मार्क्स-एंगेल्स द्वारा लिखित ‘कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र’ पर डेविड रियाज़ानोव की व्याख्यात्मक टिप्पणियां/बुर्जुआ और सर्वहारा-10. विश्व बाज़ार का मात्रात्मक और गुणात्मक विकास

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10. विश्व बाज़ार का मात्रात्मक और गुणात्मक विकास

“मशीनों के आविष्कार के पहले प्रत्येक देश की औद्योगिक गतिविधि मुख्यतया देशज भूमि में पैदा होने वाले कच्चे सामान के उत्पादन को लगातार विकसित करते जाने में निहित थी. इस प्रकार ग्रेट ब्रिटेन देशी भेड़ों के ऊन से कपड़ा बनाता था, जर्मनी पटसन को लिनेन में परिवर्तित करता था, फ्रांस रेशम और पटसन पैदा करता था और इनसे तैयार माल बना लेता था, ईस्ट इंडीज़ और लेवांत कपास उगाते थे और इससे सूती सामान बनाते थे,आदि-आदि. वाष्प-चालित मशीन के उपयोग से श्रम विभाजन में इतना अधिक विस्तार हो गया कि विशाल पैमाने के उद्योग देशज भूमि से उखड़ते गए और विश्व बाज़ार, अंतरराष्ट्रीय विनिमय और अंतरराष्ट्रीय श्रम पर पूर्णतया निर्भर हो गए.” (मार्क्स, द पावर्टी ऑफ़ फिलासफी, पृ 110)

यदि यूरोपीय उद्योग को कपास,जूट, पेट्रोलियम और रबर उपलब्ध न होता तो इसकी नियति इसे विनाश की ओर ले जाती. इटली का इन्जीनियरिंग और ऑटोमोबाइल उद्योग कोयला और धातु के निर्यात पर पूर्णतया निर्भर है. मध्ययुगीन व्यापर के सर्वाधिक समृद्धिशाली काल में एक साल में सेंट गोथार्ड दर्रे से गुजरने वाले सारे सामान को अब आसानी से कुछ अदद साधारण मालगाडियों में भरा जा सकता था. अंतरराष्ट्रीय व्यापार के विकास का स्तर निम्न आंकडों से स्पष्ट हो जाता है. 1800 में मालों के अंतरराष्ट्रीय कारोबार की कीमत 6,050,000,000,मार्क आंकी गयी थी, ( 1 मार्क = 8 औंस चांदी); पर था; 1840 में इसकी कीमत 11,500,000,000 तक पहुच गयी और और 1850 में इसका आकलन 16,650,000,000 किया गया था. बीसवीं सदी के आरंभ में अंतरराष्ट्रीय कारोबार 1850 की तुलना में पांच गुना बढ़ गया था और 88,500,000,000 मार्क तक पहुँच गया था जो 1912 तक छलांग लगाकर 169,000,000,000 मार्क तक पहुँच गया था. विश्व बाज़ार में पहुँचने वाले सामानों कि विविधता में दस गुना वृद्धि हो गयी थी. अठारवीं शताब्दी के अंत तक कुछ ‘कुलीन’ सामान उच्च वर्गों द्वारा वांछित माल बाज़ार में आये जिनकी मात्रा बढती गयी. बाल्टिक सागर और यूरोप के उत्तर-पश्चिमी सागर तट के बीच अनाज और इमारती लकड़ी का समुद्री व्यापार तेजी से होता था. 1790 में अंतरराष्ट्रीय व्यापार के बड़े केंद्र, लन्दन में जलपोतों में भरकर 580,000 टन माल बन्दरगाह पर आया था. एक सौ साल बाद यह आंकडा बढ़कर 7,709,000 टन हो गया. सूती वस्त्र उद्योग के विकास से उत्तरी अमेरिका के दक्षिणी राज्यों में कच्चे कपास उगाने की मांग में बढोत्तरी ज़्यादा से ज़्यादा होती चली गयी. 1790 में 2,000,000 पाउंड वजन की फसल हुई. 1820 में यह आंकडा बढ़कर 180,000,000 पाउंड हो गया था. इससे इंग्लैंड में कच्चे कपास के आयात में भारी वृद्धि हुई. 1751 में आयात की मात्रा 5,000,000 पाउंड थी, 1920 तक यह बढ़कर 142,000,000 पाउंड पहुँच गयी.

उन्नीसवीं शताब्दी के दौरान विश्व बाज़ार में आने वाले माल की संरचना में समग्र परिवर्तन हो गया. उत्तरी अमेरिका से गेहूं, कपास, पेट्रोलियम और ताम्बा, दक्षिणी अमेरिका से कॉफी, ग्वानों, चिली का शोरा, गोश्त; एशिया से गेहूं, जूट, कपास, चावल और चाय; आस्ट्रेलिया से गेहूं, गोश्त और ऊन- यह सब विविध सामान हजारों वाष्प-चालित जहाजों में समुद्री रास्ते से आते हैं और विश्व बाज़ार को मालों से पाट देते हैं.

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