लाभकारी मूल्य..लागत मूल्य : एक बहस

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लाभकारी मूल्य, लागत मूल्य, मध्यम किसान और छोटे पैमाने के माल-उत्पादन के बारे में मार्क्सवादी दृष्टिकोण : एक बहस मज़दूर अख़बार `बिगुल´ के पन्नों पर दिसम्बर 2002 से फरवरी 2005 के बीच लागत मूल्य, लाभकारी मूल्य और मँझोले किसानों के प्रति सर्वहारा क्रान्तिकारियों के दृष्टिकोण को लेकर एक महत्त्वपूर्ण बहस चली थी।

बहस में एस. प्रताप की मूल अवस्थिति यह थी कि छोटे और मँझोले किसानों की मुख्य माँग कृषि का लागत मूल्य कम करने की होनी चाहिए और यह कि लाभकारी मूल्य की माँग मुख्यत: बड़े किसानों को ही लाभ पहुँचाती है, लेकिन इसके साथ ही वे (गन्ना किसानों की बात करते हुए अपने पहले लेख में) यह भी कहते हैं कि गन्ने का वाजिब मूल्य पाने के लिए उन्हें मिलों पर लगातार दबाव बनाये रखने की रणनीति अपनानी होगी। सुखदेव, नीरज और `बिगुल´ सम्पादक-मण्डल की अवस्थिति यह है कि न केवल लाभकारी मूल्य की माँग बल्कि लागत मूल्य घटाने की माँग भी वर्ग-चरित्र की दृष्टि से मुनाफे के लिए उत्पादन करने वाले और मज़दूरों की श्रम-शक्ति ख़रीदकर अधिशेष निचोड़ने वाले मालिक किसानों की माँग है। यह माँग सर्वहारा के वर्गहित के खिलाफ़ है। लागत मूल्य घटाने की माँग का मतलब है ग़रीब किसानों और मँझोले किसानों के निचले संस्तर को पूँजीवाद के अन्तर्गत खुशहाली की भ्रान्ति देना, छोटी जोतों को पूँजीवाद के चतुर्दिक हमले से बचाकर सामाजिक विकास की गति को अनुपयोगी रूप से धीमा करना और उजरती मज़दूरों की कीमत पर मालिक किसानों के हितों की हिफ़ाज़त करना। यह माँग न केवल मँझोले बल्कि धनी किसानों को भी लाभ पहुँचायेगी, लेकिन सर्वहारा-अर्द्धसर्वहारा आबादी के हितों के सर्वथा प्रतिकूल होगी। इस पक्ष का कहना है कि लागत मूल्य घटाने की माँग पर नहीं, बल्कि अन्य कुछ माँगों पर सर्वहारा वर्ग को छोटे-मँझोले किसानों को अपने पक्ष में करने की कोशिश करनी होगी। फिर बहस का दायरा विस्तारित होकर इस मुद्दे पर केन्द्रित हो गया है कि मँझोले किसानों के प्रवर्ग को किस प्रकार परिभाषित किया जाये और समाजवादी क्रान्ति की पक्षधर क्रान्तिकारी शक्तियों का उनके प्रति क्या रुख़ होना चाहिए। पूरी बहस के दौरान एस. प्रताप ने कई बार अपनी अवस्थिति में अवसरवादी गोलमाल किया है पर इससे उनकी मूल अवस्थिति पर कोई फ़र्क नहीं पड़ा है। पूरी बहस पढ़कर पाठक स्वयं इसे देखेंगे और सही-ग़लत का फैसला करेंगे।

`बिगुल´ के फरवरी 2005 अंक में सम्पादक-मण्डल ने इस बहस का सम्पादकीय समाहार कर दिया, लेकिन एस. प्रताप इस निर्णय से असन्तुष्ट थे। उनका मानना था कि ग़ैर-जनवादी ढंग से इस बहस को बीच में ही रोक दिया गया। `बिगुल´ सम्पादकों का कहना था कि दोनों पक्षों के सभी तर्क आने के बाद ही बहस का समाहार किया गया था और यह कि `बिगुल´ के पन्नों पर अनन्तकाल तक यह बहस नहीं चल सकती, इसलिए इसे किसी और माध्यम या मंच से आगे चलाया जायेगा। इस निर्णय से असन्तुष्ट एस. प्रताप ने `बिगुल´ को अपनी दो टिप्पणियाँ (क्रमश: जनवरी 2005 और फरवरी 2005 में) भेजीं। उन्हें सन्तुष्ट करने के लिए `बिगुल´ सम्पादक-मण्डल ने ये दोनों टिप्पणियाँ अप्रैल 2005 में सुखदेव को भेज दीं, जिनका उत्तर उन्होंने जून, 2005 में लिखकर भेजा। एस. प्रताप की अन्तिम दो टिप्पणियाँ और सुखदेव का जवाब `बिगुल´ में प्रकाशित नहीं हुए। हमारी योजना थी कि इन्हें शामिल करके पूरी बहस को पुस्तिका के रूप में प्रकाशित कर दिया जायेगा। अब उसी योजना को, कुछ अपरिहार्य कारणों से, किंचित विलम्ब से लागू करते हुए, यह पुस्तिका प्रकाशित की जा रही है।

इस पुस्तिका के प्रकाशन का उद्देश्य एस. प्रताप जैसे लोगों और उनकी वर्ग-अवस्थिति को स्पष्ट करना मात्र ही नहीं है। ऐसे तमाम बड़बोले ‘चिन्तक’ और निठल्ले कलमघसीट बहुत सारा “मौलिक” चिन्तन करते रहते हैं। उन सब पर बहस चलाना ऊर्जा का अपव्यय होगा। इस पूरी बहस को प्रकाशित करने का मूल कारण यह है कि भारत के कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी आन्दोलन में लागत मूल्य, लाभकारी मूल्य और मँझोले किसानों के सवाल पर भारी भ्रान्ति व्याप्त है। ज़्यादातर की अवस्थिति इस मामले में कमोबेश एस. प्रताप जैसी ही है। अपने को मार्क्सवादी कहते हुए भी उनकी मूल अवस्थिति नरोदवादी है। इसलिए इस प्रश्न पर सफाई बेहद ज़रूरी है।

यह बहस इस प्रयोजन को काफ़ी हद तक सिद्ध करेगी, इसका हमें विश्वास है। बहरहाल, हमने दोनों पक्षों को यथावत यहाँ प्रस्तुत कर दिया है और सही-ग़लत का फैसला पाठकों पर छोड़ दिया है।….इस बहस को पूरा पढ़ने के लिए देखें पीडीऍफ़ फाइल ..

लाभकारी मूल्य..लागत मूल्य : एक बहस

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