तुमने ये करार अपनी मर्ज़ी से किया है, अब तो तुम्हें उसका पालन करना ही होगा…नौ वर्ष की आयु से मृत्यु तक इन मज़दूरों को हर घड़ी यह मानसिक और शारीरिक यातना सहन करनी पड़ती है.” (कैपिटल, खंड 1, पृ. 453)
क्रांति के पहले रूस में कारखानों में कायम निरंकुशता का घृणित रूप, रूसी कारखाना मालिकों द्वारा जुर्मानों की व्यवस्था में किये गये परिमार्जन के स्तर को लेनिन के पैम्फ्लेट (‘दण्डों के कानून की व्याख्या’ – Explanation of the Law on Fines Imposed on Factory Workers) में अच्छे तरीके से चित्रित किया गया है.

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