देश को एक बार फ़िर सांप्रदायिक जुनून की आग में झोंकने की तैयारी

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हिंदू फासिस्टों के जुनूनी अभियान और

कांग्रेस के नरम हिंदुत्व की राजनीती देश

को एक खतरनाक मोड़ पर धकेल रही है


मेहनतकशों की फौलादी एकजुटता ही फासिस्टों

को फैसलाकुन शिकस्त दे सकती हैं


संपादक मंडल– ‘बिगुल’ अक्टूबर २००८


केन्द्रीय सत्ता से बेदखल होने के बाद से ही संघ परिवार देश में सांप्रदायिक फासीवादी जुनून पैदा करने के कोशिशों में लगा रहा है. गुजरात, राजस्थान, उडीसा और मध्यप्रदेश तो हिंदुत्व के प्रयोगशालाएँ बने ही रहे हैं. यह अलग बात है कि गुजरात और उडीसा के अलावा देश भर में सांप्रदायिक लहर पैदा करने में उसे खास सफलता नहीं मिल पा रही थी. लेकिन चुनाव नज़दीक आते देख पूरी हिंदुत्व ब्रिगेड बदहवास होकर जुनूनी माहौल बनाने में पिल पड़ी है. “नरम हिंदू कार्ड” खेलने में माहिर कांग्रेस फ़िर पूरी बेशर्मी के साथ इस खेल में शामिल है और पूंजीवादी मिडिया भी इसके लिए माहौल बनाने का काम कर रहा है.
समाज को एक बेहद खतरनाक मोड़ पर धकेला जा रहा है. देश
की अल्पसंख्यक आबादी आज जिस कदर अलग-थलग और अपमानित महसूस कर रही है, वैसे पहले कभी नहीं था. आंतकवाद के बहाने पूरी मुस्लिम कौम को निशाना बनाया जा रहा है. बाबरी मस्जिद गिराए जाने और इसके बाद हुए सुनियोजित दंगो तथा गुजरात में राज्य मशीनरी के पूरी मिलीभगत से कराये गए मुसलमानों के कत्लेआम के बाद यह सांप्रदायिक फासीवाद के उभार का तीसरा और बेहद खतरनाक चरण है.
देश
की मुस्लिम आबादी के खिलाफ एक मुहीम छेड़ दी गई है जिसमें आंतकवाद तो महज़ एक बहाना है. आंतकवाद को वास्तव में ख़त्म करने में न भाजपा की दिलचस्पी है और न ही कांग्रेस की. दिल्ली के बम धमाकों के बाद जिस तरह आनन-फानन में पुलिस ने आंतकवादियों के नाम पर जामियानगर में दो मुस्लिम नौजवानों को मार गिराया और कई जाँच टीमों द्वारा पुलिस की कहानी पर ढेरों सवाल खड़े करने के बाद भी जिस बेशर्मी के साथ सरकार,पुलिस और मिडिया उसी कहानी को दोहराए जा रहे हैं वह आम मुसलमान के मन में इस धारणा को फ़िर मज़बूत बना रहा है कि इस समाज में उसके साथ इंसाफ नहीं हो सकता.
अमरनाथ श्राइन  बोर्ड की जमीन को लेकर चले आन्दोलन में संघ परिवार के संगठनों ने मुसलमानों के खिलाफ पूरे देश में जहरीला प्रचार अभियान चलाया था. जगह-जगह दंगे भड़काने की सुनियोजित हरकतें शुरू हो चुकी हैं. उडीसा के कंधमाल जिले में ईसाईयों के खिलाफ गुजरात की तर्ज़ पर जारी हमले तो वर्षों से जारी तैयारियों का परिणाम है, कर्नाटक तथा तमिलनाडु में भी चर्चों पर हमले किए जा रहे हैं. महाराष्ट्र के धुले और मध्यप्रदेश के बुहानपुर जिले में भड़काए गए दंगों में कई लोग मारे गए हैं और सैंकडों बेघर हो चुके हैं. दर्जनों और जगहों पर ऐसी कोशिशें जारी हैं. पूर्वांचल में योगी आदित्यनाथ की फासिस्ट हिंदू वाहिनी बेरोकटोक अपना जहरीला प्रचार अभियान चलाते हुए घूम रही है. आजमगढ़ में योगी के काफिले में मुसलमानों को घोर अपमानजनक गालियाँ देते हुए नारे लगते हैं और इसके विरोध में पथराव होने पर मिडिया ख़बर देता है कि अंतकवाद के विरोध के लिए “आजमगढ़ गए योगी के काफिले पर कातिलाना हमला”. आजमगढ़ और खासकर संजरपुर गाँव को मीडिया में इस तरह पेश किया जा रहा है जैसे वहां आंतकवादी ही पैदा होते हों. एस.एम.एस. ईमेल और ज़बानी प्रचार से इस किस्म की बातें फैलाई जा रही हैं कि “हर मुसलमान आंतकवादी नहीं होता लेकिन हर आंतकवादी मुसलमान होता है.” दूसरी और नागपुर, मालेगांव और कानपूर में हुए विस्फोटों में आर.एस.एस. और बजरंग दल के लोगों के शामिल होने से स्पष्ट सबूत मिलने के बाद वे आंतकवादी नहीं माने जाते. अदालत को सिमी के खिलाफ एक भी सबूत न मिलने पर सरकार उसे फ़ौरन प्रतिबंधित कर देती है लेकिन बजरंग दल पर प्रतिबन्ध लगाए जाने की मांग लटकाए रखी जाती है, बस बीच-बीच में कुछ कांग्रेसी मंत्री बयान देते रहते हैं कि बजरंग दल पर रोक लगनी चाहिए.
हजारों मुसलमानों के कत्लेआम की सच्चाई ‘तहलका’ की टेपों में सामने आने के बावजूद नानावटी आयोग मोदी को क्लीन चिट देता है, सोहराबुद्दीन और उसकी बीवी कौसर बानो की नृशंस हत्या के मामले में पूरी तरह नंगा हो जाने के बाद मोदी उनकी हत्या की जिम्मेवारी खुलेआम स्वीकारता है और इसे चुनावी मुद्दा बनाकर जीत भी जाता है. बजरंग दल के लोग जगह-जगह हथियारों की ट्रेनिंग लेते हैं, बम बनाते हुए पकड़े जाते हैं, अल्पसंख्यकों को जिंदा जलाकर मार देते हैं, सैंकडों घर जला देते हैं फ़िर भी उनका कुछ नहीं बिगड़ता. बाल ठाकरे हिंदू आत्मघाती दस्ते बनाने की बात करता है, बाबरी मस्जिद गिराने में शिवसैनिकों का हाथ होने की बात स्वीकार करता है, पर उस पर सरकार हाथ भी नहीं डालती. राज ठाकरे सरेआम लाखों लोगों के खिलाफ नफ़रत भड़काने वाले भाषण देता है, उसकी पार्टी के लोग सुनियोजित हमले करते हैं, हत्याएं, मारपीट और लूटमार करते हैं पर पुलिस उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाती. दूसरी ओर आंतकवाद के बहाने सैंकडों बेक़सूर मुसलमानों को बिना किसी सबूत के गिरफ्तार करके टार्चर किया जाता है, फर्जी मुकदमों में फंसाकर जेल भेज दिया जाता है, ऐसा माहौल पैदा कर दिया जाता है जैसे मुसलमान और नौजवान होना ही शक के घेरे में आने के लिए काफी है. पूरी कौम को कदम-कदम पर अपमानित किया जाता है, तरह-तरह से इस बात का अहसास कराया जाता है कि वे दोयम दर्जे के नागरिक हैं और बहुसंख्यकों की मर्ज़ी से ही इस देश में रह सकते हैं. जब किसी समाज में भाषाई या धार्मिक अल्पसंख्यकों की आबादी को इस तरह अलग-थलग कर दिया जाए कि वह लगातार घुटन में जीते हुए यह महसूस करने लगे कि इस समाज में उसे इंसाफ और बराबरी मिलने की कोई उम्मीद नहीं है, तो अंधी प्रतिक्रिया में उसके कुछ नौजवान कट्टरपंथ और आंतकवाद की ओर मुड़ जायें यह बिल्कुल स्वाभाविक है. लेकिन इसके लिए बहुसंख्यकों की साम्प्रदायिकता और राजकीय आंतकवाद ही मुख्य रूप से जिम्मेवार है.
कश्मीर का मुद्दा एक अलग सवाल है और यहाँ उस पर चर्चा करने का अवसर नहीं है लेकिन अमरनाथ श्राइन  बोर्ड को ज़मीन देने के मसले पर चले आन्दोलन को संघ परिवार ने जिस तरह मुस्लिम विरोधी रंग दिया उसने माहौल को ओर जहरीला ही बनाया है. कश्मीर घाटी की जिस तरह से आर्थिक नाकाबंदी की गई उसके बाद घाटी के लोग अगर मुज़फ्फराबाद मार्च नहीं करते तो क्या करते? दूसरी ओर, उसके बाद से कश्मीर में जिस तरह का बर्बर दमन चक्र चल रहा है उसकी तो खबरें भी अख़बारों में कभी नहीं आई. दमन के खिलाफ फिलस्तीनी इंतिफादा की याद दिला देने वाले अंदाज़ में लाखों कश्मीरी जनता सडकों पर उतर आई पर इसे इस ढंग से पेश किया गया जैसे यह चंद अलगाववादियों का प्रदर्शन हो. सच तो यह है कि कश्मीरी जनता की अपने हकों की लडाई एक सेक्युलर लडाई थी जिसे सांप्रदायिक रूप देने और अपनी कारगुजारियों से वहां पाकिस्तान समर्थक लॉबी को मजबूत करने में सबसे बड़ी भूमिका भारत सरकार की रही है. कश्मीर शुरू से संघ परिवार के लिए मुसलमान विरोधी अंधराष्ट्रवादी प्रचार का एक बहाना रहा है और इस बार भी वे ऐसा ही करते रहे हैं.
कई विधानसभाओं और फ़िर लोकसभा का चुनाव जैसे-जैसे नज़दीक आ रहा है, मुद्दे के लिए वेचैन संघ परिवार की आक्रामकता बढ़ती जा रही है. रामसेतु का मुद्दा टाँय-टाँय फिस्स हो जाने और श्राइन बोर्ड के मुद्दे से भी देश में कोई लहर न बन पाने से बदहवास भाजपा को आतंकवाद के रूप में एक मुद्दा मिल गया है जिसके जारी लोगों में और खासकर मध्यवर्ग के भय के मनोविज्ञान का इस्तेमाल करके वह मुसलमान विरोधी भावनाएं भड़का सकती है और चुनाव में उसकी फसल काटने की उम्मीद कर सकती है. उसे पता है कि सत्ता के लिए फासिस्टों से भी हाथ मिलाने को तैयार पतित समाजवादियों और क्षेत्रीय अवसरवादी पार्टियों से जोड़तोड़ करके सरकार बनाने के लिए उसे जितनी सीटें चाहिए वह भी उसे केवल अंधराष्ट्रवाद और उग्र हिंदुत्व के नारों से ही मिल सकती हैं.
दूसरी ओर कांग्रेस फ़िर से अपने नाम हिंदू कार्ड के खेल में लग गई है. भूलना न होगा कि कांग्रेस पंजाब में हिंदू कार्ड खेलने, बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाने से लेकर राम जन्मभूमि मन्दिर के शिलान्यास और गुजरात में मोदी के उग्र हिंदुत्व के बरक्स नरम हिंदुत्व की राजनीती करने का काम करती रही है. यह अलग बात है कि प्रतिस्पर्धी साम्प्रदायिकाताओं के इस खेल में बाजी उग्र हिंदुत्व के हाथ ही लगती रही है और कांग्रेस के नरम हिंदू कार्ड का फायदा भी भाजपा को ही मिलता रहा है. यूपीए के दूसरे घटकों के लिए भी साम्प्रदायिकता महज एक चुनावी मुद्दा है, जिसमें वे अपने-अपने वोटबैंक के अनुसार नरम या गरम बयान देते रहते हैं. राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष शरद पावर एक और तो बजरंग दल पर पाबन्दी लगाने का बयान देते है और दूसरी और बाल ठाकरे से उनकी पुरानी दोस्ती भी कायम है. राज ठाकरे की फासिस्ट करतूतें कांग्रेस और राकांपा के परोक्ष समर्थन से ही जारी हैं.
संसदीय वामपंथी अपने दोगले चरित्र के ही मुताबिक व्यवहार कर रहे हैं. सांप्रदायिक ताकतों का हौवा खड़ा करके ये पाँच साल तक यूपीए सरकार की घनघोर जनविरोधी आर्थिक नीतियों को समर्थन देते रहे और चुनाव के करीब पहुँच कर उससे अलग हुए तो हुए पर अब भी बेशर्मी से यह कह रहे हैं कि चुनाव के बाद सांप्रदायिक ताकतों को रोकने के लिए कांग्रेस का साथ दे सकते हैं. वैसे भी, इनका साम्प्रदायिकता विरोध भाषणबाजी और टीवी पर बयानबाजी या फ़िर मोमबती जलूसों से आगे कभी नहीं गया. इतिहास ने हमेशा ही सामाजिक जनवादियों ने अपनी हरकतों से फासिस्टों को मदद पहुंचाई है और भारत में भी ये ऐसा ही कर रहे हैं.
राजनितिक परिस्थितियों का यह जंगलतंत्र आर्थिक तंत्र से मेल खा रहा है और आर्थिक कट्टरपंथ की ही एक अभिव्यक्ति है. भारतीय पूंजीवाद के लिए फासीवाद जंजीर से बंधा शिकारी कुत्ता है, जिसे वह मौका पकड़ने पर मेहनतकश के आंदोलनों को कुचलने के लिए हमेशा तैयार रखना चाहता है.
आर्थिक नीतियों से पैदा होने वाला संकट, बेरोजगारी, निराशा और असुरक्षा लगातार फासीवादी प्रवृत्तियों के पैदा होने और फैलाने की जमीन तैयार कर रहा है. सांप्रदायिक फासीवाद के नए उभार के लिए समां बनाने में मिडिया की भी बड़ी भूमिका है. न्यूज़ चैनलों की घोर पूर्वाग्रस्त और आक्रामिक रिपोर्टिंग के साथ ही एक के बाद एक धार्मिक चैनलों ने रामजन्मभूमि मुद्दे पर संघ परिवार के आन्दोलन के लिए फिजां तैयार करने में भूमिका निभाई थी. टीवी पर भूत-प्रेत, जादू-टोना और अंधविश्वासों को फैलाने वाले कार्यक्रमों की भरमार है. जब भी कोई समाज अपनी पीठ विज्ञान की तरफ़ करता है तो उसका मुंह अपने आप अन्धविश्वास की ओर हो जाता है. ऐसे समाज में अन्धविश्वास के पौधे तेज़ी से पनपते हैं.
मेहनतकश को इस सांप्रदायिक जुनून की लहर में बहाने से बचाना होगा और यह समझ लेना होगा कि जाति-धर्म-भाषा-क्षेत्र आदि-आदि के नाम पर लोगों को आपस में बांटने और लड़ाने की सारी राजनीती का एक मकसद होता है–आम मेहनतकश गरीब आबादी को एकजुट होने से रोकना, ताकि यह लुटेरा निजाम जारी रहे और गरीब जनता बदहाली, गुलामी और जिल्लत की ज़िन्दगी से बाहर न निकल सके. इतिहास में हमेशा मेहनतकशों ने ही फासिस्टों को फैसलाकुन शिकस्त दी है और भारत में भी जब मेहनतकश अवाम एकजुट और संगठित हो जाएगा तो वही लोहे के झाडू से इस  साम्प्रदायिक कचडे की सफाई करेगा.

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3 thoughts on “देश को एक बार फ़िर सांप्रदायिक जुनून की आग में झोंकने की तैयारी

    अमर ज्योति said:
    November 22, 2008 at 8:20 AM

    बहुत सही विवेचन है। बस एक शंका है।’हिंदू फ़ासिस्टों’ की जगह ‘हिंदुत्ववादी फ़ासिस्टों’का प्रयोग बेहतर नहीं होता क्या। जैसे सारे मुस्लिम आतँकवादी नहीं हैं वैसे ही सारे हिंदू फ़ासिस्ट भी नहीं हैं।
    बहुत अच्छा काम कर रहे हैं आप। बधाई और शुभकामनायें।

    prashant kumar said:
    March 1, 2009 at 5:09 PM

    mahashay apni puri lekh me hindu ko code kiya hai… aapko nahi lagta abhi tak jitne v aatankwadi ghatne huye hai sab me musilm logo ka bahut bara haat raha hai……………

    kksharma said:
    December 10, 2010 at 3:21 PM

    mahodaya,
    aap asatya likh jahe hain. musalaman hi hinduon ko majate hain. hindu to keval apana bachava karate hain. isaliye asatya likh kar logon ko bhram men na dalen. aap mugal shasan kal ko bhool gaye , vahi atyachar masalaman abhi bhi kar rahe hain. isa gaharai men jane ka prayas karen.

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