दर्शन के प्रश्नों पर-2

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दर्शन के प्रश्नों पर-1

अब तक, विश्लेषण और संश्लेषण को स्पष्ट ढंग से परिभाषित नहीं किया गया है। विश्लेषण अधिक स्पष्ट है लेकिन संश्लेषण के बारे में ज्यादा कुछ नहीं कहा गया है। मैंने आई सू-चि[27] से बात की। उसका कहना है कि आजकल सिर्फ़ अवधारणात्मक संश्लेषण और विश्लेषण की बात की जाती है, और वस्तुगत प्रयोगात्मक संश्लेषण तथा विश्लेषण की बात नहीं की जाती। हम कम्युनिस्ट पार्टी और क्वोमिन्ताङ, सर्वहारा और बुर्जुआ, भूस्वामियों और किसानों, चीनी जनता और साम्राज्यवादियों का विश्लेषण और संश्लेषण कैसे करेंगे? उदाहरण के लिए, कम्युनिस्ट पार्टी और क्वोमिन्ताङ के मामले में हम ऐसा कैसे करेंगे। विश्लेषण तो बस यह प्रश्न है कि हम कितने मज़बूत हैं, हमारे पास कितना इलाका है, हमारे कितने सदस्य हैं, कितने सैनिक हैं, हमारी कमजोरियाँ क्या हैं? हमारे हाथ में कोई बड़ा शहर नहीं है, हमारी सेना की संख्या सिर्फ़ 1,200,000 है, हमारे पास कोई विदेशी सहायता नहीं है, जबकि क्वोमिन्ताङ को भारी विदेशी सहायता मिलती है। अगर आप येनान की तुलना शंघाई से करें, तो येनान की आबादी सिर्फ़ 7,000 है, इसमें (पार्टी और सरकार के) संगठनों के लोगों तथा सैनिकों (येनान में तैनात) को जोड़ दें, तो कुल योग 20,000 होता है। वहाँ सिर्फ़ दस्तकारी और खेती होती है। किसी बड़े शहर से इसकी तुलना कैसे की जा सकती है? हमारा मज़बूत पक्ष है कि हमारे साथ जनता का समर्थन है जबकि क्वोमिन्ताङ जनता से कटी हुई है। आपके पास ज्यादा इलाका है, लेकिन आपके सैनिक दबाव डालकर भरती किये गये हैं, और अफसरों तथा सिपाहियों के बीच टकराव है। स्वाभाविक है, उनकी सेना के एक खासे बड़े हिस्से के पास लड़ने की काफी क्षमता है, और ऐसा कतई नहीं है कि वे एक ही प्रहार से ढेर हो जायेंगे। उनका कमज़ोर पक्ष इस बात में है, उसकी कुंजी यह है कि वे आम जनता से कटे हुए हैं। हम आम जनता के साथ एकजुट हैं; वे आम जनता से कटे हैं।

वे अपने प्रचार में कहते हैं कि कम्युनिस्ट पार्टी सम्पत्ति को और पत्नियों को सर्वोपभोग्य बना देगी और वे इन बातों को प्राथमिक स्कूलों तक के स्तर पर प्रचारित करते हैं। उन्होंने एक गीत बनाया था: `जब चू तेह और माओ त्से-तुङ आयेंगे, मारते-काटते और तबाही मचाते हुए, तो तुम क्या करोगे?´ उन्होंने प्राइमरी स्कूल के विद्यार्थियों को यह गीत सिखा दिया, और जैसे ही विद्यार्थियों ने इसे गाया, सारे बच्चों ने घर जाकर अपने माता-पिता भाई-बहनों से इसके बारे में पूछा, और इस तरह हमारे लिए इस प्रचार का उलटा ही असर हुआ। एक छोटे बच्चे ने (गीत) सुनकर अपने पिता से पूछा। उसके पिता ने जवाब दिया : `तुम्हें पूछना नहीं चाहिए( जब तुम बड़े हो जाओगे तो खुद देखकर समझ जाओगे।´ वह मध्यमार्गी था। फिर बच्चे ने अपने चाचा से भी पूछा। चाचा ने उसे डाँट लगायी, और जवाब दिया : `ये सब मारने-काटने का क्या मामला है? अगर मुझसे फिर पूछा तो मार खाओगे।´ उसका चाचा पहले कम्युनिस्ट युवा लीग का सदस्य था। सभी अख़बार और रेडियो स्टेशन हम पर हमला करते थे। ढेर सारे अख़बार थे, हर शहर में कई दर्जन, हर धड़े का अपना अखबार था, और वे सब के सब, निरपवाद रूप से, कम्युनिस्ट विरोधी थे। क्या सारे सामान्य लोगों ने उनकी बात सुनी? कतई नहीं! हमें चीन के मामलों का कुछ अनुभव हुआ है, चीन एक `गौरैया´ है।[28] विदेशों में भी, अमीर-ग़रीब, प्रतिक्रान्ति और क्रान्ति, मार्क्सवाद-लेनिनवाद और संशोधनवाद के सिवा कुछ नहीं है। आपको यह बिल्कुल नहीं मानना चाहिए कि हर कोई कम्युनिस्ट-विरोधी प्रचार को मान लेगा और कम्युनिज्म का विरोध करने में शामिल हो जायेगा। क्या हम उस समय अखबार नहीं पढ़ते थे? फिर भी हम उनसे प्रभावित नहीं थे।

मैंने `लाल महल का सपना´ पाँच बार पढ़ी है, और इससे प्रभावित नहीं हुआ हूँ। मैं इसे इतिहास के तौर पढ़ता हूँ। पहले मैंने इसे कहानी के तौर पर पढ़ा, और फिर इतिहास के तौर पर। जब लोग `लाल महल का सपना´ पढ़ते हैं, तो वे चौथे अध्याय को ध्यान से नहीं पढ़ते , लेकिन दरअसल इसी अध्याय में इस किताब का सार है। इसमें लेङ लू-सिङ है जो जुङ-कुओ का वर्णन करता है, और गीत तथा टिप्पणियाँ रचता है। चौथे अध्याय `लौकी वाला भिक्षु लौकी का मामला तय करता है´ में `अफसरों के लिए ताबीज´ की चर्चा की गयी है। यह चार बड़े खानदानों का परिचय कराता है :

नानकिङ चिया के लिए

कहो हिप हिप हुर्रा!

वे जार भर-भरकर

तौलते हैं अपना सोना।

आह-पाङ महल

छूता है आसमान,

लेकिन इसमें समा नहीं पाता

नानकिङ शिह खानदान।

समन्दर के राजा को

जब कम पड़ते हैं। सोने के पलंग

तो पहुँचता है वह नानकिङ वाङ।

नानकिङ सुएह हैं इतने अमीर

कि उनके पैसे गिनने में

लग जायेगा सारा दिन….[29]

`लाल महल का सपना´ में चारों बड़े खानदानों का वर्णन किया गया हैं यह एक भीषण वर्ग संघर्ष के बारे में है, जिससे दर्जनों लोगों का भविष्य जुड़ा है, हालाँकि इनमें से बीस-तीस लोग ही शासक वर्ग में हैं। (गणना की गयी है कि (इस श्रेणी में) तैंतीस लोग हैं।) अन्य सभी, तीन सौ से ज्यादा लोग, दास हैं, जैसे युएह याङ, सू-चि, दूसरी बहन यु, तीसरी बहन यु, आदि। इतिहास पढ़ते समय, यदि आप वर्ग संघर्ष को अपना प्रस्थान-बिन्दु न बनायें, तो आप भ्रम में पड़ जायेंगे। वर्ग विश्लेषण से ही चीज़ों का स्पष्ट विश्लेषण किया जा सकता है। `लाल महल का सपना´ और आज तक, इस किताब पर हुए शोध से मुद्दे स्पष्ट नहीं हो सके हैं( इससे हम समझ सकते हैं कि समस्या कितनी कठिन है। यु पिङ-पो और वाङ कुन-लुन दोनों इसके विशेषज्ञ हैं।[30] हो चि फाङ [31][32] नामक एक सज्जन भी प्रकट हुए हैं। ये सब तो `लाल महल का सपना´ पर हाल में हुए शोध से सम्बन्धित हैं, पुराने अध्ययनों को तो मैं गिनाउँगा ही नहीं। `लाल महल का सपना´ के बारे में त्साई युवान-पेई का दृष्टिकोण गलत था( हू-शिह का दृष्टिकोण कुछ अधिक सही था।[33]

संश्लेषण क्या है? कि किस तरह दो विपरीत तत्व, क्वोमिन्ताङ और कम्युनिस्ट पार्टी मुख्य भूमि (चीन – अनु.) पर संश्लेषित हो गये। संश्लेषण इस तरह घटित हुआ: उनकी सेनाएँ आयीं, और हम उन्हें हज़म कर गये, हम एक-एक कौर करके उन्हें खा गये। यह याङ सिएन-चेन द्वारा बताये गये ढंग से दो को एक में मिलाने का मामला नहीं था, यह शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व में मौजूद दो विपरीत तत्वों का संश्लेषण नहीं था। वे शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व में नहीं रहना चाहते, वे आपको हजम कर जाना चाहते हैं वरना, वे येनान पर हमला क्यों करते? उनकी सेना तीनों सीमाओं पर तीन सिएन को छोड़कर उत्तरी शेन्सी मे हर जगह घुस चुकी थी। आपके पास अपनी आज़ादी है, और हमारे पास अपनी आज़ादी हैं आप 250,000 हैं, और हम 25,000 लोग।[34] चन्द ब्रिगेड, 20,000 आदमियों से कुछ ज्यादा। विश्लेषण कर लेने के बाद, अब हम संश्लेषण कैसे करें? अगर आप कहीं जाना चाहते हैं, तो सीधे आगे जाइये( हम फिर भी एक-एक कौर करके आपकी सेना को निगल जायेंगे। अगर हम जीतने के लिए लड़ सकते थे, तो हम लड़ते थे, अगर नहीं जीत सकते थे, तो हम पीछे हट जाते थे। मार्च 1947 से मार्च 1948 तक, (दुश्मन की) एक पूरी सेना हवा में ग़ायब हो गयी, क्योंकि हमने उनके दसियों दजार सैनिकों को ख़त्म कर दिया। जब हमने ई-चुझान का घेरा डाला, और ल्यू कान शहर को मुक्त कराने आया, तो मुख्य कमाण्डर ल्यू कान मारा गया, उसके तीन डिवीज़नल कमाण्डरों में से दो मारे गये और तीसरा बन्दी बना लिया गया, और पूरी सेना का अस्तित्व ही समाप्त हो गया। यह संश्लेषण था। उनकी तमाम बन्दूकें और तोपखाना हमारे पक्ष में संश्लेषित हो गया और सैनिक भी संश्लेषित हो गये। जो हमारे साथ रहना चाहते थे वे रह सकते थे और जो नहीं रहना चाहते थे उन्हें हमने जाने का ख़र्चा दे दिया। जब हमने ल्यू-कान को ख़त्म कर दिया तो ई-चुआन में तैनात ब्रिगेड ने बिना लड़े हथियार डाला दिये। तीन बड़े अभियानों – ल्याओ-शेव, हुआई-हाई और पीकिङ- त्येनित्सन – में संश्लेषण का हमारा तरीका क्या था? फू त्सो-ह 400,000 आदमियों की अपनी सेना सहित, बिना लड़े, हमारे पक्ष में संश्लेषित हो गया और उन्होंने अपनी सारी रायफलें सौंप दीं।[35] एक चीज़ का दूसरे को खा जाना, बड़ी मछली का छोटी मछली को खा जाना, यह संश्लेषण है। इसे इस तरह से किताबों में कभी प्रस्तुत नहीं किया गया है। मैंने भी कभी अपनी किताबों में इसे इस ढंग से नहीं प्रस्तुत किया है। याङ सिएन-चिन मानते हैं कि दो मिलकर एक हो जाते हैं और संश्लेषण दो विपरीत तत्वों के बीच का अटूट बन्धन हैं। इस दुनिया में कौन से बन्धन अटूट हैं? चीज़ें एक-दूसरे से जुड़ी हो सकती है, लेकिन अन्तत: उन्हें टूटना होता है। कुछ भी ऐसा नहीं है जिसे अलग नहीं किया जा सकता। हमारे संघर्ष के करीब बीस वर्षों में, हममें से भी बहुत से लोगों को दुश्मन हजम कर गया। जब 300,000 आदमियों की लाल सेना शेन-कान-निङ क्षेत्र में पहुँची, तो सिर्फ़ 20,000 लोग बचे थे। बाकी में से, कुछ हजम कर लिये गये थे, कुछ बिखर गये थे, कुछ मारे गये या घायल हुए थे।

हमें विपरीत तत्वों की एकता पर चर्चा करने के लिए अपने जीवन को प्रस्थान बिन्दु बनाना चाहिए। (कामरेड काङ शेङ : `सिर्फ़ अवधारणाओं की बात करने से काम नहीं चलेगा।´)

जब विश्लेषण चल रहा होता है, तो संश्लेषण भी होता है, और जब संश्लेषण हो रहा होता है, तो विश्लेषण भी होता है। जब लोग जानवरों और पौधों को खाते हैं, तो वे भी विश्लेषण से शुरू करते हैं। हम बालू क्यों नहीं खाते? अगर चावल में बालू हो तो वह खाने लायक नहीं होता। हम घोड़े, गाय या भेड़ की तरह घास क्यों नहीं खाते, सिर्फ़ बन्दगोभी जैसी चीज़ें क्यों खाते हैं? हमें हर चीज़ का विश्लेषण करना चाहिए। शेन वुङ ने सौ जड़ी-बूटियों को चखा,[36] और दवाओं के लिए उनके इस्तेमाल की शुरुआत की। दसियों हज़ार साल बाद, विश्लेषण ने स्पष्ट रूप से यह उजागर किया कि क्या खाया जा सकता है और क्या नहीं। टिड्डे, साँप और कछुए खाये जा सकते हैं। केकड़े, कुत्ते और जलीय जन्तु खाये जा सकते हैं। कुछ विदेशी उन्हें नहीं खाते। उत्तरी शेन्सी में लोग जलीय जन्तुओं को नहीं खाते, वे मछलियाँ नहीं खाते। वे वहाँ बिल्ली भी नहीं खाते। एक बार पीली नदी की भारी बाढ़ से हज़ारों किलों मछलियाँ किनारों पर जमा हो गयी( और उन्होंने उन सबकी खाद बना डाली। मैं एक देशी दार्शनिक हूँ, आप लोग विदेशी दार्शनिक हैं। (कामरेड काङ शेङ `क्या अध्यक्ष तीन श्रेणियों के प्रश्न पर कुछ कह सकते हैं?´) एंगेल्स ने तीन श्रेणियों की चर्चा की है, लेकिन जहाँ तक मेरी बात है मैं उनमें से दो श्रेणियों में विश्वास नहीं करता। (विपरीत तत्वों की एकता सबसे बुनियादी नियम है, गुण और मात्रा का एक-दूसरे में रूपान्तरण विपरीत तत्वों गुण और मात्रा की एकता है, और निषेध का निषेध होता ही नहीं है) उसी स्तर पर, गुण और मात्रा का एक-दूसरे में रूपान्तरण, निषेध का निषेध, और विपरीत तत्वों की एकता के नियम को साथ-साथ रहना एकतत्ववाद नहीं, बल्कि `त्रितत्वाद´ है। सबसे बुनियादी चीज़ है विपरीत तत्वों की एकता। गुण और मात्रा का एक-दूसरे में रूपान्तरण विपरीत तत्वों गुण और मात्रा की एकता है। निषेध का निषेध जैसी कोई चीज़ नहीं है। अभिपुष्टि, निषेध, अभिपुष्टि, निषेध… चीज़ों की विकास प्रक्रिया में, घटनाओं की श्रंखला में हर कहीं अभिपुष्टि और निषेध दोनों होते हैं। दास स्वामियों के समाज ने आदिम समाज का निषेध किया, लेकिन सामन्ती समाज के सन्दर्भ में, यह एक सकारात्मक बात थी। सामन्ती समाज दास समाज के सम्बन्ध में निषेध था, लेकिन पूँजीवादी समाज के सन्दर्भ में यह सकारात्मक था। पूँजीवादी समाज सामन्ती समाज के सम्बन्ध में निषेध था, लेकिन समाजवादी समाज के सन्दर्भ में यह फिर सकारात्मक है। संश्लेषण की पद्धति क्या होती है! क्या यह सम्भव है कि दास समाज के साथ-साथ आदिम समाज का भी अस्तित्व बना रहे? वे साथ-साथ मौजूद होते हैं, लेकिन यह समग्र का एक छोटा-सा हिस्सा है। समग्र तस्वीर यह है कि आदिम समाज समाप्त हो जायेगा। इससे भी बाढ़कर यह है कि समाज का विकास कई मंजिलों से गुजरकर होता है। आदिम समाज भी अनेक मंजिलों में बँटा हुआ है। उस समय तक, मृत पतियों के साथ औरतों को दफन कर देने की प्रथा नहीं थी, लेकिन तब पुरुष स्त्रियों के अधीन थे और फिर चीज़ें अपने विपरीत की ओर बढ़ीं और स्त्रियाँ पुरुषों के अधीन हो गयीं। इतिहास की यह मंजिल अब तक स्पष्ट नहीं हो पायी है, हालाँकि करीब दस लाख वर्ष से ज्यादा समय से यह चला आ रहा है। वर्ग समाज अभी 5000 वर्ष पुराना नहीं हुआ है, आदिम युग के अन्त में लुङ शान और याङ शाओ [37] जैसी संस्कृतियों में रँगे हुए बर्तन होते थे। एक शब्द में, एक दूसरे को हड़प कर जाता है, एक दूसरे को उखाड़ फेंकता है, वर्ग ख़त्म कर दिया जाता है, दूसरा वर्ग उठता है, एक समाज का खात्मा हो जाता है, दूसरा समाज उठ खड़ा होता है। स्वाभाविक रूप से, विकास की प्रक्रिया में हर चीज़ बिल्कुल शुद्ध नहीं होती। जब यह सामन्ती समाज तक पहुँचती है, तो दास प्रणाली की कुछ चीज़ें अब भी बची रहती हैं, हालाँकि सामाजिक ढाँचे का अधिकांश भाग सामन्ती प्रणाली की अभिलाक्षणिकताओं के अनुसार होता है। अब भी कुछ भू-दास और कुछ बँधुआ मजदूर होते हैं, जैसे दस्तकार कारीगर। पूँजीवाद समाज भी बिल्कुल शुद्ध नहीं होता, और ज्यादा उन्नत पूँजीवादी समाजों में भी एक पिछड़ा भाग भी होता है। उदाहरण के लिए, दक्षिणी संयुक्त राज्य अमेरिका में दास प्रणाली थी। लिंकन ने दास प्रणाली ख़त्म कर दी, लेकिन वहाँ अब भी काले गुलाम हैं, उनका संघर्ष बहुत तीखा है। दो करोड़ से ज्यादा लोग इसमें शामिल हैं और ये काफी बड़ी संख्या है। एक चीज़ दूसरी को नष्ट कर देती है, चीज़ें पैदा होती हैं, विकसित होती हैं, और नष्ट हो जाती हैं, हर कहीं ऐसा ही है। अगर चीज़ें दूसरी चीज़ों द्वारा नष्ट नहीं करती, तो वे खुद ही नष्ट हो जाती हैं। लोग क्यों मरते हैं? क्या कुलीन लोग भी मरते हैं? यह एक प्राकृतिक नियम है। जंगल मनुष्यों से ज्यादा जीवित रहते हैं, लेकिन वे भी कुछ हज़ार वर्ष तक रहते हैं। यदि मृत्यु जैसी चीज़ न होती, तो यह स्थिति असहनीय होती। अगर हम आज कनफ़्यूशियस को जीवित देख सकते, तो धरती इतने सारे लोगों को सँभालने लायक नहीं रहती। मैं चुआङ-ल्यू[38] के रवैये का समर्थन करता हूँ। जब उसकी पत्नी मर गयी तो वह थाली बजाकर गाना गाने लगा। जब लोग मरें, तो द्वन्द्ववाद की विजय का जश्न मनाने के लिए पुराने के ध्वंस का जश्न मनाने के लिए पार्टियाँ होनी चाहिए। समाजवाद भी समाप्त हो जायेगा। इसका समाप्त न होना ठीक नहीं, क्योंकि जब तक यह समाप्त नहीं होगा तब तक कम्युनिज्म नहीं आयेगा। कम्युनिज्म हज़ारों हज़ार साल तक रहेगा। मैं नहीं मानता कि कम्युनिज्म के तहत कोई गुणात्मक बदलाव नहीं होंगे, कि यह गुणात्मक बदलावों द्वारा मंज़िलों में बँटा नहीं होगा। मैं इसे नहीं मानता! मात्रा गुण में बदलती है, और गुण मात्रा में बदल जाता है। मैं यह नहीं मानता कि यह दसियों लाख वर्ष तक बिना बदले गुणात्मक रूप से बिल्कुल एक समान बना रह सकता है! द्वन्द्ववाद की रोशनी में ऐसा सोचा भी नहीं जा सकता। फिर यह सिद्धान्त है, `हरेक से उसकी क्षमतानुसार, हरेक को उसकी आवश्यकतानुसार।´ क्या आप मानते हैं कि वे दस लाख वर्ष तक इसी अर्थशास्त्र पर चलते रहेंगे? क्या आपने इसके बारे में सोचा है? अगर ऐसा होता, तो हमें अर्थशास्त्रियों की ज़रूरत नहीं होती, या फिर हम बस एक पाठ्यपुस्तक से काम चला सकते, और द्वन्द्ववाद ख़त्म हो जाता। विपरीत ध्रुवों की ओर निरन्तर गति द्वन्द्ववाद का प्राण है। अन्तत: मनुष्य जाति का भी अन्त होगा। जब धर्मशास्त्री कयामत के दिन की बात करते हैं, तो वे निराशावादी होते हैं। हम कहते हैं कि मनुष्य जाति का अन्त कुछ ऐसी चीज़ होगी जो मनुष्य जाति से भी उन्नत किसी चीज़ को जन्म देगी। मनुष्य जाति अभी अपनी शैशवावस्था में है। एंगेल्स ने आवश्यकता के राज्य से स्वतन्त्रता के राज्य में प्रवेश करने की बात की थी, और कहा था कि स्वतन्त्रता का अर्थ है आवश्यकता की समझ। यह वाक्य अधूरा है। यह आधी बात कहता है और शेष को अनकहा छोड़ देता है। क्या इसे महज समझने से आप स्वतन्त्र हो जायेंगे? स्वतन्त्रता का अर्थ है आवश्यकता की समझ और आवश्यकता का रूपान्तरण – आपको कुछ काम भी तो करना होता है। अगर आप बिना कोई काम किये सिर्फ़ खायेंगे, अगर आप महज समझेंगे, तो क्या यह काफ़ी होगा? जब आप कोई नियम ढूँढ़ते हैं, तो आपको इसे लागू करना आना चाहिए, आपको दुनिया का नये सिरे से निर्माण करना होगा, आपको जमीन खोदनी और इमारतें खड़ी करनी होंगी, आपको खदानें खोदनी होंगी, उद्योग लगाने होंगे। भविष्य में और भी ज्यादा लोग होंगे, और अनाज काफी नहीं होगा, तो लोगों को खनिजों से भोजन प्राप्त करना होगा। इस तरह, केवल रूपान्तरण द्वारा ही स्वतन्त्रता हासिल की जा सकती है। क्या भविष्य में इतनी स्वतन्त्रता सम्भव होगी? लेनिन ने कहा था कि भविष्य में, आसमान में इधर-उधर भागते हवाई जहाज इतने ज्यादा होंगे जैसे कि पतंगें। हर जगह वे टकरा जायेंगे, तो हम इसके बारे में क्या करेंगे? हम उन्हें कैसे चलायेंगे? और अगर हम ऐसा कर लेंगे, तो क्या चीज़ें इतनी स्वतन्त्र रहेंगी? पीकिङ में इस समय 10,000 बसें हैं, टोक्यो में 100,000 (वाहन) हैं (या यह 800,000 है?) इसलिए वहाँ वाहन दुर्घटनाएँ ज्यादा होती हैं। हमारे यहाँ कम कारें हैं और हम ड्राइवरों और लोगों को शिक्षित भी करते हैं, इसलिए दुर्घटनाएँ कम होती हैं। अब से 10,000 साल बाद पीकिङ में क्या होगा? क्या तब भी 10,000 बसें ही रहेंगी? वे कुछ नया अविष्कार कर सकते हैं, जिससे वे परिवहन के इन साधनों को त्याग सकते हैं, ताकि मनुष्य उड़ सके, किसी सरल-से यान्त्रिक उपकरण का प्रयोग करके किसी भी जगह उड़कर जा सके, और जहाँ जी चाहे उतर सके। आवश्यकता को सिर्फ़ समझने से कुछ नहीं होगा, हमें चीज़ों को बदलना भी होगा। मैं नहीं मानता कि कम्युनिज्म मंजिलों में विभाजित नहीं होगा, और कोई गुणात्मक बदलाव नहीं होंगे। लेनिन ने कहा था कि सारी चीज़ें विभाजित की जा सकती हैं। उन्होंने परमाणु का उदाहरण दिया और कहा कि न सिर्फ़ परमाणु को विभाजित किया जा सकता है बल्कि इलेक्ट्रान को भी विभाजित किया जा सकता है। पहले, यह माना जाता था कि इसे विभाजित नहीं किया जा सकता, परमाणु के नाभिक के विखण्डन से जुड़ी विज्ञान की शाखा की उम्र अभी ज्यादा नहीं है, बस बीस या तीस वर्ष हुए हैं। हाल के दशकों में वैज्ञानिकों ने परमाणु के नाभिक को उसके संघटकों जैसे प्रोटॉन, न्यूट्रॉन, एण्टी-न्यूट्रान, मेज़ान और एण्टी- मेज़ॉन में बाँटा है। ये तो भारी वाले संघटक हैं इसके अलावा हल्के वाले भी हैं। इनमें से ज्यादातर खोजें द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान या उसके बाद हुई हैं। यह तथ्य कुछ समय पहले खोजा जा चुका था कि इलेक्ट्रान को परमाणु के नाभिक से अलग किया जा सकता है। बिजली के तार में ताँबे या अल्युमिनियम से अलग किये गये इलेक्ट्रानों का प्रयोग किया जाता है। पृथ्वी के 300 ली के वातावरण में, भी असम्बद्ध इलेक्ट्रानों की परतों का पता लगाया गया है। वहाँ भी इलेक्ट्रान और परमाणु का नाभिक अलग-अलग हैं। अब तक इलेक्ट्रानों को तोड़ा नहीं जा सका है लेकिन एक दिन वे अवश्य ही इसे भी तोड़ सकेंगे। चुआ³-त्जू ने कहा है, `एक फुट की लम्बाई, जिसे रोज़ आधा किया जाता है, कभी भी घटकर शून्य नहीं होगी।´ (चुआङ-त्जू, अध्याय 33 का उद्धरण) यह सच है। अगर आपको विश्वास नहीं है, तो ज़रा सोचिये। अगर इसे घटा कर शून्य किया जा सकता, तो विज्ञान ही नहीं होता। तमाम तरह की चीज़ें निरन्तर और असीम ढंग से विकसित होती रहती हैं, और वे अनन्त हैं। समय और स्थान अनन्त हैं। जहाँ तक स्थान का सवाल है, वृहत और सूक्ष्य दोनों दृष्टिकोण से देखने पर, यह अनन्त है, इसे अन्तहीन ढंग से विभाजित किया जा सकता है। इसलिए, दस लाख वर्ष बाद भी वैज्ञानिकों के लिए करने को काम होगा। मैं `बुलेटिन ऑफ नेचुरल साइंसेज़´ में मूलभूत कणों पर सकाटा के लेख की बहुत सराहना करता हूँ।[39] मैंने पहले इस तरह का कोई लेख नहीं देखा। यह द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद है। वह लेनिन को उद्धृत करते हैं। दर्शनशास्त्र की कमजोरी है कि इसने व्यावहारिक दर्शन नहीं, सिर्फ़ किताबी दर्शन पैदा किया है। हमें हमेशा नई-नई चीज़ें सामने लानी चाहिए। वरना हमारा यहाँ क्या काम है? हमें वंशज किसलिए चाहिए? नयी चीज़ें यथार्थ में मिलती हैं, हमें यथार्थ को समझना चाहिए। अन्तिम विश्लेषण में, जेन चि-यू[40] मार्क्सवादी हैं या नहीं? मैं बौद्ध धर्म पर उनके उन लेखों की काफी सराहना करता हूँ। (उनके पीछे) कुछ शोध किया गया दिखता है, वह ताङ युङ-तुङ[41] के शिष्य हैं। वह सिर्फ़ ताङ वंश के बौद्ध धर्म की चर्चा करते हैं, और बाद के समय के बौद्ध धर्म पर सीधे कुछ नहीं कहते। सुङ और मिङ अधिभूतवाद ताङ वंश के चान स्कूल से विकसित हुए, और यह मनोगत प्रत्ययवाद से वस्तुगत प्रत्ययवाद की ओर एक आन्दोलन था।[42] बौद्ध धर्म और ताओ पन्थ दोनों ही हैं, और दोनों के बीच फर्क न करना ग़लत है। उन पर ध्यान देना उचित कैसे हो सकता है? हान यू की बातों का कोई मतलब नहीं है। उसका नारा था( `उनके विचारों से सीखो, उनकी अभिव्यक्ति के ढंग से नहीं।´ उसके विचार पूरी तरह दूसरों से नकल किये हुए थे, उसने बस निबन्धों का रूप और संरचना बदल दी। उसकी बातें बेमतलब थीं, और जो कुछ उसने कहा वह मूलत: प्राचीन पुस्तकों से लिया गया था। `शिक्षकों पर विमर्श´ जैसे लेखनों में कुछ नयापन है। ल्यू-हाउ अलग था, वह बौद्ध और ताओ भौतिकवाद की एक-एक बात जानता था।[43] लेकिन उसकी `स्वर्ग उत्तर देता है´ बहुत छोटी है। उसकी `स्वर्ग उत्तर देता है´ चू युआन की `स्वर्ग पूछता है´ से पैदा हुई है।[44] हज़ारों साल में सिर्फ़ इस एक आदमी ने `स्वर्ग उत्तर देता है´ जैसी कोई चीज़ लिखी है। `स्वर्ग उत्तर देता है´ और `स्वर्ग पूछता है´ किसके बारे में हैं? `स्वर्ग पूछता है´ में स्पष्ट ढंग से व्याख्या करने के लिए टिप्पणियाँ न हों, तो इसे पढ़कर आप कुछ नहीं समझ पायेंगे, आपको एक सामान्य झलक मिलेगी। `स्वर्ग पूछता है´ वाकई अद्भुत है, हज़ारों वर्ष पहले इसने ब्रह्माण्ड, प्रकृति और मनुष्य पर सवाल उठाये थे। (दो को एक में मिलाने के प्रश्न पर चर्चा के सम्बन्ध में) हुङ चि को कुछ अच्छी चीज़ें पुनर्मुद्रित करने और एक रिपोर्ट लिखने के लिए कहें।

टिप्पणियाँ

27आई सू-ची (1910-66) अपनी मृत्यु के समय उच्चतर पार्टी स्कूल के उपाध्यक्ष थे। वह पार्टी के अग्रणी दार्शनिक प्रवक्ताओं में से एक थे, जिन्होंने द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद पर कृतियों का रूसी से अनुवाद किया था, और मार्क्सवाद को जनसाधारण तक ले जाने के लिए अनेक पुस्तकें तथा लेख लिखे थे। 1 नवम्बर 1964 को उन्होंने पीपुल्स डेली में `बुर्जुआ´ दार्शनिक याङ सिएन-चेन पर हमला करते हुए एक लेख प्रकाशित कराया।

28 `गौरैया की चीरफाड़´ की उपमा ज्ञान अर्जित करने और अनुभवों का समाहार करने का एक अनुप्रयुक्त सिद्धान्त और कार्य पद्धति है। किसी परिघटना की अनेक पुनरावृत्तियों के सामान्यीकरण का प्रयास करने के बजाय, यह कार्य पद्धति किसी प्रोटोटाइप के सांगोपांग अध्ययन और जांच-पड़ताल के ज़रिये उसका गहन विश्लेषण करने और इस विश्लेषण के ज़रिये अनुभवों का सार-संकलन करने की हिमायत करती है। यह नारा इस आम कहावत से निकला है कि `गौरैया छोटी भले ही होती है लेकिन उसमें सभी ज़रूरी अंग होते हैं।´ यहाँ माओ कहते हैं कि व्यापक अन्तरराष्ट्रीय सन्दर्भों में पूरा चीन आज की दुनिया में क्रान्ति की समस्याओं का एक लघु रूप है।

29 पुस्तक (दि स्टोरी ऑफ दि स्टोन) के अध्याय 2 में जुङ कुओ के ड्यूक की हवेली में लेङ त्जू-सिंग के उपदेश। `अधिकारियों के लिए ताबीज´ इलाके के अमीर और असरदार परिवारों की एक सूची थी जिसे बॉटल-गूर्ड के भूतपूर्व शिष्य को साथ रखना पड़ता था ताकि उन्हें नाराज़ करके अपना भविष्य चौपट करने से बच सके। (दि स्टोरी ऑफ दि स्टोन)

30 इस मुद्दे पर कॉमरेड माओ द्वारा की गयी आलोचनाओं के लिए देखें लाल भवन का सपना के बारे में पत्र´´ (संकलित रचनाएँ, खण्ड 5) वाङ कुन-लेन 1950 के दशक में पीकिङ के उप महापौर थे

31 हो चि-फाङ (1911-) एक कवि तथा साहित्य जगत के प्रभावी व्यक्ति थे। 1954 में यू यिंग-पो के विरुद्ध चली मुहिम में उन्होंने एक सीमा तक उसका यह कहकर बचाव किया कि लाल भवन का सपना की यू की व्याख्या ग़लत है लेकिन वे राजनीतिक रूप से वफादार हैं। महान अग्रवर्ती छलाँग के वक्त स्वयं उनकी आलोचना की गयी।

32 इस विषय पर वू शिह-चाङ की कृति अंग्रेज़ी में अनूदित है : ऑन `लाल भवन का सपना´ (क्लैरण्डन प्रेस, 1961)

33 यहाँ माओ के विचार लू शुन से मेल खाते हैं।

34 माओ द्वारा यहाँ दिये गये आँकड़े 1946 में गृह युद्ध नये सिरे से छिड़ जाने जाने से अधिक जापान विरोधी युद्ध के आरिम्भक दिनों के हैं जब जन मुक्ति सेना की ताकत कम से कम पाँच लाख तक की हो गयी थी।

35 जनवरी 1949 में, पेइपिंग (जिस नाम से तब उसे जाना जाता था) में राष्ट्रवादी गैरीसन के कमाण्डर जनरल फू त्सो-इ ने व्यर्थ की बरबादी से बचने के लिए बिना लड़े ही आतमसमर्पण कर दिया। बाद में पीकिङ सरकार में वह जल संरक्षण मन्त्री बने।

36 कहा जाता है कि प्रसिद्ध सम्राट शेन नुङ ने तीसरी शताब्दी ई.पू. में कृषि कला सिखायी थी, और ख़ास तौर पर वनस्पतियों के औषधीय गुणों का पता लगाया था।

37 लुङ शान और यान शाओ संस्कृतियाँ, जो क्रमश: उत्तर-पूर्वी और उत्तर- पश्चिमी चीन में स्थित हैं, उत्तरपाषाण काल की दो उल्लेखनीय संस्कृतियाँ थीं। जैसा कि माओ कहते हैं, वे अपनी मृदभाँड कला के लिए विशेष रूप से जानी जाती हैं।

38 चुआङ-त्जू नामक पुस्तक, जिसका एक अंश ही दूसरी शताब्दी ई.पू. के उत्तरार्द्ध में रहने वाले इसी नाम के व्यक्ति ने लिखा था, न केवल ताओ धर्म के शास्त्रीय ग्रन्थों में से एक है (लाओ-त्जू और बुक ऑफ चेंजेंस के साथ) बल्कि चीन के इतिहास की महानतम साहित्यिक कृतियों में से भी एक है।

39 नगोया विश्वविद्यालय के एक जापानी भौतिकीविद सकाटा शियूची का मानना था कि `मूलभूत कण एक एकल, भौतिक, विभेदीकृत और असीम श्रेणी होते हैं जिनसे प्राकृतिक व्यवस्था बनी होती है।´ इन विचारों को प्रस्तुत करने वाला उनका एक लेख जून 1965 में रेड फ्लैग में छपा था।

40 सम्भवत: माओ जेन चि-यू द्वारा 1963 में प्रकाशित और 1973 में पुनर्मुद्रित लेखों के एक संग्रह की बात कर रहे हैं : `हान एवं ताङ राजवंशों में बौद्ध विचारधारा पर संकलित निबन्ध,´ (पीकिङ )। इन अध्ययनों में वह द्वन्द्ववाद के विषय में लेनिन को काफ़ी विस्तार से उद्धृत करते हैं।

41 ताङ युङ-तुङ (1892-1964) जिन्हें जेन चि-यु अपना शिक्षक मानते हैं, बौद्ध धर्म के अग्रणी इतिहासकार थे, जिन्होंने हान, वेई, चिन और उत्तरी एवं दक्षिणी राजवंशों में चीनी बौद्ध धर्म के बारे में तथा भारतीय दर्शन के इतिहास आदि पर लिखा था। 1948 से लेकर 1954 में बीमार पड़ने तक वह पीकिङ विश्वविद्यालय में मानविकी के डीन थे।

42 चान बौद्ध धर्म (जो उसके जापानी नाम ज़ेन से अधिक प्रसिद्ध है) के प्रभाव में, सुङ और मिङ वंशों के चीनी दार्शनिकों ने कनफ़्यूशियसवाद और बौद्ध धर्म का संश्लेषण किया जिसमें केन्द्रीय भूमिका ली अवधारणा (सिद्धान्त या तर्क) की होती है, जिसे नव-कनफ़्यूशियसवाद के नाम से जाना जाता है।

43 हान यू और ल्यू त्सुङ-युआन। हान-यू ने प्राचीन शैली की अधिकता से बचते हुए प्राचीन क्लासिकी अवधि की सादगी को पुनर्सृजित करने की कोशिश की। `उनके विचारों से सीखने´ का माओ द्वारा उद्धृत नारा अभिव्यक्ति के पुराने पड़ गये तरीकों से बचते हुए प्राचीन कनफ़्यूशियस- वादी सन्तों से प्रेरणा लेने के इस लक्ष्य का हवाला देता है। उन्होंने बौद्ध धर्म के प्रति आलोचनात्मक रवैया अपनाया लेकिन फिर भी उससे कुछ विचार लिये। ल्यू त्सु³-युआन, जिन्हें माओ यहाँ उनके साहित्यिक नाम ल्यू त्जू-हाउ के नाम से पुकारते हैं, हान यू के करीबी दोस्त थे।

44 ल्यू त्सुङ-युआन का निबन्ध `स्वर्ग उत्तर देता है´ में चू युआन द्वारा अपनी कविता `स्वर्ग पूछता है´ में ब्रह्माण्ड के बारे में उठाये गये कुछ प्रश्नों के उत्तर दिये गये हैं।

अनुवाद : सत्यम

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