तनख्वाह का सच

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आपस की बात
मजदूर भाइयो, मैं अभी कुछ दिनों से ही फैक्ट्री में काम करने लगा हूँ, किंतु इतने में ही मैंने जो चीज जान ली है वह है तनख्वाह देने की पीछे का सच. हमें तनख्वाह क्यों और कितनी दी जाए इसके पीछे मालिक का अपना मतलब होता है. लुटेरा मालिक एक मजदूर को उतना ही देता हैं जितना मज़दूर को जिंदा रहने की लिए न्यूनतम जरूरत होती है. मालिक को खूब अच्छी तरह पता है कि मज़दूर को किसी तरह रोटी, कपडा और दवा चाहिए, साथ में एक किराए का कमरा, क्योंकि अधिकतर मज़दूर अपने गावों से दूर शहरों में काम करने आयें हैं,. इन सभी चीजों की लिए इतनी महंगाई में २०००-२५०० रुपये देना ठीक होगा. मालिक को पता है अगर मैं २००० रुपये भी नहीं दूँगा तो मज़दूर भूखा या नंगा तो काम करने आएगा नहीं. मज़दूर फैक्ट्री आये तभी मालिकों की लिए १२-१४ घंटों तक काम करके रोज मालिकों की लिए करोड़ों रुपये मुनाफ़ा बनाएगा. अगर मज़दूर को जिंदा रहने लायक मजदूरी भी नहीं दी गयी तो एक दिन मज़दूर वर्ग ही मिट जाएगा और इन चोर पूंजीपतियों -मालिकों का मुनाफा बंद हो जाएगा. जिस (मुनाफे) को ये लुटेरे कभी भी किसी भी हालत में बंद नहीं होने देंगे. और इसी मुनाफे को जारी रखने की लिए वह कम तनख्वाह देकर मज़दूरों को जिंदा रखता है ताकि उसका मुनाफा बनता रहे. कल्पना करें कि आटा ५ रुपये किलो, चावल ५ रुपये किलो, सरसों तेल २० रुपये किलो, सभी सब्बजियाँ ४ रुपये किलो हो जायें तो तुरंत मालिक सभी की तनख्वाह १००० रुपये कर देगा और पुराने मज़दूरों को किसी न किसी बहाने निकाल कर नये मजदूरों की भर्ती ले लेगा. क्योंकि इन सारी चीजों के सस्ते होने पर मालिक भी हिसाब लगायेगा कि अब १००० रुपये में मज़दूर जिंदा रह सकता है तो २००० रुपये क्यों दिया जाए.
एक बात और कम्पनी में देखने को मिली कि कम्पनी में जो पुराने मज़दूर हैं जो थोड़ा काम जानते हैं उनको कुछ ज्यादा पैसा (३०००-३५००) देकर मालिक कुछ-कुछ अपना बफादार बना लेता है. और मालिक साजिशाना ढंग से मज़दूरों की बीच भी दो वर्ग पैदा कर देता है और इससे होता यह है कि नये मज़दूर जब किसी तरह का विरोध करते हैं तो पुराने मज़दूर जल्दी उनका साथ नहीं देते. पुराने मज़दूर कहते हैं हमें क्या है हमें तो ३००० रुपये मिल ही रहा है. वह सोचता है मुझे इन मजदूरों से ज्यादा पैसा तो मिल ही रहा है और कुछ दिन काम करके कारीगर बन जाऊंगा तो और तनख्वाह बढ़ जायेगी. और मैं अच्छी जिंदगी जीने लगूंगा. वह यह भूल जाता है कि वह जिस मालिक के लिए काम कर रहा है , वह मालिक उसी की मेहनत से हर महीने बिना कुछ किए लाखों रुपया मुनाफा कमाता है और अपनी संपत्ति में कई गुणा की बढोत्तरी करता रहता है. और वह मज़दूर कारीगर सीखने को ही अपना लक्ष्य बनाकर सालों गुजार देता हैं. वह मज़दूर अपनी तुलना अपने से नीचे वाले मज़दूर से करता है जबकि उसे चाहिए कि वह अपनी तुलना उस नये मज़दूर से न करके उस मालिक से करके देखे कि उसका मालिक कितना ज्यादा मुनाफा बटोर रहा है. सभी मजदूरों को समझना चाहिए कि ये लुटेरा जो लाखों-करोडों कमाता है वह हमारी खून-पसीने से बनाया गया मुनाफा होता है अगर हम मज़दूर वर्ग न हो तो ये लुटेरे भूखों मरेंगे. इसलिए मजदूरों को अपनी ताकत समझनी होगी और मजदूरों को संगठित होकर इन मालिकों की खिलाफ लडाई में हिस्सा लेना होगा. नए मजदूरों के साथ पुराने मज़दूरों को भी समझना होगा कि उसे जो थोड़ा ज्यादा तनख्वाह मिल रही है उससे कुछ नहीं होने वाला. उसका सारा मुनाफा तो मालिक हड़प जाता है और फ़िर इन पैसों से अगले साल ६-८ मशीने बढा ली जाती हैं और इसीके साथ मालिक का मुनाफा और फ़िर कुछ नये मजदूरों का शोषण बढ़ता जाता है.
‘बिगुल’ दिसम्बर २००८ से साभार

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