मार्क्स-एंगेल्स द्वारा लिखित ‘कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र’ पर डेविड रियाज़ानोव की व्याख्यात्मक टिप्पणियां/बुर्जुआ और सर्वहारा-6. बुर्जुआ वर्ग का राजनितिक विकास

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6. बुर्जुआ वर्ग का राजनितिक विकास

यहाँ पर लेखकों का मंतव्य सर्वप्रथम और प्रमुख रूप से फ्रांसीसी बुर्जुआ के राजनितिक विकास पर विचार करना है. अन्यंत्र मार्क्स लिखते हैं : “बुर्जुआ वर्ग के इतिहास को दो चरणों में विभाजित किया जा सकता है. पहले चरण के दौरान सामंती व्यवस्था और निरंकुश राजतन्त्र के अधीन बुर्जुआ वर्ग के रूप में विभेदीकृत होता है. दूसरा चरण तब आता है जब यह वर्ग के रूप में पहले से ही संगठित हो जाता है, सामंती सामाजिक व्यवस्था और राजतन्त्र को उखाड़ फेंकता है और पुरानी व्यवस्था के स्थान पर बुर्जुआ व्यवस्था स्थापित कर लेता है. पहले चरण को दूसरे चरण की अपेक्षा ज्यादा वक्त लगा और अपनी कार्यसिद्धि के लिए अधिक उर्जा व्यय करनी पड़ी”. (मार्क्स, द पॉवर्टी ऑफ फिलासफी, बीपीएच, कलकत्ता, पृ.136-37)  [The Poverty of Philosophy Answer to the Philosophy of Poverty by M. Proudhon]

बाहरवीं और तेरहवीं शताब्दी में, फ्रांसीसी कम्यून सामंती जागीरदारों के खिलाफ संघर्ष में उलझे हुए थे और सामंतों की बीच झगडों का उसने फायदा उठाया. (जिसकी एंगेल्स घोषणापत्र के बाद के संस्करणों की टिपण्णी में बताते हैं कि “कम्यून” नाम इटली और फ्रांस के शहरी समुदायों ने तब अपनाया था जब उन्होंने सामंती स्वामियों से स्व-शासन का अधिकार क्रय कर लिया था.) चौदहवीं शताब्दी के प्रारन्भिक वर्षों में उन्होंने स्टेट्स जनरल के प्रतिनिधित्व की मांग की. इस सभा को पूरे राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करना था. 1356 से 1358 तक पेरिस के व्यापारियों के अध्यक्ष एतियन मार्सेल (मृत्यु 1358) के नेतृत्व में, पेरिस के बुर्जुआ ने स्टेट्स जनरल को वास्तविक प्रातिनिधिक संस्था में बदलने की कोशिश की जिसकी बैठक, राजा के बुलावे की प्रतीक्षा किये बिना निर्धारित अवधि पर की जा सके. निरंकुश सम्राट ने विभिन्न श्रेणियों (पुरोहित वर्ग,कुलीन वर्ग आदि  के बीच मतभेदों का फायदा उठाकर बुर्जुआ पक्ष से समझौता कर लिया. बुर्जुआ वर्ग “थर्ड एस्टेट” (राज्य का तीसरा स्तम्भ), कर-योग्य श्रेणी, केंद्रीकृत राजतान्त्रिक राज्य का एक मान्यता-प्राप्त अंग बन गया जिसने राजकीय तंत्र का उपयोग व्यापारिक और औद्योगिक विकास के हित में करने के लिए अपनी सारी शक्ति केन्द्रित कर दी. इस आन्दोलन के शीर्ष पर वे बुर्जुआ धन्नासेठ थे जिन्होंने उन दरबारी कुलीनों के साथ मिलकर जो समर्थन के लिए इस उभरती ताकत की ओर उन्मुख हो गए थे, राजतंत्रीय शक्ति का उपयोग अपने-अपने उद्देश्यों की पूर्ति के एक साधन के रूप में करने की कोशिश की. इस नीति की असफलता ने, क्योंकि यह मेहनतकश जनता के निर्मम शोषण और निम्न-बुर्जुआ हितों की पूर्ण उपेक्षा पर आधारित थे, महान फ्रांसीसी क्रांति का रास्ता साफ़ कर दिया जो अठारहवीं शताब्दी के अंत में भड़क उठी थी. नेपोलियन के मध्यवर्ती शासन (1815 में समाप्त हो गया था) और बूर्बो वंश की पुनप्रतिष्ठा के बाद 1830 में क्रांति हुई और “जुलाई राजतन्त्र” की स्थापना हुई जोकि बुर्जुआ मताधिकार पर आधारित संसदीय सरकार का क्लासिकीय रूप था.

नीदरलैंड में, नागरिकों, ने सामंती संस्थाओं के खिलाफ अविराम संघर्ष किया.यह संघर्ष कभी-कभी वास्तविक गृह-युद्ध (उदाहरण के लिए 1324 का वाइप्रे और ब्रूगे के नेतृत्व में फ्लेमिश नगरों का विद्रोह जो कई वर्षों तक चला)  का रूप धारण कर लेता था. सोलहवीं शताब्दी के दुसरे अर्धांश के दौरान नीदरलैंड के बुर्जुआ ने मध्यवर्ती और निम्न कुलीनों के सहयोग से हैप्सबर्ग वंश के शासन के खिलाफ राष्ट्रीय विद्रोह का नेतृत्व किया और लम्बे और तीखे संघर्ष के बाद लोलैंड ने विदेशी शासन से स्वतंत्रता प्राप्त कर ली. नीदरलैंड पहला बुर्जुआ राज्य बना और सत्रहवीं शताब्दी के बाद से ही अन्य सभी बुर्जुआ राज्यों के लिए मॉडल बन गया जोकि कालांतर में पश्चिमी यूरोप में स्थापित हुए.

इटली के स्वतन्त्र नगर गणराज्य, भूस्वामी कुलीनों के शासन के जुवे को उतार फेंकने के बाद, धीरे-धीरे व्यापारिक और औद्योगिक अल्पतन्त्र का रूप धारण करने लगे. लेकिन उत्तरी इटली की व्यापारिक प्रधानता (जहाँ पर व्यापारिक पूंजीवाद का विकास यूरोप के अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा पहले हो गया था) के ह्नास के साथ-साथ नगरों में पूंजीवाद के विकास में गतिरोध आ गया. इस प्रकार इन व्यापारिक नगरों ने अपना पहले वाला महत्त्व खो दिया और उन्नीसवीं शताब्दी में ही इतालवी बुर्जुआ के सुदृढीकरण की प्रक्रिया नए सिरे से शुरू हो पाई.

ग्रेट ब्रिटेन में नगरीय समुदाय ने संसदीय प्रतिनिधित्व बहुत अरसा पहले हासिल कर लिया था लेकिन औद्योगिक पूंजीवाद का विकास आरंभ होने के बाद ही ब्रिटिश बुर्जुआ का सलाहकार और याचक की भूमिका से संतुष्ट होना ख़त्म हो गया और राजनितिक सत्ता के लिए उसका संघर्ष उग्रतर होता चला गया. संसदीय युद्ध जो 1641 से 1649 तक चला, चार्ल्स प्रथम को फांसी और ओलिवर क्रोमवेल के नेतृत्व में राष्ट्रकुल की स्थापना के बाद ख़त्म हुआ. स्टुअर्ट वंश की पुनप्रतिष्ठा की अल्पावधि के बाद क्रांति 1688 में नए रूप में भड़क उठी और इस मर्तबा संसदीय राजतन्त्र स्थापित करने में सफल हो गयी. अब बुर्जुआ को भूस्वामी अभिजातों के रूप में सुयोग्य मित्र मिल गया था जिसका बुर्जुआकरण तेजी से हो रहा था. आर्थिक क्षेत्र में सत्ता बुर्जुआ के अधिक प्रभावशाली संस्तर के अधीन हो गयी जैसाकि फ्रांस में भी इसके बाद घटित हुआ. 1832 में चुनाव सुधारों और 1846 में अनाज कानून के बाद उन्नीसवीं शताब्दी काफी आगे बढ़ गयी थी तब जाकर विश्व बाज़ार के शोषण के लिए एकजुट समग्र बुर्जुआ वर्ग के लिए ब्रिटिश राज्य ज्वाइण्ट-स्टॉक कंपनी में तबदील हो गयी.

जिन देशों में राजनितिक एकता स्थापित नहीं हो पाई थी उनमें राजनितिक केन्द्रीकरण का सटीक अध्ययन जर्मनी और इटली जैसे देशों के उन्नीसवीं सदी के इतिहास में किया जा सकता है. जहाँ तक फ्रांस का सवाल है इस प्रक्रिया ने विशेषतया तीव्र और विशिष्ट रूप धारण कर लिया था. यहाँ पर बुर्जुआ राजनितिक केन्द्रीकरण 1789 और 1815 के वर्षों के दौरान हो गया था हालाँकि 1830, 1845-50 और 1870-75 के दौरान इसे परिपूर्ण किया गया.

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