तेल से भी सस्ता हुआ इंसानी खून !

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इराक पर हमला और कब्ज़ा साम्राज्यवाद के इतिहास में सबसे बड़े अपराधों में से एक है. संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट बताती है कि अमेरिका ने मध्यपूर्व में १९४८ में इस्राइल द्वारा फिलिस्तीनियों के निष्कासन के बाद से सबसे बड़े शरणार्थी संकट को जन्म दिया है. १९७० के दशक में जिस इराक का जीवन स्तर ग्रीस जैसा था वही इराक आज साम्राज्यवादी लूटखसोट के चलते दुनिया के निर्धनतम देश बुरुंडी से भी पीछे चला गया है. अमेरिका ने सुन्नीयों, शियाओं और कुर्दों को एक दूसरे के खिलाफ खड़ा करके ग्रह युद्ध की जो आग लगाई है उसमें मानव सभ्यता का पालना रहा देश धूधू करके जल रहा है.

बहुराष्ट्रीय कंपनियों के इशारे पर अमेरिका और ब्रिटिश सरकार ने इराक पर जो हमला किया था उसके चलते वहां से भयानक तबाही और इंसानी जानों के नुकसान के बहुत ही बर्बर और दिल हला देने वाले आंकड़े सामने आ रहे हैं. २००७ में ब्रिटेन की बहुत ही प्रसिद्द चिकित्सा पत्रिका लान्सेट में छपी जॉन हॉपकिन सरही की रिपोर्ट के अनुसार अमेरिकी हमले और कब्जे के कारण २००७ के मध्य तक ६,५०,००० इराकी लोगों की मौत हो चुकी थी. इसके बाद एक और बड़ी जाँच पड़ताल रिपोर्ट ब्रिटेन की कंपनी ओपिनियन रिसर्च बिजनेस द्वारा अगस्त २००७ में पेश की गई. इस रिपोर्ट के अनुसार (इराक युद्ध के दौरानमार्च,२००३ के बाद) :

इराक में लगभग १२ लाख लोगों की मौत अप्राकृतिक कारणों से हुई

इराक युद्ध के कारण लगभग २२ फ़ीसदी घरों ने एक या एक से ज़्यादा सदस्यों की मौत देखी. बगदाद में तो हर दूसरे घर में एक या एक से ज़्यादा सदस्यों की मौत हुई.

इनमें से ४८ फ़ीसदी मौतें गोली लगने के कारण, २० फ़ीसदी कार बम धमाकों के कारण, ९ फ़ीसदी हवाई हमलों और ६ फ़ीसदी अन्य धमाकों के कारण हुई.

इसके अतिरिक्त जख्मी होने वालों की गिनती तो और भी अधिक है. ६५ लाख लोग बेघर हो गए, जिनमें से २२.५ लाख लोग सीरिया और जोर्डन में शरण लेने को मजबूर हुए.

इराक में, जहाँ कभी हर घर को बिजली की आपूर्ति १६२४ घंटे तक होती थी, अब अमेरिका राजदूत रेयान करकोर के अनुसार १२ घंटे ही होती है. महंगाई दर बढ़ कर ५० फ़ीसदी से भी अधिक हो चुकी है. ७० फ़ीसदी लोगों को पीने का पानी तक नहीं मिल रहा. इराक में अब महज़ २० फ़ीसदी ही बच्चे स्कूल जा पा रहे हैं, जबकि अमेरिका हमले से पहले अधिकांश बच्चे स्कूल जाते थे. यहाँ १९८७ में एक वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर ४५ बच्चे प्रति हज़ार थी, जोकि अब बढ़कर १५० तक पहुँच गई है. इन मौतों के अतिरिक्त, पाबंदियों के कारण वर्ष १९९१ से २००३ तक भूखमरी और दवाओं की कमी से १० लाख बच्चों की मौत हो चुकी है.

हरेक को पता है : इराक़ युद्ध तेल के लिए लड़ा जा रहा है !

अमेरिका और ब्रिटेन ने लडाई के बहुत से कारण गिने हैं, जैसे आंतकवाद के खिलाफ़ लडाई, व्यापक तबाही के हथियार, “जनवादका विस्तार, सद्दाम हुसैन का अलकायदा से सम्बन्ध होना. वैसे तो इन झूठों को सच मानने वाले मूर्ख इस दुनिया में हैं, पर अब सामने आने वाले तथ्यों ने स्थिति को दिन के उजाले की तरह साफ़ कर दिया है. यह स्पष्ट है कि इराक़ पर हमला सिर्फ़ उसके तेल भंडारों पर कब्ज़ा करने के लिए किया गया. इस बात को अमेरिका के कई शीर्षस्थ लोग भी स्वीकार कर चुके हैं.

इराक़ पर हमले के पीछे भी मुनाफे की लगातार हवस के सहारे चलता पूंजीवाद और पूंजीवादी देशों के आपसी टकराव ही हैं. एक अनुमान के अनुसार, इराक़ के पास ११५ अरब तेल का भंडार है, जो पूरी दुनिया के तेल भंडारों का लगभग १५ प्रतिशत है और साथ ही इराक़ के पास ११२ खरब प्राकृतिक गैस का भंडार भी है. इराक़ की धरती से तेल निकालना तकनिकी तौर पर भी आसान है और समुद्र में ड्रिल करने के मुकाबले सस्ता भी है. इसलिए बड़ी तेल कंपनियों के लिए यह तेल भंडार असीम मुनाफे का स्रोत है, पर उनके ये सपने १९७५ में सद्दाम द्वारा तेल उद्योग का राष्ट्रियकरण करने के बाद मिटटी में मिल गए. इस राष्ट्रियकरण के समय इराक पर तेल पर कब्ज़ा किए बैठी कम्पनियाँ एक्सोन मोबिल (अमेरिकी), शेल और ब्रिटिश पेट्रोलियम (दोनों ब्रिटिश) को बड़ा नुकसान उठाना पड़ा. पिछली सदी कें अंत और इस सदी के शुरुआत में बोलीविया और वेनेजुएला द्वारा तेल उद्योग के लिए किए गए नए समझौतों ने इन कंपनियों को और भी नुकसान पहुँचाया और बाकि कसर रूसी और भारतीय कंपनियों ने सद्दाम से तेल निकालने और बेचने के लिए समझौते करके पूरी कर दी. इसके अलावा बड़े स्तर पर तेल के क्षेत्र में चीन के आने से भी अमेरिका और ब्रिटिश कम्पनियों की हालत पतली हो रही थी. इसके अतिरिक्त अमेरिकी अर्थव्यवस्था भी चरमरा रही थी, ऐसे संकट के समय में पूंजीवाद के पास युद्ध के सिवा और कोई रास्ता बाकी नही रह जाता.

अपने मंसूबों को पूरा करने के लिए अमेरिकी साम्राज्यवाद के लिए यह जरूरी था कि वह इराक में तख्तापलट करके अपनी कठपुतली सरकार बनवाये, ताकि इराक को अपनी फौजी चौकी का रूप दे सके, जो रूस और चीन को राजनितिक तौर पर काबू करने में काम आयेगी और इरान पर हमला करने की सूरत में बेसकैम्प का भी काम देगी. पॉँच सालों की कत्लोगारद, लाखों लोगों की मौत और देश के ४,१०० सैनिकों की जिंदगी (और ३०,००० घायल भी ) की कीमत चुकाकर अमेरिकी साम्राज्यवाद के लिए यह भी समय आ गया है कि वह इराक के तेल भंडारों पर अपना कब्जा करले. इसलिए अमेरिका इराक की कठपुतली सरकार से कई तरह के समझौते कर रहा है.

पहले समझौते के अनुसार, अमेरिका और ब्रिटेन की तेल कंपनियों को इराक में तेल निकालने और बेचने की इजारेदारियां मिल जाएँगी और यह सब कुछ बिना किसी खुली नीलामी के होगा, जिससे किसी भी अन्य देश की कंपनी को कोई मौका नहीं मिलेगा.

दूसरे समझौते के अनुसार, अमेरिका को इराक में पक्के तौर पर अपने फौजी ठिकाने बनाने और तेल क्षेत्रों की सुरक्षा के लिए अपनी सेना तैनात करने के अधिकार मिल जायेंगे. इस तरह दिसम्बर में अवधि पूरी हो जाने के बावजूद अमेरिका आगे से अनिश्चितकालीन समय के लिए अपनी फौज इराक में रख सकेगा. इस नए समझौते के अनुसार अमेरिका की इराक के अन्दर फौजी कार्रवाइयों की छूट होगी और अमेरिकी सैनिकों पर अपराधिक मुकदमे भी अमेरिका में चलाए जा सकेंगे. इसके अतिरिक्त अमेरिका इराक के हवाई क्षेत्र पर नियंत्रण की मांग भी कर रहा है. अमेरिका की काफी सारी मांगों को मानना तो सैनिकों की इस कठपुतली सरकार के लिए भी मुश्किल हो रहा है, इसलिए अमेरिका हर तरह का हथकंडा अपना रहा है.

कुवैत पर १९९० में किए गए हमले के बाद इराक को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के अध्याय७ में शामिल कर दिया गया था, जिसके अनुसार इराक दुनिया के लिए खतरा है. बुश प्रशासन इराक पर ज़ोर डाल रहा है कि समझौतों पर हस्ताक्षर करने के बाद ही यह अध्याय हटाया जाएगा. इसके अतिरिक्त, अन्य पाबंदियों के कारण सैनिकों को अपनी विदेशी पूँजी का भंडार भी न्यूयार्क के फेडेरल रिसर्व में जमा कराना पड़ता है. इस समय इराक के तकरीबन ५० मिलियन डालर इसमें जमा है और अमेरिकी समझौते पर हस्ताक्षर नहीं करने की सूरत में इसकी अदायगी रोकने के धमकी दे रहा है.

इसके अलावा इराक को डालर की कीमत कम होने का बेहद नुकसान उठाना पड़ रहा है, क्योंकि वह अपने विदेशी पूँजी के भंडार को किसी और करंसी में नहीं बदल सकता. इराकी जनता ने इन समझौतों का विरोध करना भी शुरू कर दिया है.

कई इराक़ और भी….

बहुराष्ट्रिय कंपनियों के मुनाफे की हवस और साम्राज्यवादियों की राजनितिक चालों और आपसी टकरावों का शिकार अकेला इराक़ नहीं है, बल्कि कई और देश कत्लगाहों में तब्दील हो चुके हैं या भविष्य में हो सकते है.

इनमें से एक हैसूडान ! सूडान बड़े तेल भन्डारोँ वाला एक अफ्रीकी देश है. १९७० में अमेरिकी तेल कंपनी शेवरोन ने यहाँ अपनी खोज शुरू की थी पर गृहयुद्ध के कारण उसका काम बंद हो गया. बाद में फ्रांस, कनाडा, रूस और चीन की कम्पनियों ने बड़ी खोजें कीं और सूडान के तानाशाह अलबरार के साथ मिलकर अमेरिका का पत्ता साफ कर दिया. ८० के दशक में अमेरिका ने खारतूम (सूडान की राजधानी) के खिलाफ़ बगावत को हवा दी. दारफुर में स्थापित सूडानी लिबरेशन आर्मी की अमेरिका ने दिल खोलकर मदद की. इसके अतिरिक्त इथोपिया, युगांडा जैसे पडौसी मुल्कों को करोड़ों डालर का फौजी साजोसामान दिया, ताकि खारतूम सरकार पर दबाब डाला जा सके. २००३ में इस लडाई नें भयानक रूप अख्तियार कर लिया और तब से हर साल लगभग एक लाख इंसानी जाने इसकी भेंट चढ़ रही हैं. अमेरिका सभी गुटों को सब्र से काम लेने की सलाह देने के साथसाथ शान्ति कायम करने के लिए संयुक्त राष्ट्र शांति सेना भेजने पर ज़ोर दे रहा है. अब अगर शांति स्थापित होती है और खारतूम सरकार की जगह कोई और सरकार आती है तो महज़ इतना फर्क पड़ेगा कि फ्रांस, रूस और चीन की जगह अमेरिकी कम्पनियां तेल के मुनाफे में गोता लगाएंगी और आम मेहनतकश आबादी के हिस्से भूखमरी और गरीबी ही आयेगी.

इसी तरह सूडान के पड़ोसी मुल्क चाड में एक्सोन मोबिल ने एक पाइपलाइन बिछाने के लिए लाखों किसानों को उजाड़ दिया है. यहाँ भी साम्राज्यवादी देशों के आपसी हित टकरा रहे हैं. और कोई बड़ी बात नहीं कि यहाँ भी कल को कोई नया दारूफ़ बन जाए.

इसी तरह सोमालिया में भी हुआ. १९९२ में पड़े अकाल के कारण इंसानियत के आधार परसोमालिया में संयुक्त राष्ट्र की सैनिक टुकडियां भेजी गयीं, पर बाद में पता चला कि उनका असली मिशन तेल के ट्रांसपोर्ट वाले रास्ते की रक्षा करना था. स्थानीय लोगों के जबरदस्त विरोध के कारण १९९३ में सेना को वापस बुलाना पड़ा. २००२ में सोमालिया का अलकायदा से रिश्ता जोड़कर (हालाँकि एक बार फ़िर यह कहानी झूठी साबित हुई है) फौज इस मुल्क में भेजी गई है.

इस तरह वेनजुएला के राष्ट्रपति ह्यूगो शावेज़ द्वारा तेल उद्योग का राष्ट्रियकरण की कोशिश करने और अमेरिका तेल कम्पनियों के मुनाफे के हिस्से को कम करने पर गंभीर परिणाम भुगतने की धमकियाँ अमेरिकी साम्राज्यवाद की ओर से समयसमय पर दी जाती रही हैं, फ़िलहाल इराक़ युद्ध ने इस तरफ़ से अम्रीका का ध्यान खींच लिया है. पिछले दिनों हुई जोर्जिया और रूस के बीच की फ़ौजी झड़पों के मुख्य कारणों में तेल भी है. ब्रिटिश पेट्रोलियम और अमेरिकी कंपनी शेवरोन ने मिलकर २००६ में बाकूतिबलिसीकहान तेल पाइपलाइन चालू की हैं. यह पाइपलाइन जॉर्जिया में दक्षिण ओसेतिया प्रान्त के बिल्कुल पास से गुजरती है. यह पाइपलाइन रोज़ एक मिलियन कच्चा तेल यूरोप और अमेरिका को सप्लाई करती है. जॉर्जिया और दक्षिण ओसेटिया एकदूसरे पर रणनीतिक और कूटनीतिक धौंस ज़माने के लिए रूस और अमेरिका के बीच युद्ध का अखाडा बन गए. रूस किसी भी तरह इस पाइपलाइन को अपनी पकड़ में रखना चाहता है, ताकि किसी बड़ी जंग की सूरत वह अमेरिका और योरूपीय मुल्को पर दबाब बना सके. दूसरी तरफ़ अमेरिका के लिए इस पाइपलाइन की सुरक्षा महत्वपूर्ण है, इसी वजय से वह जॉर्जिया की कठपुतली सरकार को छूट देने की हिमायत कर रहा है.

पूंजीवाद तेल के लिए सिर्फ़ युद्ध ही नहीं लड़ रहा, अब इसने बायोफ्यूलनाम की तकनीक के ज़रिए लोगों के लिए अनाज संकट भी पैदा करना शुरू कर दिया है. अपनी योजना के मुताबिक २०१७ तक अमेरिका ३५ बिलियन गैलन तेल अनाज, मुख्य तौर पर मक्का से तैयार करने लगेगा. पिछले कुछ सालों में ही २० फीसदी फसल का प्रयोग तेल बनाने के लिए होने लगा है और अनाज की कीमतें बढ़ने लगी हैं. चीन और ब्राजील भी अमेरिका के रास्ते ही चल पड़े हैं. चीन में पिछले कुछ वर्षों में अनाज की कीमतों में ४२ फीसदी वृद्धि हुई है और यह संकट तीसरी दुनिया के गरीब देशों को बुरी तरह झंझोड़ रहा है. अनाज से तेल बनाने की तकनीक कोई बुरी बात नहीं पर जब दुनियाभर में ८५ करोड़ लोग भूखमरी के शिकार हों तो कारें चलाने के लिए लोगों के पेट पर लात मारनी कहाँ की अक्लमंदी है! लेकिन पूंजीवाद की ऑंखें तो सिर्फ़ मुनाफा देखती है. जब तक पूंजीवाद है, तब तक तेल के लिए लड़ाईयां होती रहेंगी और मानवता का विनाश होता रहेगा, इंसानों के मुंह से रोटी छीनकर कारों की टंकियां तेल से भरती रहेंगी.

अमृतपाल बिगुलअक्टूबर २००८ से साभार

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