आतंकवाद इस पूंजीवादी व्यवस्था का पैदा किया नासूर है

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मुंबई में आतंकवादी हमला

यह अंधराष्ट्रवादी जूनून में बहने का नहीं,

संजीदगी से सोचने और फ़ैसला करने का वक्त है.

मुंबई में आतंकवादी हमले की घटना पिछले कुछ दिनों से प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया की सुर्खियों में है. जाहिर है कोई भी विवेकवान और संवेदनशील व्यक्ति इस घटना और इससे पैदा हुई स्थिति पर  औपचारिक या अखबारी ढंग से भावनात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करेगा बल्कि पूरे राजनितिक-सामाजिक परिदृश्य पर अत्यन्त चिंता और सरोकार के साथ विचार करेगा.

यह घटना एक बार फ़िर यह दर्शाती है कि जब प्रगति की धारा पर गतिरोध की धारा हावी होती है तो किस तरह राजनीती के एजेंडा पर शासक वर्गों की राजनीती हावी हो जाती है और उनके तरह-तरह के टकराव विकृत रूपों में सामने आते हैं जिनकी कीमत जनता को चुकानी पड़ती है. देश के भीतर और पूरे भारतीय उपमहाद्वीप के स्तर पर शासक धड़ों के बीच के टकराव विभिन्न रूपों में समाज में कलह-विग्रह पैदा करते रहे हैं. इसके अलावा शासक जमात की नीतियों की बदौलत एक लम्बी प्रक्रिया में आतंकवाद पैदा हुआ और फैलता गया है. शासक वर्ग एक हद तक अपने-अपने हितों के लिए इसका इस्तेमाल भी करते रहे हैं लेकिन कभी-कभी यह उनके हाथ से बाहर निकल जाता रहा है. दोनों ही सूरतों में इसकी कीमत जनता ही चुकाती रही है.

एक क्रान्तिकारी मजदूर अख़बार के नाते ‘बिगुल’ इस घटना पर दुःख व्यक्त करता है और इसकी कठोर निंदा करता है. ‘बिगुल’ के पन्नों पर हम बार-बार अपनी यह राय जाहिर करते रहे हैं कि आतंकवाद किसी भी समस्या का समाधान नहीं हो सकता. लेकिन ऐसे समय में रस्मी तौर पर देशभक्ति का मुजाहिरा करने की बजाय इस समस्या की जड़ों पर संजीदगी से सोचने की जरूरत है.

पूंजीवादी मीडिया ने इस घटना के समय से ही जैसा उन्मादभरा माहौल बना रखा है उसमें संजीदगी से सोचने की ज़रूरत और भी बढ़ गयी है. टीआरपी बढाने के लिए सनसनी के भूखे मीडिया को तो इस घटना ने मानो मुंहमांगी मुराद दे दी. घटना के ‘दिन’ से ही सारे टीवी चैनल एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ में जुट गये थे. किसी का कैमरामैन कमांडो के पीछे-पीछे घुसा जा रहा था तो किसी का रिपोर्टर अपनी सारी अभिनय प्रतिभा का प्रदर्शन करते हुए रिपोर्टिंग को ज्यादा से ज्यादा नाटकीय बना रहा था. गोली चलने, बम फटने, आग लगने, या किसी के मरने के दृश्य को किसने सबसे पहले दिखाया इसे बताने की होड़ का बेशर्मीभरा प्रदर्शन लगातार तीन दिन तक चलता रहा. कुल मिलाकर, इस पूरी घटना को देशभक्ति के पुट वाली जासूसी या अपराध कथा जैसा बना दिया गया. अधिकांश चैनलों और अख़बारों की रिपोर्टिंग ने साम्प्रदायिकता का रंग चढी हुई देशभक्ति और अंधराष्ट्रवादी भावनाओं को उभाड़ने का ही काम किया. हालाँकि कुछ संजीदा पत्रकारों और बुद्धिजीविओं ने कहा कि किसी एक सम्प्रदाय विशेष को कठघरे में खडा करना या सीधे पाकिस्तान को निशाना बनाना ठीक नहीं है, लेकिन यह धारा कमज़ोर थी.

इस बात में ज़्यादा संदेह नहीं है कि इस हमले के पीछे जैश-ऐ-मोहम्मद या लश्करे-तैयबा और अल-कायदा जैसे संगठनों का हाथ हो सकता है और इसके लिए पाकिस्तान की जमीन का इस्तेमाल किया गया है. पाकिस्तान में आज कई वर्ग शक्तियों का टकराव बहुत तीखा हो चुका है और बहुत सी शक्तियाँ सत्ता के नियंत्रण से स्वतंत्र होकर काम कर रही हैं. आईएसआई और सेना के भीतर पुनरुत्थानवादी कट्टरपंथियों  के मज़बूत धडे हैं और ये पूरी तरह सरकार के कहने से नहीं चलते हैं. साथ ही यह भी सच है कि जब-जब शासक वर्ग आर्थिक-राजनितिक संकट में फंसते हैं तब-तब अंधराष्ट्रवाद की लहर पैदा करने की कोशिक की जाती है. इससे दोनों हुक्मरानों के हित सधते हैं. अपने-अपने शासक वर्गों की जरूरतों के मुताबिक कभी ये युद्ध के लिए आमादा दिखाई पड़ते हैं तो कभी गले मिलते नजर आते हैं. जो मुशर्रफ कारगिल में युद्ध के लिए जिम्मेदार था, वही कुछ महीने बाद आगरा में शान्ति दूत बना नजर आता है.

पाकिस्तान में भी कुछ लोगों ने इस मौके पर संजीदगी से काम करने की बात कही लेकिन आसिफ अली जरदारी की कमजोर सत्ता ने इस तरह के बयान देकर फ़िर वही पुराना दांव खेलना शुरू कर दिया है कि हम हर तरह से तैयार हैं-दोस्ती चाहो तो दोस्ती, जंग चाहो तो जंग कर लो. यह अयूब खान और भुट्टो के जमाने से चला आ रहा आजमूदा दांव है. भूलना नही चाहिए कि पाकिस्तान की आर्थिक हालत इस समय इतनी खराब है कि अभी एक महिना पहले वह दिवालिया होने के कगार पर पहुंच गया था. ऐसे में, इस घटनाक्रम से ज़रदारी की भी गोट लाल हो रही है और भारत-विरोधी अंधराष्ट्रवादी लहर पैदा कर उसका फायद उठाने की वे पूरी कोशिश कर रहे हैं.

भारतीय शासक वर्ग के विभिन्न धड़े भी अपने-अपने ढंग से इसका फायदा उठाने में लगे हैं. आर्थिक मंदी और कमरतोड़ महंगाई से निपट पाने में पूरी तरह नाकाम मनमोहन सिंह सरकार को मूल मुद्दों से जनता का ध्यान हटाने का मौका मिल गया है. चुनाव में अल्पसंख्यक वोटों के लिए पोटा हटाने का कांग्रेस ने वादा तो किया था लेकिन ऐसा कड़ा कानून आज भारतीय शासक वर्ग की ज़रूरत भी है और इस मुद्दे पर भाजपा के हमले से वह दबाब में भी है. इस घटना के बहाने उसे पोटा से भी सख्त कानून बनाने का मौका मिल गया है.

उधर भाजपा को ऐन विधानसभा चुनाव के पहले एक ऐसा मुद्दा मिल गया जिसे वह जमकर भुनाने की कोशिश कर रही है और जिसके शोर में मालेगंव तथा नांदेड़ आदि बम धमाकों में पकडे गया हिंदू आतंकवादियों का मामला फिलहाल पृष्ठभूमि में चला गया है. संघ गिरोह के संगठनों को हम तो पहले भी आतंकवादी मानते थे- गुजरात और उड़ीसा में जो कुछ इन्होने किया वह भी आतंकवाद ही था. योजनाबद्ध ढंग से बहशी भीड़ को लेकर गर्भवती औरतों के पेट चीरकर बच्चों को काट डालना, सामूहिक बलात्कार, लोगों को जिंदा जला देना- ये सब भी बर्बर, वहशी आतंकवाद ही है. लेकिन इनका दूसरा रूप भी जनता के सामने नंगा हो रहा था जिस पर अब पर्दा पड़ गया है. इसे भुनाने के लिए ये इतने उतावले थे कि मुठभेड़ अभी जारी ही थी कि नरेंद्र मोदी और आडवणी मुंबई पहुंचकर बयानबाजी करने लगे.

मीडिया में लगातार इस पर चर्चा जारी है कि यह घटना सुरक्षा इंतजामों और खुफिया तन्त्र की खामियों का नतीजा है. पर सच तो यह है कि महज़ इंतजामों को चाक-चौबंद करके ऐसे हमलों को नहीं रोका जा सकता. अगर भारत इजराइल से हथियारों का सौदा करेगा, अमेरिका के इशारे पर इरान विरोधी बयान देगा, अन्तरराष्ट्रीय मंचों पर फिलिस्तीन के साथ दिखाई जाने वाली रस्मी एकता से भी पीछे हटेगा, अफगानिस्तान में हामिद करजई की अमेरिकी कठपुतली सरकार के साथ गलबहियां डालेगा और अमेरिका टट्टू जैसा आचरण करेगा तो ख़ुद अमेरिका के पैदा किए हुए तालिबान और अलकायदा जैसे भस्मासुरों का यहाँ-वहां निशाना बनने से भला कब तक बचेगा. भारतीय विदेशनीति के चलते इसकी छवि दिन-ब-दिन अमेंरिका-परस्त और पश्चिम परस्त बनती जा रही है. बेशक, आतंकवाद द्वारा साम्राज्यवाद का कोई विरोध नहीं किया जा सकता और अंततः यह साम्राज्यवाद को फायदा ही पहुंचता है लेकिन जो आतंकवादी संगठन सोचते हैं कि अपने ढंग से साम्राज्यवाद पर चोट कर रहे हैं उन्होंने भारत को भी निशाने पर ले लिया है.

इसके साथ ही, यह भी नहीं भूलना चाहिए कि आडवणी की रथयात्रा और बाबरी मस्जिद गिराए जाने के समय से हो रही घटनाएँ देश के अल्पसंख्यक समुदाय के अलगाव और अपमान को लगातार बढाती रही हैं. किसी क्रान्तिकारी विकल्प की गैर-मौजूदगी में उनकी गहन निराशा और घुटन बढ़ती जा रही है. जब गुजरात जैसे नरसंहार और टीवी पर बाबू बजरंगी जैसे लोगों को सरेआम अपनी बर्बर हरकतों का बयान करते दिखाने के बाद भी किसी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती और दूसरी तरफ महज़ अल्पसंख्यक होने के कारण हजारों नौजवानों  को गिरफ्तार और टॉर्चर किया जाता है, फर्जी मुठभेडों में मार दिया जाता है तो इस देश में इन्साफ मिलने की उनकी उम्मीद दिन-ब-दिन ख़त्म होती जाती है. ऐसे में गहरी निराशा और बेबसी की हालत में, कोई उपाय न देखकर प्रतिक्रियास्वरूप कुछ युवा आतंकवाद की तरफ मुड़ सकते है. मुंबई जैसी घटनाओं के बाद बना माहौल, जिसमे मीडिया की मुख्य भूमिका है, अल्पसंख्यकों के अलगाव को और बढा ही रहा है. अख़बारों में भी ऐसी अनेक घटनाओं की खबर आई है कि २६ नवंबर के बाद स्कूल से लेकर कार्यालय और रेल-बस तक में लोगों को उनके मजहब के कारण अपमानित किया गया है. बुर्जुआ राज्य के हित में दूर तक सोचने वाले कुछ संजीदा बुद्धिजीवी संयम से काम लेने की सलाह दे रहे हैं और ऐसी बाते कर रहे हैं कि संकट की इस घडी में हम सबको एक रहना चाहिए, आदि-आदि. लेकिन प्रकारान्तर से ये भी उस समुदाय के अलगाव को बढाने का ही काम कर रहे हैं जिसकी वफादारी को हिंदू कट्टरपंथी पाकिस्तान से जोड़कर उसे गैर-देशभक्त साबित करने पर तुले रहते हैं.

इस वक्त देश की एकता की काफी बातें की जा रही हैं मानों टाटा-बिड़ला-अम्बानी से लेकर २० रूपये रोज़ पर जीने वाले ८४ करोड़ गरीब लोगों तक सबके हित एक ही हैं. आज तक देशभर में होने वाले बम-विस्फोटों, दंगे-फसाद में हजारों आम लोग मरते रहे, उनके घर जलते रहे पर इतना बडा मुद्दा कभी नहीं बना. इस बार सबसे अधिक बवंडर इसलिए भी मचा है क्योंकि आतंकवादियों ने ताज होटल जैसे भारत के “आर्थिक प्रतीकचिह्नों” पर हमला किया है. उस ताज होटल पर जिसके बारे में एक अख़बार ने लिखा कि ताज में घुसने पर पता चलता है कि विलासिता और शानो-शौकत क्या होती है ! जिसके एक सुइट का एक दिन का किराया एक मजदूर की साल भर की कमाई से ज़्यादा होता है ! छत्रपति शिवाजी टर्मिनस पर सबसे बड़ी संख्या में मारे गये आम लोगों के लिए इतनी चिंता और दुःख नहीं जताया जा रहा जितना की ताज और ओबरॉय होटलों में मरने वाले लोगों के लिए. सीएसटी  स्टेशन पर मरने वाले सारे लोग आम लोग थे- कोई दिनभर की मेहनत के बाद घर लौट रहा था, कोई परिवार सहित अपने गाँव जा रहा था, कोई नौकरी के इंटरव्यू के लिए ट्रेन पकड़ने आया था. लेकिन इस समाज में आम आदमी की जिंदगी भी सस्ती होती है और उसकी मौत भी.

मुंबई की घटना के बाद उद्योगपतियों से लेकर फ़िल्म-स्टारों तक उपरी तबके के तमाम लोग अचानक आतंकवाद के खिलाफ सड़क पर उतर आये क्योंकि इस हमले ने पहली बार उनके भीतर अपनी जान का भय पैदा कर दिया है. अब तक आतंकवादी हमलों में अक्सर आम लोग ही मरते थे और वे सोचते थे बंदूकधारी सिक्यूरिटी गार्डों और ऊँची दीवारों से घिरे अपने बंगलों में वे सुरक्षित हैं, लेकिन इस बार उन्हें लगने लगा कि अब तो हद ही हो गयी ! अब तो हम भी महफूज नहीं!

लेकिन इसका एक दूसरा पहलू भी है. यह घटना देश की चोर, भ्रष्ट, विलासी और आपराधिक नेताशाही के खिलाफ़ आम जनता को स्वर देने का भी जरिया बन गयी. नेताओं की लूट-खसोट, निकम्मेपन और ख़ुद भयंकर खर्चीले सुरक्षा तन्त्र में रहते हुए जनता की सुरक्षा पर ध्यान न देने वाले नेताओं पर लोगों का गुस्सा फूट पडा. इस घटना पर लोगों की प्रतिक्रियाओं के कई पहलू थे लेकिन सबसे अधिक नफ़रत और गुस्सा हर पार्टी की नेताशाही के खिलाफ़ था. किसी ने कहा कि नेता बार-बार कहते हैं कि वे जनता के लिए प्राण न्यौछावर कर देंगे तो क्यों नहीं वे अपनी सुरक्षा छोड़कर लोगों के बीच चले आते. एक महिला ने कहा कि जितनी सुरक्षा एक-एक नेता को दी जाती है उतने में बच्चों के एक-एक स्कूल की सुरक्षा का इंतजाम किया जा सकता है- क्या सैंकडों बच्चों की जान एक नेता से भी कम कीमती है? बेशक, लोगों के गुस्से का यह उभार तात्कालिक है और किसी संगठित आन्दोलन के आभाव में जल्दी ही यह शांत हो जाएगा, लेकिन इसने सत्ताधारियों की पूरी जमात को इस बात का अहसास जरूर करा दिया होगा कि जनता  के मन में नेताओं के खिलाफ़ किस क़दर नफ़रत  भरी हुई है.

मुंबई की घटना कोई अलग-थलग घटना नहीं है और न ही सुरक्षा के सरकारी उपायों को चुस्त-दुरस्त करने से ऐसी घटनाओं की पुनरावृति को रोका जा सकता है. प्रश्न को व्यापक सन्दर्भों में देखना होगा. आतंकवाद एक वैश्विक परिघटना भी है जिसकी जड़ें साम्राज्यवादी देशों की नीतियों में हैं. भारतीय समाज का भी यह एक असाध्य रोग बन चुका है जिसे यहाँ की आर्थिक-राजनितिक स्थितियों ने पैदा किया है और खाद-पानी दिया है. यह पूंजीवादी व्यवस्था के चौतरफा संकट की ही एक अभिव्यक्ति है. विभिन्न रूपों में आतंकवादी घटनाएँ पूरे देश में हो रही हैं. इस व्यवस्था के पास इसका कोई समाधान नहीं है, बल्कि व्यवस्था का आर्थिक संकट इसके लिए और जमीन तैयार कर रहा है. आतंकवाद इस व्यवस्था का एक ऐसा नासूर है जो रिसता रहेगा और समाज में कलह और तकलीफ पैदा करता रहेगा. लोगों को आपस में लडाने वाली इस लुटेरी और अत्याचारी व्यवस्था के नाश के साथ ही इस नासूर का भी अंत होगा.

जनता का एक हिस्सा इन बातों को समझता भी है लेकिन जनता का बड़ा हिस्सा अंधराष्ट्रवादी जूनून में भी बहने लगता है. शासक वर्ग के हित भी इससे पूरे होते हैं. आतंकवाद रोकने के नाम पर संघीय जाँच एजेंसी गठित करने और पोटा से भी कड़ा कानून बनाने की जो कवायदें की जा रही हैं उनसे आतंकवाद को तो रोका नहीं जा सकेगा मगर इनका असली इस्तेमाल होगा मेहनतकशों के आंदोलनों को कुचलने के लिए. रासुका और टाडा से लेकर पोटा तक इसके उदाहरण हैं.

हर तरह का आतंकवाद जनता की वास्तविक मुक्ति के आन्दोलन को नुकसान पहुंचाता है. आतंकवाद के रास्ते से जनता कुछ हासिल नहीं कर सकती. असली सवाल एक क्रान्तिकारी विकल्प खडा करने का है. मेहनतकश वर्ग के उन्नत, वर्ग सचेत तत्वों को इस बात को समझना होगा और व्यापक मेहनतकश अवाम को इसके लिए संगठित करने की तैयारी करनी होगी.

“बिगुल” दिसंबर २००८ से साभार

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    […] आतंकवाद इस पूंजीवादी व्यवस्था का … 27 दिसं 2008 … जब गुजरात जैसे नरसंहार और टीवी पर बाबू बजरंगी जैसे लोगों को सरेआम अपनी बर्बर हरकतों का …. मर्यादपुर में देहाती मजदूर यूनियन एक बार फिर संघर्ष की तैयारी में-इस खबर का … samajvad.wordpress.com/2008/12/27/आतंकवाद-इस-पूंजीवादी-व्य/ – 142k – संचित प्रति – समान पृष्ठ […]

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