‘कम्युनिस्ट घोषणापत्र’ पर डेविड रियाज़ानोव की व्याख्यात्मक टिप्पणियां-12

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शहर और गाँव के बीच दरार

जर्मनी में पहले विशाल पैमाने के श्रम विभाजन, शहर से गाँव के अलगाव को स्थापित होने में तीन शताब्दियों का वक्त लगा. केवल इस पहलू के लिहाज़ से जिस तरह शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के सम्बन्धों में परिवर्तन हो गया था, ठीक उसी प्रकार सारे समाज में परिवर्तन हो गया था. आइए हम श्रम विभाजन के इस एक ही पहलू पर गौर करते हैं और प्राचीन दास-स्वामी वाले गणतंत्रों और ईसाई सामंतवाद के विरोध पर ध्यान देते हैं या फिर उपाधिकारी भूपतियों के पुराने इंग्लैंड और कपास स्वामियों के आधुनिक इंग्लैंड के विरोध पर ध्यान देते हैं. चौदहवीं और पंद्रहवीं शताब्दी में जब औपनिवेशिक अधिकार क्षेत्र स्थापित नहीं हुए थे, जब यूरोपियनों के लिए अमेरिका अस्तित्व ही नहीं था और एशिया के व्यापर कुस्तुनतुनिया के रास्ते से होता था, जब भूमध्य सागर व्यापारिक गतिविधियों का केंद्र था-उन दिनों (समाज में) श्रम विभाजन सत्रहवीं शताब्दी के श्रम विभाजन से बिलकुल भिन्न था जब स्पेन, पुर्तगाल, हॉलैंड, इंग्लैंड और फ्रांस धरती के हर कोने पर औपनिवेशिक अधिकार-क्षेत्र स्थापित कर रहे थे (मार्क्स, द पावर्टी ऑफ फिलासफ़ी, पृ. 101). पूंजी में मार्क्स इस विषय का फिर उल्लेख करते हैं और जोड़ते हैं : “प्रत्येक श्रम विभाजन का आधार जो अच्छी तरह विकसित हो चुका है और जो मालों के विनिमय के कारण अस्तित्व में आया है, शहर और देहात का अलगाव होता है. यह कहा जा सकता है कि समाज के पूरे आर्थिक इतिहास का सारांश शहर और देहात के बीच इस अलगाव में निहित है.” (मार्क्स, कैपिटल, खंड 1 371-2)

विशाल पैमाने के उद्योग ने कृषि के पुराने जमाने के तौर-तरीकों पर निर्णायक प्रहार किया. इसने किसान के ग्रामीण जीवन की निर्जीव कर देने वाली स्थितियों का उन्मूलन कर दिया. “कृषि के क्षेत्र में आधुनिक उद्योग का सर्वाधिक क्रांतिकारी प्रभाव यह है कि यह पुराने समाज के आधार स्तम्भ – किसान – को नष्ट कर देता है और उसके स्थान पर उज़रत लेकर काम करने वाले मजदूर को स्थापित कर देता है. इस प्रकार सामाजिक परिवर्तनों की आवश्यकता और वर्ग विरोध गांवों में भी शहर के स्तर तक पहुँच गए हैं…उत्पादन की पूंजीवादी पद्धति ने कृषि और मैन्युफैक्चर के बीच एकता के पुराने बंधन को, जिसने उनमें तब एकता कायम कर रखी थी जब दोनों अपनी शैशव अवस्था में थे, एकदम तोड़कर फैंक दिया है.”(मार्क्स, कैपिटल, खंड 1, 546 )

नीचे दिए गए आंकडों से यह नतीजा निकलता है कि उन्नीसवीं शताब्दी की आरम्भिक दशाब्दियों में गाँव की आबादी के बहिर्गमन से शहरी आबादी में बहुत तेज वृद्धि हुई. 1800 में लन्दन की आबादी 9,59,000 थी जो बढ़कर 1850 में 2,363,000 हो गयी. 1800 से 1850 के बीच पेरिस की आबादी 547,000 से बढ़कर 1,053,000 हो गयी. इसी अवधि में न्यूयार्क की आबादी 64,000 से बढ़कर 612,000 हो गयी. मैनचेस्टर, बर्मिंघम, शैफील्ड और ब्रेडफोर्ड जैसे नए औद्योगिक केन्द्रों में आबादी में वृद्धि और ज्यादा तेज़ थी. लेकिन इस शताब्दी के दूसरे अर्धांश के दौरान शहरी आबादी में वृद्धि के सामने यह कुछ भी नहीं थी.

1850

1900

वियना

444,000

1,675,000

सैंट पीटर्सबर्ग

485,000

1,333,000

बर्लिन

419,000

1,889,000

म्यूनिख

110,000

500,000

एसेन

9,000

119,000

लीपज़िग

63,000

456,000

शिकागो

30,000

1,699,000

न्यूयार्क शहर

612,000

3,437,000

1851 में ही इंग्लैंड और वेल्स की शहरी आबादी 8,991,000 तक पहुच गयी थी जोकि पूरे देश की आबादी का 50 प्रतिशत थी. 1901 तक यह आबादी बढ़कर 28,169,000 या सम्पूर्ण आबादी का 88 प्रतिशत हो गयी थी. इंग्लैंड और वेल्स की आबादी में वृद्धि की रफ्तार को नीचे दिए गए आंकडों से देखा जा सकता है :

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वर्ष                  आबादी

1690                          5,000,000

1801                          9,000,000

1851                        17,900,000

1901                        32,500,000

————————————————

इंग्लैंड और वेल्स में जनसंख्या घनत्व 1800 में लगभग 146 प्रति वर्ग मील, 1840 में 265 प्रति वर्ग मील और 1901 में 540 प्रति वर्ग मील था.

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