मार्क्स-एंगेल्स द्वारा लिखित ‘कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र’ पर डेविड रियाज़ानोव की व्याख्यात्मक टिप्पणियां/बुर्जुआ और सर्वहारा-11. पूंजीवादी व्यवस्था के अंतर्गत संचार के साधनों और परिवहन का विकास

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11. पूंजीवादी व्यवस्था के अंतर्गत संचार के साधनों और परिवहन का विकास

“उद्योग और कृषि की उत्पादन प्रणालियों में क्रांति ने उत्पादन की सामाजिक प्रक्रिया की सामान्य परिस्थितियों में – अर्थात संचार और परिवहन के साधनों में – भी एक क्रांति को आवश्यक बना दिया. फूरिये के शब्दों में जिस समाज की एक धुरी सहायक घरेलू उद्योगों सहित छोटे पैमाने की खेती और दूसरी धुरी शहरी दस्तकारी थी उस समाज में संचार और परिवहन के जो साधन थे वे मैन्युफैक्चर के काल की उत्पादन आवश्यकताओं के लिए जिसमें सामाजिक श्रम का विस्तृत विभाजन, उत्पादन के औजारों और मजदूरों का संकेन्द्रण हो गया था और जिसके लिए उपनिवेशों में मंडियां तैयार थीं, इतने अधिक अपर्याप्त थे कि संचार और परिवहन के क्षेत्र में मूल परिवर्तन होना ही था और वास्तव में यह हुआ भी. इसी प्रकार मैन्युफैक्चर के काल से आधुनिक उद्योग को संचार और परिवहन के जो साधन मिले, वे इस नए ढंग के उद्योग के लिए जिसमें तूफानी गति से उत्पादन होता है, जिसका विस्तार बहुत व्यापक होता है, जो पूँजी और श्रम को उत्पादन के एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में लगातार स्थानांतरित करता रहता हो और जिसके पूरे विश्व की मंडियों में नवोत्पादित सम्बन्ध स्थापित हो चुके हों, शीघ्र ही असहनीय बाधा बन गए. इसलिए पालों वाले जलपोतों की बनवाट में मूलभूत परिवर्तनों के अलावा नदियों में चलने वाले स्टीमरों, रेलों, सागरगामी वाष्प जलपोतों और तार की एक पूरी प्रणाली से संचार और परिवहन के साधन विशाल पैमाने के उद्योग की उत्पादन पद्धतियों के धीरे-धीरे अनुकूल बनते चले गये.” (मार्क्स, कैपिटल, 1, अंग्रेजी, 406-407)

अठारहवीं शताब्दी के दूसरे अर्धांश में जलयानों को इंग्लैंड से भारत जाने और वापस आने की समुद्री यात्रा में अठारह से बीस महीने का वक्त लगता था. इन जलयानों का औसत भार 3०० से 500 टन हुआ करता था. अठाहरवीं शताब्दी के अंत में इस जहाज़रानी बेड़े की कुल भार-क्षमता 1,725,000 टन से अधिक नहीं थी. पहले चप्पुओं से और फिर पेंच या पेंचों से आगे बढ़ने वाले वाष्प-जलपोतों के आविष्कार के साथ समुद्री परिवहन के भार और गति दोनों में ज़बरदस्त वृद्धि हुई. आजकल मालवाहक जहाज़ों का औसत भार दस से बारह हज़ार टन होता है और यात्री जहाज़ जिनकी औसत भार-क्षमता चालीस से पचास हज़ार टन होती है, बीस नॉट प्रति घंटा या उससे ज़्यादा रफ्तार से चलते हैं. नार्वे के सांख्यिकीविदों के अनुसार 1821 में सारे समुद्री बेड़े की भारवहन क्षमता 5,250,000 टन थी जिसमें वाष्प चालित जहाज़ 0.02 प्रतिशत से अधिक नहीं थे. 1914 में यह भार क्षमता 31,500,000 टन हो गयी जिसमें मुख्यता वाष्प जलपोत थे. जहाँ तक रेल मार्गों का सम्बन्ध  है, 1840 में पूरे विश्व में इसकी लम्बाई 4800 मील, 1850 में 21,600 मील, 1870 में 136,000 मील और 1913 में इसकी लम्बाई 690,000 मील थी. मालगाडी की औसत चाल 20 से 25 मील प्रति घंटा और यात्री गाड़ी की औसत चाल 35 मील प्रति घंटा थी. 1812 में बर्लिन से वियना तक की यात्रा में पांच दिन का समय लगता था 1912 में यह समय घट कर बारह घंटा हो गया. 1812 में बर्लिन से पेरिस तक की यात्रा नौ दिन की थी और 1912 में केवल सत्रह घंटों की ज़रुरत रह गयी थी. 1812 में हैम्बर्ग से न्यूयार्क की यात्रा में लगने वाले अड़तालीस दिनों की बजाय 1912 में सात दिनों से ज़्यादा की ज़रुरत नहीं रह गयी थी. 1840 के बाद से, रोलेंड हिल (1795-1879) द्वारा प्रस्तुत किये गये सुधारों के बाद, डाक सेवा विशाल पैमाने के उद्योग की मांगों के अनुरूप गठित कर ली गयी थी. उन्नीसवीं सदी के अंत तक डाक सेवा लगभग पूरी पृथ्वी पर चालू हो गयी थी जिससे उत्तर में स्पिटबर्गेन से लेकर दक्षिण में टियरा डे फ्यूगो पर पुटा एरिनाज़ तक पत्रों आदि का नियमित वितरण होने लगा. पोस्टल यूनियन की स्थापना ने सम्पूर्ण पृथ्वी को ‘एक डाक क्षेत्र’ में बदल दिया है.

पहला संकेत यंत्र जो क्लॉद शेप (1753-1850) द्वारा आविष्कृत प्रकाशीय तार यंत्र था, को 1792 में लेजिस्लेटिव असेम्बली ने स्वीकार कर लिया था और राजतन्त्रवादी गठबंधन के विरुद्ध संघर्ष में क्रांति की सेना के लिए यह यंत्र बहुत उपयोगी साबित हुआ. आजकल सर्वाधिक सुपरिचित संकेत यंत्र वह है जो रेलवे सिग्नल की ब्लाक प्रणाली में प्रयोग किया जाता है. विद्युत तारयंत्र के आविष्कार हो जाने के पहले तक, लम्बी दूरी तक तीव्र गति से सन्देश भेजने के लिए संकेत यंत्रों से प्रसारण का उपयोग किया जाता था. 1830 के दशक के दौरान एक विद्युत तार यंत्र बनाया गया और अमेरिकावासी मोर्स (1791-1872) ने अभिलेखन पद्धति का अविष्कार किया जो आज तक उसके नाम से जाना जाता है. 1844 से ही विश्व बाज़ार की आवश्यकताओं की पूर्ती के लिए और इसके विकास की गतिविधियों से कदम मिलाकर चलने के लिए इलेक्ट्रो-टेलीग्राफ का उपयोग सारे संसार में किया जा रहा है. टेलीग्रामों के ज़रिए ही वाणिज्य जगत के दामों में तेजी से होने वाले उतार-चढाव की जानकारी दी जा सकती थी. 1865 में जब पहला समुद्री तार बिछाया गया तब से सारे संसार में तार-यंत्रों की सहायता से संपर्क स्थापित हो गया. टेलीग्राफ प्रणाली की सहायता से राजधानी और उपनिवेशों के बीच, केंद्र में स्थित व्यापारिक उद्यम और उसकी दूरस्थ शाखाओं के बीच निकटम सम्बन्ध कायम कर दिया गया है.उन्नीसवीं शताब्दी के अंत तक पचास लाख मील लम्बी टेलीग्राफ संचार-प्रणाली निर्मित कर दी गयी थी. अठारह सौ सत्तर के दशक में टेलीफोन का प्रयोग आरंभ किया गया था और तब से इसका इतना अधिक विकास हो गया है कि एक देश के किसी शहर या गाँव में बैठे किसी मित्र से ही नहीं, बल्कि देश की सीमाओं के बाहर बैठे मित्र से भी बातचीत की जा सकती है. यह गणना की गयी है कि टेलीफोन और टेलीग्राफ के तार लगभग चालीस लाख मील में फैले हुए हैं और इनकी लम्बाई से पूरी पृथ्वी को 1600 बार लपेटा जा सकता है. बेतार टेलीग्राफ और टेलीफोन के आविष्कार ने संचार के साधनों के इतिहास में एक नए युग की शुरुआत कर दी है.

अंग्रेज़ व्यापारियों ने अपने सामानों, विशेषतया सूती सामानों की कीमत घटाकर ईस्ट इंडीज़ के उद्योग को बरबाद का दिया. समृद्धि के लिए वे केवल आर्थिक स्त्रोतों से संतुष्ट नहीं हुए बल्कि उन्होंने बिना किसी नैतिक हिचक के राजनितिक तौर-तरीकों का भी सहारा लिया. इस प्रकार उन्होंने बल प्रयोग से चीनियों को अफीम का आयात करने के लिए विवश कर दिया. इस मामले में अंग्रेजी नौसेना की जगह पर संयुक्त राज्य की नौसेना ने काम किया. 1854 के पैरी समझौता, 1875 का हैरिस समझौता और 1858 की येदो संधि द्वारा जापानियों को अपने कुछ बंदरगाह पश्चिमी व्यापार के लिए खोलने के लिए मजबूर कर दिया गया.

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One thought on “मार्क्स-एंगेल्स द्वारा लिखित ‘कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र’ पर डेविड रियाज़ानोव की व्याख्यात्मक टिप्पणियां/बुर्जुआ और सर्वहारा-11. पूंजीवादी व्यवस्था के अंतर्गत संचार के साधनों और परिवहन का विकास

    Kapil said:
    April 22, 2009 at 7:39 PM

    बेहद उपयोगी सामग्री दे रहे हैं। पोस्‍ट का शीर्षक छोटा करने का प्रयास करें।

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