आतंकवाद बनाम काले कानून : बहाना कोई निशाना कोई

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पिछले दिनों देश के कई इलाकों में हुए बम धमाकों के बाद देश में इस्लामी आतंकवाद का हौवा खड़ा करके नए-नए काले कानून बनाने की कवायद शुरू हो गई है. बेशक, इन आतंकवादी कार्रवाईयों की केवल कठोर शब्दों में निंदा ही की जा सकती है. इनमें मरने या घायल होने वाले ज्यादातर आम लोग होते है और इन घटनायों के बाद शुरू होने वाले दमन-उत्पीडन का शिकार भी आम मुस्लिम आबादी ही बनती है. लेकिन इस आतंकवाद के लिए जिम्मेदार सामाजिक-राजनितिक कारणों को समझना ज़रूरी है. हिन्दुत्ववादी संगठनों का आक्रामक अभियान, राज्यसत्ता का दमन-उत्पीडन, समाज में क़दम-क़दम पर मिलने वाला अपमान और अलगाव, और सबसे बढ़कर यह अहसास कि इस समाज में उन्हें इंसाफ नहीं मिल सकता-इससे पैदा होने वाली निराशा, बेबसी और गुस्सा कुछ मुस्लिम नौजवानों को इस्लामी कट्टरपंथ और आंतकवाद के रास्ते पर धकेल रहा है. लेकिन यह अंधी प्रतिक्रिया में पैदा होने वाला सांप्रदायिक आतंकवाद है और इसके लिए भी हिन्दुत्ववादी फासिस्ट संगठनों की जहरीली राजनीती और उन्हें प्रत्यक्ष या परोक्ष ढंग से शह देने वाली राज्यसत्ताएँ मुख्यत: जिम्मेदार हैं. दूसरे, यह भी नहीं भूलना चाहिए कि बजरंग दल जैसे हिंदूवादी संगठनों के कई धमाकों में शामिल होने के सबूत बार-बार मिलते रहे हैं, लेकिन सरकार से लेकर मीडिया तक ऐसी खबरों को उभरने नहीं देते.

विभिन्न पूंजीवादी टी.वी. चैनलों पत्रिकाओं द्वारा इन आतंकवादियों को काबू में करने के लिए सख्त से सख्त कानून बनाने का शोर मचाया जा रहा है. आज जो कोई भी आतंकवाद के खिलाफ लिख या बोल रहा है उनमें से अधिकतर जनता को भ्रमित करने और उलझन में डालने के सिवा और कुछ नहीं कर रहे हैं.

कुछ ऐसे हिंदू कट्टरपंथी संगठन और नेता है जो खुलेआम सारी मुस्लिम आबादी के खिलाफ आग भड़काने में लगे हुए हैं. आम जनता इस तरह के प्रचार के कारण काफी हद तक आतंकवाद के खिलाफ गलत दृष्टिकोण अपना लेती है. आतंकवाद की असली जड़ को समझना चाहिए ताकि इसके खिलाफ सही दृष्टिकोण से मोर्चाबंदी की जा सके.

अल्पसंख्यक धर्मों (जैसे मुस्लिम और ईसाई) लोगों को देश के बाहर निकाल देने या उनके सभी जनवादी अधिकार छीन लेने का इच्छुक हिंदूत्ववादी कट्टरपंथी फासीवाद आतंकवाद की जड़ भी है और यह ख़ुद आतंकवादी भी है. वैसे तो हर धार्मिक कट्टरपंथ ही जनता का दुश्मन है लेकिन आज भारत में हिन्दुत्ववादी फासीवाद की जन-विरोधी भूमिका प्रमुख है.

यही मुख्य दुश्मन है. मुस्लिम कट्टरपंथी आतंकवाद सहित अन्य अल्पसंख्यक धार्मिक कट्टरपंथी आतंकवाद इसी हिंदूत्ववादी फासीवाद की प्रतिक्रिया में पैदा हो रहे हैं. सन २००२ में गुजरात में हुआ मुस्लिम आबादी का योजनाबद्ध कत्लेआम भाजपा, आर.एस.एस., विश्व हिंदू परिषद् जैसे हिंदू कट्टरपंथियों द्वारा किया गया था. वैसे तो यह बात २००२ में ही साफ़ हो गई थी लेकिन कुछ ही महीनों पहले अंग्रेजी की पत्रिका “तहलका” के स्टिंग आपरेशन के दौरान छुपे कैमरों ने इन संगठनों के नेताओं के इस नरसंहार में शामिल होने के पुख्ता सबूत जगजाहिर किए. हजारों लोगों का यह कत्लेआम आतंकवाद नहीं तो और क्या था? अमरनाथ श्राइन बोर्ड को ज़मीन मिलने और बाद में वापस लिए जाने के बाद जम्मू-कश्मीर में भी हिंसात्मक घटनाएँ घटी हैं उनमें भाजपा, आर.एस.एस. जैसे कट्टर हिंदू संगठनों द्वारा निभाया गया रोल हम सबके सामने है. यही हिंदूत्ववादी फासीवाद मुस्लिम कट्टरपंथी आतंकवाद को जन्म देता है और इसके फलने-फूलने के लिए खाद पानी मुहैया कराता है.

बेशक हमें अल्पसंख्यक धर्मों के कट्टरपंथियों का भी हर हालत में विरोध करना है. अल्पसंख्यक धार्मिक कट्टरपंथी फासीवादियों द्वारा फैलाये जा रहे भ्रमों को मजबूती देता है. इस तरह मुस्लिम और अन्य अल्पसंख्यक धार्मिक कट्टरपंथ भी वापस हिंदू कट्टरपंथ को खाद-पानी मुहैया कराता है.

भारत में हर पूंजीवादी राजनितिक पार्टी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर फ़ासीवाद को इस्तेमाल करती है या इसके फलने-फूलने में योगदान देती है. लेकिन मुख्य फासीवादी ताकत हिंदू कट्टरपंथी संघ परिवार रहा है. इसके अहम् सूत्रधार आर.एस.एस. की स्थापना पिछली सदी के तीसरे दशक के दौरान हुई थी जब विश्व में फासीवाद का तेजी से उभार हो रहा था. आर.एस.एस. की ब्रिटिश गुलामी विरोधी संघर्ष में कोई भूमिका नहीं रही. बल्कि उस समय भी यह मध्ययुग के मुस्लिम हमलावरों के हवाले देकर साधारण मुस्लिम आबादी के विरुद्ध धार्मिक ज़हर फैलाने का ही काम कर रहा था और उन्हें निशाना बना रहा था. आर.एस.एस. के संस्थापकों में से एक अहम व्यक्ति डॉ. मुंजे फ़ासीवाद से बेहद प्रभावित था और भारत में भी मुसोलिनी और हिटलर जैसे किसी तानाशाह की कामना करता था. उसने इटली जाकर मुसोलिनी से मार्गदर्शन भी प्राप्त किया जिसके आधार पर उसे भारत में आर.एस.एस. का आर्किटेक्ट भी कहा जाता है. १९५२ में आर.एस.एस के राजनितिक शाखा जनसंघ का जन्म हुआ. १९७७ में जनसंघ ने जनता पार्टी में शामिल होकर केन्द्रीय सरकार में हिस्सेदारी प्राप्त की. इसके बाद भारतीय जनता पार्टी के तौर पर जनता पार्टी से अलग होकर इसकी ताकत तेज़ी से बढ़ी. ८० के दशक में पंजाब में कांग्रेस द्वारा ‘हिंदू कार्ड’ खेलने के बाद और फ़िर रामजन्मभूमि का मुद्दा उठने के साथ हिंदुत्व के कार्ड का योजनाबद्ध, खुला इस्तेमाल करने के लिए पूरा संघ परिवार सक्रीय हो गया. ९० के दशक की शुरुआत में ही आडवाणी की रथयात्रा से लेकर बाबरी मस्जिद का गिराया जाना और फ़िर २००२ में गुजरात में मुसलमानों का योजनाबद्ध कत्लेआम, अमरनाथ श्राइन बोर्ड ज़मीन के ताज़ा विवाद में संघ परिवार की भूमिका और अब उडीसा में ईसाईयों के कत्ल, उनके घरों और गिरजाघरों को आग लगाना आदि, यह सब संघ परिवार के हिंदू कट्टरपंथ के घिनौने कारनामें हैं.

यह बात ध्यान रखने वाली है कि संघ परिवार मौजूदा हिंदूत्ववादी फ़ासीवाद की वजह नहीं बल्कि साधन है. भारत में वैश्विकरण, उदारीकरण की बर्बर आर्थिक कट्टरपंथी नीतियों के लागू होने और इनके तबाह्कुन नतीजों के सामने आने के साथ-साथ हिन्दू कट्टरपंथी फ़ासीवाद में भी उभार आया. ८० के दशक में इंदिरा गाँधी द्वारा उदारतावादी आर्थिक नीतियों का आरंभ हुआ. राजीव गाँधी ने इस प्रक्रिया को जारी रखा. ‘९० के दशक की शुरुआत नई आर्थिक नीतियों के लागू होने से हुई. पिछले दशक के मुकाबले कहीं अधिक कठोरता के साथ उदारतावादी नीतियों के लागू होने का यह विशेष दौर था. “उदारीकरण” की नीतियों का असली चेहरा यानि पूंजीवादी ” आर्थिक कट्टरता” जगजाहिर होना लाजिमी था. इन नीतियों के संयोजक विश्व पूँजी और देशी पूँजी के मालिक यह अच्छी तरह से जानते थे कि इन तबाह्कुन नीतियों को लागू करना इतना आसान नहीं. बर्बर दमन के बिना इन नीतियों का लागू हो पाना असंभव था. इसी ने भारतीय राज्यसत्ता, जिसका जनवाद पहले ही काफी हद तक सीमित था को और गैर-जनवादी बना दिया. वैश्वीकरण-उदारीकरण-निजीकरण के प्रत्यक्ष विरोध या अन्य किसी भी स्तर पर अपने अधिकारों के लिए किए जा रहे संघर्षों में पुलिस दमन का जो घिनौना चेहरा देखने में आ रहा है वह भारतीय राज्यसत्ता के गैर-जनवादीकरण अर्थात फासीवादीकरण की ही निशानी है.

राज्यसत्ता के इसी गैर-जनवादीकरण-फासीवादीकरण के एक पहलू “बाँटो और राज करो” की नीति के तहत हिन्दुओं की भावनाओं को दूसरे धर्मों खास तौर पर मुसलमानों और ईसाईयों के खिलाफ भड़काना है. इस बाँटो और राज करो की नीति का असल निशाना प्रत्यक्ष रूप में मजदूरों और अन्य मेहनतकश लोगों के हुक्मरान वर्ग की नीतियों के खिलाफ हो रहे और संभावित संघर्ष बनते हैं. कोई हैरानी की बात नहीं है कि संघ परिवार अपने तीन मुख्य दुश्मनों में मुसलमान और ईसाईयों के साथ ही कम्युनिस्टों को भी रखता है.

“हिंदुत्व”, “स्वदेशी”, “भारतीय सभ्यता” आदि की दुहाई देने वाले संघ परिवार को वैश्विकरण, उदारीकरण और निजीकरण की नीतियों से कोई परहेज नहीं रहा. जिस संघ परिवार का अपने ही देश में बसने वाले मुस्लिमों और ईसाईयों से धर्म नष्ट होता है उसे विदेशी पूँजी के आगे घुटने टेकने में कोई परहेज नहीं है, कोई शर्म नहीं है. संघ परिवार जो मुसलमानों और ईसाईयों को या तो इस देश से बाहर ही निकाल देने या इनके सभी जनवादी अधिकार छीन लेने का पक्षधर है उसे विदेशी पूँजी का बेसब्री से इंतजार रहता है. कांग्रेस द्वारा शुरू की गई नीतियों को ज़ोर-शोर से लागू करने में भारतीय जनता पार्टी सहित दूसरी सभी पूंजीवादी पार्टियों की बराबर की दिलचस्पी है.

सन २००२ में भाजपा के नेतृत्व में चल रही एन.डी.ए. की सरकार ने पोटा नाम का तथाकथित आतंकवाद विरोधी कानून बनाया था. पोटा कानून में यह दर्ज था की अगर कोई व्यक्ति इस कानून के तहत हिरासत में लिया जाता है तो हिरासत में लिए गए बयान को सबूत के तौर पर मान्यता दी जायेगी. दूसरा जब तक वह व्यक्ति ख़ुद को बेक़सूर साबित नहीं कर देगा तब तक कानून की नज़र में वह व्यक्ति गुनाहगार रहेगा. तीसरा, जमानत संबंधी बेहद सख्त धाराएं होने के चलते उसे लंबे समय तक जेल में ही रहना होगा. पोटा कानून के रहते आतंकवादी गतिविधियों में तो कोई कमी नहीं आई, पर हजारों बेक़सूर लोगों और अपने जायज़ हकों की मांग करने वाले लोगों को पोटा के तहत बंद कर दिया गया. गुजरात में आन्दोलन कर रहे मजदूरों से लेकर पंजाब, झारखण्ड, आंध्रप्रदेश आदि में किसानों तक को पोटा में बंद कर दिया गया. लेकिन सबसे बड़ी तादाद में आम मुसलमानों को इसके तहत गिरफ्तार करके बिना किसी सबूत के लंबे समय तक जेल में रखा गया. इसके भारी विरोध को देखते हुए कांग्रेस सहित कई पार्टियों ने पोटा ख़त्म करने को चुनावी मुद्दा बना दिया और यूपीए सरकार ने इसे ख़त्म कर दिया.

लेकिन कई राज्यों में खासकर वे राज्य जहाँ भाजपा के नेतृत्व की सरकारें हैं वहां योजनावद्ध अपराध को काबू करने के नाम पर पोटा जैसे काले कानून बनाये जा रहे है. गुजरात संगठित अपराध नियंत्रण विधेयक, २००६, उत्तर प्रदेश संगठित अपराध नियंत्रण, २००७ ऐसे ही विधेयक हैं जिन्हें इन राज्यों की सरकारें कानून का रूप देना चाहती हैं. महाराष्ट्र और कर्नाटक में पहले ही ऐसे कानून बने हुए हैं जिनकी तर्ज़ पर ये विधेयक तैयार किए गए हैं. आंध्र प्रदेश में पहले भी यह कानून बना हुआ था लेकिन ४ नवंबर २००४ इसके लागू रहने का समय समाप्त हो गया था. हाल की बम धमाकों की घटनाओं के बाद एल. के आडवाणी ने केन्द्र सरकार से यह मांग की है कि गुजरात संगठित अपराध नियंत्रण विधेयक,२००७ को कानून के तौर पर जल्द से जल्द मंजूरी दी जाए. उनका यह भी बयान है की भाजपा की सरकार बनने पर पोटा को फ़िर से लागू कर दिया जाएगा. अब मनमोहन सरकार का फ़िर बयान आया है कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ने के लिए सरकार कानून को और सख्त करने के बारे में सोच रही है. लेकिन सबसे बड़े इन आतंकवादियों के काले कानूनों से न तो ऐसे घटनाएँ रुक सकती हैं और न ही इनका असल निशाना यह बम धमाकों वाला आतंकवाद है. बम-बन्दूक वाला आतंकवाद राज्यसत्ता का कुछ भी बिगाड़ नहीं सकता. यह बात राज्यसत्ता भी अच्छी तरह जानती है. बम धमाकों में बेकसूर लोगों के मरने का भी राज्यसत्ता को असल में कोई दुःख नहीं है. लेकिन ऐसा आतंकवाद शासकवर्गों को अपनी सत्ता और मज़बूत करने के लिए टाडा, पोटा जैसे काले कानून बनाने का बहाना प्रदान करते हैं. काले कानूनों का मकसद होता है कि शासकवर्ग अपनी कट्टर नीतियों को लोगों पर थोप सकें. इस तरह काले कानूनों का असल निशाना वैश्विकरण, उदारीकरण और निजीकरण की नीतियों के खिलाफ उठ रहे जनांदोलनों में भाग लेने वाले लोग बनते हैं. इसका एक सबूत यह है कि खालिस्तानी आतंकवाद से निपटने के नाम पर बनाए गए टाडा कानून का सबसे अधिक इस्तेमाल अहमदाबाद और औरंगाबाद के हड़ताली मजदूरों के खिलाफ हुआ था. हिंदू कट्टरपंथी फासीवाद का विरोध साम्राजवादी वैश्वीकरण और उदारीकरण की कट्टर आर्थिक नीतियों का विरोध है. यह पूंजीवादी राज्यसत्ता और लुटेरे आर्थिक प्रबंध की तबाही के लिए लड़े जा रहे संघर्ष का ही हिस्सा है. मौजूदा फासीवाद विरोधी संघर्ष पूंजीवाद-साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष के रूप में राज्यसत्ता के क्रांतिकारी तख्तापलट के लिए संघर्ष है.

–लखविंदर ‘बिगुल’ अक्टूबर २००८ से साभार

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