मुरादनगर के पावरलूम मजदूरों ने शोषण के खिलाफ आवाज उठाई

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मोदीनगर देश के किसी भी दूसरे कस्बे की तरह खामोश और ठहरा हुआ नज़र आता है. यह गाजियाबाद से २२ किलोमीटर दूर मेरठ रूट पर स्थित है. अभी हाल के दिनों में यहाँ के माहौल में हलचल देखी गई. करीब ८ हज़ार मजदूरों ने यहाँ अपनी मांगों को लेकर एक बड़ी सभा की. पिछ्ले २० साल से पशु की तरह पावरलूम उद्योग में अपना हाड़मांस गलातेगलाते थक चुके मजदूरों ने लम्बी चुप्पी तोडी और मालिकों के बर्बर शोषण के विरुद्ध आम सभा में खुले में आवाज उठाई.

मोदीनगर में पावरलूम की ४०० से ज्यादा फ़ैक्ट्रियां हैं. फैक्ट्रियों की इमारतें मुर्गियों के लंबेलंबे दडबों की तरह हैं. हवा और धूप के लिए शायद ही रोशनदान छोडे गए हैं. फैक्ट्री ईमारत की ऊंचाई कम होने की वजय से काम की जगह पर घुटन बढ़ जाती है. लूम चलते वक्त धागों से उड़ने वाले मशीन रेशे बिना रोकटोक के मजदूरों के फेफडों में समा जाते हैं. नतीज़तन टीवी की बीमारी आम बात है. खुली हुई बिजली की मोटरों और यहाँ वहां बिखरते नंगे तारों की चपेट में मजदूर अकसर ही आ जाते हैं. चूंकि क़स्बा बहुत खुलाखुला है इसलिए मालिकों को यह हमेशा सुविधा रहती है कि दुर्घटना में मारे गए मजदूर की लाश को खेतों में या सड़क किनारे कहीं भी फिंकवा दे. वैसे लूम के मालिक काफी रहमदिलहैं. वो पहले तो मजदूरों को फैकट्री में सोने की इजाजत दे देते हैं लेकिन फ़िर उन्हीं पर चोरी का इल्जाम लगाकर हवालात की हवा और पुलिस की लात भी खिलवाते हैं. इस तिकड़म का इस्तेमाल वे आन्दोलन को तोड़ने और बदनाम करने के लिए करते हैं.

मजदूरों ने बताया कि पिछले २० सालों से उनकी मजदूरी नहीं बढ़ी है. आज २.५ रूपए से ३ रूपए प्रति चादर की दर पर भुगतान किया जा रहा है. जब मजदूरी बढ़ाने की बात मालिकों के सामने रखी गई तो उन्होंने प्रति मजदूर मशीन की संख्या दो से बढाकर चार कर दी. इस तरह मजदूरी की पुरानी दर कायम रखते हुए मालिकों ने शोषण को दुगना कर दिया.

यहाँ काम के घंटों की कोई सीमा नहीं है. कई मजदूर तो फैक्टरियों में ही रहते हैं और उन्हें कभी भी काम पर बुला लिया जाता है. अभी तक इतवार की छुट्टी भी नहीं होती थी. आन्दोलन के बाद मालिकों ने इतवार की छुट्टी मंज़ूर की. ईएसआई, पीएफ, हाजरी रजिस्टर, जॉब कार्ड, बोनस आदि किसी भी कानून को लागू नहीं किया गया है.

मजदूरों में बढ़ते असंतोष और संगठन को भांप कर प्रशासन ने वार्ता सुलहसमझौते का नाटक खेलना शुरू कर दिया है. मालिकों और उच्चाधिकारियों की उपस्थिति में हुई बैठकों में अभी तक मजदूरों को कुछ मामूली रियायतें ही हासिल हुई हैं. अपने अनुभवों से वे समझने लगे हैं कि एकजुट संघर्ष के बिना कुछ भी हासिल नहीं किया जा सकता.

—‘बिगुलसंवाददाता अक्टूबर २००८


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