1857, आरम्भिक देशभक्ति और प्रगतिशीलता

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1857, आरम्भिक  देशभक्ति और प्रगतिशीलता

दीपायन बोस

1857 पर, विशेषकर पिछले पचास वर्षों  के दौरान, मार्क्सवादी  विद्वानों और इतिहासकारों ने काफी कुछ लिखा है। पहले जिन मार्क्सवादियों  में मार्क्स के भारत विषयक प्रेक्षणों से ही ऐतिहासिक मूल्यांकन का अपना फ्रेमवर्क निर्धारित करने की आदत थी, उनकी अवस्थिति 1857 को लेकर प्राय: अस्पष्ट या अंतर्विरोधपूर्ण हुआ करती थी। और बाद के मार्क्सवादियों में तथ्यबहुलता और पल्लवग्राहिता की प्रवृत्ति हावी रही है। या तो तथ्यों के मनमाने चयन के आधार  पर निष्कर्ष दिये जाते रहे हैं, या फिर तमाम तथ्य देने के बावजूद सामान्य सूत्रीकर्णों   से बचा जाता रहा है, या फिर इस ऐतिहासिक महाघटना के किसी एक पहलू या कुछ पहलुओं पर विचार करके इतिश्री कर ली जाती है।

भारतीय इतिहास-विषयक विभिन्न बहसों में यूरोकेन्द्रिकता  का विरोध  करते हुए प्राय: यूरोकेन्द्रिकता का ही शिकार हो जाने की प्रवृत्ति देखने को मिलती है और 1857 के सन्दर्भ में भी ऐसा होता रहा है। यूरोप में, ख़ासकर पश्चिमी यूरोप में पूँजीवाद  का विकास-पथ `पुनर्जागरण-प्रोबोधन-क्रान्ति´ (`रिनेसा¡-एनलाइटेनमेण्ट-रिवोल्यूशन´) का क्रम था। औपनिवेशिक भारत में भी इसी का समतुल्य या प्रतिरूप ढूँढते हुए कतिपय सुधारवादी राष्ट्रवादी से लेकर मार्क्सवादी इतिहासकारों तक ने `बंगाल रिनेसा¡´ का आविष्कार कर डाला, तो हिन्दी पट्टी के गौरव की येन-केन-प्रकारेण स्थापना के लिए व्याकुल रामविलास शर्मा ने हिन्दी नवजागरण की स्थापना प्रस्तुत कर दी और 1857 के महासंग्राम को उसका प्रस्थान-बिन्दु घोषित कर दिया। इन स्थापनाओं के अन्तरविरोधों  और इनमें निहित मनोगतता एवं आधिभौतिकता का विश्लेषण एक विशद प्रबन्ध का विषय है और प्रदीप सक्सेना ने इस महत दायित्व का अपनी पुस्तक `1857 और नवजागरण के प्रश्न´ में काफ़ी हद तक सफल निर्वाह किया है। राष्ट्रीय गौरव की स्थापना के लिए, भारतीय इतिहास में यूरोपीय इतिहास का प्रतिरूप गढ़ते हुए उपरोक्त श्रेणी के विद्वान इस बात पर ध्यान ही नहीं देते कि पूंजीवादी विकास का पथ और प्रकृति उपनिवेशों में यूरोपीय महाद्वीप से काफी भिन्न थी और अलग-अलग ऐतिहासिक विशिष्टताओं के अनुसार एशिया, अफ्रीका, लातिन अमेरिका के देशों में भी इस सन्दर्भ में मूलभूत भिन्नताएँ थीं ।ये भिन्नताएँ इस हिसाब से भी थीं कि कौन देश किस देश का उपनिवेश था, क्योंकि सभी उपनिवेशवादियों की नीतियां एक समान न थीं। उपरोक्त इतिहासकार और विद्वान इस तथ्य पर भी ध्यान नहीं देते कि रूस में, कुछ पूर्वी यूरोपीय देशों में, और जापान में भी, पूँजीवादी विकास का रास्ता हू-ब-हू `पुनर्जागरण-प्रबोधन-क्रान्ति´ का रास्ता नहीं था। इन देशों में पुनर्जागरण और प्रबोधन के स्थानापन्न सामाजिक-सांस्कृतिक-विचारधारात्मक आन्दोलनों के अन्य रूप देखने को मिलते हैं। यूरोपीय पुनर्जागरण और प्रबोधन के संघटक अवयव इन आन्दोलनों में अलग ढंग से संघटित हुए थे। और सभी जगह पूँजीवाद क्रान्ति के द्वारा आया भी नहीं। कहीं यह `नीचे से´ और (मार्क्स के शब्दों में) क्रान्तिकारी ढंग से आया तो कहीं `ऊपर से´ या `क्रमिक विकास´ की प्रक्रिया में या ग़ैर-क्रान्तिकारी ढंग से विकसित हुआ। जहाँ यह दूसरे ढंग से आया, वहां  का चरित्र अधिक जनविरोधी था, वहां  के राज्य और समाज में जनवाद के तत्व  बहुत कम थे, वहां  पूँजीवाद उत्पादन-संबंधों के वर्चस्व के बावजूद, उनके अधीनस्थ प्राक्-पूंजीवादी संरचनाओं की मौजूदगी बनी हुई थी तथा वहां प्राक्-पूंजीवादी अधिसंरचना को पूरी तरह से ध्वस्त करने के बजाय उसके तमाम मूल्यों-संस्थाओं को पूँजीवाद ने अंतर्भेधन -अधीनीनीकरण-परिष्कार के द्वारा अपने अनुरूप बनाकर अपना लिया था। यूरोपीय पुनर्जागरण-प्रबोधन की प्रक्रिया के बजाय, उपनिवेशों में जनवाद और राष्ट्रवाद के मूल्य राष्ट्रीय आन्दोलन के अन्तर्गत चलने वाले साम्राज्यवाद-सामन्तवाद विरोधों  संघर्षों के गर्भ से उत्पन्न हुए थे। इनकी वाहक सामाजिक शक्तियां उसी औपनिवेशिक सामाजिक-आर्थिक संरचना में पैदा हुई थीं, जिसे इन देशों की अपनी सामाजिक-आर्थिक संरचना को व्यवस्थित ढंग से नष्ट करके, इनकी नैसर्गिक  आन्तरिक विकास-प्रक्रिया को नष्ट करके, ऊपर से आरोपित किया गया था। औपनिवेशिक सामाजिक-आर्थिक संरचना में पैदा हुए और साम्राज्यवादी विश्व-परिवेश में पले-बढ़े, विकलांग-बौने पूँजीवाद  के मानववाद, जनवाद, यथार्थवाद और वैज्ञानिक तर्कणा के मूल्य यदि जन्मना ही पक्षाघात के शिकार थे तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं। उपनिवेशों में, (निश्चय ही अलग-अलग ढंग से और अलग-अलग परिमाण में) पूंजीवादी जनवादी क्रान्तियों के कार्यभार एक दु:सह-यन्त्राणादायी ढंग से क्रमिक विकास की प्रक्रिया में और आधे-अधूरे ढंग से पूरे हुए और सत्तासीन होने के बाद भी इन देशों के पूंजीपति वर्ग ने साम्राज्यवाद से निर्णायक विच्छेद नहीं किया। यह इतिहास की वस्तुगत सच्चाई है जिससे मुंह मोड़कर और किसी विषम के काल्पनिक चिन्तन का सहारा लेकर “खोये हुए राष्ट्रीय गौरव” की खोज करना एकदम व्यर्थ है। भारतीय जनता के पास वर्ग-संघर्ष के सातत्य का गौरव है, पर उस गौरव का मनोगत महिमामण्डन करते हुए इतिहास के रंगमंच की सीमाओं और तज्जनित त्रासदियों की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए। इतिहास की सहस्त्रब्दियों  से जारी दौड़ में कुछ शताब्दियों के लिए कोई क्षेत्र/देश/राष्ट्र आगे रहे तो कभी कोई और। इसका भी अपना एक ऐतिहासिक-वैज्ञानिक तर्क है। पूंजीवाद, उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद के दौर में पुरातन सभ्यता-संस्कृति वाले तथा प्रचुर प्राकृतिक सम्पदा एवं सामाजिक सम्पदा वाले कुछ देश (जैसे भारत) विशिष्ट वस्तुगत ऐतिहासिक कारणों से (जिनकी चर्चा यहाँ सम्भव नहीं) पीछे छूट गये। अब ऐसे ही देश विश्व-पूंजीवाद विरोधी सर्वहारा क्रान्ति के नये “हॉट स्पॉट्स” हैं जो भविष्य में “फ्लैश प्वाइण्ट्स” बनेंगे। सर्वहारा क्रान्ति के प्रथम संस्करणों की विफलता से विश्व इतिहास की इस बुनियादी गति पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। भारत जैसे देशों के औपनिवेशिक अतीत के चलते फर्क बस इतना पड़ा है कि राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान और 1947 के बाद क्रमिक विकास-प्रक्रिया के ग़ैर-क्रान्तिकारी मार्ग से और आधे-अधूरे  ढंग से जनवादी क्रान्ति के कार्यभारों के पूरा होने की जो त्रासदी घटित हुई, उससे पैदा हुई विकृतियों को दूर करने और विगत दौर के छूटे हुए कार्यभारों के `बैकलॉग´ को निपटाने की ज़िम्मेदारी अब भावी नयी सर्वहारा समाजवादी क्रान्ति के कर्णधारों  पर है। सांस्कृतिक-वैचारिक आन्दोलन की एक गहन प्रक्रिया और सुदृढ़ वैचारिक-सांस्कृतिक आधार के बिना इस क्रान्ति की वाहक शक्तियां  निश्चय ही इस काम को पूरा नहीं कर सकतीं। और इसके लिए मनमाने सूत्रीकरणों और “भारत-व्याकुल-हृदय” होने की जगह इतिहास के प्रति एक वस्तुपरक रुख़ अपनाना ज़रूरी है। दूसरी बात, राष्ट्रीय गौरव-स्थापना के लिए द्रविड़ प्राणायाम करते हुए विश्व-ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य की भी अनदेखी और विश्व-इतिहास की मनमानी व्याख्या नहीं की जा सकती। “हिन्दी नवजागरण” के आविष्कर्ता रामविलास शर्मा और उनके अनुयायी तथा मनमाने ढंग से अवस्थितियाँ  बदलते रहने वाले और “बंगाल नवजागरण” का महत्व-प्रतिपादन करने वाले नामवर सिंह ने तो ऐसा किया ही है, कई मार्क्सवादी इतिहासकार भी इस दोष से मुक्त नहीं हैं। इसी दोष का एक सह-उत्पाद यह है कि विशिष्ट यूरोपीय ऐतिहासिक घटनाओं-परिघटनाओं-प्रवगों  के जूते के हिसाब से भारतीय ऐतिहासिक तथ्यों के पैर प्रकारान्तर से वे लोग भी काटने लगते हैं जो प्रकटत:  ‘भारतीय गौरव के अतिशय अग्राही” प्रतीत होते हैं। 1857 के महासंग्राम की महत्ता और इतिहास पर पड़े उसके प्रभावों के वस्तुपरक मूल्यांकन के लिए इस प्रवृत्ति-दोष और पद्धति-दोष से मुक्त होना ज़रूरी है।

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