डेविड रियाज़ानोव की व्याख्यात्मक टिप्पणियां

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14. पूंजीवाद और प्रकृति पर मनुष्य की विजय

सन 1848 तक प्रकृति पर मनुष्य की विजय का काम बहुत धीमी गति से चल रहा था. फिर भी वाट के आविष्कार की व्यापक स्वीकृति के बाद वायु शक्ति और जलशक्ति के बेहतर इस्तेमाल के साथ-साथ वाष्पशक्ति के उपयोग का विकास तेजी से हो रहा था. 1820 से ओस्टेड (1777-1851), सीबेक (1770-1831) और फैराडे (1791-1867) जैसे वैज्ञानिकों ने विद्युत परिघटना के क्षेत्र में एक के बाद दुसरे आविष्कार किये. लेकिन विद्युत तार और विद्युत धातुशोधन के अपवाद को छोड़कर विनिर्माण उद्योग में इन आविष्कारों का लाभ नहीं उठाया जा सका. हालाँकि उन्नीसवीं शताब्दी के आखिरी तृतीयाँश में उद्योग की एक शाखा के रूप में विद्युत तकनीक अस्तित्व में आ चुकी थी.

कृषि में रसायन विज्ञान का उपयोग, जिसे कभी-कभी कृषि रसायन कहा जाता है, का श्रेय मुख्य रूप से जस्टस वान लीबिंग (1806-1873) नामक जर्मन को जाता है. हालाँकि इस सिलसिले में हम्फ्री डेवी (1772-1829) नामक अँगरेज़ का उल्लेख किया जा सकता है जिसकी कृषि रसायन के प्रारंभिक ज्ञान पर पुस्तक 1813 में प्रकाशित हुई थी. इस विषय पर लीबिंग की प्रथम कृति (Die Chemie in ihrer Ammending aur Agriculther und Phisiology) शीर्षक की पुस्तक जिसका लयों फ्लेफेयर (1818-1898) ने तुरंत अंग्रेजी में अनुवाद कर दिया था) 1840 में प्रकाशित हुई. मार्क्स बताते हैं, “लीबिंग का एक अमर अवदान यह है कि उन्होंने प्राकृतिक विज्ञान के दृष्टिकोण से आधुनिक खेती के नकारात्मक और विनाशकारी पहलू का विवेचन किया है (मार्क्स, कैपिटल, खंड 1,548, टिपण्णी). इसके ठीक पहले मूल पाठ में लिखा है : “पूंजीवादी उत्पादन आबादी को लगातार बड़े केन्द्रों में एकत्रित करके शहरी आबादी के महत्त्व को बढाकर एक ओर समाज की गतिशीलता में वृद्धि कर देता है तो दूसरी ओर मनुष्य और धरती के बीच पदार्थों की अदला-बदली को अर्थात भोजन और वस्त्र के रूप में मनुष्य धरती से जिन तत्त्वों को लेकर उपयोग कर लेता है, उनकी धरती को वापसी, जो धरती को उपजाऊ बनाये रखने के लिए सदा सहज आवश्यक होता है, को अस्त-व्यस्त कर डालता है.” (मार्क्स, कैपिटल, खंड 1,546-47)

लीबिंग पहले व्यक्ति थे जिन्होनें सिद्ध किया कि ज़मीन की उर्वरा शक्ति चुक जाने का कारण यह है कि इन्सान और उसके द्वारा जोती गयी ज़मीन के बीच विनिमय संबंधों में अस्त-व्यस्तता आ गयी है क्योंकि अपनी वृद्धि के दौरान फसलें ज़मीन से कुछ पदार्थों को चूस लेती हैं जिन्हें ज़मीन को वापस लौटा देने में इन्सान असमर्थ रहता है. पूंजीवादी अर्थव्यवस्था और इसमें शहर के गाँव से अलगाव की एक अभिलाक्षणिकता धरती को कई उर्वरक पदार्थों से वंचित कर देना और प्राकृतिक खाद के रूप में इन पदार्थों को धरती को वापस न लौटा पाना है. प्राकृतिक अर्थव्यवस्था के अर्न्तगत ज़मीन की उपज का लगभग पूरे हिस्से का उपभोग उस इलाके में हो जाता है जहाँ पैदावार होती है, उपभोक्ताओं, इन्सान और जानवर दोनों, द्वारा प्राकृतिक खाद ज़मीन की उर्वरा शक्ति को प्रतिपूर्ति के लिए पर्याप्त हुआ करती थी. लेकिन विशाल से विशालतर शहरों के विकास के कारण कृषि उत्पादों का उपयोग कृषि क्षेत्रों से दूर होने लगा और प्राकृतिक उर्वरक पदार्थ बर्बाद होने लगा. प्राकृतिक खाद के अभाव के कारण कृत्रिम उर्वरकों की खोज ज़रूरी हो गयी ताकि ज़मीन को उन खनिजों की वापसी की जा सके जिन्हें फसलों ने अपने पोषण के लिए इस्तेमाल कर डाला था. लीबिंग का मत था कि खनिज अवयवों की आपूर्ति सीमित होती है क्योंकि जमीन उनकी असीमित मात्रा मुहैया कराने में असमर्थ होती है. इसलिए किसान की मुख्य ज़िम्मेदारी और खादों का कार्य जमीन को उन खनिजों की प्रतिपूर्ति होना चाहिए जिन्हें प्रत्येक फसल, जिसकी उनके विश्लेषण से पता चलता है, अपनी वृद्धि के लिए जमीन से ले लेती है. इसलिए एक ऐसी कृत्रिम खाद तैयार की गयी जिसमें आवश्यक खनिज पदार्थ जैसे फास्फोरिक अम्ल, पोटेशियम और नाइट्रोजन विद्यमान थे. अठारह सौ चालीस की दशाब्दी और उसके बाद से, कृत्रिम खाद का उपयोग ज्यादा लोकप्रिय होने लगा. अब उत्पादित नाइट्रोजन युक्त खाद, सुपरफास्फेट जैसे उर्वरक और मूल धातु-कचरा, धुली हुई हड्डियाँ और मिश्रित खाद का इस्तेमाल किया जाता है. मूल धातु कचरा स्टील निर्माण का अपशिष्ट उत्पाद है और इसके उर्वरकीय गुणों की खोज 1878 के पहले नहीं हो पाई थी.

औद्योगिक उत्पादन में रसायनशास्त्र का उपयोग अठारवीं शताब्दी के अंत में आरंभ हुआ. सन 1787 के लगभग निकोलस लाब्लांक (1742-1806) ने समुद्री नमक से सोडा कार्बोनेट बनाने की महत्वपूर्ण समस्या पर ध्यान केन्द्रित किया. इन प्रयोगों में उसके अवदान ने कृत्रिम क्षार उत्पादन के विशाल उद्योग का आधार निर्मित किया जिसके उत्पाद विरंजन कार्यों (विशेषतया कुछ किस्म के कागजों के लिए), आतिशबाजी, दियासलाई, साबुन, वस्त्रों, रंगों आदि में प्रयोग किए जाते है. प्रदीपक के रूप में कोल गैस के पहले व्यावहारिक उपयोग का श्रेय विलियम मरडक (1754-1839) को दिया जाता है जिन्होंने सन 1792 से 1802 के बीच इस दिशा में सम्भावना प्रर्दशित करने वाले प्रयोग किए. इन प्रयोगों ने अगला पड़ाव तब पार किया जब एक जर्मन ने, जो 1804 में इंग्लैंड आया था, लिसियम थियेटर ख़रीदा और अपनी विधि का वहां प्रदर्शन किया. इसका परिणाम यह हुआ कि पॉल माल में नयी प्रकाश व्यवस्था की स्थापना के साथ ही लन्दन में गैस आधारित सार्वजानिक प्रकाश व्यवस्था आरंभ हो गयी. कोयले के आसवन से मुख्य ठोस अवशेष कोक प्राप्त होता है और द्रव अवशेष टार और अमोनियामय लिकर प्राप्त होता है. उप-उत्पात के रूप में हमें बेंजीन, एनिलीन डाई, विभिन्न कीटनाशक, नैप्थलीन, सैक्रीन आदि प्राप्त होते हैं. उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ में शेवारिल (1786-1889) की वसा और तेलों पर परीक्षणों और लाब्लांक की साधारण नमक से कास्टिक सोडा बनाने की खोजों ने साबुन और मोमबत्ती बनाने की विधियों और मात्राओं में आमूल परिवर्तन कर दिया. लेकिन घोषणापत्र के पहले प्रकाशन के कई वर्षों बाद अठारह सौ पचास के दशक में ही उद्योग में रासायनिक शोध के उपयोग का युग आरम्भ हो सका. सन 1848 से कुछ वर्षों बाद वस्त्र उत्पादन में औद्योगिक क्रांति जो अभी तक मुख्य रूप से कताई और बुनाई से सम्बंधित प्रक्रियाओं तक सीमित थी, रंगाई और परिष्करण के क्षेत्र में सुधार के साथ अपनी अंतिम मंजिल तक पहुँच गयी. 1856 में डब्ल्यू.एच. पार्किन ने पहला एनिलिन डाई अर्थात माव नाम का पहला रंगीन पदार्थ बनाया. कोलतार के आसवन से अन्य चमकदार रंगीन पदार्थों की खोजों का ताँता लग गया. आज इतने किस्म के रंगीन पदार्थ मौजूद हैं कि रंगसाज को उलझन में डाल देते हैं. उनसे हर किस्म के रंग बनाए जा सकते हैं जिनके गुण सर्वाधिक विविधपूर्ण होते हैं. उनमें से कुछ रंग अल्पकालिक लेकिन ज्यादातर रंग स्थायी और विभिन्न प्रभावों को सहन करने वाले होते हैं.

धरती के सुदूरवर्ती हिस्सों पर खेती करने का काम (घोषणापत्र के पाठ में मार्क्स और एंगेल्स इस प्रक्रिया का सन्दर्भ देते हैं) 1848 तक प्रारंभिक मंजिल पार कर चूका था. 1815 में संयुक्त राज्य का कपास का उत्पादन 73,000 गांठ था जो बढ़कर 1840 में 1,348,000 गांठों तक पहुँच गया था. 1840 में गेहूं का उत्पादन 84,800,000 बुशेल था लेकिन 1901-1905 के पाँच वर्षों में वार्षिक औसत 662,000,000 बुशेल प्रतिवर्ष हो गया था. जहाँ तक समस्त किस्मों के अनाजों के सम्पूर्ण उत्पादन का प्रश्न है, यह 1848 में 377.000,000 बुशेल था जबकि 1901-1905 के वर्षों के बीच औसत वार्षिक उत्पादन 2,100,000,000 बुशेल था. 1850 के बाद कनाडा, दक्ष्णि अमेरिका, आस्ट्रेलिया, साइबेरिया, अफ्रीका आदि व्यापार के लिए खुले.

अठारवीं शताब्दी के अंतिम तृतीयाँश तक नौपरिवहन के लिए नदियों का प्रयोग पुराने तरीके से ही किया जा रहा था. अठारवीं शताब्दी के मध्य में इंग्लैंड में नहरों के निर्माण का काम आरंभ हो गया था और फ्रांस में भी नहरों का जाल बिछ गया था. नहर निर्माण के आरंभिक वर्षों में बनाई गयी ज्यादातर नहरे बजरा और नौका नहरों के नाम से जानी जाती थीं तथा सीमित गहराई और चौडाई के कारण छोटे आकार के जलयान के लिए उपयुक्त थीं. नहरों के विकास का कारण बढ़ते व्यापार की तत्काल ज़रुरत को पूरा करना था. जैसे-जैसे नहर निर्माण की तकनीक में सुधार होता गया, जलमार्गों की गहराई और चौडाई इतनी बढाई गयी कि इसमें समुद्री जहाज भी चलने लगे. ज्यादातर जहाजी नहरें इसलिए निर्मित की गयीं ताकि बीच में पड़ने वाले जलडमरू मध्य को काटकर दो सागरों के बीच यात्रा समय को कम किया जा सके. (उदाहरण के लिए केलिडोनियन नहर और श्वेज़ नहर) या कि महत्त्वपूर्ण आंतरिक स्थानों को समुद्री बंदरगाहों में परिवर्तित किया जा सके (मैनचेस्टर जहाजी नहर और फ्लैंडर्स में जीब्रुगे-ब्रुग्स नहर). एक छल्ले से दुसरे छल्ले तक कटाई करके नदियों की टेढ़े-मेढे घुमावदार धारा से बचाया गया और बांध और जलाशय द्वारा नदी की तलहटी का ढाल नौपरिवहन योग्य बनाया गया. जलमार्गों और नदियों के मुहानों को प्राय: वाष्पशक्ति से चालित ड्रेजिंग मशीनों द्वारा साफ़ किया जाता है. बड़े पैमाने के रेलवे निर्माण के आरंभ होने के बाद ही नहरों का विकास समाप्त हुआ.

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