संकटों के सिद्धांत और इतिहास के बारे में कुछ बातें

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‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ पर डेविड रियाजानोव

की व्याख्यात्मक टिप्पणियां

अंग्रेज़ मेहनतकश वर्ग जीवनस्थितियों का चित्रण करने वाली अपनी पुस्तक में एंगेल्स संकटों के बारे में विस्तार से चर्चा करते हैं. वह सिद्ध करते हैं कि पूंजीवादी उत्पादन और प्रतिस्पर्द्धा की प्रवृति ही उन्हें (संकटों) उत्पन्न करती है.”आधुनिक उत्पादन और उत्पाद वितरण की अराजक स्थितियां, उत्पादन की वे स्थितियां जोकि आवश्यकता की तुष्टि के लिए न होकर लाभ से नियंत्रित होती है, वह स्थितियां जिसमें धनी बन जाने की कोशिश में प्रत्येक व्यक्ति खुद की स्वंतंत्र लीक पर काम करता है, ये स्थितियां बार-बार मंदी पैदा करने से नहीं चुकती हैं. औद्योगिक विकास के युग के आरंभ में मंदी उद्योग की एक या दूसरी शाखा या एक बाज़ार तक सीमित रहती थी. लेकिन प्रतिस्पर्द्धियों की कार्रवाईयों के चलते उद्योग की एक शाखा में रोज़गार से वंचित मजदूर उद्योग की दूसरी शाखा में रोज़गार पाने के लिए धावा बोल देते हैं जिसमें काम सीखना तुलनात्मक रूप से आसान होता है. इस प्रकार वे उत्पाद जिन्हें एक बाज़ार में खरीददार नहीं मिलते आगे बढ़कर दूसरे बाज़ार में पहुँच जाते हैं, आदि, आदि. ये छोटे-छोटे संकट इकठ्ठा होकर कालांतर में बड़े पैमाने के संकटों में तब्दील हो जाते हैं. इन संकटों का दस्तूर यह होता है कि विकास और व्यापक समृद्धि की अल्पकालीन अवधि के बाद हर पाँच वर्ष में वे प्रकट हो जाते हैं.” (एंगेल्स, द कन्डीशन ऑफ वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड, पृ. 82)

अन्यंत्र एंगेल्स पॉँच वर्षीय या छः वर्षीय चक्रों की चर्चा करते हैं और ‘कम्युनिज्म के सिद्धांत’  [The Principles of Communism-Frederick Engels 1847] में सात वर्षीय अवधि का उल्लेख करते है. “इस शताब्दी की पूरी अवधि के दौरान, उद्योगों का जीवन समृद्धि के दौरों और संकटों के दौरों के बीच झूलता रहा. इस तरह के संकट पॉँच साल से सात साल के नियमित अंतरालों में पैदा होते रहे. अपने साथ मजदूरों के लिए असहनीय दुर्दशा, व्यापक क्रांतिकारी उफान और मौजूदा व्यवस्था के लिए सबसे बड़े संकट लाता गया.”

सन 1848 के बहुत सालों बाद जब मार्क्स पूंजी लिख रहे थे, तब उन्होंने ध्यान दिया कि तेजी और मंदी के बीच उतार-चढाव के ये चक्र पॉँच या सात वर्षों की नहीं बल्कि दस या पंद्रह सालों की अवधि को समेट लेते हैं.

पहला संकट सन 1825-1826 में आया जिसने राष्ट्रव्यापी असर पैदा किया. उसके आरंभ में सट्टेबाजी की कार्रवाईयों में प्रस्फोट हुआ था. अगला व्यापक संकट 1836-37 में आया. इसके पहले ब्रिटेन के उद्योग और निर्यात में बहुत वृद्धि हुई थी. निर्यात में यह वृद्धि विशेष थी जिसे उत्तरी अमेरिका में बाज़ार मिल गया था. 1847 में तीसरे संकट के संकेत मिलने लगे थे. 1845 और 1846 के “रेलवे में पूंजी लगाने के उन्माद” जिसमें रेलवे निर्माण में विह्वल उतावली में पूंजी उड़ेली जा रही थी, के बाद तेजी से मंदी आयी.

जिस गति से रेलवे का निर्माण किया जा रहा था, उससे बड़ी भारी संख्या में लोगों को काम मिला. लेकिन बाद में लगभग पचास हज़ार लोग बेरोजगार हो गए. इस संकट की चरम अवस्था में जिसने ग्रेट ब्रिटेन, अमेरिका और वास्तव में समूचे यूरोपीय महाद्वीप को (रूस को छोड़कर) लपेट में लिया था और जिसने 1848 की क्रांतिकारी उथल-पुथल का मार्ग प्रशस्त कर दिया था, कम्युनिस्ट लीग के अनुरोध पर मार्क्स ने घोषणापत्र की रचना की.

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One thought on “संकटों के सिद्धांत और इतिहास के बारे में कुछ बातें

    ravikumarswarnkar said:
    May 3, 2009 at 12:33 AM

    खा़लिस अंधेरे में…..कुछ मशालें जल रहीं हैं…..
    सुर्ख़ सूर्य की उम्मीद इन्हीं पर कायम है शायद……..

    तूफ़ान कभी मात नहीं खाते…..
    आएंगे…

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