बाल मजदूरी का कारण गरीब माँ-बाप का लालच या बेबसी ?

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विद्वान प्रोफेसर जुत्शी साहब से दो बातें

अभी पिछले दिनों एक एन.जी.ओ. ‘बचपन बचाओ आन्दोलन’ की ओर से दिल्ली में एक संवादाता सम्मेलन आयोजित किया गया जिसमें फुटबाल सिलने वाले बच्चों की दशा और दिशा पर चर्चा हुई. इस संवाददाता सम्मेलन में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के एक विद्वान प्रोफेसर बी. जुत्शी ने फ़रमाया कि बाल मजदूरी के लिए बच्चों के माता-पिता ही जिम्मेदार हैं जो अतिरिक्त आय के लिए अपने बच्चों को काम में लगा देते हैं.

विद्वान प्रोफेसर साहब के खयाल से गरीब माँ-बाप थोड़ा कम इन्सान होते हैं, जो अपने बच्चों को प्यार नहीं करते, पढा-लिखाकर उनका भविष्य नहीं संवारना चाहते और “अतिरिक्त आमदनी” के लिए उनका वर्तमान और भविष्य उजरती गुलामी के अंधेरे में झोंक देना चाहते हैं.

आदरणीय जुत्शी साहब, हम लोग बरसों से नोएडा, दिल्ली की असंगठित, गरीब मेहनतकश आबादी के बीच काम कर रहे हैं. पिछले दिनों गाजियाबाद. नोएडा और दिल्ली की मजदूर बस्तियों से गायब होने वाले बच्चों के बारे में जाँच-पड़ताल करने और रिपोर्ट तैयार करने के दौरान हमें मजदूर बस्तियों के बच्चों के जीवन के बारे में कुछ और अधिक गहराई से जानने का अवसर मिला. हम आपको यकीन दिलाना चाहते हैं कि गरीब मजदूर भी सामान्य इन्सान होते हैं और शायद समृद्धि की चकाचौंध भरे अतिरेक में जीने वालों से अधिक इन्सान होते हैं. चंद एक अपवादस्वरूप, विमानवीकृत (डीह्यूमनाईज़ड) शराबखोर चरित्रों को छोड़ दे,  तो हर गरीब अपने बच्चे को किसी भी तरह से पढाना-लिखाना चाहता है. वह उसे उजरती गुलामी की रसातल से बाहर निकालना चाहता है, पर ठोस हकीकत की चट्टान से सर टकराकर समझ जाता है कि मजदूर का बच्चा भी ८५ फीसदी मामलों में मजदूरी करने की लिए ही पैदा होता है. जुत्शी साहब, इस सच्चाई को तो डेढ़ सौ साल पहले कार्ल मार्क्स ही नहीं, बहुतेरे बुर्जुआ यथार्थवादी साहित्यकार भी समझ चुके थे कि मजदूर अपनी श्रम शक्ति बेचकर  उतना ही हासिल कर पाते हैं कि श्रम करने के लिए जिंदा रहें और मजदूरों की नई पीढी पैदा कर सकें. आप शायद मंगल ग्रह से आये हैं या ज़्यादा किताबें पढ़ लेने से जिंदगी की हकीकत आपकी नजरों से ओझल हो गयी है. नोएडा और दिल्ली में ४० रूपये से साठ रूपये की दिहाड़ी पर औरत-मर्द मजदूर आठ, दस या कहीं-कहीं बारह घंटे काम करते हैं. सिंगल रेट पर कभी-कभार ओवर-टाइम मिल जाता है तो महीने में कई दिन बेकारी के भी होते हैं. मालिक या ठेकेदार की ओर से शिक्षा, स्वास्थ्य या आवास की कोई सुविधा नहीं होती. इन हालात में पति-पत्नी दोनों लगातार काम करने के बाद मुश्किल से दो जून की रोटी, झुग्गी का किराया, कुछ कपड़े आदि की जरूरतें पूरी कर पाते हैं. क़र्ज़ लिए बिना दवा इलाज नहीं हो पता और फ़िर उस क़र्ज़ को चुकाने का सिलसिला चलता रहता है. इस हालत में मुश्किल से ही मजदूरों के बच्चे दो जून की रोटी खा पाते हैं. सरकारी स्कूल में पढ़ने के लिए भी पेट में रोटी तो होनी चाहिए ही. क्या आप इन आंकडों से परिचित नहीं हैं कि अस्सी फीसदी से भी अधिक मजदूरों के बच्चे कुपोषण के शिकार होते हैं. आपका जो नजरिया है, उसके हिसाब से तो शायद गरीब लोग पैसा बचाने के लिए अपने बच्चों को रोटी नहीं देते. नहीं, प्रोफेसर महोदय, ऐसा नहीं हैं. जब हड्डियाँ गलाकर भी मजदूर बच्चे को भरपेट भोजन, तन पर कपडा और बीमारी में दवा नहीं दे पाता तो कलेजे पर सिल रखकर यह तय करता है कि कप-प्लेट धोकर, सामान धोकर, गाडियां साफकर या फुटबाल सिलकर शायद बच्चा जिंदा रह सके और जिंदगी की कोई बेहतर राह निकाल सके. उसके सामने कई विकल्प नहीं, बल्कि एकमात्र विकल्प होता है और वह उसे चुनने के लिए विवश होता है.

दूसरी बात आपको और बताएं जुत्शी साहब! कुछ मजदूर यदि बच्चों को पढा पाने की स्थिति में अगर होते भी हैं तो वे यह भली-भांति जानते हैं कि उनके बच्चे आप जैसे बच्चों के समान डॉक्टर, इंजिनियर, प्रोफेसर, वकील, तो दूर म्युनिसिपैलिटी के क्लर्क भी शायद ही बन पायें ऐसी स्थिति में वे उन्हें जल्दी ही मजदूरी के काम में लगा देना चाहते हैं ताकि उसी में हुनरमंद होकर शायद वे थोड़ा बेहतर जीवन जी सकें.

जुत्शी साहब, जरा इतिहास का अध्ययन कीजिए. पूंजीवाद की बुनियाद ही स्त्रियों और बच्चों के सस्ते श्रम को निचोड़कर तैयार हुई थी. बीच में मजदूरों ने लड़कर कुछ हक हासिल किए थे. अब बीसवीं सदी की मजदूर क्रांतियों की हार और मजदूर आन्दोलन के गतिरोध के बाद, नवउदारवादी दौर में, पूँजी की डायन एक बार फ़िर सस्ती श्रम की तलाश में पूरी पृथ्वी पर भाग रही है और असंगठित, दिहाड़ी, ठेका मजदूरों- विशेषकर स्त्रियों और बच्चों की हड्डियाँ निचोड़ रही है. “कल्याणकारी राज्य” हवा हो गया है. श्रम कानूनों और जीने के अधिकार का कोई मतलब नहीं रह गया है. ऐसी सूरत में पूंजीवादी लूट का अँधा-अमानवीय तर्क उस सीमा तक आगे न बढ़ जाए कि लोग जीने के लिए विद्रोह पर अमादा हो जायें, इसके लिए विश्व स्तर पर साम्राज्यवादी फंडिंग से एन.जी.ओ. नेटवर्क खडा किया गया है जो पूंजीवादी बर्बरता को सुधार के रेशमी लबादे से ढकने, पूंजीवादी जनवार की तार-तार हो रही चादर की पैबंदसाजी करने और भड़कते जनाक्रोश पर कुछ पानी के छींटे मारने का काम करता है. ये तमाम एन.जी.ओ. पूंजीवादी व्यवस्था की बजाय जनता को ही, उसकी बदहालियों  के लिए दोषी ठहराते  हैं और धर्म-प्रचारकों की तरह उसके उत्थान की बातें करते रहते हैं.  ‘बचपन बचाओ आन्दोलन’ भी ऐसा ही एक एन.जी.ओ. है. कैलाश सत्यार्थी और ‘बचपन बचाओ आन्दोलन’ का  एक और उद्देश्य होता है. पिछडे देशों के पूंजीपति अपने देशों के सस्ते श्रम के चलते उत्पादित माल को सस्ते में बेचकर साम्राज्यवादी देशों के पूंजीपतियों के सामने कुछ क्षेत्रों में प्रतिस्पर्द्धा की स्थिति पैदा कर देते हैं, इसलिए धनी देशों के पूंजीपति एक ओर तो ख़ुद भी पिछडे देशों को अपना ‘मैन्युफैक्चरिंग हब’ बनाना चाहते हैं, दूसरी ओर वे अन्तरराष्ट्रीय एजेंसियों और वित्तपोषित एन.जी.ओ. द्वारा तीसरी दुनिया के देशों में बाल श्रम पर प्रतिबन्ध के लिए आवाज उठाकर इन देशों के पूंजीपतियों को प्रतिस्पर्द्धा से बाहर करने की कोशिश भी करते हैं. ‘बचपन बचाओ आन्दोलन’ को धनी देशों की फंडिंग एजेंसियों से पैसा किसलिए और क्यों मिलता है, इसे आप न जानते हों, इतने मासूम भी तो आप नहीं होंगे जुत्शी साहब!

अतरिक्त आय! क्या बात है! जुत्शी साहब, आपके लिए अतिरिक्त आय का मतलब है नये बंगले, कार, छुट्टियों में विदेश यात्रा या संम्पत्ति  बढाने के लिए, या फ़िर शेयर में लगाकर पैसे से पैसा बनाने के लिए कुछ धन जुटा लेना. पर गरीब के लिए अतिरिक्त और कुछ नहीं होता. पर आप जैसे प्रोफेसर लोग जो हफ्ते में तीन-चार क्लास लेकर साल में छः मास पढाते हैं और महीने में ३०-३५ हजार रूपए उठाते हैं, वे इस बात को नहीं समझ सकते. समृद्धि की मीनार की किसी मंजिल पर रहते हुए उसके तलघर के अंधेरे को देख पाना सम्भव भी नहीं होता.

जुत्शी साहब, आप तो शायद यही सोचते होंगे कि गरीबों के बच्चे ही अपने घरों से भागकर महानगरों के अपराधियों के हत्थे चढ़ जाते हैं, चोर-मवाली-पौकेटमार -भिखमंगे और नशेड़ी बन जाते हैं, उन्हें बेच दिया जाता है, उनके अंगों की तस्करी की जाती हैं, इसमें दोष गरीबों का ही है. आप शायद सोच भी नहीं सकते की समृद्धि की चकाचौंध और अमीरों के बच्चों को मिले ऐशो-आराम को तिल-तिल करके आभाव में जीते गरीबों के बच्चे किस निगाह से देखते हैं और उनके दिलो-दिमाग पर क्या प्रभाव पड़ता है. आप शायद यह नहीं जान सकते की पूरी दुनिया के लिए जीने की बुनियादी चीजें उत्पादित करने वाले जिन लोगों को इन्सान की तरह जीने के लिए न्यूनतम चीजें भी मयस्सर  नहीं होती, उनके घरेलू और सामाजिक परिवेश में किस कदर विमानवीकरण का घटाटोप होता है. इस आभाव और विमानवीकरण के परिवेश में घुटने वाले मासूम यदि घरों से भाग जाते हैं तो इसके लिए उनके बेबस माँ-बाप नहीं बल्कि यह सामाजिक ढांचा और राजनितिक व्यवस्था जिम्मेदार होती हैं.

पर ये बातें आपको बताने का फायदा ही क्या? आप इन्हें नहीं समझ सकते, क्योंकि सबकुछ समझकर न समझने वाले की समझ तो हकीम लुकमान भी नहीं बढा सकते!

-तपिश मैंदोला

‘बिगुल’ दिसंबर २००८ से साभार

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5 thoughts on “बाल मजदूरी का कारण गरीब माँ-बाप का लालच या बेबसी ?

    amar jyoti said:
    December 29, 2008 at 1:18 PM

    जुत्शी साहब का कहना है कि मुफ़लिस लोग लालच की
    वजह से अपने बच्चों को काम पर लगा देते हैं। कितना
    कमा पाते हैं ये बच्चे? शायर की ज़बान में कहें तो-
    ‘कितने दिनों के प्यासे होंगे यारो सोचो तो,
    शबनम क क़तरा भी जिनको दरिया लगता है।’

    Devpriya Shivani said:
    August 2, 2011 at 8:38 PM

    At d end d v.correct thing has been said dat “सबकुछ समझकर न समझने वाले की समझ तो हकीम लुकमान भी नहीं बढा सकते!” it is v.difficult 2 make awareness 4 studies among illiterate parents… day never try 2 _stand us.

    devesh kaushik said:
    January 15, 2012 at 4:09 PM

    aaj punjipati aur jyada amir or garib or jyada garibkyo ho raha hai kyoki jab hum kisi five star hotel me jaa kar rehte hai or khana khate hai to jo bhi bill aata hai use hum bina kese behesh ke pay kar dete hai or jab humne kese rehre patri par sabzi ya fruet ka bill dena ho ya kisi mazdoor ki mazdoori dene hoti hai to hum us se paisa kum karne ke liye lambi behesh karte hai ……………jara socheye

    चंदन कुमार मिश्र said:
    January 31, 2012 at 11:09 PM

    अब तो ऐसे लोगों की तनख्वाह लाख तक जा पहुँची है। चमचागिरी करते हैं ये सब!

    गरीबी का कारण ये क्या नहीं समझते हैं! सब ठगी है।

    बेहतरीन लेख!

    ankur tyagi said:
    April 2, 2012 at 2:39 PM

    main is sachhai ko aisa hi manta hu jasie is dunia main mera hona.ye such hi air-conditioner room main beth kar child labour par likhna or uska virodh karna behad aasan hota hai par us majdoor ke bacche ko kya padha kar apne us kamre baithne ki himmat in punjivadi ngo ke kathit budhijivio main hai?

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