फ़िर सताने लगा है पूंजीवादी दुनिया को कम्युनिज़्म का हौवा!

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फ़िर साम्राज्यवादियों-पूंजीपतियों को आने लगे हैं

मजदूर क्रांति के भयावह दु:स्वप्न!!

अक्टूबर क्रांति के नए संस्करण अवश्यम्भावी हैं


इस वर्ष (नए कैलेंडर के अनुसार ७ नवंबर को) रूस की सोवियत समाजवादी क्रांति या अक्टूबर क्रांति शताब्दी की अन्तिम दशाब्दी में प्रवेश कर रही है. यानि विश्व इतिहास की पहली समाजवादी क्रांति को अभी सौ साल भी पूरे नहीं हुए हैं, उसकी पराजय (१९५६ में ख्रुश्चेव के नेत्रत्व में सोवियत संघ में पूंजीवादी पुनर्स्थापना के समय से जोड़कर) के बाद अभी लगभग आधी शताब्दी का समय बीता है और उस क्रांति की परम्परा को आगे बढाने वाली चीन की सर्वहारा क्रांति की पराजय (१९७६ में माओ त्से तुंग की म्रत्यु के बाद चीन देङ्पन्थियोँ द्वारा शुरू की गई पूंजीवादी पुनर्स्थापना के समय से जोड़कर) के बाद अभी करीब तीन दशकों का समय ही बीता है. लेकिन धरती की सतह के नीचे से, सोयी हुई सर्वहारा क्रांति की हलचलें फ़िर से महसूस होने लगी हैं. पूंजीवाद के अमरत्व के सारे नुस्खे नीमहकीम साबित हुए हैं. जिसे पूंजीवाद ने चमत्कारी पुनर्नवा रस समझा था वह बोका का बदबूदार अर्क निकला. अमेरिका से शुरू हुई मंदी अब न केवल विश्वव्यापी होकर १९३० के दशक की महामंदी और महाध्वंस के बाद के सबसे बड़े आर्थिक संकट का रूप ले चुकी है, बल्कि अर्थव्यवस्था के कारगर पुनर्गठन का कोई विकल्प भी सामने मौजूद नहीं दिख रहा है. जो लोग पूंजीवाद के अमरत्व के दावे करते हुए समाजवाद को भंगुर और अव्यवहारिक बता रहे थे, वे पूंजीवाद को दुश्चक्र से निकालने की कोई राह नहीं सुझा पा रहे हैं.


मौजूदा विश्वव्यापी वित्तीय संकट ने उस सर्वहारा क्रांति के विज्ञान को एक बार फ़िर सही साबित किया है, जिसके आलोक में अक्टूबर क्रांति हुई थी. एक बार फ़िर यह सिद्ध हो गया है कि साम्राज्यवाद के आगे पूंजीवाद की कोई और अवस्था नहीं है और ऐतिहासिक कारणों से साम्राज्यवाद की आयु भले ही लम्बी हो गई हो, लेकिन अब एक सामाजिक-आर्थिक संरचना और विश्व-व्यवस्था के रूप में पूंजीवाद के दीर्घजीवी होने की संभावना निश्शेष हो चुकी है. एक बार फ़िर यह सथापना वस्तुगत यथार्थ के रूप में उभरकर सामने आने लगी है कि साम्राज्यवाद की अवस्था सर्वहारा क्रांतियों की पूर्वबेला है.

वर्तमान विश्वव्यापी मंदी और आर्थिक तबाही के बारे में, एकदम सरल और सीधे-सादे ढंग से यदि पूरी बात को समझने की कोशिश की जाए तो यह कहा जा सकता है कि अंतहीन मुनाफे की अंधी हवस में बेतहाशा भागती बेलगाम वितीय पूँजी अंतत: बंद गली की आखरी दीवार से जा टकराई है. एकबारगी सब कुछ बिखर गया है. पूंजीवादी वित्त और उत्पादन की दुनिया में अराजकता फ़ैल गई है. कोई इस विश्वव्यापी मंदी को “वित्तीय सुनामी” कर रहा है तो कोई “वित्तीय पर्ल हार्बर”, और कोई इसकी तुलना वर्ल्ड ट्रेड टावर के ध्वंस से कर रहा है. दरअसल वित्तीय पूँजी का आन्तरिक तर्क काम ही इस प्रकार करता है कि निरुपाय संकट के मुकाम पर पहुंचकर वे आत्मघाती आतंकवादी के समान व्यवहार करते हुए विश्व पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की पूरी अट्टालिका में काफी हद तक या पूरी तरह से ध्वंस करने वाला विस्फोट कर देती है.

हालाँकि इस पूरी स्थिति का विस्तृत विश्लेषण तो यहाँ सम्भव नहीं है, लेकिन संक्षेप में बात करते हुए भी बेहतर यही होगा कि, जैसाकि अक्सर कहा जाता है, शुरू से ही शुरू करें.

पूंजीवाद का बीज-शब्द है : मुनाफा | वह हर चीज़ को खरीद-फरोख्त की चीज़ बना देता है. वह मजदूर की श्रमशक्ति को भी माल में बदल देता है. पूंजीपति मजदूर को उसकी श्रमशक्ति के मूल्य के बराबर मजदूरी देता है और उस मूल्य से ज्यादा मजदूर का श्रम जो कुछ भी पैदा करता है, उसे हड़प लेता है. मजदूर से निचोड़े गये इस अतिरिक्त मूल्य को ही वह पूंजी में बदलकर उसका निवेश करता है और फ़िर मजदूर को और अधिक निचोड़ता है. जितना अधिक निचोडा जाता है उतना ही पूँजी संचय होता है और जितना अधिक पूँजी संचय होता है, उतना ही अधिक निचोडा जाता है. पूँजी संचय का यह निरपेक्ष और सामान्य नियम है कि समाज के एक छोर पर संपत्ति का संचय होता है और दूसरे छोर पर गरीबी का संचय. राष्ट्रिय आय में मजदूरी का हिस्सा घटते जाने और पूंजीपतियों द्वारा लूटे गए अतिरिक्त मूल्य का हिस्सा बढ़ते जाने के साथ ही सर्वहारा वर्ग की सापेक्षिक गरीबी बढती जाती है और साथ ही श्रम दशाओं और जीवनदशाओं में लगातार गिरावट उसे निरपेक्ष दरिद्रता में धकेलती जाती है. ज़्यादा मुनाफा निचोड़ने के लिए पूंजीपति एक ओर तो काम के घंटों को बढाकर मजदूर को उजरती गुलाम बना देते है, दूसरी ओर उन्नत मशीनेँ लगाकर मजदूरों की बड़ी आबादी की छंटनी करके कम मजदूरों से उतनी ही या उससे भी कम पगार देकर ज़्यादा उत्पादन करते है, क्योंकि श्रम बाज़ार में मजदूरों की बहुलता के चलते श्रमशक्ति का मोल घट गया रहता है. समस्या यह पैदा हो जाती है कि मुनाफा कूटने की अंधी हवस में पूंजीपति अराजक ढंग से ज़्यादा से ज़्यादा माल पैदा करते हुए सर्वहारा सहित सभी आम उत्पादकों को कंगाल करके उनकी क्रयशक्ति कम करते चले जाते है. क्रयशक्ति के सापेक्ष सामाजिक उत्पादन की अधिकता हो जाती है. गोदामों-दुकानों में माल अंटे पड़े रह जाते हैं और लोग उन्हें खरीद नहीं पाते. अतिरिक्त मूल्य पूंजीपति के पास नहीं आ पाता है. मंदी छा जाती है. उत्पादन रुकने लगता है. पूँजी नष्ट होने लगती है.

साथ ही पूंजीवाद के अंतर्गत अलग-अलग कारखानों में तो उत्पादन संगठित रहता है, लेकिन सामाजिक उत्पादन में अराजकता व्याप्त रहती है. जिस क्षेत्र में मुनाफा अधिक होता है, पूंजीपति आपस में होड़ करते हुए उधर भाग निकलते हैं और उतना पैदा कर देते है, जितने के खरीददार नहीं होते. व्यापारिक गतिविधियाँ भी बनावटी मांग पैदा करके समाज की वास्तविक क्रयशक्ति को छुपाती हैं. जब तक बाज़ार में दाम चढ़ते रहते हैं, व्यापारी उद्योगपतियों को माल का आर्डर देते रहते हैं और बैंकर उन दोनों को ऋण मुहैया कराते रहते हैं. इस प्रकार बाज़ार में एक कृत्रिम समृद्धि बनी रहती है जो सापेक्षिक अतिउत्पादन पर पर्दा डालने का काम करती है. जब यह पर्दा हटता है तो मंदी और आर्थिक संकट का दौर सामने आता है. कई उपादान होते हैं जो कृत्रिम समृद्धि के इस पर्दे को ज़्यादा से ज़्यादा लंबे समय तक बनाए रखते हैं और यह समय जितना ही लंबा होता है, पर्दा उतरने के बाद की असलियत भी उतनी ही अधिक भयावह होती है. जैसे, सूद से मुनाफा कमाने वाली बैंकिंग पूँजी विशेषकर मध्यवर्गीय उपभोक्ताओं को कारखानों में उत्पादित माल खरीदने के लिए तरह-तरह के आकर्षक ऋण-पैकेज देती हैं. तमाम बैंक ज़्यादा से ज़्यादा उपभोक्ताओं को लुभाने के लिए ज़्यादा से ज़्यादा लुभावनी शर्तों पर ऋण देने के लिए लुभाते हैं. फ़िर उनकी यही तिकडम तब आत्मघाती सिद्ध होती है जब क्षमता से अधिक ले चुके लोग क़र्ज़ लौटा नहीं पाते, फलत: बैंक डूबने लगते है, वित्त बाज़ार में मंदी आ जाती है, जो वास्तविक उत्पादन के क्षेत्र में गिरावट और मंदी को और अधिक गंभीर बना देती है. आगे हम देखेंगे कि यही चीज़ अधिक वित्तीय जटिलताओं के साथ हाल के उस अमेरिकी सबप्राइम संकट के रूप में घटित हुई, जिससे वर्तमान विश्वव्यापी मंदी की शुरुआत हुई.

उन्नीसवीं शताब्दी से ही पूंजीवाद एक कुंडलाकार रास्ते से होकर, संकट मंदी के दौर, उबरने के दौर, और फ़िर तेज़ी के दौर के चक्रों से गुजरता रहता था. फ्रेडरिक एंगेल्स ने इसका वर्णन इस प्रकार किया था : “रफ्तार तेज़ हो जाती है; धीमे कदम तेज़ कदमों में बदल जाते है. औद्योगिक तेज़ कदम दौड़ते तेज़ कदमों में बदल जाते हैं. दौड़ते कदम उद्योग, वाणिज्य, क्रेडिट और सट्टाबाज़ारी गतिविधियों की लंगड़ी दौड़ में फर्राटा बन जाते हैं. अंत में कई अन्तिम, बदहवास छलांगों के बाद यह ध्वंस के रसातल में गिर पड़ते हैं.” पूंजीवाद संकट और मंदी, उससे उबरने, और फ़िर तेज़ी के चक्रों से लगातार गुजरता रहा है. लेकिन हर अगली बार संकट पहले से अधिक गंभीर होकर आता रहा है. संकट के दो चक्रों के बीच का अन्तराल प्राय: कम होता जाता रहा है और यदि कभी ऐसा नहीं होता रहा है तो अगली बार संकट अधिक भीषण रूप में सामने आता रहा है. इस प्रक्रिया में एक नया मुकाम था १९३० के दशक की महामंदी और आर्थिक महाध्वंस, और वृद्धावस्था के असाध्य, अन्तकारी रोग जैसी नयी परिघटना सामने आई १९७० के दशक से लगातार जारी दीर्घकालिक आर्थिक संकट के रूप में. १९७३-७४ के बाद से ही स्थिति यह है कि रोगी की तबीयत बीच-बीच में संभलती है, कुछ राहत एवं उम्मीदों के आसार नजर आते हैं और फ़िर रोगी नीमबेहोशी में चला जाता है. यानि आवर्ती चक्रीय क्रम आने वाले संकट के दौर के बाद ढांचागत संकट का एक ऐसा दीर्घकालिक दौर शुरू हुआ है, जिसके बीच-बीच में राहत और सापेक्षिक तेज़ी की कुछ अल्पकालिक तरंगें उठती रही हैं और अब सितंबर-अक्टूबर, २००८ में, लगभग दो वर्षों तक सबप्राइम संकट की मौजूदगी के बाद अमेरिका में वित्तीय ध्वंस के साथ ही विश्व वित्तीय तंत्र के धराशायी होने और वास्तविक अर्थव्यवस्था में ठहराव और विघटन-सकुंचन का जो सिलसिला एक नई विश्वव्यापी मंदी के रूप में सामने आया है, उसने पूरी पूंजीवादी दुनिया में हडकम्प मचा दिया है. लेकिन बेहतर होगा कि आज पैदा हुई परिस्थिति को ठीक-ठीक समझने के लिए हम थोड़ा पीछे लौटकर सिलसिलेवार बात को आगे बढायें.

उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम चतुर्थाश तक यूरोप और अमेरिका में पूँजी संचय और पूंजीवादी आर्थिक विकास सरपट रफ्तार से दौडते हुए ठहराव के दौर में प्रविष्ट हो चुके थे. आपस में होड़ करते हुए युरोपीय पूंजीपतियों ने अपने मुनाफे को उस हद तक बढा लिया था कि अब और कमाने की गुंजाईश नहीं रह गई थी. उपनिवेशों की जिस अकूत लूट ने यूरोप में औद्योगिक क्रांति के लिए जरूरी प्रारम्भिक पूंजी मुहैया की थी, वही अब पूंजी की प्रचुरता के संकट को बढाने का काम कर रही थी. इस समस्या के समाधान के प्रयासों ने कई नई प्रक्रियाओं को जन्म दिया. १८७३-१८९६ की पहली मंदी के दौर में, विनिर्माण क्षमता और निर्यात के स्तर में बढोत्तरी के साथ-साथ, यूरोपीय महाद्वीप के कई देश और अमेरिका ब्रिटिश आधिपत्य को चुनौती देने लगे थे. पूंजी के संकेन्द्रण की प्रक्रिया तेज़ हो गई, इजारेदारी मुख्य प्रवृति बनने लगी, बड़ी कम्पनियों ने छोटी कम्पनियों को निगल लिया और गलाकाटू प्रतिस्पर्द्धा में टिके रहने के लिए तथा दाम एवं उत्पादन-नीतियों पर नियंत्रण के लिए, उन्होंने कार्टेल,ट्रस्ट, होल्डिंग कम्पनी, वृहद कारपोरेशन आदि तरह-तरह की संस्थाएं खड़ी कीं. एकाधिकारी बनते पूंजीपति घराने देशों के भीतर भी मजदूरों और अन्य प्रत्यक्ष उत्पादकों को निचोड़ने के लिए गलाकाटू होड़ कर रहे थे और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी, अलग-अलग पूंजीवादी देशों के पूंजीपति अपने-अपने देशों की राज्यसत्ताओं के सहारे नये बाज़ारों के लिए प्रतिस्पर्द्धारत थे. नए नए उपनिवेशों के लिए छीना-झपटी तेज़ हो चुकी थी. अपने विराट भूभाग में अश्वेत दासों और मजदूरों के श्रम को निचोड़कर विपुल पूंजी संचय के बाद अमेरिकी पूंजीपति वर्ग को (अधिकांश लैटिन अमेरिकी देशों के मुक्ति-युद्धों में स्पेनी उपनिवेशवादियों के पीछे हटने के बाद) लैटिन अमेरिका को लूट का संरक्षित क्षेत्र बनाने का अवसर मिल चुका था. पूंजी की प्रचुरता के रूप में प्रकट होने वाले अतिउत्पादन के संकट को हल करने की लिए यूरोपीय उपनिवेशवादियों ने उपनिवेशों में पूंजी के निर्यात की शुरुआत की, जो धीरे-धीरे माल के निर्यात पर हावी हो गई. पूंजी के निर्यात को तेज़ और सुगम बनाने के लिए बैंकिंग पूंजी और औद्योगिक पूंजी मिलकर एक हो गए और साम्राज्यवादी वित्तीय पूंजी का जन्म हुआ, जिसने फ़िर आगे बढ़कर अर्थतंत्र की नियंत्रणकारी चोटियों पर कब्जा जमा लिया. यूँ तो बैंक और अन्य मुद्रा पूंजी पहले से मौजूद थे जो उद्योगों, व्यापारों, सरकारों और आमजनों को ऋण देने का और सूद लेने का काम करते थे. लेकिन उन्नीसवीं शताब्दी के अंत तक वित्तीय पूंजी के अदृश्य हाथ पश्चिमी देशों में एकाधिकारी घरानों के माध्यम से सारी औद्योगिक गतिविधियों को नियंत्रित करने के साथ ही उपनिवेशों को भी नियंत्रित करने लगे थे.

उन्नीसवीं शताब्दी के नवें दशक से लेकर पहले विश्वयुद्ध के प्रारम्भ तक उपनिवेशवादी ताकतों ने प्रतिवर्ष औसतन २,४०,००० वर्गमील उपनिवेशों का विस्तार किया जो उस सदी के प्रथम ७५ वर्षों के प्रति वर्ष औसत विस्तार से तीन गुना था. विस्विन शताब्दी शुरू होते-होते घरेलू बाज़ार-निर्देशित य्रुपीय-अमेरिकी पूंजीवाद एकाधिकारी कम्पनियों द्वारा नियंत्रित साम्राज्यवाद की शक्ल अख्तियार कर चुका था. यूरोप, अमेरिका के आन्तरिक और विदेश-व्यापर दोनों ही क्षेत्रों में “मुक्त व्यापार” का स्थान संरक्षणवाद ले चुका था. उपनिवेशों के संरक्षित बाज़ारों के रूप में पूरी दुनिया साम्राज्यवादियों के बीच बंटी हुई थी, अत: उसके पुनर्विभाजन के लिए युद्ध लाजिमी था. विशेषकर जर्मन साम्राज्यवाद अपनी बढ़ती आर्थिक शक्ति के साथ ब्रिटेन को सामरिक तौर पर भी चुनौती दे रहा था. इसकी अन्तिम परिणति प्रथम विश्वयुद्ध (१९१४-१९१९) के रूप में सामने आई. युद्ध में पराजित जर्मनी तो विश्व बाज़ार में अपनी हिस्सेदारी नहीं बढा पाया, लेकिन साम्राज्यवादी तंत्र के शीर्ष पर आसीन ब्रिटेन को भी काफी नुकसान उठाना पडा. अमेरिका को कोई नुकसान नहीं हुआ, उल्टे युद्ध जर्जर यूरोप के पुनर्निर्माण कार्यों में पूँजी लगाकर उसने जमकर मुनाफा बटोरा. जर्मनी ने फ़िर तेज़ी से अपनी उत्पादक शक्तियों का विकास किया और जापान एवं इटली के साथ धुरी बनाकर आक्रामक ढंग से पुन: विश्व बाज़ार पर प्रभुत्व के लिए अपनी दावेदारी पेश की जिसका नतीजा दूसरे विश्वयुद्ध (१९३९-४५) के रूप में सामने आया. दो विश्वयुद्धों के बीच का समय ऐतिहासिक अफरा-तफरी भरा दौर था- १९३० के दशक की महामंदी, विश्व बाज़ार के बंटवारे की खींचतान में नये-नये व्यापार गुटों और मुद्रा गुटों का निर्माण, डॉलर-स्वर्ण मानक की स्थापना …आदि. लेकिन पूंजीवादी विश्व को झकझोर देने वाले सर्वाधिक युगांतरकारी घटना थी-रूस में हुई १९१७ की पहली समाजवादी क्रांति. गृहयुद्ध और प्रतिक्रांति के प्रयासों से उबरने के बाद समाजवादी निर्माण के वर्षों के दौरान सोवियत संघ में यूरोपीय औद्योगिक क्रांति की रफ्तार को भी पीछे छोड़ देने वाले गति से आर्थिक प्रगति हुई. दूसरे विश्वयुद्ध में नात्सियों की पराजय सोवियत सेना के हाथों ही संभव हो सकी.

उपनिवेशों में पूंजी-निर्यात की तार्किक-परिणति ने उपनिवेशवादियों के न चाहते हुए भी औपनिवेशिक-अर्द्धऔपनिवेशिक आर्थिक-सामाजिक संरचनाओं में पूंजीवाद के बीज डाल दिए. पुराने प्रतिरोध-युद्धों का स्थान राष्ट्रिय मुक्ति संघर्षों ने ले लिया, जिनके लिए समाजवादी सोवियत संघ प्रेरणा एवं सहायता का एक अहम स्त्रोत था. दूसरे विश्वयुद्ध के बाद पूरा पूर्वी यूरोप समाजवादी शिविर में शामिल हो गया. चीन में सामंतवाद-साम्राज्यवाद के विरुद्ध नवजनवादी क्रांति कम्युनिस्ट पार्टी के नेत्रत्व में सम्पन्न हुई. उत्तर वियतनाम और उत्तर कोरिया की राष्ट्रीय मुक्ति भी कम्युनिस्ट नेत्रत्व में ही हासिल हुई. साथ ही, उपनिवेशों की मुक्ति का अविराम सिलसिला शुरू हो गया जो कमोबेश १९७० के दशक तक जारी रहा.

अब अमेरिका की स्थिति पर चर्चा के लिए पीछे लौटते हैं. प्रथम महायुद्ध में कोई नुकसान उठाने की बजाय अमेरिका ने युरप में भी पुनर्निर्माण के कार्यों में पूँजी लगाकर खूब मुनाफा कमाया. “ऑटोमोबाइल-क्रांति” में भी वह अग्रणी था. तेज़ विकास ने जल्दी ही उसके सामने अतिउत्पाद और पूंजी की प्रचुरता का संकट ला खडा किया जिसका नतीजा १९३० के दशक की महामंदी और आर्थिक ध्वंस के रूप में सामने आया. चूंकि साम्राज्यवाद के दौर में पूंजी के राष्ट्री धडों द्वारा संगठित “बाज़ार संरक्षणवाद ” के बावजूद विश्व अर्थतन्त्र ज्यादा गुंथा-बुना हुआ था, इसलिए अमेरिका से उठी महामंदी की आंधी ने यूरोप को और उपनिवेशों को भी अपनी चपेट में ले लिया. जब विकसित देशों में माल बिकने की गुंजाईश ही कम हो गयी हो तो उपनिवेशों से कच्चे मॉल और कारखाना-उत्पादों की आपूर्ति पर भी प्रभाव पड़ना ही था. ब्रिटिश अर्थशास्त्री जॉन मेनार्ड कीन्स के “कल्याणकारी राज्य” के नुस्खों और अमेरिकी राष्ट्रपति रूजवेल्ट के “न्यू डील” ने अमेरिका को महामंदी से उबरने में अहम भूमिका निभाई. इन दोनों का सारतत्व एक ही था. कीन्स का कहना था कि चूंकि पूंजी की स्वतंत्र गति स्वयं पूंजीवाद के सामने ही अस्तित्व का संकट पैदा कर देती है और पूंजीपतियों की मुनाफा कमाने की होड़ अंतत: अतिउत्पाद और मंदी का संकट पैदा कर देती है, अत: पूंजीवाद को पूंजीपतियों से बचाने के लिए राज्य का हस्तक्षेप कई रूपों में लाजिमी होता है. एक तो यह कि आर्थिक विकास में संतुलन लाने के लिए, जिन क्षेत्रों में पूंजीपति निवेश न कर रहे हों, उनमें राज्य स्वयं पूंजीपति की भूमिका निभाते हुए निवेश करें यानि जनता के पैसे को निवेश करके पूंजीवाद का हितसाधन करें. दूसरे, मेहनतकशों के सामाजिक विस्फोटों से व्यवस्था को बचाने के लिए, राज्य आगे आकर सामाजिक सुरक्षा की कुछ स्कीमें लागू करे और पूंजीपतियों पर श्रम कानूनों को लागू करने तथा मजदूरों को कुछ हक-रियायते देने के लिए दबाब बनाये. तीसरे, मंदी की मार से पूंजीवादी उत्पादन तंत्र जब ध्वस्त हो जाए तो उस समय उसे विशेष मदद देकर फ़िर से खडा करे और बडे पैमाने पर बेरोजगार मजदूर आबादी को भी राहत देकर समाजी असंतोष के विस्फोट को रोके. जाहिर है कि इस सबका बोझ भी सरकारी खजाने को, यानि जनता को ही उठाना था. कीन्स के “कल्याणकारी राज्य” के नुस्खे ने वस्तुत: कुछ फार्मूले समाजवाद से उधार लिए थे. उसका एक उद्देश्य मजदूर असंतोष पर सुधार-कल्याण के छींटे मारकर समाजवाद के खिलाफ एक वैचारिक मोर्चाबंदी करना भी था. रूजवेल्ट के ‘न्यू डील’ ने कीन्सियाई नुस्खों पर ही अमल करते हुए अमेरिका को मंदी से उबारने में अहम भूमिका निभाई. उधर युद्ध की तैयारियों ने यूरोप को भी मंदी से राहत दे दी.

दूसरे विश्वयुद्ध के बाद साम्राज्यवादी देशों के बीच उभरे नये शक्ति-संतुलन के अनुरूप विश्व पूंजीवादी तन्त्र का पुनर्गठन हुआ. जर्मनी, जापान और इटली के ध्वस्त हो जाने, पूरे यूरोप के तबाह हो जाने और इंग्लैंड के दिवालियेपन के कगार पर खडा हो जाने के बाद नये पूंजीवादी विश्व के शीर्ष पर अमेरिका आसीन हुआ जो युद्ध की तबाही से न केवल अप्रभावित बच निकला बल्कि युद्ध ने उसकी अर्थव्यवस्था को महामंदी से निकालकर नई सेहत बख्शने का काम किया था. युद्ध से तबाह यूरोप के पुनर्निर्माण में पूँजी लगाकर अमेरिका ने खूब मुनाफ़ा कमाया. जर्मनी और जापान को बैसाखी थमाते हुए, मार्क और येन को ताकतवर बनाने की प्रक्रिया में डॉलर ख़ुद भी अपनी ताकत बढ़ता रहा. ब्रेट्टनवुड्स समझौते (१९४४) ने इसी नये आर्थिक यथार्थ को संहिताबद्ध किया. डॉलर दुनियाभर की मुद्राओं का सरदार बना, विश्व वित्तीय व्यवस्था में डॉलर-स्वर्ण मानक लागू हुआ, यानि अमेरिका ने तमाम देशों के केन्द्रीय बैंकों में जमा डॉलरों का मूल्य सोने में चुकाने का वायदा किया. अमेरिकी पूंजी के हितों को शीर्ष पर रखते हुए पूरे साम्राज्यवादी गिरोह की पूँजी के विश्वव्यापी प्रवाह को उचित चैनलों से संचालित-निर्देशित करने की लिए विश्व बैंक और आई.एम.एफ. जैसी अन्तरराष्ट्रिय संस्थाओं का निर्माण हुआ. १९४७ के गैट करार ने साम्राज्यवादी पूंजी और मुख्यत: अमेरिकी पूंजी की राह के व्यापारिक अवरोधों को कम करके विश्व-बाज़ार पर उसके वर्चस्व को पुख्ता बनाने का काम किया.

अमेरिका ने तीसरी दुनिया के बहुतेरे देशों में उपनिवेशवाद की राख पर अपना एक नवऔपनिवेशिक तन्त्र खडा किया. इन अमेरिकी नवउपनिवेशों में प्राय: किसी तानाशाह की सत्ता होती थी, देश की आज़ादी बस नाममात्र की होती थी, जनता के जनवादी अधिकार नगण्य होते थे और अर्थतन्त्र पूरी तरह से अमेरिकी अर्थतन्त्र के साथ नत्थी होता था. जो नवस्वाधीन देश थे, उनको पूंजी और टेक्नोलॉजी देकर सीधे और आई.एम.एफ.-विश्वबैंक के जारी ऋण एवं अनुदान देकर ( तथा, सूद वसूलकर और पूंजी निवेश की अनुकूल शर्तें हासिल करके) तथा विश्व बाज़ार पर अपने अधिपत्य का लाभ उठाकर अमेरिका अपनी लूट का शिकार बनाता था. इन देशों के शासक पूंजीपति अन्तरसाम्राज्यवादी प्रतिस्पर्द्धा का लाभ उठाकर तथा अपने देश की जनता को निचोड़कर ‘पब्लिक सेक्टर’ खडा करके साम्राज्यवादी दबाब का मुकाबला करते थे और अपने आर्थिक विकल्पों का विस्तार करते थे, लेकिन कुल मिलाकर उनकी भूमिका नई विश्व-व्यवस्था में “जूनियर-पार्टनर” की ही थी. १९८० के दशक तक दुनिया के अधिकांश नवउपनिवेशों का ख़ात्मा हो चुका था. अब नई विश्वव्यवस्था में मुख्यत: उत्पादक शक्तियों के विकास और पूंजी के बूते ही साम्राज्यवादी (जिनमें अमेरिका प्रमुख था) देश पिछडे देशों की जनता को लूटते थे और इसमें इन पिछडे देशों के पूंजीपति शासक उनके सहयोगी की भूमिका निभाते थे. राजनितिक दबाब का पहलू मौजूद रहता था, लेकिन गौण रूप में.

१९५६ में सोवियत संघ में पूंजीवादी पुनर्स्थापना के कुछ वर्षों बाद, समाजवादी अतीत की विशिष्ट सामाजिक-आर्थिक संरचना का लाभ उठाकर अपेक्षाकृत कमज़ोर उत्पादक शक्ति होने के बावजूद सोवियत संघ एक आक्रामक साम्राज्यवादी अतिमहाशक्ति के रूप में उभरा. अमेरिका के साथ उसकी उग्र प्रतिस्पर्द्धा का लाभ तीसरी दुनिया के पूंजीपति वर्ग ने भी उठाया और दूसरी ओर जर्मनी और जापान जैसी नये सिरे से उभरती साम्राज्यवादी शक्तियों ने भी. दूसरे विश्वयुद्ध के बाद लगभग दो दशकों तक पूंजीवादी विश्व का विकास असाधारण तेज़ गति से हुआ. युद्ध से हुए नुकसान की भरपाई, युद्ध के दौरान आम उपभोक्ता सामग्रियों के उत्पादन में हुई कटौती से पैदा हुई. अभाव की पूर्ति, युद्ध के लिए विकसित टेक्नोलॉजी के युद्धेत्तर उत्पादनों में इस्तेमाल, उष्ण और शीतयुद्धों की नई श्रंखला तथा ऋण, अनुदान, सहायता और सीधे पूंजी-निवेश के जारी तीसरी दुनिया के देशों में (जहाँ पूंजीवादी विकास की प्रक्रिया जारी थी) पूंजी-निर्यात के परिणामस्वरूप पचास के दशक में पूंजी संचय के लिए अनुकूलतम परिस्थितियां तैयार हुई. लगा जैसे एक बार फ़िर पूंजीवाद का स्वर्णिम दौर आ गया. पर यह स्वप्न जल्दी ही टूट गया. पूँजी संचय का यह चरित्र है कि वह मांग की उस प्रेरक शक्ति को ही समाप्त कर देती है जो उसके लिए अनुकूल माहौल तैयार करती है. और वही हुआ. १९६० के दशक का अंत होते-होते वह स्थिति पैदा हो चुकी थी, जिसकी परिणति १९७४-७५ की तीव्र मंदी के रूप में हुई. यूरोप, विशेषकर, जर्मनी और जापान विदेश व्यापर और वित्तीय क्षेत्र में अमेरिका के निर्विवाद प्रभुत्व को चुनौती देने की स्थिति में पहुँचते जा रहे थे. डॉलर की शक्ति में आई सीधी गिरावट के कारण १९७१ में डॉलर का सोने से सम्बन्ध-विच्छेद हो गया.

यह पूरी स्थिति अमेरिकी प्रभुत्व के खात्मे की नहीं, बल्कि उसके पराभव के एक नये दौर की शुरुआत का संकेत दे रही थी. तीसरी दुनिया के देशों में अमेरिकी पूँजी की पैठ, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं पर उसका प्रभुत्व, सोवियत साम्राज्यवाद की सामरिक शक्ति का मुकाबला करने में यूरोप की विवशता- इन बहुतेरे कारणों से अमेरिका को अपना वर्चस्व बनाये रखने में मदद मिल रही थी. एक अहम कारण डॉलर-गोल्ड स्टैण्डर्ड के टूटने के बावजूद विश्व-मुद्रा के रूप में डॉलर की मौजूदगी भी रही है. आज तक की भी स्थिति यही रही है कि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार की मुख्य मुद्रा डॉलर है और दुनिया के लगभग सभी देशों (चंद एक को छोड़कर) का विदेशी मुद्रा भंडार डॉलर में है. डॉलर की स्थिति यदि एक झटके से बदले तो न केवल इन सभी देशों की अर्थव्यवस्थाओं में बल्कि पूरे वैश्विक अर्थतंत्र में भूचाल आ जाएगा. यही कारण है कि दुनिया का सबसे बडा कर्जदार होने के बावजूद अमेरिका डॉलर छपकर अपने घाटों की भरपाई क्र लेता है और ऋणदाता देशों को अमेरिकी सरकारी बांडों के कागज़ थमा देता है.

१९७६ में चीन में पूंजीवाद की पुनर्स्थापना और अस्सी के दशक के अंत तक सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप में राजकीय पूंजीवादी के ढांचे के टूटने और वहाँ पश्चिमी ढंग के नवक्लासिकी पूंजीवाद की स्थापना के बाद अमेरिका, यूरोप और जापान के सामने पूंजी-निवेश का नया क्षेत्र सामने आया. इधर तीसरी दुनिया के देशों के सामने भी, पश्चिमी देशों को चुनौती देने वाली एक महाशक्ति के विघटन के बाद. पश्चिमी साम्राज्यवादी दबाब के आगे झुकने के अतिरिक्त दूसरा कोई विकल्प नहीं बचा था. दूसरे, राजकीय पूंजीवादी ढांचा खडा करके सापेक्षित स्वतंत्रता के साथ पूंजीवादी विकास की संभावनाएं भी इन देशों में निचुड़ चुकी थी.साथ ही, अब तक पर्याप्त आर्थिक शक्ति जुटा चुका इन देशों का इजारेदार पूंजीपति वर्ग भी राजकीय उपक्रमों के निजीकरण और पश्चिमी देशों से पूंजी और टेक्नोलॉजी लेने के लिए दबाब बना रहा था. परिणामस्वरूप, तीसरी दुनिया के देशों ने अमेरिकी नेत्रत्व वाले पश्चिमी खेमे और आई.एम.एफ.-विश्व बैंक-गैट (अब विश्व व्यापर संगठन ) निर्देशित नुस्खों-नीतिओं को स्वीकार करके अपने देश के बाज़ारों-दरवाजों को साम्राज्यवादी पूंजी के लिए पूरी तरह से खोल दिया. पूरी दुनिया में नवउदारवादी नीतियों का नया दौर शुरू हो चुका था. साम्राज्यवादी और पिछडे देशों के पूंजीपतियों की इस बात पर आम सहमती थी कि सभी कीनिसयाई नुस्खों को त्यागकर शिक्षा, स्वास्थ्य आदि सभी क्षेत्रों को भी पूँजी निवेश का क्षेत्र बना दिया जाए तथा राज्य श्रमिकों के हितों की कानूनी हिफाजत का काम पूरी तरह से छोड़कर पूंजीपतियों को उनसे ज्यादा से ज्यादा अधिशेष निचोड़ने दे. बावजूद इसके, विश्व-अर्थव्यवस्था में १९७३-७४ से जारी दीर्घकालिक मंदी का अभूतपूर्व दौर जारी रहा. बीच-बीच में सुधार के कुछ लक्ष्ण दिखते थे, फ़िर पुराना रोग और अधिक उग्र होकर उभर आता था. १९७० के दशक में विश्व अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीति लगातार बढ़ती गयी. १९८० के दशक में क़र्ज़ न चुकाने का संकट और विदेशी मुद्रा विनिमय दरों की अनियंत्रित अस्थिरता सामने आई. फ़िर १९९० के वित्त का अभूतपूर्व अंतरराष्ट्रीयकरण हुआ तथा क़र्ज़ और सट्टेबाजी का घटाटोप-सा छा गया.

शेयर दलालों और बोन्डस के व्यापारियों की वित्तीय दुनिया पहले भी मौजूद थी, पर कुल मिलाकर सट्टेबाजी उद्योग की सतत धारा पर उठने वाले बुलबुले के समान ही थी. वित्त की दुनिया में शेयर बाज़ार नहीं, बल्कि बनी की भूमिका प्रधान थी. दूसरे विश्वयुद्ध के बाद इस स्थिति में परिवर्तन आने शुरू हुए और गत शताब्दी के नवें दशक तक स्थिति यह हो गयी थी कि वित्तीय पूंजी ने वास्तविक आर्थिक उत्पादन की सामान्य सहायक भूमिका से पूरी तरह स्वतन्त्र होकर, सम्पूर्ण विश्व अर्थव्यवस्था पर अपना प्रभुत्व कायम कर लिया. बैंक और बीमा कम्पनियां भी वास्तविक उत्पादन में निवेश के बजाय शेयर बाज़ार में निवेश करने लगीं. ताकि तुरत-फुरत मुनाफा सुनिश्चित हो. तीसरी दुनिया के देशों में भी जो पूँजी आ रही है, उसका बडा हिस्सा उस आवारा पूँजी का है जो तुंरत मुनाफे की आस में दुनिया भर के शेयर बाज़ारों का चक्कर लगाती रहती है. विदेशी (और देशी भी) पूँजी का एक छोटा हिस्सा उत्पादन कार्यों में लग रहा है और उसका भी बडा भाग नये कारखाने लगाने की बजाय पहले खडे कारखानों के अधिग्रहण में लग रहा है. कीन्स ने १९३६ में लिखा था : “उद्योग की स्थायी धारा पर उठने वाले सट्टेबाजी के बुलबुले कोई नुक्सान नहीं पहुंचा सकते. लेकिन स्थिति तब गंभीर हो जाती है जब उद्योग ही सट्टेबाजी के भंवर में सतह पर तैरने वाला बुलबुला बन जाता है, तब पूरी संभावना है कि बात बिगड़ जाए.” कीन्स ने तब यह सोचा भी नहीं होगा कि आधी सदी बाद ही उसकी यह बात किसी एक राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के लिए नहीं बल्कि पूरी विश्व अर्थव्यवस्था के लिए एक सच्चाई बन जायेगी. आज पूँजी का जो भी विश्वव्यापी प्रसार दिखाई दे रहा है वह विश्व के प्रमुख मुद्रा बाज़ारों में ऋण-सर्जन में सतत वृद्धि, मुद्रा पूँजी के अंतरराष्ट्रीय आवागमन और सट्टेबाजी के रूप में है. मुख्यत: निवेश शेयर बाज़ार बीमा जैसे वित्तीय क्षेत्रों में या विज्ञापन, मीडिया आदि अनुत्पादक क्षेत्रों में हो रहा है.

अमेरिक सबप्राइम संकट और उत्तरवर्ती विश्वव्यापी मंदी वास्तव में उसी अंदेशे का सही सिद्ध होना है जो कीन्स ने १९३६ में प्रकट किया था. वर्तमान संकट को ठीक से समझने के लिए इसकी कुछ पूर्ववर्ती कड़ियों की भी चर्चा जरूरी है.

नवउदारवादी नीतियों या भूमंडलीकरण के दौर में पहली बार, अतिउत्पाद और पूंजी के प्रचुरता के पुराने पूंजीवादी संकट की ही अभिव्यक्ति पूर्वी एशियाई संकट के रूप में सामने आई. इस संकट से निपटने के लिए अमेरिका के फेडरल रिज़र्व बैंक ने ब्याज दरें बेहद गिरा दीं. इसका लाभ डॉट-कम्पनियों ने उठाया. इन कम्पनियों का लक्ष्य था इन्टरनेट टेक्नोलॉजी के आधार पर आईडिया बेचना. इनका मानना था कि शुरुआत में कुछ घाटा उठाकर, फ़िर ब्रांड जागरूकता पैदा करके अपने उत्पादों और सेवाओं को बेचकर काफी मुनाफा कमाया जा सकता है. घाटा उठाने की अवधि के दौरान ये कम्पनियां वेंचर पूँजी (यानि शुरू करने के लिए प्रारम्भिक पूंजी) पर निर्भर थी, जो फेडेरल रिज़र्व बैंक ने बेहद कम ब्याज दरों व आसान शर्तों के कारण उन्हें तब आसानी से क़र्ज़ के रूप में प्राप्त हो रही थी. जल्दी ही इन कम्पनियों के शेयरों के दाम आसमान छूने लगे. मार्च, २००० इस डॉट-कॉम बुलबुले का चरमोत्कर्ष था. अभी तक भावी मुनाफे की उम्मीद में सैंकडों डॉट-कॉम कम्पनियां फेडेरल रिज़र्व बैंक की कम ब्याज दरों के सहारे लगातार हानि में काम कर रही थीं. जाहिर है कि नेटवर्क प्रभाव से इन सभी कम्पनियों का मुनाफा कमा पाना संभव नहीं था. हर सेक्टर में सिर्फ़ एक-दो ही ऐसे विजेता हो सकते थे जो प्रचार और सट्टेबाजी के जरिए हानि के दौर में अपने उपभोक्ताओं की संख्या इतनी बढा लेते थे कि बाद में मुनाफा कमा पाते.

२००१ तक स्थिति यह हो गयी कि भावी मुनाफे का इंतजार करती सैंकडों डॉट-कॉम कम्पनियां अपनी वेंचर पूँजी खर्च कर चुकने के बाद दिवालिया हो गयीं. छंटनी और तालाबंदी हुई, शेयर बाज़ार भारी मंदी का शिकार हो गया. बाज़ार में नकदी में भारी कमी आई और पूरी अमेरिकी अर्थव्यवस्था एक गंभीर मंदी की ओर बढ़ने लगी. डॉट-कॉम बुलबुला फट चुका था.

आसन्न गम्भीर मंदी के संकट को देखते हुए फेडेरल रिज़र्व बैंक ने ब्याज दरों को ऐतिहासिक रूप में निम्न स्तर तक गिरा दिया क्योंकि उपभोक्ता सामग्रियों की खरीद में भारी कमी आने लगी थी और उपभोक्ता खर्च को गिरने से रोकने के लिए यह जरूरी हो गया था कि ‘वेल्थ इफेक्ट’ पैदा किया जाए और उपभोक्ताओं को आसान ऋण उपलब्ध कराया जाए. अमेरिकी रियल इस्टेट की शक्तिशाली लॉबी ने अमेरिकियों के मकान मालिक बनने के सपने को उन्माद की हदों तक बढावा दिया. आम लोग यह भी मानते हैं कि आवारा में निवेश एक जोखिम मुक्त और भरोसेमंद निवेश है. नतीजतन, डॉट-कॉम बुलबुले के फटने के बाद जैसे ही शेयरों की कीमतें गिरीं, रियल इस्टेट स्टॉक मार्केट द्वारा शुरू किए गये सट्टेबाजी के पागलपन के लिए एक प्राथमिक निकासी-द्वार बन गया.

बैंक और वित्तीय संसथान ऊँचे दर्जे की ऋण पात्रता वाले लोगों को, रकम की वापसी की अधिकतम निश्चितता के साथ जो ऋण देते हैं, उनमें पहला होता है ‘एएए’ ऋण या प्राइम ऋण. इसके बाद आता है ‘आल्टरनेटिव ए’ ऋण जिसमें थोड़ा अधिक जोखिम होता है. इसके बाद तीसरी श्रेणी सबप्राइम ऋण की बनाई गई, जिसे उन लोगों को दिया गया जो पहली दो श्रेणियों के ऋणी में नहीं आते थे, इसलिए पूंजी की प्रचुरता से ग्रस्त अमेरिकी वित्तीय बाज़ार उन्हें छोड़ नहीं सकता था, खासतौर पर तब जब प्रथम दो श्रेणियों के ऋण का बाज़ार संतृप्त हो चुका था. फलत: निवेश बैंकों और मोर्टगेज़ बैंकों ने अंधाधुंध सबप्राइम ऋण दिए. ऋण के तरह-तरह के पैकेज बनाकर अन्य वित्तीय संस्थाओं को-जैसे बीमा कम्पनियों, वाणिज्यक बैंको हेज़ फंड्स को बेचा गया, इस उम्मीद के साथ कि इससे जोखिम का वितरण हो जाएगा और बुरे ऋणों के संकट से कोई एक बैंक ध्वस्त नहीं होगा.

सबप्राइम संकट की शुरुआत २००६ के उत्तरार्द्ध में हुई. यह तथ्य आम है कि विगत दो दशकों से अमेरिका व्यापार घाटे का शिकार है और गत शताब्दी के अंत तक वह दुनिया का सबसे बडा कर्जदार देश बन चुका था. कहावत है कि दुनिया पैदा करती है अमेरिका उपभोग करता है. हालाँकि डॉलर की विश्व मुद्रा होने की स्थिति का लाभ उसके पक्ष में है, पर यह स्थिति फ़िर भी बहुत दिनों तक नहीं चल सकती, इसका अहसास अमेरिकी साम्राज्यवादियों को भी है. भारी ऋण व्यापार घाटे के कारण अमेरिकी फेडेरल रिज़र्व बैंक ने जब अपनी ब्याज दरें बढा दीं तो निवेश बैंकों और मोर्टगेज़ बाज़ार के बडे खिलाड़ियों को भी अपनी ब्याज दरें बढानी पडी. इसकी सबसे भारी चोट पडी सबप्राइम ऋण लेने वाले लोगों पर, जिन्होंने परिवर्तनीय ब्याज दर के तहत ऋण ले रखे थे. ऐसे लोगों ने ऋण के भुगतान में अपनी असमर्थता प्रकट कर दी. २००७ तक १०० से भी अधिक सबप्राइम ऋणदाता दिवालिया हो गये. अमेरिका का ६५ खरब डॉलर का मोर्टगेज़ बाज़ार धराशाही हो गया. ऋण-भुगतान में असमर्थ लोगों के घरों की नीलामी शुरू हुई. लेकिन ‘हाऊसिंग बूम’ खत्म होने के बाद घरों की कीमतों में भारी कमी आ गयी थी और घर खरीदने में लोगों की दिलचस्पी खत्म हो चुकी थी.

अत: नीलामियों से अब कोई लाभ नहीं था. फलत: पूंजी बाज़ार के खिलाड़ियों की पूंजी फंसने लगी. बाज़ार में तरलता की कमी, यानि नकदी की कमी पैदा हो गयी. तरलता की कमी के कारण कई निवेश बैंक असमाधेयता ( insolvency ) के शिकार हो गये, ‘क्रेडिट क्रंच’ की स्थिति पैदा हो गयी. कई बड़े निवेश बैंकों और हेज़ फंड्स के दिवालिया होने के चलते स्टॉक मार्केट में भी पतन का खतरा पैदा हो गया. उपभोक्ताओं ने और अधिक खर्च करने और उपभोक्ता खरीददारियों को वित्तपोषित करने की क्षमता खो दी. इससे स्थित आय, इक्विटी और डेरिवेटिव बाज़ार में अस्थिरता बढी. अमेरिका के सकल घरेलू उत्पाद का ७० प्रतिशत उपभोक्ता खरीददारियों से आता है. इसलिए जाहिर है कि उपभोक्ता खरीददारियों की कमी ने वास्तविक अर्थव्यवस्था पर गम्भीर प्रतिकूल प्रभाव छोड़ा. केवल अमेरिका ही नहीं, पूरी दुनिया की वास्तविक अर्थव्यवस्था पर भी इसका प्रभाव पड़ने लगा.यह प्रभाव दो रास्तों से पड़ा. एक तो जो देश मुख्यत: अमेरिकी बाज़ार के लिए पैदा करते थे (जैसे निर्यात निर्देशित चीनी उत्पादन तंत्र के सामानों का सबसे बडा खरीददार अमेरिका है, और जापान, यूरोपीय देशों, भारत आदि अधिकांश देशों से अमेरिका कुछ न कुछ खरीदता है) , उनकी अर्थव्यवस्था का मंद पड़ना स्वाभाविक था. दूसरा प्रभाव आज पूरी दुनिया के शेयर बाज़ारों के परस्पर जुड़े होने के नाते पड़ना था. अमेरिका के शेयर बाज़ारों के नीचे आते ही, पूरी दुनिया में उसका असर पड़ना ही था और फ़िर इसका प्रभाव वास्तविक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ना ही था. भारत और चीन जैसी अर्थव्यवस्थाओं में जिस विदेशी संस्थागत निवेश के कारण शेयर बाज़ार के भाव आसमान छूते थे, उसका बडा हिस्सा हेज़ फंड्स की पूंजी का होता था जो सबप्राइम संकट जैसे पूंजी बाज़ार के किसी संकट का सर्वाधिक शिकार होती है. संकट के दौर में ऐसी पूंजी शेयर बाज़ार से भागना शुरू कर देती है और जबर्दस्त अस्थिरता पैदा हो जाती है. अमेरिकी सबप्राइम बाज़ार के ढहने के साथ ही मोर्टगेज़ ऋणों को वित्तपोषित करने के लिए पूरी दुनिया के वित्त बाज़ार में पूंजी की कमी हो गयी. वित्तीय पूंजी के भूमंडलीकरण, यानि वैश्विक पूंजी बाज़ार के अधिक से अधिक परस्पर जुड़ जाने के बाद ऐसा होम लाज़िमी था. स्थिति यह थी कि सितंबर २००७ में ब्रिटेन का प्रमुख मोर्टगेज़ बैंक ‘नार्दर्न रॉक’ लोगों द्वारा दो खरब डॉलर निकालने की बजह से दिवालिया होने के कगार पर आ गया. बैंक ऑफ़ इंग्लैंड ने उसे हस्तक्षेप करके बचाया. ब्रिटिश पूंजी बाज़ार में २० अरब डॉलर पूंजी इंग्लैंड के केन्द्रीय बैंक ने इंजेक्ट की.

यह स्थिति थी २००८ की शुरुआत होने तक. लोग यह समझ रहे थे कि कुछ वित्तीय उपायों और कुछ प्रतीक्षा के बाद संकट धीरे-धीरे हल्का पड़ता हुआ टल जाएगा. लेकिन सतह के नीचे तो वित्तीय तन्त्र और वास्तविक अर्थव्यवस्था में विश्वव्यापी भूचाल की पूर्वपीठिका तैयार हो रही थी. ध्वंसकारी विस्फोट हुआ अक्टूबर के पहले सप्ताह में. वाल स्ट्रीट में मची खलबली ने पूरी दुनिया की वित्तीय व्यवस्था को झकझोर दिया. पूरी दुनिया के वित्तीय बाज़ार से ६० खरब डॉलर की रकम उड़नछू हो गयी. इसके पहले वित्तीय संकट की आँधी में सितंबर महीने में ही अमेरिका के पाँच बड़े बैंक धराशाही हो चुके थे. उसके भी पहले मध्य जुलाई में इन्डी मैक नामक मार्ट्गेज़ बैंक धराशाही हो चुका था. तबसे आठ शीर्ष बैंक दिवालिया हो चुके हैं. सिर्फ़ सितंबर के तीन सप्ताहों में लीमैन ब्रदर्स, मेरिल लिंच वॉशिंगटन म्युचुअल गायब हो गये तथा फेनी माय और फ्रेडी मैक का नियंत्रण सरकार ने अपने हाथों में लिया. दुनिया की सबसे बडी बीमा कम्पनी ए.आई .जी. को बचाने के लिए सरकार को ८५ अरब डॉलर का बेलआउट (जमानत) देना पड़ा. इस संकट से उबरने के लिए सितंबर में दस निवेश और वाणिज्यिक बैंकों ने हाथ मिलाकर ७० अरब डॉलर की उधारी सुविधा स्थापित करने का निर्णय लिया, लेकिन बाज़ार में वित्तीय कत्लोगारत का माहौल बना रहा. महज़ दस दिन उन बैंकों के राष्ट्रीकरण, डूबने और बचाव की प्रक्रिया के गवाह रहे जिसमें १० खरब डॉलर की परिसंपत्ति के साथ दुनिया की सबसे बड़ी बीमा कम्पनी, १५ खरब डॉलर की परिसंपत्ति के साथ दुनिया के दो बड़े निवेश बैंक और १८ खरब डॉलर की संपत्ति के साथ अमेरिका मोर्टगेज़ बाज़ार की दो भीमकाय फर्में शामिल थीं. अक्टूबर के पहले सप्ताह में अमेरिकी वित्तीय बाज़ार में आई सुनामी ने जब पूरी दुनिया के वित्तीय तंत्र को झकझोरकर रख दिया तो दुनियाभर के साम्राज्यवादियों और पूंजीपतियों ने, उसके सिद्धांतकारों, सलाहकारों और राजनितिक प्रतिनिधियों ने युद्ध स्तर पर भागदौड़ शुरू कर दी. तबाही का जो चेन रिएक्शन’ शुरू हुआ था, वह पूरी दुनिया के शेयर बाज़ारों, निवेश एवं वाणिज्य बैंकों को अपनी चपेट में ले चुका था. दुनिया के अरबपतियों की पूंजी में रातोंरात अरबों की कमी हो गयी थी. वित्तीय ध्वंस की यह नई लहर वास्तविक अर्थव्यवस्था में २००६-०७ से ही जारी विश्वव्यापी लहर को और खतरनाक बना देगी यह अंदेशा विश्व पूंजीवादी व्यवस्था के चौधरियों और सिद्धान्तकारों को दिन-रात आपात बैठक करके उपाय निकालने को विवश कर रहा था. तुरंत अमेरिका ने बची हुई वित्तीय संस्थाओं को बचाने के लिए ७०० अरब डॉलर के बेलआउट पैकेज की घोषणा की और २५० अरब डॉलर सीधे अग्रणी बैंकों को देने का निर्णय लिया. यूरोपीय देशों ने ७७३ अरब डॉलर और जापान ने २७५ अरब डॉलर के बेलआउट पैकेज की घोषणा की. इसके अतिरिक्त ब्रिटेन ने ८७७ अरब डॉलर खर्च करके बैंकों का बडा हिस्सा खरीदने का निर्णय लिया. संयुक्त अरब अमीरात ने ७० अरब डॉलर के आपात फंडिंग करके अपने बैंक जमा पर तीन साल की गारंटी दी. इन सारे कदमों के बावजूद बाज़ार में अस्थिरता-अनिश्चितता का माहौल अभी भी बना हुआ है. यही नहीं, संकट रिसकर वास्तविक अर्थव्यवस्था को पूरी दुनिया के पैमाने पर अपनी चपेट में ले चुका है. अमेरिकी अर्थव्यवस्था सिर्फ़ इस वर्ष की तीसरी तिमाही में ०.३ प्रतिशत सिकुड़ गयी और आय में ८.७ प्रतिशत की गिरावट आई. अनेरिका अर्थतंत्र के २/३ भाग को चलाने वाले उपभोक्ता खर्चों में ३.१ प्रतिशत की गिरावट आई. १९५० के बाद अमेरिका में गैर-टिकाऊ उपभोक्ता सामानों की खपत में सबसे तेज़ गिरावट आई है. मंदी और अर्थव्यवस्था के संकुचन की यही स्थिति यूरोप और तीसरी दुनिया के पूंजीवादी देशों की भी है. अमेरिका, यूरोप से लेकर चीन और भारत तक छंटनी, वेतन कटौती, लेऑफ़ का सिलसिला जारी है. ग्लोबल असेम्बली लाइन पर जो श्रम-सघन काम चीन, भारत, मेक्सिको आदि देशों की वर्कशोपों में होते थे, वहाँ गंभीर संकट है. निर्यात के लिए होने वाले उत्पादन और ऐसी नई परियोजनाओं का भविष्य अंधकारमय है. निर्यात निर्भरता को कम करके देशी उपभोक्ता बाज़ार को बढावा देन के लिए चीनी सरकार ने १० नवंबर को अवरचना और सार्वजनिक कल्याण कार्यों के लिए ५८६ अरब डॉलर के “आर्थिक प्रोत्साहन पैकेज’ की घोषणा की है जिससे दुनिया के बाज़ारों में थोडी तेज़ी आई है. लेकिन यह पैकेज भी, विश्व अर्थव्यवस्था तो दूर, चीन का संकट हल करने के लिए भी शायद ही कारगर सिद्ध होगा.

.कीन्स ने मंदी की मार से पूंजीवाद अर्थतंत्र को बचाने के लिए सार्वजनिक कोष की पूंजी को वित्तीय बाज़ार में झोंकने की नहीं बल्कि वास्तविक अर्थव्यवस्था में लगाने और सीधे उपभोक्ताओं को (कल्याणकारी राजकीय उपायों द्वारा) राहत देने का नुस्खा सुझाया था. पर आज का परजीवी, परभक्षी, अनुत्पादक पूंजीवाद कीन्स के दौर तक भी नहीं वापस लौट सकता. वह केवल वित्तीय महाप्रभुओं को बचाने के लिए उनके घाटे का बोझ उठाने के लिए ही आम करदाताओं से उगाही गयी रकम झोंक सकता है और यह हवाई उम्मीद पाल सकता है कि वित्तीय दुनिया में स्थिरता आने से वास्तविक अर्थव्यवस्था का ठहराव भी टूट जयेगा. लेकिन यह एक खयाली पुलाव मात्र है. सच्चाई यह है कि साम्राज्यवादी देश अतिउत्पाद और पूँजी की प्रचुरता के जिस असाध्य संकट में फंसे हुए हैं, उसके चलते लंबे समय से, चढावों-उतारों के साथ जारी दीर्घकालिक मंदी अब एक ऐसे गम्भीर दौर में प्रवेश का संकेत दे रही है जो निकट भविष्य में उग्र तूफानों और आर्थिक ध्वंस को जन्म दे सकती है. तय है कि मुनाफ़े के लिए उत्पादन की होड़ करने वालों ने प्रत्यक्ष उत्पादकों को निचोड़कर उनकी क्रयशक्ति को इस हद तक कम कर दिया है कि विपुल पूंजी के निवेश के लिए उत्पादक क्षेत्र में गुंजाईश ही कम है. इसी सापेक्षिक अतिउत्पादन की स्थिति में पूंजी तुरत-फुरत मुनाफ़ा कमाने के लिए सट्टा बाज़ार में लग रही है और विभिन्न अनुत्पादक क्षेत्रों में लग रही है. हालत यह है कि वास्तविक अर्थव्यवस्था में निवेश की गुंजाईश होने पर भी, तुरत और जल्दी मुनाफ़ा कमाने के लिए होड़रत पूंजीपति शेयर बाज़ार का रुख करते हैं. चूंकि पूंजीपतियों के बीच यह अंधी होड़ बनी रहेगी, इसलिए यह प्रवृत्ति भी बनी रहेगी. पूंजीवाद के सामने कोई और रास्ता नहीं है.

मार्क्स ने यह दिखलाया था कि अतिरिक्त मूल्य की दर में गिरते जाने की अन्तर्निहित प्रवृत्ति होती है. इस आधार पर उन्होंने साबित किया था कि समाज में सतत विकास के लिए मुनाफ़े को केन्द्र में रखकर उत्पादन करने वाली अर्थव्यवस्था एक मंजिल के बाद समाज को आगे नहीं ले जा पायेगी और उसका स्थान एक ऐसा समाज लेगा जिसमें संचय का उद्देश्य निजी मालिकाने की व्यवस्था के अंतर्गत मालिकों का मुनाफ़ा बढाना और मेहनतकशों को जीने की न्यूनतम जरूरतें देना मात्र नहीं होगा. उसमें पूरा समाज उत्पादन करेगा और संचय करेगा और बढ़ता संचय पूरे समाज के सभी सदस्यों के जीवन को उन्नत से उन्नतर, सुंदर से सुन्दरतर और ज़्यादा से ज़्यादा विविधतापूर्ण बनाता जाएगा. इसका कारण यह है कि उस समाजवादी समाज में, उत्पादन के साधन पूरे समाज की साझा संपत्ति होंगे. उत्पादन भी सामाजिक होगा और विनियोजन भी सामाजिक होगा.

विश्व पूंजीवाद के असाध्य ढांचागत आर्थिक संकट की विगत करीब तीन दशकों से जारी प्रक्रिया में सघन मंदी और आर्थिक ध्वंस का जो यह नया दौर आया है, इससे कुछ तात्कालिक राहत भले ही मिल जाए, पर यह स्वत:सिद्ध हो गया है कि समस्या का कोई अन्तिम समाधान पूंजीवादी दायरे के भीतर सम्भव ही नहीं है. इस अहसास ने पूंजी के शिविर में सघन निराशा का माहौल तैयार किया है जबकि श्रम के शिविर में समाजवादी मुक्ति-परियोजनाओं के पुनर्निर्माण के अनुकूल माहौल तैयार किया है.

आश्चर्य नहीं कि पिछले दिनों बुर्जुआ अख़बारों में कई बार ऐसी खबरें प्रकाशित हुई कि ब्रिटेन में, जर्मनी में और कई दूसरे देशों में मार्क्स के लेखन और मार्क्सवादी साहित्य की बिक्री इन दिनों काफी बढ़ गयी है. अमेरिका में एक ओर तो मार्क्सवाद में लोगों की दिलचस्पी बढी है, दूसरी ओर चर्च जाने वालों की संख्या बढ़ गयी है. रूस और उक्रेन जैसे देशों में लेनिन-स्तालिन की विरासत को मानने वाले ख्रुशचेवपंथी संशोधनवाद का विरोध करने वाले संगठनों की बढ़ती सक्रियता की खबरें पहले भी आती रही है. चीन में सुदूरवर्ती गांवों के किसानों से लेकर औद्योगिक क्षेत्रों के मजदूरों तक -“बाज़ार समाजवाद” का कहर झेल रहे मेहनतकशों के लगातार विद्रोहों की, नये सिरे से संगठित होने की तथा माओ और सांस्कृतिक क्रांति की विरासत के पुनर्जागरण की खबरें पिछले करीब दस वर्षों से लगातार आ रहीं हैं. ‘बिगुल’ में भी ऐसी कई रिपोर्टें प्रकाशित हो चुकी हैं.

अठारह वर्षों पहले सोवियत संघ के विघटन के बाद, फ्रांसिस फुकोयामा ने ‘इतिहास के अंत’ का नारा देते हुए जनतंत्र की विजय को निर्णायक और अन्तिम विजय बताया था. फ़िर तीन या चार साल पहले ‘इंडिया टुडे कांकलेव’ में जब भारत आए थे तो पूंजीवादी जनतंत्र के लिए कम्यूनिज्म को सबसे बडा खतरा बताया था. और अब अख़बारों में खबर आई है कि पूंजीवाद के भविष्य को लेकर वे काफी निराश हैं. यह सब कुछ अनायास नहीं है. पूंजीवाद बौद्धिक जगत की निराशा पूंजीवाद के आर्थिक जगत के उस संकट और निराशा की अभिव्यक्ति है, जो ता रहा है कि निजी मुनाफ़े के लिए सामाजिक उत्पादन की प्रणाली का ध्वंस करके ही मनुष्यता वस्तुत: अपने को मुक्त कर सकती है.

साम्राज्यवाद के असमाधेय संकट का यह अर्थ कदापि नहीं है कि विश्व पूंजीवाद अपने आप धराशायी हो जाएगा और समाजवाद का युग आ जाएगा. जब तक नई सामाजिक-आर्थिक संरचना और राजनितिक ढांचे का निर्माण करने की सुचिंतित योजना के साथ सर्वहारा क्रांति के नेतृत्वकारी शक्ति नये सिरे से संगठित नहीं होगी, तब तक कई बार के संकट और आर्थिक अराजकता के बावजूद पूंजीवादी व्यवस्था अपने को पुनर्गठित करके घिसटती रहेगी. हालाँकि यह प्रक्रिया भी अनंतकाल तक नहीं चलती रहेगी. वस्तुगत परिस्थितियों और मनोगत शक्तियों का सम्बन्ध द्वद्वात्मक होता है. जो परिस्थितियाँ धनी-गरीब के बीच के ध्रुवीकरण को लगातार तीखा बना रही हैं, वही मजदूरों की मानसिकता भी तैयार कर रही हैं कि वे विद्रोह करें और व्यवस्था और उसके विकल्प के बारे में सही समझदारी हासिल करते हुए विद्रोह से क्रांति की दिशा में आगे बढे. वर्तमान वस्तुगत परिस्थितियाँ क्रांतिकारी प्रचार एवं शिक्षा को आत्मसात करने के लिए मजदूर वर्ग की मानसिकता तैयार करेंगी और दुनिया की बिखरी हुई कम्युनिस्ट क्रांतिकारी शक्तियों को प्रेरित करेंगी कि वे अक्टूबर क्रांति और अतीत के सभी सर्वहारा क्रांतियों की शिक्षाओं को आज के सन्दर्भ में जाने-समझें तथा आज की दुनिया और अपने-अपने देश की परिस्थितियों का अध्ययन करके अक्टूबर क्रांति के नये संस्करण की तैयारी में जुट जायें.

वर्तमान विश्वव्यापी आर्थिक संकट का एक परिणाम जो ज़्यादा सुनिश्चित है, वह यह है कि पूंजीवाद विश्व के अमेरिकी चौधराहट के दिन अब बीतने वाले हैं. डॉलर की स्थिति अब बहुत वर्षों तक विश्व मुद्रा की नहीं रह पाएगी. इरान और वेनेजुएला के बाद अब चीन, कई अन्य लैटिन अमेरिकी देशों और यूरोपीय देशों ने अपने विदेशी मुद्रा भंडार को सिर्फ़ डॉलर में रखने की बजाय उसके विविधिकरण की प्रक्रिया शुरू कर दी है. यूरोप (विशेषकर जर्मनी और फ्रांस) अमेरिकी वर्चस्व को चुनौती देने की तैयारी में हैं. रूस में २०२० तक तेल केंद्रित अर्थतंत्र को टेक्नोलॉजी-केंद्रित बनाने की योजना पर काम करता हुआ आर्थिक-राजनितिक-सामरिक स्तर पर अमेरिका को चुनौती देने लगा है. आने वाले दिनों में अलग-अलग साम्राज्यवादी ताकतों के ब्लाकों के बीच अन्तरसाम्राज्यवादी प्रतिस्पर्द्धा तीखी होती जायेगी. इन ब्लाकों में भारत, चीन ब्राजील, द.अफ्रीका जैसे तीसरी दुनिया के सापेक्षत: अधिक विकसित पूंजीवादी की अहम भूमिका होगी. ज़्यादा सम्भावना है कि गहराते साम्राज्यवादी अंतर्विरोध (राष्ट्रपारीय निगमों के रूप में पूँजी के अंतरराष्ट्रीयकरण और नाभिकीय प्रतिरोधक की मौजूदगी के चलते) विश्वयुद्ध के रूप में तो न विस्फोट करें, लेकिन महाद्वीपीय-क्षेत्रीय युद्धों के रूप में प्रकट होते रहें. जब तक साम्राज्यवाद रहेगा, युद्ध जारी रहेंगे. ये युद्ध सर्वहारा क्रांतियों की परिस्थितियाँ और तेज़ी से तैयार करेंगे और सर्वहारा क्रांतियों का नया चक्र ही साम्राज्यवादी-पूंजीवादी युद्धों को समाप्त करने का ऐतिहासिक काम करेगा.

अक्टूबर क्रांति के बाद, राष्ट्रिय मुक्ति युद्ध और जनवादी क्रांतियाँ विश्व सर्वहारा क्रांति के मुख्य संघटक अवयव थे. अब दुनिया के जिन देशों में साम्राज्यवाद का सर्वाधिक दबाब है, और जहाँ नई ‘ट्रेंड सेटर’, ‘पाथ ब्रेकिंग’ सर्वहारा क्रांतियों की जमीन तैयार है, वे ऐसे पिछडे पूंजीवादी देश हैं जहाँ साम्राज्यवाद-पूंजीवाद विरोधी क्रांति- यानि नई समाजवादी क्रांति की मंजिल है. ऐसी क्रांतियाँ ही आज विश्व सर्वहारा क्रांति का प्रमुख संघटक अवयव हैं. अक्टूबर क्रांति का नया संस्करण आज इसी रूप में सम्भावित है.

श्रम और पूँजी के बीच विश्व ऐतिहासिक महासमर का जो चक्र उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में शुरू हुआ था, वह १९७० के दशक में चीन में आखिरी सर्वहारा दुर्ग के पतन के बाद समाप्त हो गया. आने वाले समय में इस विश्व-ऐतिहासिक महासमर का नया चक्र अवश्यम्भावी है. इक्कीसवीं शताब्दी निर्णायक, नई सर्वहारा क्रांतियों की शताब्दी होगी, अक्टूबर क्रांति के नये संस्करण के निर्माण की शताब्दी होगी, पूंजीवादी विश्व का वर्तमान संकट इसी ऐतिहासिक सच्चाई को सत्यापित करने वाला तथ्य है.

‘बिगुल’ नवंबर २००८ से साभार

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