मार्क्स-एंगेल्स द्वारा लिखित ‘कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र’ पर डेविड रियाज़ानोव की व्याख्यात्मक टिप्पणियां/बुर्जुआ और सर्वहारा-7. विनिमय का विकास और नकद भुगतान का प्रभुत्व

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7. विनिमय का विकास और नकद भुगतान का प्रभुत्व

“विनिमय का अपना अलग इतिहास है और यह विकास के विभिन्न मंजिलों से होकर गुजरा है. एक वक्त था, उदाहरण के लिए मध्ययुग में, जब केवल फ़ाजिल चीजों यानि केवल उन चीजों का जो जनता की ज़रूरतों से अधिक उत्पादित होती थीं, का विनिमय किया जाता था. दूसरा वक्त आया जब न केवल उत्पादन का अधिशेष बल्कि उद्योग का सम्पूर्ण उत्पाद वाणिज्य के क्षेत्र में पहुँचने लगा. यह वह वक्त था जब उत्पादन पूर्णतया विनिमय पर निर्भर हो गया था. अंत में वह दिन भी आ गया जब उन चीजों का जिन्हें पहले अहस्तान्तरणीय समझा जाता था, विनिमय और मोल-टोल होने लगा. वास्तव में वे चीजें बेचीं भी जाने लगी. वे चीजें भी जो अभी तक सौंपी जाती थीं, विनिमय नहीं की जाती थीं, दी जाती थीं, बेची नहीं जाती थीं – सतीत्व, प्रेम, अभिमत, विज्ञानं, अंतरात्मा आदि – वाणिज्य के हवाले कर दी गयीं. यह बड़े पैमाने के भ्रष्टाचार और सार्विक धन -लोलुपता का वक्त है या राजनितिक अर्थशास्त्र की भाषा में कहें तो यह एक ऐसा वक्त है जबकि हर चीज़ चाहे भौतिक हो या आत्मिक, बिक्री योग्य माल बन गयी है, उचित मूल्य-निर्धारण हेतु बाज़ार में ले जायी जा रही है.” ((मार्क्स, द पॉवर्टी ऑफ फिलासफी, बीपीएच, कलकत्ता, पृ. 26)

“जब किसी माल में विनिमय-मूल्य को संभाले रखने और जमा करने की सम्भावना उत्पन्न हो जाती है, तब मुद्रा के प्रति लालच का जन्म होता है. मालों का परिचलन बढ़ने के साथ मुद्रा की, अर्थात उस सर्वथा सामाजिक रूप की जिसका हर वक्त इस्तेमाल किया जा सकता है, शक्ति बढती जाती है. १५०३ में जैमाका से लिखे पत्र में कोलंबस बताते हैं : “सोना एक आश्चर्यजनक वस्तु है. जिसके पास पास है वह जो भी चाहे हासिल कर सकता है. सोना आत्माओं के स्वर्ग तक जाने का रास्ता बना सकता है.” मुद्रा चूंकि यह खुलासा नहीं करती है कि कौनसी चीज़ उसमें रूपांतरित हुई है, इसलिए हर चीज़ चाहे वह माल हो या न हो, सोने से बदली जा सकती है. हर चीज़ बिकाऊ बन जाती है और हर चीज़ खरीदी जा सकती है. परिचलन वह विशाल सामाजिक दहनपात्र बन जाता है जिसमें हर चीज़ डाली जाती है और जिसमें से हर चीज़ मुद्रा का रूप धारण करके निकल आती है. यहाँ तक कि संतों की हड्डियाँ तक इस कीमियागिरी के सामने नहीं ठहर पाती हैं. इसमें से ज्यादा नाजुक चीजें, वे पवित्र चीजें जो मनुष्यों के व्यापारिक लेन-देन से बाहर हैं, तो इस कीमियागिरी के सामने और भी कम ठहर पाती हैं. जिस प्रकार मालों के बीच मात्रात्मक भिन्नता का लोप मुद्रा में हो जाता है उसी प्रकार मुद्रा बेरहमी से सबकुछ सपाट कर देने वाला, अपनी ओर से हर तरह के भेदभाव समाप्त कर देती है.” (मार्क्स, कैपिटल, खंड 1, अंग्रेजी संस्करण, 112-13) capital

औद्योगिक क्रांति की पूर्वसंध्या पर ब्रिटेन में विद्यमान काव्यात्मक और पितृसत्तात्मक संबंधो को एंगेल्स ने अपनी कृति इंग्लैंड में मजदूर वर्ग की दशा (द कन्डीशन ऑफ द वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड, लंदन, 1892) में भली-भांति चित्रित किया है. १८४५ में लिखते समय इस पुस्तक में वह उन बुनकरों का चित्र प्रस्तुत करते हैं जो अभी भी भूमि के छोटे टुकड़े पर मालिकाना हक़ रखे हुए थे : “मेहनतकशों के इस वर्ग का नैतिक और बौद्धिक जीवन किस तरह का था , इसका अनुमान लगाने के लिए कल्पना की उड़ान की आवश्यकता नहीं है. वे शहर से कटे रहते थे जहाँ वे कभी नहीं जाते थे (क्योंकि घुमंतू एजेंट उनसे धागा और कपड़ा खरीद लेते थे और बुनकरों को इसके बदले में मजदूरी दे दिया करते थे). यहाँ तक कि साड़ी जिंदगी शहर के पास गुजारने के बावजूद, अपने बुढापे में वे कहा करते थे कि उन्होंने वहां अभी तक कदम नहीं रखा. यह स्थिति तब तक चलती रही जब तक कि मशीन के प्रवेश ने उन्हें आजीविका के साधन से वंचित नहीं कर दिया और उन्हें रोजगार की खोज में शहर जाने को मजबूर नहीं कर दिया. बुनाई के काम से मिली छुट्टी के दौरान वे अपनी छोटी जोत में खेती करते थे जिसकी वजय से उनका बौद्धिक और नैतिक स्तर अपने इलाके के भूधर किसान से मिलता-जुलता था जिससे वे स्वेच्छा से मेल-जोल बढाते और सर्वाधिक आत्मीयता के सम्बन्ध बनाए रखते थे. अपने इलाके के प्रमुख भूस्वामी ज़मींदार को वे सहज ही अपना श्रेष्ठ समझते थे. वे अपने छोटे-मोटे झगड़ों के निपटारे के लिए उससे सलाह लेने जाते और इस पूज्य सम्बन्ध को बनाये रखने के लिए उसे यथोचित सम्मान भी देते थे. वे ‘सम्मानीय लोग’ माने जाते थे जो अच्छे पति और पिता हुआ करते थे. वे सदाचारी जीवन बिताया करते थे क्योंकि उन्हें अनैतिक बना देने वाला कोई प्रलोभन मौजूद नहीं था यदि यह तथ्य ध्यान में रखा जाये कि उन दिनों ग्रामीण क्षेत्रों में शराबखाने और चकले नहीं हुआ करते थे. और चूंकि मेरा मेज़बान जिसके भटियारखाने में वे कभी-कभार अपना गला तर करने जाते थे, उन्हीं की तरह “भला” आदमी, या शायद असामी किसान होता जिसे अपनी अच्छी बियर अपनी अच्छी श्रेणी पर गर्व हुआ करता और जो छुट्टी के दिन या त्यौहार पर अपनी दूकान बंद कर देने की सावधानी बरतता. बच्चे घर पर रखे जाते थे, उन्हें आज्ञापालन की शिक्षा दी जाती थी और उनका लालन-पालन परमेश्वर पर श्रद्धा बनाये रखने वाले माहौल में किया जाता. जब तक नौजवान अविवाहित रहते, यह पितृसत्तात्मक सम्बन्ध उन्हें दृढ़ता से बांधे रखता था. विवाह होने तक बच्चे ग्रामीण सादगी और अपने बाल सखाओं के निकट साहचर्य में रहकर बड़े होते थे. यद्यपि विवाह के पहले स्त्री-पुरुष के बीच अन्तरंग संबंध कायम होना लगभग सामान्य था तो भी इन जोड़ों के बीच यह बात बिलकुल साफ़ हुआ करती थी कि यह वैवाहिक समारोह का पूर्वाभ्यास मात्र है जिसे कालांतर में संपन्न कर दिया जाता था. संक्षेप में,उन दिनों अंग्रेज़ कारीगरों और शिल्पकारों की सक्रीय जिंदगी और सेवा-निवृति का वक्त एकांत में, बौद्धिक गतिविधि और प्रचंड व्याकुलता का उनकी जीवन-शैली में कोई स्थान लिए बिना, बीत जाता था जो आज भी (1845) जर्मनी के कुछ हिस्सों में पाया जाता है. शायद ही कभी उन्हें पढना आता और बिरले ही वे लिखना जानते. वे नियमित रूप से गिरजाघर जाते थे, कभी भी राजनीती पर बात नहीं करते थे, कभी भी कोई सामूहिक षड़यंत्र नहीं रचते थे, गंभीर चिंतन के लिए वक्त नहीं निकालते थे, शारीरिक रंगरेलियों और क्रीडाओं को बहुत पसंद करते थे, बाइबिल के प्रवचन को पारम्परिक श्रद्धा के साथ सुनते थे और अपने से श्रेष्ठों को पूरी नम्रता के साथ नीचे झुककर और श्रद्धापूर्वक सम्मान देते थे. लेकिन बौद्धिक दृष्टिकोण से वे मृत थे, जिंदगी से उनका सरोकार अपने संकीर्ण हितों, अपने करघे और अपने छोटे बगीचे तक सीमित थे और उनकी सीमित दुनिया के पार समग्र मानवता को आलोड़ित करने वाले प्रचंड आन्दोलन की कोई समझ नहीं थी. वे अपने शांत और निष्क्रिय जीवन के आदी हो गये थे. यदि औद्योगिक क्रांति नहीं हुई होती, तो उन्हें उस जिंदगी से निजात नहीं मिलती जो रूमानी किस्म की मोहकता के बावजूद मानवीय अस्तित्व के लायक नहीं थी. सच्चाई यह है कि वे इन्सान नहीं थे बल्कि मात्र मशीन बन गये थे जो उन कुलीनों के एक छोटे से समूह की सेवा कर रही थी जोकि अभी तक इतिहास का आधार रहे थे. (एंगेल्स, द कन्डीशन ऑफ वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड, पृ 2-4) The Condition of the Working Class in England — Frederick Engels

पूंजीवादी समाज का प्रधान घटक, नकद भुगतान, बुर्जुआ की मनोवृत्ति का प्रमुख प्रेरक तत्त्व है. इसलिए इस नारे “मुद्रा को बटुवे में रख लो” का जन्म हुआ. एंगेल्स निम्न पंक्तियों में इसका सजीव चित्र प्रस्तुत करते हैं : “जब तक उसके मजदूर अपने जीते जी उसके लिए प्रचुर धन अर्जित करते रहते है, अंग्रेज़ बुर्जुआ को इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि वे भूख से मर रहे हैं या नहीं. हर चीज़ की कीमत मुद्रा में आंकी जाती है और हर वह चीज़ जो मुद्रा न अर्जित कर पाती हो उसे उपहासास्पद, अव्यवहारिक और विचारधारात्मक मूर्खता समझा जाता है…उसके लिए मजदूर इन्सान न होकर मात्र एक ‘कारीगर’ होता है और मजदूर के सामने भी बुर्जुआ उनकी चर्चा इसी तरह करता है. जैसाकि कार्लाईल कहते हैं कि बुर्जुआ यह मानता है कि “नकद भुगतान एक इन्सान और दूसरे इन्सान के बीच का एक मात्र सम्बन्ध है.” यहाँ तक कि वह बंधन जो पति को पत्नी के साथ बाँधता है, सो में से निन्यानबे मामलों में नकद मुद्रा के रूप में व्यक्त किया जा सकता है. दासत्व की दयनीय स्थिति जो मुद्रा ने बुर्जुआ पर थोपी है, उसने अंग्रेजी भाषा पर भी अपनी छाप छोड़ दी है. यदि आप यह बताना चाहते हैं कि किसी व्यक्ति के पास 10,000 पाउंड हैं तो उसे इस तरह कहा जाता है कि ‘अमुक व्यक्ति की कीमत 10,000 पाउंड है.’ जिसके पास धन होता है वह ‘सम्मानीय समझा जाता है और तदनुसार उसे महत्त्व दिया जाता है : उसकी गणना बेहतर किस्म के लोगों’ में की जाती है और वह ज्यादा असर डालता है. वह जो कुछ भी करता है उसके साथियों के लिए मानक बन जाता है. यह अवांछित मनोवृत्ति सारी भाषा में समां गयी है. सभी सम्बन्धों को व्यापारिक शब्दावली से उधार लिए गए शब्दों में व्यक्त किया जाता है और इसका समाहार आर्थिक श्रेणियों में किया जाता है. आपूर्ति और मांग का सूत्र अंग्रेजों के समग्र जीवन दृष्टिकोण को व्यक्त करता है. इसलिए मानवीय गतिविधि के प्रत्येक क्षेत्र में स्वतन्त्र प्रतिस्पर्द्धा का होना आवश्यक है, इसलिए शासन, चिकित्सा और शिक्षा के क्षेत्र में अवरोधहीनता और अहस्तक्षेप की नीति का पालन आवश्यक है. जल्दी ही अहस्तक्षेप की नीति धर्म के क्षेत्र में प्रवेश कर जायेगी क्योंकि जैसे-जैसे वक्त गुजरता जा रहा है राजकीय चर्च का चुनौतीरहित प्राधिकार ज़्यादा तेज़ी से ध्वस्त होता जा रहा है.” (एंगेल्स, द कन्डीशन ऑफ वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड, पृ 277)

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