सर्वहारा वर्ग का ऐतिहासिक विकास

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16. ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ पर डेविड रियाजानोव

की व्याख्यात्मक टिप्पणियां

वर्तमान समय में ‘सर्वहारा’ (‘प्रोंवितारिया’) का तात्पर्य उस व्यक्ति से है जिसके जीवकोपार्जन का एकमात्र साधन अपनी श्रमशक्ति का विक्रय है. लैटिन भाषा के शब्द ‘प्रोलितारियास’ का मूल अर्थ यह नहीं था. प्राचीन रोम के ज़माने में ‘प्रोलितारियास’ शब्द का प्रयोग उस व्यक्ति के लिए किया जाता था जिसकी एकमात्र सम्पत्ति उसके वंशज, उसकी संताने (प्रोलेस) होती थीं. आरंभ में सर्वहारा जोकि रोम की आबादी का निर्धनतम वर्ग था, को सैनिक सेवा और करों की अदायगी से मुक्त कर दिया गया था. बाद में सर्वहारा को सेना में भर्ती किया जाने लगा जिसका संभरण राज्य करता था. गृहयुद्धों के दौर में जब रोम का किसान समुदाय बरबाद हो गया तथा (रोमन) साम्राज्य के अधीन हो गया, तो सर्वहारा सेना का केन्द्रक बन गया था. शांति के समय सैनिकों के इस समूह का भरण-पोषण राज्य करता था तथा उन्हें अनाज की नियमित रसद दी जाती थी. इस प्रकार नाम के अलावा इन रोमन सर्वहारा और आज के भूमिहीन आवासहीन यूरोपीय सर्वहारा के बीच अन्य कोई साम्य नहीं है. हमें इस बात की भी अनदेखी नहीं करनी चाहिए, जैसाकि मार्क्स बताते हैं,”कि प्राचीन रोम में वर्ग संघर्ष स्वतन्त्र धनिकों और स्वतन्त्र निर्धनों यानि कि विशेषाधिकार प्राप्त अल्पसंख्यकों के दायरे में जारी रहा था. दास वर्ग जोकि आबादी का बड़ा उत्पादक हिस्सा था, उस निष्क्रिय मंच का काम कर रहा था जिस पर यह संघर्ष चल रहा था. लोग सिसमोंदी की उल्लेखनीय उक्ति को भूल गए हैं कि ‘रोम का सर्वहारा राज्य के खर्च पर जीता था जबकि आधुनिक समाज सर्वहारा के दम पर जीता है”. (कार्ल मार्क्स, द एटीन्थ ब्रूमेर ऑफ लुई बोनापार्ट, पृ. 18-19) The Eighteenth Brumaire of Louis Bonaparte- by Karl Marx
उज़रती मजदूरों के वर्ग को व्यक्त करने के अर्थों में ‘सर्वहारा शब्द का व्यापक उपयोग उन्नीसवीं शताब्दी के पहले अर्धांश के पूर्व आरंभ नहीं हुआ था. एंगेल्स ने इंग्लैंड में मेहनतकश वर्ग की जीवनस्थितियों के सम्बन्ध में अपनी पुस्तक में पहली बार इंग्लैंड के सर्वहारा के अठारह सौ चालीस के दशक तक का विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत किया है. इस पुस्तक के मूल जर्मन संस्करण की प्रस्तावना में एंगेल्स बताते हैं कि उन्होंने “मेहनतकश, श्रमजीवी, सम्पत्ति-अधिकार रहित वर्ग और सर्वहारा” शब्द का प्रयोग एक ही परिघटना को व्यक्त करने के लिए किया है. अन्य स्थान पर वह लिखते हैं, “सर्वहारा समाज का वह वर्ग है जो अपने जीवन-निर्वाह के लिए, पूंजी से हासिल किए गए मुनाफे पर नहीं बल्कि पूरे तौर पर अपने श्रम (श्रमशक्ति) की बिक्री पर निर्भर करता है. उसका सुख-दुःख ज़िन्दगी और मौत, सम्पूर्ण अस्तित्व श्रम (श्रमशक्ति) की मांग पर, कारोबार के अच्छे और बुरे वक्त के बीच झूलते रहने पर, उन उतार-चढावों पर जो अनियंत्रित प्रतिस्पर्द्धा का परिणाम होते हैं, पर निर्भर करता है. संक्षेप में, सर्वहारा अथवा सर्वहारा वर्ग उन्नीसवीं सदी का मेहनतकश वर्ग है.” इंग्लैंड में उज़रती मजदूरों या श्रमजीवियों का वर्ग चौदहवीं शताब्दी के दूसरे अर्धांश में अस्तित्व में आ गया था. एक सौ पचास वर्षों के दौरान आबादी के निम्नतर संस्तर इसमें शामिल थे. धीरे-धीरे करके यह (वर्ग) कारीगरों, शिल्पकारों और किसानों से अलग हुआ तथा सामंती बंधनों से मुक्त हो सका.
जहाँ तक सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रश्न है, अपने प्रादुर्भाव के आरंभिक दिनों से ही, सर्वहारा का अन्य शिल्पों या कृषि कर्म में लगे रहने वाले मेहनतकशों से विभेदीकरण बहुत कम हुआ था. लेकिन जैसे-जैसे पूंजीवाद विकसित होता गया, सर्वहारा ने अपनी खुद की अभिलाक्षणिकताएँ धारण कर लीं. सर्वहारा, स्वतन्त्र किसान और शिल्पकार के बीच भिन्नता इस तथ्य में निहित है कि सर्वहारा मजदूर श्रम के साधनों से वंचित होता है, कि उसे अपने लिए नहीं (किसान और शिल्पकार की भांति) बल्कि पूंजी के मालिक अन्य व्यक्ति के लाभ के लिए श्रम करना पड़ता है. वह स्वयं को, अपनी श्रमशक्ति को इस तरह बेचता है मानो वह कोई माल हो और इसके बदले वह उज़रत पाता है.
जब तक पूंजीवाद अपनी शैशवावस्था में था, जब तक ग्रामीण क्षेत्रों में सामंती अधिकारी और नगरों में व्यापारिक निगम वित्तीय पूंजी और व्यापारिक पूंजी के औद्योगिक पूंजी में रूपांतरण को बाधित करते रहे, जब तक विनिर्माण उद्योग केवल उन नगरीय बस्तियों में पनपते रहे जो शिल्प-संघों के नियंत्रण में नहीं थे- दमनात्मक कानूनों के बावजूद उजरती मजदूर, सर्वहारा पूंजी संचय के परिणामस्वरूप अपने श्रम की बढती मांग का पूरा लाभ उठाते रहे. गिरजाघर से जुड़ी परिसंपत्तियों की लूटमार, राज्य की संपत्तियों के वितरण और सामूहिक भूमि की व्यापक बाड़ेबंदी जिसने लाखों किसानों को आजीविका से वंचित कर दिया तथा राजमार्गों, गलियों में व्यर्थ ही काम की तलाश में भटकने पर मजबूर कर दिया, के बाद मजदूरों की हालत अकस्मात बहुत बिगड़ गयी. विनिर्माण की वृद्धि ने, स्वतन्त्र उद्यमोँ को खड़ा करने के लिए अत्यंत आवश्यक पूंजी संचय ने उज़रती मज़दूर की स्वयं मालिक बन जाने की आशाओं पर पानी फेर दिया था – क्योंकि स्वतन्त्र शिल्पों का स्थान भी पूंजीवादी उद्यम लेते जा रहे थे. यह सही है कि विनिर्माण उद्योग केवल धीरे-धीरे (सत्रहवीं शताब्दी के दुसरे अर्धांश  से लेकर अठाहरवीं शताब्दी के दुसरे अर्धांश तक के सौ सालों या इससे कुछ ज्यादा अवधि के दौरान ही) नगरीय उत्पादन तथा ग्रामीण उत्पादन पर नियंत्रण स्थापित कर सका था. लेकिन कारीगरों और घरेलू नौकरों के आते जाने से सर्वहारा की कतारों में लगातार वृद्धि हो रही थी. इन सभी नए घटकों के बावजूद वर्ग के रूप में सर्वहारा का विभेदीकरण ज्यादा तेजी से हो रहा था. नगरीय शिल्पकार और ग्रामीण घरेलू नौकर पूरी तौर पर तभी गायब हुए जब मशीन से विशाल पैमाने का उत्पादन शुरू हुआ. वे कई खंडों में सर्वहारा की कतारों में फेंके गए और इस प्रकार ख़त्म हो गयी उनकी “आदिम अवस्था” में वापस लौटने की सम्भावना. बडे पैमाने पर मशीन से उत्पादन की शुरुआत ने ऐसे व्यक्तियों के वर्ग को जन्म दिया जो बाज़ार में अपनी चमड़ी बेचने खुद जाते हैं और रोज़गार की तलाश में अपने शरीर को प्रतिस्पर्द्धा की भंवर में झोंक देते हैं.
एंगेल्स बताते हैं,”आधुनिक बुर्जुआ समाज का प्रधान लक्षण सभी की सभी के खिलाफ जंग है जिसकी सर्वाधिक पूर्ण अभिव्यक्ति ‘प्रतिस्पर्द्धा” शब्द से होती है. यह युद्ध जिंदगी के लिए, अस्तित्व के लिए, प्रत्येक चीज़ के लिए किया जाता है और ज़रुरत पड़ जाये तो मृत्यु तक चलता रहता है. यह युद्ध समाज के विभिन्न वर्गों के बीच ही नहीं बल्कि इन वर्गों के अलग-अलग सदस्यों के बीच भी छिड़ा रहता है. हरेक इन्सान दूसरे इन्सान के रास्ते का रोड़ा होता. इसलिए हरेक इन्सान दूसरे इन्सान को अपने रास्ते से हटा देने और उसकी जगह लेने की कोशिश करता है. मजदूर एक-दूसरे से ठीक उसी तरह प्रतिस्पर्द्धा करते हैं जिस तरह एक बुर्जुआ दूसरे बुर्जुआ से प्रतिस्पर्द्धा करता है. शक्तिचालित करघे का बुनकर, हथकरघा बुनकर, रोजगारशुदा या ज़्यादा उज़रत पाने वाले  साथी से प्रतिस्पर्द्धा करता है और उसका स्थान लेना चाहता है. जहाँ तक मजदूरों का सवाल है, यह प्रतिस्पर्द्धा विद्यमान स्थितियों का निकृष्टतम पक्ष है क्योंकि यही सर्वाधिक असरदार हथियार है जो बुर्जुआ वर्ग सर्वहारा के खिलाफ इस्तेमाल करता है. (एंगेल्स, द कन्डीशन ऑफ द वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड, पृ. 75-76)

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One thought on “सर्वहारा वर्ग का ऐतिहासिक विकास

    Sandeep said:
    May 3, 2009 at 7:34 PM

    आप रियाज़ानोव की व्‍याख्‍यात्‍मक टिप्‍पणियां यहां प्रस्‍तुत करके अच्‍छा कर रहे हैं…इससे मेनिफेस्‍टों के उन अंशों को समझने में भी मदद मिलती है, जहां कुछ भ्रम की गुंजाइश हो

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