मार्क्स-एंगेल्स द्वारा लिखित ‘कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र’ पर डेविड रियाज़ानोव की व्याख्यात्मक टिप्पणियां/बुर्जुआ और सर्वहारा-3. मध्ययुगीन अर्थव्यवस्था का ह्नास, भूगोलिक खोजों का युग और विश्व-बाज़ार की शुरुआत

Posted on Updated on

3. मध्ययुगीन अर्थव्यवस्था का ह्नास, भूगोलिक खोजों का युग और विश्व-बाज़ार की शुरुआत

पंद्रहवीं शताब्दी के दूसरे अर्धांश के पहले से ही छोटे पैमाने के उत्पादन पर आधारित मध्ययुगीन समाज अपकर्ष की सक्रिय प्रक्रिया से गुज़र रहा था. देश और विदेश में विनिमय के साधनों की त्वरित वृद्धि के परिणामस्वरूप वित्तीय अर्थव्यवस्था के उदय ने वित्तीय और व्यापारिक पूँजी के विकास के लिए अनुकूल परिस्थितियां उत्पन्न कर दीं. ग्रामीण क्षेत्रों में सामंती शुल्क का भुगतान जिन्स  के रूप में किया जा रहा था; स्वतन्त्र किसान और भूदासों की छोटे पैमाने के कृषि उत्पादन की स्थिति एक साथ ख़राब हो रही थी; सामन्ती जमींदार फार्मर बनते जा रहे थे और मुद्रा के रूप में धन इकठ्ठा करने के लिए प्रत्येक साधन का इस्तेमाल कर रहे थे. सामन्ती जागीरदारों ने विशाल कर्मचारी समुदाय और दरबारी लोगों को निकाल दिया. इन बेसहारा लोगों और उन बेदखल किसानों, जिन्हें उस भूमि से वंचित कर दिया गया था जिसे वे और उनके पूर्वज अनगिनत पीढियों से जोतते आ रहे थे, ने “हट्टे-कट्टे बदमाशों और आवारा लोगों” की कतारों में वृद्धि कर दी जो राजमार्ग पर गतिरोध उत्पन्न कर देते थे और शहरों में भीड़-भाड़ कर देते थे. स्वतन्त्र शिल्प-संघ जिनमें उस्तादों और कारीगरों के बीच अनबन से दरार पड़ गयी थी, व्यापारिक पूँजी के अधीन हो गए.

धातुकर्मीय उत्पादन, वस्त्र उत्पादन, नौपरिवहन, युद्ध-सामग्री उत्पादन, घड़ी-निर्माण, खगोलीय यंत्रों के क्षेत्रों में हुए अनेक तकनीकी सुधारों; छापाखानों का आविष्कार; वैज्ञानिक अनुसन्धान की प्रगति, विशेषतया खगोलीय विश्व में नयी खोजों – इन सबने उत्पादक शक्तियों के विकास को जोरदार संवेग प्रदान किया और उद्धमी मानसिकता के व्यक्तियों को पहल करने के लिए प्रोत्साहित किया. भूमध्य सागर के पश्चिमी हिस्से या अटलांटिक महासागर के तटवर्ती क्षेत्रों (जेनोआ या लिस्बन) जैसे बंदरगाहों में व्यवसाय का संचालन करने वाले व्यापारियों और मैन्युफैक्चर करने वालों, तथा एशियाई व्यापार पर एकाधिकार रखने वाले और पूर्वी भूमध्य सागर के स्वामी वेनिसवासियों के बीच प्रतिस्पर्द्धा ने पुर्तगालियों, जेनेवावासियों और स्पेनी व्यापारिक दु:साहसियों को इंडीज़ के लिए नए मार्ग की तलाश के लिए उकसाया. पुर्तगाल के राजा जोआओ और गांट के जान की पुत्री अंग्रेज़ राजकुमारी फिलिप्पा के चौथे पुत्र महान नौसंचालक राजकुमार हेनरी (1394-1460) ने पंद्रहवीं शताब्दी के आरम्भिक अर्द्धांश में ही भौगोलिक खोजों में किये गए योगदान के लिए ख्याति प्राप्त कर ली थी. उसने अफ्रीका के तट पर स्थित उन स्थानों के लिए जहाज भेजे जो अब तक अनजान थे और 1418 तथा 1420 में उसके कप्तानों ने पोटों सान्टो और मडीरा की दुबारा खोज की. अजोर्स की खोज के लिए समुद्री अभियान भेजने का श्रेय भी उसको जाता है जिसका पुर्तगालवासियों द्वारा उपनिवेशीकरण तेजी से आगे बढा. 1460 तक राजकुमार हेनरी के पोत भूमध्यरेखा के निकटतर स्थानों, केप वर्डे से करीब एक सौ लीग से आगे तक पहुँच गए थे. इसके बाद 1486 में बार्थोलेम्यू (1455-1500) ने केप ऑफ गुड होप का चक्कर लगाया. इसके पहले कि  पुर्तगाली इंडीज़ के नए मार्ग की खोज के लिए अगला अभियान भेज सकें, जेनेवावासी नाविक क्रिस्टोफ़र कोलम्बस (1446-1506) ने अपने अभियान में पश्चिम की ओर रूख़ किया और 1492 में वेस्ट इंडीज़ के टापुओं की खोज की. जान कैबर (1450-1557)  1497 में अमेरिका के उत्तरी तट पर उतरा. लेकिन इसके एक साल बाद ही वास्को डि गामा (1451-1512) ने डियाज़ द्वारा शुरू किये गए काम को पूरा किया और भारत के समुद्री मार्ग का पता लगाया. दो वर्ष बाद “फ्लोरेंसवासी नाविक अमेरिगो वेस्पूची (1451-1512) ब्राजील के तट तक पहुँच गया और उसी के नाम पर अमेरिकी महाद्वीप का नामकरण हुआ. 1500 में पुर्तगाली सेनापति पेड्रों अल्वारेज़ कैब्रल (मृत्यु 1526) जिसे उसके राजा ने डिगामा के मार्ग का अनुसरण करने के लिए नियुक्त किया था, को प्रतिकूल हवाओं ने अपने मार्ग से इतना दूर हटने के लिए बाध्य कर दिया कि वह उस साल गुड फ़्राइडे के दिन ब्राजील के तट पर जा पहुँचा. अंत में 1520 में फर्डीनण्ड मैगलन (1470-1521), पृथ्वी का चक्कर लगाने वाला पहला नाविक, उस जलडमरूमध्य से होकर प्रशांत महासागर में पहुँच गया जो अभी भी उसके नाम से जाना जाता है.

इन समुद्री यात्राओं और खोजों के कारण विश्व बाज़ार का इतना अधिक विस्तार हो गया कि इसने सौलहवीं शताब्दी के बढ़ते उत्पादन को खपा लिया. इसी शताब्दी में समकालीन बुर्जुआ युग का जन्म हुआ.

मेक्सिको में कार्टेज़ (1485-1547), पेरू में पिजारो (1476-1541) जैसे शुरुआती अत्याचारी विजेताओं द्वारा नए खोजे गए देशों की निर्मम लूट और आदिवासियों के उन्मूलन का स्थान सोलहवीं शताब्दी के दुसरे अर्धांश में ही, दास श्रम की सहायता से अछूती भूमि के सुव्यवस्थित शोषण ने ले लिया. कुछ शताब्दियों में ही अफ्रीका उन श्वेतों का आखेट-क्षेत्र बन गया जो अमेरिकी बाज़ार के लिए नीग्रो दासों की तलाश में रहते थे. 1508 से 1860 के बीच “परोपकारी” पुर्तगाली, स्पेनी, फ्रांसीसी और सर्वोपरि रूप से ब्रिटिश दास व्यापारियों के शिकार लगभग डेढ़ करोड़ नीग्रो अटलांटिक महासागर के पार जहाजों में भरकर लाये गए थे और उतनी ही संख्या में इस समुद्री यात्रा में मर गए थे. “लिवरपूल दास व्यापार का प्रशस्ति गान करते हैं. उदाहरण के लिए 1795 में लिखी डॉ. आइकिन की पूर्व उद्धृत रचना को देखा जा सकता है जिसमें लिखा है कि दासों का व्यापार ‘निर्भय साहसिकता की उस भावना से मेल खाता है जो लिवरपूल के व्यापार का विशेष गुण हैं और जिसकी सहायता से लिवरपूल इतनी तेजी से अपनी वर्तमान समृद्धि प्राप्त कर सका है; उससे जहाज़ों और नाविकों को बड़े पैमाने पर काम मिला है और देश के मैन्युफ़ैक्चरों के बने सामान की मांग बढ़ी है.” (मार्क्स, कैपिटल, खंड 1 पृ 885) उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ में जब इंग्लैंड के सूती वस्त्र उद्योग ने अमेरिका के दक्षिण प्रान्तों में कच्चे कपास के उत्पादन को अतिरिक्त संवेग प्रदान किया, तब अटलांटिक महासागर के पार दास-प्रथा राष्ट्रीय संस्था बन चुकी थी और दासों का प्रजनन एक वाणिज्यिक उद्धम बन चुका था.

बोलीविया में 1545 के बाद से और मेक्सिको में 1548 से सोने और चाँदी की खानों की खोज और दोहन ने यूरोपवासियों के हाथों में सोने और चाँदी के विशाल सुरक्षित भंडार बनाने में योगदान किया. 1501 से 1544 तक चाँदी के उत्पादन की कीमत 460 मिलियन मार्क के आसपास थी. (‘मार्क’ पौण्ड औंस भार प्रकृति वाले अंग्रेजी पौण्ड का आधा होता है) 1546 से 1600 तक उत्पादन 2880 मार्क तक बढ़ गया था. उन चाँदी के सिक्के के मूल्य, जो परिचलन में थे, में भी समानुपातिक वृद्धि हो गयी थी.

ब्रिटेनवासियों द्वारा उत्तरी अमेरिका का योजनाबद्ध उपनिवेशीकरण 1620 में आरंभ हो चुका था. फ्रांसीसियों ने इसका अनुसरण किया. आरंभ में ईस्टइंडीज़ के शासन संचालन का काम पुर्तगालियों के हाथों में था. लेकिन 1600 में डच और ब्रिटिश ने लगभग एक साथ एक विशेष अभियान आरंभ किया जिससे धीरे-धीरे, अपने यूरोपीय प्रतिद्वंद्वियों (पहले पुर्तगालियों और बाद में फ्रांसीसियों) से संघर्ष करते हुए उन्होंने ईस्ट इंडीज़ पर अधिकार कर लिया. चीन से व्यापारिक सम्बन्ध कायम करने वाले यूरोपीय लोग , पुर्तगाली थे जिन्होंने 1557 में मकाओ पर अधिकार कर लिया. 1684 के बाद ही अंग्रेज़ चीन के तट पर स्थापित हो सके.

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s