दर्शन के प्रश्नों पर

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वार्ता विशेष

माओ त्से-तुङ

18 अगस्त, 1964


यह चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के अपने कुछ वरिष्ठ कामरेडों के साथ माओ त्से-तुङ की एक अनौपचारिक वातचीत का पाठ है जिसमें उन्होंने चीन में समाजवादी निर्माण की समस्याओं और समाजवादी समाज में जारी वर्ग संघर्ष से जोड़ते हुए कुछ दार्शनिक प्रश्नों पर, ख़ासकर द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद के बारे में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण विचार व्यक्त किये हैं। बातचीत का ढंग अनौपचारिक है और वार्ता में अनेक विषयों को छुआ गया है लेकिन यहाँ की गयी बातें बेहद गम्भीर और विचारोत्तेजक हैं। -सं

जब वर्ग संघर्ष हो तभी दर्शन भी सम्भव हो सकता है। व्यवहार से अलग ज्ञानमीमांसा की चर्चा करना समय की बर्बादी है। दर्शन का अध्ययन करने वाले कामरेडों को देहात में जाना चाहिए। उन्हें इन सर्दियों में या अगले वसन्त में वहाँ जाकर वर्ग संघर्ष में हिस्सा लेना चाहिए। जिनका स्वास्थ्य अच्छा नहीं है उन्हें भी जाना चाहिए। वहाँ जाने से लोग मर नहीं जायेंगे। बस इतना होगा कि उन्हें सर्दी लग जायेगी, और अगर वे कुछ अतिरिक्त कपड़े पहन लेंगे तो कोई दिक्कत नहीं होगी।

फ़िलहाल विश्वविद्यालयों में वे जिस तरह से इसका अध्ययन करते हैं किताब से किताब तक, एक अवधारणा से दूसरी अवधारणा तक जाते हुए, वह किसी काम का नहीं है। दर्शन किताबों से कैसे आ सकता है? मार्क्सवाद के तीन बुनियादी संघटक हैं वैज्ञानिक समाजवाद, दर्शन और राजनीतिक अर्थशास्त्र।[1] इसका आधार है समाज विज्ञान, वर्ग संघर्ष। सर्वहारा वर्ग और बुर्जुआ वर्ग के बीच संघर्ष है। मार्क्स और दूसरे लोगों ने इसे देखा था। यूटोपियाई समाजवादी हमेशा बुर्जुआ वर्ग को उदार होने के लिए राज़ी करने की कोशिश करते है। यह नहीं चलेगा, सर्वहारा के वर्ग संघर्ष पर भरोसा करना ज़रूरी है। उस समय, कई हड़तालें हो चुकी थीं। इंग्लैण्ड की संसदीय जाँच ने पाया कि बारह घण्टे काम का दिन पूँजीपतियों के हित के लिए आठ घण्टे काम के दिन के मुकाबले कम अनुकूल है। इसी दृष्टिकोण से आरम्भ करके मार्क्सवाद सामने आया। बुनियाद तो वर्ग संघर्ष है। दर्शनशास्त्र का अध्ययन इसके बाद ही हो सकता है। किसका दर्शन? बुर्जुआ वर्ग का दर्शन, या सर्वहारा वर्ग का दर्शन? सर्वहारा वर्ग का दर्शन मार्क्सवादी दर्शन है। सर्वहारा वर्ग का अर्थशास्त्र भी है, जिसने क्लासिकीय अर्थशास्त्र को बदल डाला है। जो लोग दर्शनशास्त्र से जुड़े हैं, वे मानते हैं कि दर्शन का स्थान पहले है। उत्पीड़क उत्पीड़ितों का उत्पीड़न करते हैं, जबकि उत्पीड़ितों को दर्शन की तलाश शुरू करने से पहले उत्पीड़न के विरुद्ध लड़ने और उससे निकलने का रास्ता तलाश करना पड़ता है। जब लोगों ने इसे अपना प्रस्थान बिन्दु बनाया तभी मार्क्सवाद- लेनिनवाद सामने आया और तभी उन्हें दर्शन का पता चला। हम सब इससे होकर गुज़रे हैं। दूसरे लोग मुझे मारना चाहते थे( च्याङ काई-शेक मुझे मारना चाहता था। इस तरह हम वर्ग संघर्ष में शामिल हुए, हमने दार्शनिक ढंग से सोचना शुरू किया।

विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों को इन सर्दियों में (देहात में – अनु.) जाना शुरू कर देना चाहिए -मैं समाज विज्ञानों की बात कर रहा हूँ। प्राकृतिक विज्ञान के विद्यार्थियों को अभी नहीं भेजना चाहिए, हालाँकि हम एक-दो बार उन्हें भेज सकते हैं। समाज विज्ञानों – इतिहास, राजनीतिक अर्थशास्त्र, साहित्य, कानून – का अध्ययन करने वाले सभी लोगों को, हरेक को जाना चाहिए। प्रोफेसरों, असिस्टेण्ट प्रोफेसरों, प्रशासनिक कर्मचारियों और विद्यार्थियों सभी को, पाँच महीने की सीमित अवधि के लिए जाना चाहिए। अगर वे पाँच महीने के लिए कारखानों में जायेंगे, तो वे कुछ बोधात्मक ज्ञान हासिल करेंगे। घोड़े, गायें, भेड़ें, मुर्गियाँ कुत्ते, सुअर, धान, ज्वार, सेम, गेहूँ, बाजरे की किस्में, इन सब चीज़ों को वे देख सकेंगे। यदि वे सर्दियों में जायेंगे, तो फसल नहीं देख पायेंगे, पर कम से कम वे जमीन और लोगों को देख सकेंगे। वर्ग संघर्ष का अनुभव हासिल करना – मैं इसे ही विश्वविद्यालय कहता हूँ। लोग बहस करते हैं कि कौन- सा विश्वविद्यालय बेहतर हं, पीकिङ विश्वविद्यालय या `जन विश्वविद्यालय´।[2] जहाँ तक मेरी बात है, मैं तो खुले मैदानों के विश्वविद्यालय का स्नातक हूँ, मैंने वहीं थोड़ा-बहुत सीखा है। अतीत में मैंने कनफ़्यूशियस का अध्ययन किया और चार पुस्तकों तथा पाँच शास्त्रों पर छह वर्ष ख़र्च किये।[3] मैंने उन्हें रट लिया, पर मैंने उन्हें समझा नहीं। उस समय, मुझे कनफ़्यूशियस में गहरा विश्वास था, और मैंने लेख भी लिखे (उसके विचारों को स्पष्ट करते हुए) बाद में मैं सात वर्ष तक एक बुर्जुआ स्कूल में गया। सात धन छह बराबर तेरह वर्ष होते हैं। मैंने आम तौर पर पढ़ाई जानेवाली सारी बुर्जुआ चीज़ों का अध्ययन किया – प्राकृतिक विज्ञान और सामाजिक विज्ञानों को। थोड़ा शिक्षाशास्त्र भी सिखाते थे। इसमें पाँच वर्ष नार्मल स्कूल में दो वर्ष मिडिल स्कूल में और साथ ही पुस्तकालय में बिताया गया मेरा समय शामिल है।[4] उस समय मैं काण्ट के द्वैतवाद, खासकर उसके प्रत्ययवाद में विश्वास करता था। मूलत: मैं एक सामन्तवादी और बुर्जुआ लोकतन्त्र का समर्थक था। समाज ने मुझे क्रान्ति में भाग लेने की ओर धकेला। मैंने प्राथमिक स्कूल के शिक्षक और एक चार-वर्षीय स्कूल के प्रिंसिपल के रूप में कुछ वर्ष बिताये। मैंने एक छह-वर्षीय स्कूल में इतिहास और चीनी भाषा भी पढ़ाई। मैंने थोड़े समय तक एक मिडिल स्कूल में भी पढ़ाया, पर मैं कुछ भी समझता नहीं था। जब मैं कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हुआ, तो मैं जानता था कि हमें क्रान्ति करनी है, पर किसके खिलाफ? और हम ऐसा करेंगे कैसे? बेशक हमें साम्राज्यवाद ओर पुराने समाज के खिलाफ क्रान्ति करनी थी। मुझे ठीक से यही नहीं पता था कि साम्राज्यवाद किस किस्म की चीज़ है, और इस बात की तो और भी कम समझ थी कि हम इसके खिलाफ क्रान्ति कैसे करेंगे। मैं तेरह वर्षों में जो कुछ भी सीखा था, उसमें से कुछ भी क्रान्ति करने के लिए किसी काम का नहीं था। मैंने एकमात्र औज़ार – भाषा – का इस्तेमाल किया। लेख लिखना एक औज़ार है। जहाँ तक मेरे अध्ययनों का सवाल है, मैंने उसका बिल्कुल भी प्रयोग नहीं किया। कनफ़्यूशियस कहता था : सदाशयता मानवजाति का अभिलाक्षणिक गुण है। सदाशयी व्यक्ति दूसरों से प्रेम करता है।[5] वह किससे प्रेम करता था? सभी मनुष्यों से? ऐसा कतई नहीं था। क्या वह शोषकों से प्रेम करता था? बिल्कुल ऐसा भी नहीं था। वह शोषकों के सिर्फ़ एक हिस्से से प्रेम करता था। वरना, कनफ़्यूशियस कोई ऊँचा अधिकारी क्यों न बन सका? लोग उसे नहीं चाहते थे। वह उन्हें प्रेम करता था और चाहता था कि वे एकजुट हो जायें। लेकिन जब भुखमरी की, और (इस उक्ति) `श्रेष्ठ व्यक्ति ग़रीबी को झेल सकता है´ की बात आयी, तो वह मरते-मरते बचा। कुआङ के लोग उसे मार डालना चाहते थे।[6] ऐसे लोग भी थे जो चिन की पश्चिम की यात्रा पर साथ न जाने के लिए उसकी आलोचना करते थे। वास्तव में, `गीति-काव्यों की पुस्तक´ (बुक ऑफ ओड्स) में शामिल कविता `सातवें माह में अग्नि तारा भूमध्य रेखा को पार करता है´ में शेन्सी की घटनाओं का उल्लेख है। `पीला पक्षी´ कविता में उस घटना की चर्चा है जब चिन के युवराज मू के तीन उच्च अधिकारियों को मारकर उसी के साथ दफना दिया गया था।[7] सू-मा चिरोन [8]की `गीति-काव्यों की पुस्तक´ के बारे में बहुत अच्छी राय थी। वह कहता था कि इसकी 300 कविताएँ प्राचीन काल के ऋषि-मुनियों ने जागृत अवस्था में लिखी थीं। `गीति-काव्यों की पुस्तक´ की कविताओं का एक बड़ा हिस्सा राज्यों की शैली में लिखा गया है, वे आम लोगों के लोकगीत है, ऋषि-मुनि और कोई नहीं बल्कि आम लोग ही हैं। `जागृत अवस्था में लिखी थीं´ का मतलब यह है कि जब किसी व्यक्ति का हृदय क्रोध से भर उठता था तब वह कविता लिखता था!

तुम न बोते हो न काटते हो;

फिर तुम्हारे तीन सौ कोठार धान से कैसे भरे रहते है?

तुम शिकार में कभी दौड़ते नहीं हों;

फिर तुम्हारे अहाते में तीतर लटकते कैसे दिखते हैं?

ओ श्रेष्ठ मनुष्य!

वह अपनी अकर्मण्यता की रोटी

नहीं खाता![9]

`काम के न काज के, दुश्मन अनाज के´ कहावत यहीं से पैदा हुई। यह कविता देवताओं को दोषी ठहराती है और शासकों का विरोध करती है। कनफ़्यूशियस थोड़ा जनवादी भी था। उसने (`गीति-काव्यों की पुस्तक´ में) स्त्री-पुरुष के प्रेम के बारे में कविताओं को भी शामिल किया है। अपनी टिप्पणियों में, चू सि ने उन्हें गुप्त प्रेम सम्बन्धों के रूप में वर्णित किया है।[10] वास्तव में, कुछ ऐसे हैं और कुछ नहीं हैं, जो ऐसे नहीं हैं। उनमें राजकुमार और प्रजा के सम्बन्धों के बारे में लिखने के लिए पुरुष और स्त्री के बिम्बों का प्रयोग किया गया है। पाँच राजवंशों और दस काउन्टियों के काल में शू (आज का शेच्वान) में `चिन की पत्नी सर्दियों का रोना रोती है´ शीर्षक ऐवेई चुआङ की एक कविता थी।[11] उसने अपनी युवावस्था में इसे लिखा था और यह अपने राजकुमार के लिए उसकी विरह वेदना के बारे में है।

देहात में जाने के मामले पर लौटते है। लोगों को इन सर्दियों और वसन्त से शुरू करके, समूहों में और बारी-बारी से, वर्ग संघर्ष में भाग लेने के लिए जाना चाहिए। सिर्फ़ इसी ढंग से वे कुछ सीख सकते है, क्रान्ति के बारे में सीख सकते है। आप बुद्धिजीवी लोग सारा दिन अपने सरकारी दफ्तरों में बैठते हैं, अच्छा खाते हैं, अच्छा पहनते हैं, पैदल तक नहीं चलते हैं। इसीलिए आप बीमार पड़ते हैं। कपड़े, भोजन, मकान और व्यायाम की कमी बीमारी पैदा करने वाले चार बड़े कारण हैं। अगर अच्छी जीवन स्थितियों का भोग करने की हालत में तब्दीली लाकर, आप कुछ बुरी स्थितियों में जाते हैं, अगर आप वर्ग संघर्ष में हिस्सा लेने के लिए जाते हैं, अगर आप `चार सफाई अभियानों´ और `पाँच विरोध अभियानों´[12] के बीच जाते हैं और कठोर बनने के एक दौर से गुजरते हैं, तो आप बुद्धिजीवी लोग एक नये रूप में नजर आयेंगे।

अगर आप वर्ग संघर्ष में नहीं लगे हैं, तो आप भला किस दर्शन को लेकर चल रहे हैं?

क्यों न वहाँ जाकर इसे आज़मायें? अगर आपकी बीमारी ज्यादा गम्भीर हो जाये तो आप वापस आ जाइयेगा – आपको मरने की हालत में पहुँच जाने को निर्धारक रेखा बनाना चाहिए। जब आप इतने बीमार हो जाये कि मरने वाले हों तो आपको वापस आ जाना चाहिए। जैसे ही आप वहाँ जायेंगे, आपमें कुछ जोश आ जायेगा। (काङ शेङ बीच में बोलते हैं : `दर्शन और समाज विज्ञान विभागों के शोध संस्थानों और विज्ञान अकादमी को भी जाना चाहिए। फ़िलहाल, वे प्राचीन वस्तुओं के अध्ययन हेतु संस्थानों में तब्दील हो जाने, धूप-लोहबान के चढ़ावों से पोषण पाने वाले परीलोक में तब्दील हो जाने के कगार पर हैं। दर्शनशास्त्र संस्थान का कोई भी व्यक्ति कुआङ-मिङ जि-पाओ नहीं पढ़ता।´) मैं सिर्फ़ कुआङ-मिङ जि-पाओ और वेन-हुई पाओ[13] ही पढ़ता हूँ, मैं पीपुल्स डेली नहीं पढ़ता, क्योंकि पीपुल्स डेली में सैद्धान्तिक लेख नहीं छपते( जब हम कोई प्रस्ताव पारित करते हैं, तब वे उसे प्रकाशित करते हैं। लिबरेशन आर्मी डेली जीवन्त है, यह पठनीय है। (कामरेड काङ शेङ: `साहित्य संस्थान चाउ कुचेङ[14] पर कोई ध्यान नहीं देता, और अर्थशास्त्र संस्थान सुन येह-फाङ[15] और लिबरमैनिज्म की ओर उसके झुकाव, पूँजीवाद की ओर उसके झुकाव पर ध्यान नहीं देता।´)

उन्हें पूँजीवाद की ओर जाने दीजिये। समाज बहुत जटिल है। अगर हर कोई सिर्फ़ समाजवाद की ओर जाये, और पूँजीवाद की ओर न जाये, तो क्या यह ज्यादा ही सरल नहीं होगा? तब क्या हमारे यहाँ विरोधों की एकता ख़त्म नहीं हो जायेगी, और सिर्फ़ एकांगिकता ही नहीं रह जायेगी? उन्हें ऐसा करने दीजिये। उन्हें हम पर पागलपनभरे हमले करने दीजिये, सड़कों पर प्रदर्शन करने दीजिये, हथियार उठाकर बगावत करने दीजिये – मैं इन सब चीज़ों का समर्थन करता हूँ। समाज बहुत जटिल है, एक भी ऐसा कम्यून, एक भी सिएन, केन्द्रीय कमेटी का एक भी ऐसा विभाग नहीं है, जहाँ हम एक को दो में नहीं बाँट सकते। जरा देखिये क्या ग्रामीण कार्य विभाग को भंग नहीं कर दिया गया है?[16] यह पूरी तरह व्यक्तिगत गृहणियों के आधार पर लेखा-जोखा करने और `चार महान स्वतन्त्रताओं – धन उधार देने, व्यापार करने, श्रम भाड़े पर लेने और जमीन की खरीद-फरोख्त करने की स्वतन्त्रता – का प्रचार करने में जुटा हुआ था। अतीत में, उन्होंने (इस आशय की) एक घोषणा जारी की थी। तेङ त्जू-हुई का मुझसे विवाद हुआ था। केन्द्रीय कमेटी की एक बैठक में उन्होंने चार महान स्वतन्त्रताओं को लागू करने का विचार प्रस्तुत किया था[17]

नव जनवाद को सुदृढ़ करना, और इसे निरन्तर सुदृढ़ करते जाना, पूँजीवाद पर अमल करना है।[18] नव जनवाद सर्वहारा के नेतृत्व में एक बुर्जुआ-जनवादी क्रान्ति है। यह सिर्फ़ भूस्वामियों और दलाल पूँजीपतियों को छूती है, राष्ट्रीय पूँजीपति वर्ग को तो यह हाथ भी नहीं लगाती। जमीन का बँटवारा करना और उसे किसानों को दे देना सामन्ती भूस्वामियों की सम्पत्ति को किसानों की व्यक्तिगत सम्पत्ति में तब्दील करना है, और यह बुर्जुआ क्रान्ति के दायरे में ही आता है। जमीन का बँटवारा कोई बड़ी बात नहीं है – मैकआर्थर ने जापान में ऐसा किया। नेपोलियन ने भी जमीन का बँटवारा किया था। भूमि सुधारों से पूँजीवाद का खात्मा नहीं हो सकता। न ही इससे समाजवाद आ सकता है।

अभी हम जिस अवस्था में हैं उसमें एक तिहाई सत्ता दुश्मन या दुश्मन के हमदर्दों के हाथों में है। हम लोग पन्द्रह वर्षों से लगे हुए हैं औ अब दो-तिहाई शासन-सूत्र हमारे नियन्त्रण में हैं। आज की स्थिति में, आप एक (पार्टी) ब्रांच सेक्रेटरी को सिगरेट के चन्द पैकेटों से ख़रीद सकते हैं, अपनी बेटी का उससे ब्याह कर देने पर तो खैर कहना ही क्या। कुछ ऐसे इलाके हैं जहाँ भूमि सुधार शान्तिपूर्ण ढंग से पूरा किया गया, और भूमि सुधार टोलियाँ बहत कमजोर थीं( अब आप देख सकते हैं कि वहाँ ढेरों समस्याएँ उठ खड़ी हुई हैं।

मुझे दर्शन के बारे में सामग्रियाँ मिल गयी हैं। (यहाँ अन्तरविरोधों की समस्या पर सामग्रियों का ज़िक्र है – स्टेनोग्राफ़र की टिप्पणी।) मैंने रूपरेखा पर एक नजर डाली है। (यहाँ `दो को एक में मिलाओ´ की आलोचना करते हुए एक लेख की रूपरेखा का जिक्र है – स्टेनोग्राफर की टिप्पणी।)[19] मैं शेष को नहीं पढ़ पाया हूँ। मैंने विश्लेषण और संश्लेषण के बारे में सामग्रियों को भी देखा है। विपरीत तत्वों की एकता के नियम, बुर्जुआ वर्ग इसके बारे में क्या कहता है, मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन और स्तालिन इसके बारे में क्या कहते हैं, संशोधनवादी इसके बारे में क्या कहते हैं, उन पर इस तरह की सामग्री इकट्ठा करना अच्छी बात है। जहाँ तक बुर्जुआ वर्ग की बात है, याङ सिएन-चेन इसकी बात करता है, और पहले हीगेल इसकी बात करते थे। ऐसे लोग पुराने जमाने में होते थे। अब तो वे और भी बुरे हैं। बोग्दोनोव और लुनाचार्स्की भी थे, जो देववाद (Deism) की बात करते थे। मैंने बोग्दानोव का अर्थशास्त्र पढ़ा है कि आदिम संचय वाले हिस्से को उन्होंने ठीक माना था। (काङ शेङ : `बोग्दानोव के आर्थिक सिद्धान्त शायद आधुनिक संशोधनवाद के आर्थिक सिद्धान्तों से कुछ ज्यादा प्रबुद्ध थे। काउत्स्की के आर्थिक सिद्धान्त ख्रुश्चेव के आर्थिक सिद्धान्तों से कुछ ज्यादा प्रबुद्ध थे, और युगोस्लाविया भी सोवियत संघ से कुछ ज्यादा प्रबुद्ध हैं आखिरकार, जिलास ने स्तालिन के बारे में कुछ अच्छी बातें कहीं थी, उसने कहा था कि चीनी समस्याओं पर स्तालिन ने आत्मालोचना की थी।´)

स्तालिन ने महसूस किया था कि चीनी समस्याओं के सम्बन्ध में उनसे गलतियाँ हुई, और वे कोई छोटी गलतियाँ नहीं थीं। हम करोड़ों लोगों की आबादी वाला विशाल देश हैं, और उन्होंने हमारी क्रान्ति का, और सत्ता पर हमारे कब्जा करने का विरोध किया। हमने पूरे देश में सत्ता पर कब्जा करने के लिए बरसों तक तैयारी की, समूचा जापान-विरोधी युद्ध एक तैयारी थी। अगर आप उस दौर के केन्द्रीय कमेटी के दस्तावेजों को देखें, `नव जनवाद के बारे में´ सहित, तो यह बात एकदम साफ हो जायेगी। कहने का मतलब कि आप बुर्जुआ वर्ग का अधिनायकत्व कायम नहीं कर सकते, आप सर्वहारा वर्ग के नेतृत्व में नव जनवाद ही कायम कर सकते हैं, आप सर्वहारा के नेतृत्व में लोक जनवादी अधिनाकत्व ही कायम कर सकते है। हमारे देश में, अस्सी वर्ष तक, बुर्जुआ वर्ग के नेतृत्व में की गयी सभी जनवादी क्रान्तियाँ असफल रहीं। हमारे नेतृत्व में जनवादी क्रान्ति निश्चित ही विजयी होगी। एकमात्र रास्ता यही है, और कोई रास्ता नहीं है। यह पहला कदम है। दूसरा कदम समाजवाद के निर्माण का होगा। इस तरह, `नव जनवाद के बारे में´ एक सम्पूर्ण कार्यक्रम है। इसमें राजनीतिक, अर्थशास्त्र और संस्कृति की भी चर्चा की गयी है। सिर्फ़ सैन्य मामलों की इसमें चर्चा नहीं की गयी। (काङ शेङ : `नव जनवाद के बारे में विश्व कम्युनिस्ट आन्दोलन के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण है। मैंने स्पेनी कामरेडों से पूछा, और उन्होंने कहा कि उनके लिए समस्या नव जनवाद की स्थापना नहीं, बल्कि बुर्जुआ जनवाद की स्थापना करना था। उन्होंने अपने देश में तीन बिन्दुओँ सेना, देहात , राजनीतिक सत्ता – पर ध्यान नहीं दिया। वे पूरी तरह सोवियत विदेश नीति के मातहत हो गये, और कुछ भी हासिल नहीं कर पाये।´)

ये चेन तू-सिङ की नीतियाँ हैं! (कामरेड काङ शेङ : `वे कहते हैं कि कम्युनिस्ट पार्टी ने सेना संगठित की और, फिर उसे दूसरों को सौंप दिया।´)

ये बेकार की बात है। ( कामरेड काङ शेङ : `वे राजनीतिक सत्ता भी नहीं चाहते थे, न ही उन्होंने किसानों को गोलबन्द किया। उस समय पर, सोवियत संघ ने कहा कि यदि वे सर्वहारा का नेतृत्व थोपेंगे, तो इंग्लैण्ड और फ्रांस इसका विरोध करेंगे, और यह सोवियत संघ के हित में नहीं होगा।´)

क्यूबा के बारे में क्या खयाल है? क्यूबा में उन्होंने राजनीतिक सत्ता और सेना गठित करने पर ही ध्यान दिया, और किसानों को भी गोलबन्द किया, जैसा (हमने) अतीत में किया था( इसीलिए वे कामयाब हुए।

(कामरेड काङ शेङ `साथ ही, जब वे (स्पेनी) लड़े, तो उन्होंने सामान्य ढंग से युद्ध किया, बुर्जुआ वर्ग के तरीके से, वे आखिर तक मैड्रिड की रक्षा करते रहे।[20] हर चीज़ में, उन्होंने खुद को सोवियत विदेश नीति के मातहत कर लिया था।´)

तीसरे इण्टरनेशनल को भंग किये जाने के पहले भी, हमने तीसरे इण्टरनेशनल के आदेशों को नहीं माना। तसुन्यी सम्मेलन में हमने आदेश नहीं माने, और उसके बाद दस वर्ष के अरसे तक, शुद्धीकरण अभियान से सातवीं कांग्रेस तक, जब अन्तत: हमने एक प्रस्ताव पारित किया (`हमारी पार्टी के इतिहास के कुछ प्रश्नों के बारे में प्रस्ताव´)[21] और वामवाद (की ग़लतियों) को ठीक कर लिया, हमने उनके आदेशों का बिल्कुल पालन नहीं किया। वे कठमुल्लावादी चीन की विशेषताओं का अध्ययन करने में पूरी तरह असफल रहे( जब वे देहात में गये, उसके दस वर्ष बाद भी, वे देहात में भूमि सम्पत्ति और वर्ग सम्बन्धों को समझने में पूरी तरह असफल रहे। आप महज़ देहात में जाने से देहात को नहीं समझ सकते, आपको देहात के सभी वर्गों और तबकों के बीच के सम्बन्धों का अध्ययन करना चाहिए। मैंने इन समस्याओं पर दस वर्ष से अधिक ख़र्च किये तब जाकर आखिरकार वे मेरे सामने स्पष्ट हुई। आपको हर किस्म के लोगों से सम्पर्क करना पड़ेगा, चायखानों से लेकर जुआघरों तक, और उनकी जाँच-पड़ताल करनी होगी। 1925 में, मैं किसान आन्दोलन प्रशिक्षण संस्थान[22] में सक्रिय था, और ग्रामीण क्षेत्रों में सर्वेक्षण करता था। अपने पैतृक गाँव में, मैं ग़रीब किसानों की जाँच पड़ताल करने के लिए उनसे मिलता था। उनकी हालत दयनीय थी, उनके पास खाने को कुछ नहीं था। एक किसान था जिसके साथ मैंने गोटियों का खेल खेला (स्वर्ग, धरती, इन्सान, मेलजोल, मेई चिएन, चाङ साङ और बेंच के साथ खेला जाने वाला) और उसके बाद उसे अपने साथ खाना खाने के लिए आमन्त्रित किया। खाने के पहले, बाद में और खाना खाते हुए, मैंने उससे बातें की और मेरी समझ में आया कि देहात में वर्ग संघर्ष इतना तीखा क्यों है। वह मुझसे बात करने को इसलिए तैयार था क्योंकि : सबसे पहले तो मैंने उससे इन्सान के तौर पर बरताव किया( और तीसरे, वह थोड़े पैसे बनाने में सफल रहा था। मैं जानबूझकर हार रहा था( मैं एक या दो डालर हार गया, और नतीजतन वह काफी सन्तुष्ट था। एक दोस्त है जो अब भी दो बार मुझसे मिलने आया! मुक्ति के बाद। एक बार, उन दिनों में, वह काफी बुरी हालत में था, और वह एक डालर उधार लेने के लिए मुझे ढूँढ़ते हुए आया। मैंने उसे तीन डालर दिये, ऐसी मदद के तौर पर जिसे लौटाना नहीं था। उन दिनों में, ऐसी न लौटाने वाली मदद मिलना मुश्किल होता था। मेरे पिता का सोचना था कि अगर कोई आदमी अपना ख्याल नहीं रखता, उसे लोक-परलोक दोनों जगह सजा मिलेगी। मेरी माँ उनका विरोध करती थीं। जब मेरे पिता की मृत्यु हुई, तो बहुत थोडे़-से लोग शवयात्रा में शामिल हुए। जब मेरी माँ की मृत्यु हुई तो बहुत से लोग उनकी शवयात्रा में गये। एक बार को लाओ हुई ने हमारे घर को लूट लिया। मैंने कहा कि उन्होंने ठीक ही किया, क्योंकि लोगों के पास कुछ भी नहीं है। मेरी माँ भी इस बात को स्वीकार नहीं कर सकी।

एक बार चाङशा में चावल के लिए दंगे भड़क उठे जिनमें प्रान्तीय गवर्नर की पिटाई हो गयी। सियाङ-सियाङ से कुछ फेरी वाले अपनी सेम बेचकर घर लौट रहे थे। मैंने उन्हें रोककर हालात के बारे में पूछा। देहात में लाल और हरे गिरोह भी सभाएँ करते थे और बडे़ परिवारों को तबाह कर देते थे। इसकी ख़बरें शंघाई के अख़बारों में छपती थीं, और गड़बड़ियाँ तभी दबायी जा सकीं जब चाङशा से सैनिक भेजे गये। उनमें अनुशासन नहीं था, वे मध्यम किसानों का चावल छीन लेते थे, और इसलिए वे अलग-थलग पड़ गये। उनका एक नेता इधर-उधर भागता रहा, और आखिर पहाड़ियों में जाकर छिपा, लेकिन उसे वहाँ पकड़ लिया गया और मार दिया गया। बाद में, देहात के गणमान्य लोगों ने बैठक की, और कुछ और ग़रीब किसानों को मार डाला। उस समय तक कोई कम्युनिस्ट पार्टी नहीं थी। ये स्वत:स्फूर्त वर्ग संघर्ष थे।

समाज ने हमें धकेलकर राजनीतिक मंच पर ला खड़ा किया। पहले मार्क्सवाद से कोई वास्ता रखने के बारे में कौन सोचता था? मैंने तो इसका नाम भी नहीं सुना था। मैंने जिन लोगों के बारे में सुना, और पढ़ा था वे थे कनफ़्यूशियस, नेपोलियन, वाशिंगटन, पीटर महान, मेईजी पुनर्स्थापना, तीन विख्यात इतालवी (देशभक्त) – यूँ कहें कि सब पूँजीवाद के (नायक) थे। मैंने फ्रैंकलिन की एक आत्मकथा भी पढ़ी थी। वह एक ग़रीब परिवार से आये थे( बाद में वह लेखक बने, और बिजली के बारे में प्रयोग भी किये। (चेन पो-ता : `सबसे पहले फ्रैंकलिन ने ही यह प्रस्थापना दी थी कि मनुष्य औज़ार बनाने वाला प्राणी है।´) उन्होंने मनुष्य के औज़ार बनाने वाला प्राणी होने की बात कही। पहले वे कहते थे कि मनुष्य सोचने वाला प्राणी है, `हृदय सोच सकता है।´[23] वे कहते थे कि मनुष्य समस्त सृष्टि की आत्मा है। किसने सभा बुलाकर उसे चुना (इस पदवी के लिए)? उसने स्वयं को यह गौरव प्रदान किया। यह प्रस्थापना सामन्ती युग में मौजूद थी। बाद में, मार्क्स ने यह विचार रखा कि मनुष्य औज़ार-निर्माता है, और मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। सच तो यह है कि (क्रमिक विकास दस लाख वर्ष से गुजरने के बाद ही मनुष्य का बड़ा मस्तिष्क और एक जोड़ी हाथ विकसित हुए। भविष्य में, जानवर विकसित होते रहेंगे। मैं नहीं मानता कि सिर्फ़ मनुष्य के ही दो हाथ हो सकते हैं। क्या घोड़ों, गायों, भेड़ों का क्रमिक विकास नहीं हो सकता है? क्या सिर्फ़ बन्दरों का क्रमिक विकास हो सकता है? और इससे भी बढ़कर क्या यह हो सकता है कि बन्दरों की सिर्फ़ एक प्रजाति क्रमिक विकास करे, तथा अन्य सभी क्रमिक विकास करने में असमर्थ हैं? क्या दस लाख वर्ष बाद, एक करोड़ वर्ष बाद, घोड़े, गायें और भेड़ें वैसे ही रहेंगी जैसी वे आज हैं? मैं सोचता हूँ कि उनमें बदलाव होता रहेगा। घोड़े, गायें, भेड़ें, कीड़े सब बदल जायेंगे। प्राणियों का विकास वनस्पतियों से हुआ है, वे समुद्री शैवालों से विकसित हुए हैं। चाङ ताई-येन यह सब जानता था। जिस किताब में वह काङ यु-वेइ से क्रान्ति के बारे में बहस करता है, उसमें उसने इन सिद्धान्तों को स्पष्ट किया है।[24] मूल रूप में पृथ्वी मृत थी, न कोई वनस्पतियाँ थीं, न पानी, न हवा। मुझे पता नहीं कितने करोड़ वर्ष बाद जाकर पानी बना( हाइड्रोजन और ऑक्सीजन तुरन्त किसी पुराने तरीके से पानी में तब्दील नहीं हो गयी।

पानी का भी अपना इतिहास है। इससे भी पहले, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन भी मौजूद नहीं थे। हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के पैदा होने के बाद ही यह सम्भावना बनी कि इन दो तत्वों के मिलने से पानी बनेगा।

हमे प्राकृतिक विज्ञानों के इतिहास का अध्ययन करना चाहिए, इस विषय की अनदेखी करने से काम नहीं चलेगा। हमें कुछ किताबें ज़रूर पढ़नी चाहिए। हमारे वर्तमान संघर्षों की ज़रूरतों के कारण पढ़ने और निरुद्देश्य पढ़ने के बीच बहुत अन्तर है। फू यिङ [25] कहता है कि हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के लाखों बार साथ आने के बाद कहीं पानी बनता है( यह दो चीज़ों के मिलकर एक बन जाने का सीधा मामला नहीं है। वह इस बारे में ठीक ही कहता है। मैं उससे मिलना और बात करना चाहता हूँ। (लू पिङ [26] से) आप लोगों को फू यिङ की हरेक बात का विरोध नहीं करना चाहिए।

टिप्पणियाँ

1 यानी, 1) मार्क्सवादी दर्शन, अर्थात द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद और ऐतिहासिक भौतिकवाद, जो प्रकृति, मानव समाज और मनुष्य के विचारों में मौजूद अन्तरविरोधों के विकास के सामान्य सिद्धान्त से सम्बिन्धत ही( 2) मार्क्सवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र जो समाज की अर्थव्यवस्था के विकास को नियन्त्रित करने वाले नियमों की व्याख्या करता है और इस बात का पर्दाफ़ाश करता है कि पूँजीपति वर्ग किस तरह मेहनतकश वर्ग का शोषण करता है (अतिरिक्त मूल्य का सिद्धान्त)( और 3) वैज्ञानिक समाजवाद जो यह दिखाता है कि पूँजीवादी समाज का विकास समाज की एक उच्चतर मंजिल में होना ही है और सर्वहारा पूँजीवादी व्यवस्था की कब्र खोदता है। (ब्योरे के लिए देखें लेनिन की मार्क्सवाद के तीन स्रोत और तीन संघटक अंग।)

2 पीकिङ विश्वविद्यालय को, जो 1919 के 4 मई आन्दोलन की शुरुआत करने वाले पुराने पीकिङ विश्वविद्यालय और अमेरिकी आर्थिक सहायता से चलने वाले येनचिङ विश्वविद्यालय को मिलाकर बना है, 1949 के बाद से चीन में सामान्य बौद्धिक श्रेष्ठता के लिए सबसे उँचा दर्ज़ा हासिल है। पीकिङ में ही स्थित जन विश्वविद्यालय ख़ास तौर पर मज़दूर-किसान पृष्ठभूमि के विद्यार्थियों के लिए अधिक सुगम पाठ्यक्रम उपलब्ध कराने के लिए स्थापित किया गया था।

3 कनफ़्यूशियस की क्लासिकी कृतियों में `चार पुस्तकें´ आरम्भिक विद्यार्थियों द्वारा पढ़ी जाने वाली मुख्य सामग्री थी, पाँच क्लासिकी कृतियाँ इसका कुछ बड़ा रूप था।

4 माओ त्से-तुङ ने अपने विविध शैक्षिक अनुभवों में, 1912-13 की सर्दियों में हुनान प्रान्तीय पुस्तकालय में पढ़ाई करते हुए गुज़ारे गये छह माह के समय को सबसे मूल्यवान अनुभवों में से एक माना है।

5 पहला वाक्य `माध्य का सिद्धान्त´ से है, दूसरा है `मेन्शियस´, ग्रन्थ चार से।

6 यह उद्धरण कनफ़्यूशियस की कृति `एनालेक्ट्स´ से लिया गया है। `एनालेक्ट्स´ में उस घटना का उल्लेख है जिसमें कुआङ के लोगों ने कनफ़्यूशियस को बन्दी बना लिया था और उसे मार डालना चाहते थे।

7 माओ का तर्क यह लगता है कि चाहे कनफ़्यूशियस वहाँ गया हो या नहीं, चिन (आज के शेन्सी में स्थित पहली सहस्त्राब्दी ईसापूर्व का एक राज्य, जिसके शासक ने बाद में पूरे चीन को जीत लिया और 221 ई.पू. में चिन वंश की नींव डाली), वह चिन के विरुद्ध नहीं था क्योंकि उसने उस क्षेत्र की दो कविताओं को `बुक ऑफ़ ओड्स´ में शामिल किया है, जिनमें से दो को माओ ने उद्धृत किया है।

8 सू-मा चिएन (145-90 ई.पू.) चीन का पहला महान इतिहासकार था, जिसने चीन के आरिम्भक दिनों से लेकर अपने समय तक चीन का इतिहास बताने वाले शिह-चि (ऐतिहासिक अभिलेख) को संकलित किया था।

9 उपरोक्त कविता और दो पूर्वोलिखित कविताओं के शीर्षक `गीतिकाव्यों की पुस्तक´ के लेग्ग्स के संस्करण से लिये गये हैं।

10 चीनी आलोचकों ने पारम्परिक तौर पर प्रेम कविताओं की व्याख्या अधिकारी और उसके राजा के सम्बन्धों के रूपक के रूप में की है( चू सि (नीचे टिप्पणी 42 देखें) का मानना था कि उन्हें अभिधा में लिया जाना चाहिए। माओ सहजबुद्धि की दृष्टि से यह विचार प्रस्तुत करते हैं कि कभी उनका शाब्दिक अर्थ लिया लाना चाहिए और कभी नहीं।

11 वेई चुआङ (858-910) उत्तरवर्ती ताङ तथा आरिम्भक पाँच राजवंशों (907 से शुरू) काल का एक प्रमुख कवि था। माओ का तर्क है कि `गीतिकाव्यों की पुस्तक´ तथा समस्त क्लासिकी काव्य पर व्याख्या के एक ही सिद्धान्त लागू किये जाने चाहिए।

12 “Four Clean Ups“ और “Five antis” के लिए देखें संकलित रचनाएँ, खण्ड पाँच।

13 `चीन जनवादी लीग´ का पत्र कुआंग- मिङ जिह-पाओ अप्रैल 1957 में, जब `फूल खिलना और विचारों का टकराव´ ज़ोर-शोर से जारी था, पार्टी की आलोचना करने में सबसे आगे था। शंघाई से प्रकाशित वेन-हुई पाओ एक गैर-पार्टी पत्र था जिसकी माओ ने 1957 में बुर्जुआ प्रवृत्तियों के लिए आलोचना की थी। नवम्बर 1965 में, उसने सांस्कृतिक क्रान्ति की शुरुआत करने के माध्यम का काम किया।

14 चाउ कू-चेङ चीनी और विश्व इतिहास पर अनेक कृतियों के लेखक थे। 1950 के बाद से, वह शंघाई में फुतान विश्वविद्यालय में प्रोफेसर थे। 1962 में, उन्होंने इतिहास और कला पर एक लेख प्रकाशित किया था, जिसमें उन्होंने `ज़ाइटजीस्ट´ पर विचार व्यक्त किये थे जिन्हें य सिएन-चेन के दार्शनिक सिद्धान्तों की सौन्दर्यशास्त्र के दायरे में अभिव्यक्ति माना गया (देखें नीचे, टिप्पणी 19)।

15 सुन येह-फाङ इस समय विज्ञान अकादेमी के अर्थशास्त्र संस्थान के निदेशक थे( 1966 में उन्हें बर्खास्त कर दिया गया। जैसा कि काङ शेङ की टिप्पणी से पता चलता है, उन्होंने समाजवादी अर्थव्यवस्था में मुनाफे के उद्देश्य की भूमिका के बारे में कुछ सोवियत और पूर्वी यूरोपीय अर्थशास्त्रियों के विचारों को अपना लिया था जिनके साथ उसका पेशेवर सम्पर्क था।

16 1955 की गर्मियों में, 31 जुलाई के माओ के भाषण द्वारा कृषि उत्पादकों के कोआपरेटिवों के गठन को नया संवेग प्रदान करने के ठीक पहले, पार्टी के ग्रामीण कार्य विभाग ने (ल्यू शाओ-चि के उकसाने पर) अनेक कोआपरेटिवों को यह कहकर भंग कर दिया कि इन्हें जल्दबाज़ी में और समय से पहले गठित किया गया था।

17 तेङ त्ज़ू-हुई (1895-1972) 1952 से ग्रामीण कार्य विभाग का प्रमुख रहा था, हालांकि 1955 में कोआपरेटिवों को `भंग करने´ या `बुरी कोआपरेटिवों की छंटाई करने´ की ज़िम्मेदारी में उसकी हिस्सेदारी के कारण 1950 के दशक के उत्तरार्द्ध से उसका प्रभाव कम हो गया था। लेकिन ऐसा लगता है कि इसके बावजूद 1960 के दशक के आरम्भ में माओ के विचारों के विरोध में अपने विचार ज़ोर-शोर से व्यक्त करने लायक हैसियत उसकी बनी हुई थी। यह वही वक्त था जबकि माओ द्वारा यहाँ बतायी गयी नीतियाँ पार्टी के भीतर विवाद का विषय थीं। (अधिक ब्योरे के लिए देखें `संकलित रचनाएँ´ के खण्ड पाँच का पृ. 224-225, अंग्रेज़ी संस्करण।)

18 एक दक्षिणपन्थी अवसरवादी दृष्टिकोण जिसकी वकालत ल्यू शाओ-ची और दूसरे करते थे। इस सम्बन्ध में देखें, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की केन्द्रीय कमेटी के पोलित बयूरो की बैठक में माओ त्से-तुङ का भाषण “आम दिशा से विपथगमन करने वाले दक्षिणपन्थी विचलनवादी विचारों का विरोध करो,” संकलित रचनाएँ, खण्ड पाँच।

19 `दो मिलकर एक हो जाते हैं´ का विचार सबसे पहले 1960 के दशक में याङ सिएन-चेन (1899-) ने पेश किया था, जो 1955 से, उच्चतर पार्टी स्कूल का अध्यक्ष रहा था। जुलाई 1964 से इस सूत्रीकरण पर प्रेस में इस आधार पर तीखा हमला बोला गया कि यह संघर्ष और अन्तरविरोध के महत्व को कम कर देता है और माओ के इस दृष्टिकोण के विपरीत है कि `एक दो में बँट जाता है,´ यानी संघर्ष, खासकर वर्ग संघर्ष निरन्तर बार-बार उभरता रहता है, तब भी जबकि विशिष्ट अन्तरविरोध हल हो गये हों। स्टेनोग्राफ़र के नोट में उल्लिखित `एक लेख की रूपरेखा´ सम्भवत: याङ पर होने वाले किसी हमले का सारांश था जिसे पूर्वस्वीकृति के लिए अध्यक्ष को दिया गया था।

20 अक्टूबर 1936 में शुरू हुई मैड्रिड की रक्षा दो वर्ष पाँच महीने तक चलती रही। 1936 में, फ़ासिस्ट जर्मनी और इटली ने स्पेनी फ़ासिस्ट युद्ध सरदार फ्रांको का इस्तेमाल करके स्पेन के विरुद्ध हमलावर युद्ध छेड़ दिया। पॉपुलर फ्रण्ट सरकार के नेतृत्व में, स्पेन के लोगों ने बहादुराना ढंग से हमले के खिलाफ जनवाद की हिफ़ाजत की। स्पेन की राजधानी मैड्रिड की लड़ाई पूरे युद्ध में सबसे तीखी लड़ाई थी। मार्च 1939 में मैड्रिड दुश्मन के हाथों में चला गया कयोंकि ब्रिटेन, फ्रांस और अन्य साम्राज्यवादी देशों ने “अ-हस्तक्षेप´´ की अपनी पाखण्डी नीति के द्वारा हमलावरों की मदद की और पॉपुलर फ्रण्ट के भीतर मतभेद उभर आये। इस आलोचना का मुद्दा ज़ाहिरा तौर पर यह नहीं है कि स्पेन के रिपब्लिकन आखिरी सांस तक लड़ते रहे, बल्कि यह है कि वे इस बात को समझ नहीं सके कि कुछ मज़बूत क्षेत्रीय बिन्दु अपने आप में निर्णायक नहीं हो सकते।

21 कृपया देखें “हमारी पार्टी के इतिहास में कुछ प्रश्नों के बारे में प्रस्ताव,´´ 20 अप्रैल 1945 को स्वीकृत। संकलित रचनाएँ, खण्ड 3

22 माओ ने इस संस्थान में अपना काम 1925 में शुरू किया था, लेकिन 1926 में ही उन्होंने प्रिंसिपल के तौर पर काम किया और अपना मुख्य योगदान किया।

23 यह उद्धरण मेन्शियस, ग्रन्थ 4, भाग ए, अध्याय 15 से है।

24 सम्भवत: यहाँ 1903 में प्रकाशित चाङ पिंग-लिन के प्रसिद्ध लेख `काङ यु-वेई के क्रान्ति के नाम पत्र का खण्डन´ का उल्लेख है। इस लेख में चाङ ने न केवल क्रान्ति बनाम क्रमिक सुधार के मुद्दे पर बल्कि चीनी और माँचू लोगों के बीच नस्ली भिन्नता के महत्त्व को लेकर भी काङ पर तीखा हमला किया जिसे काङ कम करके पेश करते थे। चाङ का तर्क था कि मांचू लोग एक परायी और पतनशील नस्ल के हैं जोकि चीन पर शासन करने के लिए कत्तई अनुपयुक्त हैं। इसी सन्दर्भ में उन्होंने क्रमिक विकास की चर्चा की, और यह बताया कि मौजूदा नस्ली अन्तर इतिहासजन्य हैं।

25 फू यिंग कोई चीनी वैज्ञानिक लगते हैं जोकि 1964 में जीवित थे क्योंकि माओ उनसे मिलने की बात करते हैं।

26 लू पिंग (1910-) उस समय पीकिङ विश्वविद्यालय के अध्यक्ष थे( जून 1966 में उन्हें पद से हटा दिया गया और उनके विरुद्ध संघर्ष चलाया गया।

दर्शन के प्रश्नों पर-2

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