मार्क्स-एंगेल्स द्वारा लिखित ‘कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र’ पर डेविड रियाज़ानोव की व्याख्यात्मक टिप्पणियां/बुर्जुआ और सर्वहारा-8. पूंजीवाद का क्रांतिकारी चरित्र व 9. पुरे विश्व में पूंजीवाद का विस्तार

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8. पूंजीवाद का क्रांतिकारी चरित्र

“जब तक हस्तशिल्प और मैन्युफैक्चर सामाजिक उत्पादन के सामान्य आधार बने रहते हैं तब तक उत्पादक का उत्पादन की केवल एक विशिष्ट शाखा के अधीन रहना और उसके धंधे की विविधता का छिन्न-भिन्न हो जाना आगे के विकास का आवश्यक कदम होता है. इस मूलाधार के सहारे उत्पादन की प्रत्येक विशेष शाखा अनुभव के फलस्वरूप समुचित तकनीकी रूप प्राप्त कर लेती है, उसका क्रमश: परिष्करण करती जाती है और ज्यों ही यह रूप एक निश्चित मात्रा में परिपक्वता हासिल कर लेता है वैसे ही उसका उस रूप में ठोस ढंग से ढलना तीव्रता से हो जाता  है. वाणिज्य के द्वारा प्राप्त नए कच्चे माल के अलावा श्रम के औजारों में होने वाला क्रमिक परिवर्तन ही इसमें थोडा-बहुत फर्क डालता है. एक बार अनुभव से सिद्ध सर्वाधिक उपयोगी रूप जब प्राप्त हो जाता है तब श्रम के औजार का वह रूप मानों पत्थर में ढल जाता है, जो इस ढंग से प्रगट होता है जिससे कि अनेक औजार कई हज़ार वर्षों से एक पीढी से दूसरी पीढी को एक ही रूप में मिलते गए हैं… आधुनिक उद्योग किसी भी उत्पादन प्रक्रिया के वर्तमान रूप को उसका अंतिम रूप नहीं समझता और न ही व्यवहार में उसे ऐसा मानता है. इसलिए इसका तकनीकी आधार क्रांतिकारी है जबकि इसके पहले वाली उत्पादन की तमाम प्रणालियाँ बुनियादी तौर पर रुढिवादी   थीं. मशीनों, रासायनिक प्रक्रियायों तथा अन्य तरीकों की सहायता से आधुनिक उद्योग उत्पादन के तकनीकी आधार के साथ-साथ मजदूरों के काम और श्रम-प्रक्रिया के सामाजिक संयोजन में लगातार परिवर्तन कर रहा है. साथ ही यह उसी निरंतरता से इस समाज में पाए जाने वाले श्रम विभाजनों में परिवर्तन कर देता है तथा पूंजी की मात्रा तथा मजदूरों के समूहों को उत्पादन की एक शाखा से दूसरी शाखा में लगातार स्थानांतरित करता रहता है.” (मार्क्स, कैपिटल खंड 1, 524-526) पूंजीवाद के ऐतिहासिक भूमिका के प्रश्न के उत्तर के लिए देखें, प्लेखानोव (1856-1918) Georgi Plekhanov – Our Differences (हमारे मतभेद, रचनावली, रूसी संस्करण, खंड 1, पृ. 230-237)

9. पूरे विश्व में पूंजीवाद का विस्तार

सोलहवीं शताब्दी के दौरान पूरी दुनिया में बाज़ार के विस्तार ने पूंजीवाद के विकास को संवेग प्रदान किया. लेकिन अठारवीं शताब्दी की औद्योगिक क्रांति के बाद ही बुर्जुआ वर्ग धरती के सारे क्षेत्र पर फैलने में सफल हो सका. पृथ्वी के दूरस्थ स्थानों में प्रवेश करने के लिए बुर्जुआ वर्ग ने धर्म-प्रचारकों और वैज्ञानिकों का इस्तेमाल किया. 1770 से 1848 के बीच अंग्रेजों ने आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, दक्षिण अफ्रीका और सारे हिंदुस्तान पर अधिकार कर लिया था. फ्रांस, जिसे नेपोलियन के युद्धों में अपने अधिकांश औपनिवेशिक क्षेत्रों को अंग्रेजों के हवाले करना पड़ता, ने उत्तरी अफ्रीका के बड़े क्षेत्रों को कब्जे में करके अपने नुकसान की भरपाई कर ली थी.

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