नेपाली क्रान्ति : नये दौर की समस्याएँ और चुनौतियाँ, सम्भावनाएँ और दिशाएँ–आलोक रंजन

Posted on

दिसम्बर, 2008 और जनवरी, 2009 के महीने नेपाली कम्युनिस्ट

आन्दोलन और पूरे नेपाल के लिए अत्याधिक  महत्त्वपूर्ण रहे। नेपाल

की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) और नेपाल की कम्युनिस्ट

पार्टी (एकता केन्द्र-मसाल) के बीच लम्बे समय से जारी

एकता-प्रक्रिया का, विगत 13 जनवरी 2009 को एक जनसभा में

एकता की सार्वजनिक घोषणा के बाद, सफल समापन हो गया।

नयी पार्टी का नाम एकीकृत ने.क.पा. (माओवादी) रखा गया है।

ने.क.पा. (माओवादी) और ने.क.पा. (एकता केन्द्र-मसाल)

के बीच मतभेद के मुद्दों, राजनीतिक वाद-विवाद और कदम-ब-कदम

एकता की ओर अग्रवर्ती विकास की प्रक्रिया की चर्चा, `बिगुल´

के मई और जून 2008 के अंकों में धारावाहिक प्रकाशित लम्बे

निबन्ध में हम कर चुके हैं। नेपाली कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी शिविर

के इन दो  सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण घटकों की एकता नेपाल में जारी

नवजनवादी क्रान्ति की प्रगति के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। इस

महत्त्वपूर्ण घटना के बाद क्रान्तिकारी शिविर में एकता-प्रक्रिया की

गति और तेज़ हो गयी है। जल्दी ही कुछ और संगठन एकीकृत नेक.

पा. (माओवादी) में शामिल हो जायेंगे। इसकी चर्चा हम लेख

में आगे यथास्थान करेंगे।

नेपाल में कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों की एकता ने कतारों और

आम मेहनतकश जनता के भीतर नये उत्साह और नयी आशाओं

का संचार किया है। लेकिन जन समुदाय की नयी क्रान्तिकारी

आकांक्षाओं-अपेक्षाओं की कसौटी पर नेपाल के कम्युनिस्ट

क्रान्तिकारी किस हद तक खरे उतरेंगे, इस प्रश्न का उत्तर अभी

भविष्य के गर्भ में है। सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि एकता के

पहले ने.क.पा. (माओवादी) के भीतर सामाजिक जनवादी भटकाव

और नववामपन्थी मुक्त चिन्तन की जो रुझानें मौजूद रही हैं

(इनकी चर्चा `बिगुल´ के मई-जून 2008 के अंकों में प्रकाशित

लेख में की जा चुकी है), उनसे छुटकारा पाने में एकीकृत ने.कपा.

(माओवादी) किस हद तक सफल होती है! सकारात्मक बात

यह है कि न केवल ने.क.पा. (एकता केन्द्र-मसाल) ज्यादातर  सही

अवस्थिति अपनाकर दक्षिणपन्थी अवसरवादी विचलनों का विरोध

करती रही है, बल्कि 2008 के अन्तिम तीन-चार महीनों के दौरान

ने.क.पा. (माओवादी) के भीतर भी सामाजिक जनवादी भटकाव

की लाइन के विरुद्ध   तीखा संघर्ष चलता रहा है। इस संघर्ष में

दक्षिणपन्थी अवसरवादी लाइन को काफी हद तक पीछे हटना पड़ा

है, हालाँकि यह लाइन अभी भी पार्टी के भीतर मौजूद है। दो लाइनों के इस संघर्ष की चर्चा भी आगे की जायेगी।……………..

कुछ  विश्व ऐतिहासिक करने की बेचैनी

पिछड़े समाज की कूपमण्डूकता की उपज है!


बहुदलीय प्रणाली को नेपाली क्रान्ति के अभी तक के अनुभवों

के आधार पर सर्वहारा जनवाद का `ऑर्गन´ घोषित कर देना निहायत

अपरिपक्व निर्णय है और अधकचरे ढंग से अतीत के महान सामाजिक

प्रयोगों के अनुभवों के समाहार को ख़ारिज़ करना है। वर्तमान

मिली-जुली सरकार सर्वहारा अधिनायकत्व या जनता के जनवादी

अधिनायकत्व के दौर की सरकार नहीं है। इसमें भागीदारी

अल्पकालिक रणकौशल मात्र है। जब तक नेपाल के कम्युनिस्ट

क्रान्तिकारी जनता के जनवादी अधिनायकत्व के अन्तर्गत बहुदलीय

व्यवस्था को चलाने का कोई सफल प्रयोग न कर लें, तब तक ऐसे

किसी विचारधारात्मक इज़ाफे की बात ख़याली पुलाव पकाने के समान है। दरअसल, कुछ विश्व  ऐतिहासिक करने की बेचैनी

ने.क.पा. (माओवादी) में कुछ ज्यादा ही दीखती रही है। नेतृत्व में

मौजूद राजनीतिक कैरियरवाद के साथ ही यह पिछड़े समाज की

कूपमण्डूकता की देन है। प्राय: यह देखा जाता है कि पिछड़े समाजों

में लोग दुनिया की सबसे बड़ी, या सबसे अनूठी चीज़ों के

अपने आसपास होने का दावा करते रहते हैं। `प्रचण्ड पथ´ का

आविष्कार भी इसी बेचैनी की देन है, जिसकी आलोचना `बिगुल´

में पहले की जा चुकी है। नेपाली क्रान्ति को इक्कीसवीं शताब्दी

की नयी सर्वहारा क्रान्तियों का प्रस्थान बिन्दु बताना और आने वाले

दिनों की क्रान्तियों के लिए राह दिखाने का दावा करना भी एक

बचकानापन ही है। सामाजिक-आर्थिक संरचना के पिछड़ेपन की

दृष्टि से, नेपाली क्रान्ति बीसवीं शताब्दी की सर्वहारा क्रान्तियों की

ही अगली कड़ी है। यह गत शताब्दी का छूटा हुआ कार्यभार है जो

वर्तमान शताब्दी में पूरा हो रहा है। हर देश की क्रान्तिकारी परिस्थितियों की अपनी कुछ मौलिकता-नवीनता होती है और हर क्रान्ति अपने

आप में महान होती है। उसे बलपूर्वक महान सिद्ध  करने के लिए

`ट्रेण्ड सेटर´ और `पाथ-ब्रेकिंग´ बताना कूपमण्डूकता के अतिरिक्त

और कुछ नहीं हो सकता। सर्वहारा जनवाद की अब तक की

अवधारणा में विकास और संविधान सभा के प्रयोग के अनूठेपन

का दावा भी इसी कूपमण्डूकता की देन है। इसी कूपमण्डूकता के

चलते ने.क.पा. (माओवादी) अतीत की महान क्रान्तियों के अनुभवों

की तो बचकाने ढंग से कमियाँ निकालती है, लेकिन नववामपन्थी

मुक्त चिन्तन उसे काफी प्रभावित करता है। सर्वहारा क्रान्तियों

के इतिहास की हास्यास्पद ढंग से छीछालेदर करने वाला रौशन किस्सून

का लेख हो या समीर अमीन का लम्बा साक्षात्कार, पार्टी मुखपत्र

में उन्हें छापने के बाद न तो कोई बहस चलायी जाती है, न ही

कोई आलोचनात्मक टिप्पणी दी जाती है। इस किस्म की गैरपक्षधर

वस्तुपरकता पार्टी के विचारधारात्मक भटकाव का ही जीता-जागता

प्रमाण है।

इस लेख को पूरा पढ़ने के लिए \’नई समाजवादी क्रान्ति के उद्घोषक बिगुल\’ के फरवरी 2009 की पीडीऍफ़ फाईल के लिए यहाँ क्लिक करें


Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s