गहराते साम्राज्यवादी संकट पर एक विस्तृत रिपोर्ट

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अमेरिकी सबप्राईम संकट


गहराते साम्राज्यवादी संकट

की नई अभिव्यक्ति


-अभिनव

‘आह्वान’ जनवरी-मार्च २००८ से साभार

२००१ में शुरू ‘हाऊसिंग बूम’ (अमेरिका में आवास बाज़ार में अभूतपूर्व तेज़ी का दौर) के दौरान अमेरिकी संसद के कुछ मान्य सीनेटरों व राष्ट्रपति ने कहा की अमेरिकयों को यह समझ लेना चाहिए कि देशभक्ति का क्या अर्थ है जमकर खर्च करना और जो उपभोक्ता सामग्रियों पर खर्च नहीं करता वह आज के अर्थों में सच्चा देशभक्त नहीं है! अगर सीधे-सीधे उद्धृत किया जाए तो शब्द कुछ यूँ थे–‘स्पेंड योर वे आउट ऑफ़ रिसेशन’ ( यानि, इतना खर्च करो कि मंदी से बाहर निकला जा सके!) मार्क्स ने जब कहा था कि बुर्जुआ वर्ग का राष्ट्रवाद मण्डी में पैदा होता है तो उन्होंने शायद यह नहीं सोचा होगा कि पूंजीवादी विश्व के शीर्ष पर बैठे हुए देश का राष्ट्रपति इतने नंगे शब्दों में इस बात को स्वीकार करेगा!

२००१ में डॉट-कॉम क्रैश के बाद के झटके से उबरने के लिए अमेरिका के केन्द्रीय बैंक फेडरल रिज़र्व या फेड ने ब्याज दरों को ज़बर्दस्त रूप से नीचे गिरा दिया. महामंदी के दौर के बाद ब्याज दरों में की गई सबसे बड़ी कटौतियों में से एक थी. कारण यह था कि डॉट-कॉम के बुलबुले के फूटने के बाद शेयर मार्किटों में भारी गिरावट आनी शुरू हुई, कई निवेश बैंक दिवालिया हुए और उपभोक्ता सामग्रियों की खरीद में भारी कमी आने लगी. नतीजा था, एक मंदी! लेकिन अभी यह मंदी पूरी तरह परवान ही नहीं चढी थी कि फेडरल बैंक ने ब्याज दरों में कटौती की ताकि उधार से वित्त पोषण करके उपभोक्ता सामग्रियों की खरीद को उन्हीं स्तरों पर बरक़रार रखा जा सके जिन पर वे पहले थी, या उससे भी ऊपर ले जाया जा सके. डॉट-कॉम बुलबुले के दौरान उपभोक्ता सामग्रियों की खरीद में वृद्धि करने के लिए जो ‘समृद्धि प्रभाव’ (वेल्थ इफेक्ट) पैदा करना था उसका जरिया बना था शेयर मार्केट. इस बार तेज़ी का जरिए था रियल एस्टेट, यानि आवास उद्योग. घर खरीदने के लिए भारी पैमाने पर ऋण दिए गए. डॉट-कॉम बुलबुला दरअसल एक दूसरे संकट से उबरने का फौरी नुस्खा था. वह संकट था १९९७-९८ का पूर्वी एशियाई देशों का मौद्रिक संकट जिसमें ‘एशियन टाइगर्स’ कही जाने वाली सशक्त पूर्वी एशियाई अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राएँ औंधे मुहं गिर गई थीं. डॉट-कॉम बुलबुले के फूटने के बाद आए संकट से उबरने के लिए “हाऊसिंग बूम’ पैदा किया गया. दरअसल, आज जो संकट ‘सबप्राईम क्राईसिस’ के नाम से पूरे विशव मिडिया पर छाया हुआ है और जिसके कारण १८ दिसम्बर को अमेरिका के सबसे बड़े निवेश बैंकों में से एक मोर्गन स्टैनली को खुले तौर पर स्वीकारना पड़ा कि अमेरिका एक घातक मंदी की ओर तेज़ी से फिसल रहा है और यह मंदी तथाकथित ‘उभरती अर्थव्यवस्थाओं’ को बुरी तरह प्रभावित करेगा और कालांतर में एक वैश्विक मंदी का रूप ले लेगा. वह संकट इसी ‘हाऊसिंग बूम’ के फटने के कारण आये है; ऐसा कैसे हुआ है, यह हम इस लेख में आगे देखेंगे. सितम्बर तक रॉबर्ट शिलर से लेकर जोसफ स्टिग्लिट्ज़ तक जैसे अर्थशास्त्री जिस संभावित मंदी की बात कर रहे थे वह दिसम्बर आते-आते एक हकीकत में तब्दील होने लगी है. इससे पहले कि हम आगे बढ़ें, यह स्पष्ट कर देना ज़रूरी है कि इस वित्तीय संकट ने एक बार फ़िर बुनियादी मार्क्सवादी सिद्धांतों को पूरे ज़ोर-शोर के साथ स्थापित कर दिया है. यह और कुछ नहीं अतिउत्पादन और साम्राज्यवाद या इजारेदारी पूंजीवाद के दौर में पूँजी के बढ़ते अनुत्पादक चरित्र और सट्टेबाज़ प्रवृत्ति के कारण पैदा होने वाला साम्राज्यवादी आर्थिक संकट है, जो हर नए चक्र के साथ और अधिक गहराता जा रहा है और पूरी दुनिया को एक नही उथल-पुथल की ओर धकेल रहा है. इस लेख में हम सबप्राईम संकट के जारी अमेरिका और मौटे तौर पर पूरी विश्व अर्थव्यवस्था के गहराते आर्थिक संकट के चरित्र, कालानुक्रम, उसकी दिशा और उसके भविष्य पर एक निगाह डालेंगे और उसे समझने के प्रयास करेंगे और साथ ही यह प्रर्दशित करेंगे कि यह साम्राज्यवाद के गहराते संकट और उसके अवश्यम्भावी अंत का एक दिशा-संकेतक ही है.

सबप्राइम ऋण क्या है ?

सबप्राइम संकट का रिश्ता सबप्राइम ऋण से है. अमेरिका में ऋणों को मानक तय करने वाले संस्थानों और बैंकों तथा वित्तीय मामलों पर केंद्रित पत्रिकाओं ने कई श्रेणियों में बांटा है. सबसे ऊँची श्रेणी होती है ‘एएए’ या प्राइम ऋण जिसमें जोखिम सबसे कम होता है. यानि, जिसके ब्याज सहित चुकता होने में न्यूनतम संदेह है. इसके बाद, आती है ‘ऑल्ट-ए’ या ‘अल्टरनेटिव ए’ श्रेणी, जो इससे थोड़ा अधिक जोखिम वाले ऋण होते हैं, इसमें भी ऋण लेने वाले की जाँच आदि की जाती है, उसके दस्तावेजों को देखा जाता है. इसके बाद आती है ‘सबप्राइम’ ऋण की श्रेणी. यह सबसे खतरनाक किस्म के ऋण होते हैं. इसमें ऋण लेने वाले की भरोसेमंदी की पूरी तरह जाँच नही की जाती और उन लोगों को भी ऋण दिया जाता है जिनके उधार लेने का इतिहास और बैंक खाते की क्रेडिट हिस्ट्री उनको ऋण की पात्रता से वंचित करती है. इसके बदले में उन पर अत्यधिक ब्याज लगाया जाता है. यह ब्याज कई मामलों में फिक्सड यानि स्थाई नहीं होता बल्कि यह परिवर्तनीय होता है. इसे ए.आर.एम. (एड्जस्टेबल रेट मोर्टगेज) भी कहते हैं. और ऋण की पूरी अवधि में ब्याज दरें २ प्रतिशत से ३० प्रतिशत तक जा सकती हैं. ऋणदाता सबप्राइम में निहित जोखिम से निपटने के लिए भारी ब्याज दरें लगाता है. जब तक सबप्राइम ऋण देने वालों को फेडेरल रिज़र्व से कम ब्याज पर ऋण मिलता रहता है तब तक तो ब्याज दरें थोडी कम रहती हैं और फेड द्वारा ब्याज दरें बढाए जाने के साथ ही प्रति माह ऋण की किश्त का भुगतान बढ़ता जाता है.

सबप्राइम ऋण देने वालों और लेनेवालों दोनों के लिए ही घातक होता है. इसका कारण होता है, लेनेवाले की ख़राब आर्थिक स्थितियां और अत्यधिक ऊँची ब्याज दर. सबप्राइम ऋण कई क्रेडिट उपकरणों का उपयोग करके दिया जाता है. इसके प्रमुख रूप हैं सबप्राइम मोर्टगेज, जिसमे सबप्राइम ऋण लेने वाला संपत्ति गिरवी रखकर ऋण लेता है, और सबप्राइम क्रेडिट कार्ड के माध्यम से दिया जाता है. सबप्राइम ऋण की शुरुआत दिखावे के लिए जनता के हित में हुई थी. यह कहा गया कि यह उन गरीब लोगों को भी ऋण का पात्र बना देता है जिनकी क्रेडिट हिस्ट्री उनको प्राइम श्रेणी के ऋणों का अधिकारी नहीं बनाती. लेकिन यह नहीं बताया गया कि इसमें कई बार ब्याज दर इतनी अधिक बढ़ सकती है कि उसकी एक किश्त मूलधन से भी अधिक हो जाए. या फ़िर, जिस संपत्ति को गिरवी रखकर वह ऋण लिया गया, उस संपत्ति की कीमत से भी अधिक हो जाए. लोगों को फंसाने के लिए पहले कुछ महीने ब्याज दरें कम रखी जाती हैं ताकि लोग सबप्राइम ऋण लेते रहें. और उसके बाद ब्याज दरें बदना शुरू हो जाती हैं और यह दरें कई बार ३० प्रतिशत तक पहुँच जाती हैं

सबप्राइम ऋण की शुरुआत का कारण थे वित्तीय बाज़ार की बढती अस्थिरता और एक भारी आबादी का विकास जिसकी क्रेडिट रेटिंग इतनी नहीं थी कि उन्हें ऋण देने के काबिल समझा जाए. अमेरिका का संस्थान फिको (FICO) क्रेडिट ब्यूरो रिस्क स्कोर देती है जिसके अनुसार किसी व्यक्ति के ऋण की पात्रता निर्धारित होती है. २५ प्रतिशत अमेरिकियों के क्रेडिट स्कोर ६२० अंक से कम है, जो उन्हें प्राइम ऋण या आल्ट-ए-ऋण की श्रेणी से बाहर कर देता है लेकिन अमेरिकी वित्तीय बाज़ार २५ प्रतिशत अमेरिकी जनता को छोड़ नहीं सकता. दूसरी बात यह है कि उसके पास पूँजी की इतनी प्रचुरता है कि प्राइम व आल्ट ए श्रेणी बाज़ार संतृप्त होने के बाद भी उसके पास भारी मात्र में पूँजी बच जाती है. अब इस पूँजी का संचरित कराना उसके लिए अस्तित्व का प्रश्न होता है. इसलिए एक नए ऋण उपकरण का अविष्कार किया गया- सबप्राइम लोन!! और उसे इस लफ्फाजी भरे तर्क की चाशनी में लपेटा गया कि यह गरीब लोगों को भी ऋण की पात्रता के दायरे में लाकर एक क्रांतिकारी काम को अंजाम देता है.

मौजूदा सबप्राइम संकट का कारण दरअसल सबप्राइम मोर्टगेज बाज़ार में आया संकट है. सबप्राइम ऋण का यह सबसे प्रमुख उपकरण है. इसमें किसी संपत्ति को सिक्योरिटी के रूप में रखकर ऐसे व्यक्तियों को ऋण दिया जाता है जो एएए श्रेणी का या ऑल्ट-ए श्रेणी का ऋण प्राप्त करने के लिए पूरे किए जाने वाले मानकों को पूरा नहीं करते. मूडीज़ इन्वेस्टर्स सर्विस के प्रमुख अर्थशास्त्री जॉन लांस्की का कहना है कि २००४ से २००६ तक अमेरिका में दिए गए सारे ऋणों में से २१ प्रतिशत सबप्राइम ऋण थे. २००६ में सबप्राइम मोर्टगेज के तहत ६०० बिलियब डॉलर का ऋण दिया गया जो अमेरिका के कुल आवास ऋण बाज़ार का २० प्रतिशत था. इसी आंकडे से सबप्राइम ऋण की पहुँच को समझा जा सकता है. सबप्राइम ऋण के उदय को समझने के लिए यह समझना बेहद जरूरी है कि द्वितीय विश्वोत्तर काल में ऋण का एक माल के रूप में विकास हुआ और इसी के साथ विकसित हुआ एक ऋण बाज़ार. वित्तीय पूँजी के विस्तार के साथ यह होना लाजिमी था. इसका प्रमुख उदाहरण डीबेन्चर इशू को माना जा सकता है जिसमें कम्पनियाँ लोगों से ऋण लेती हैं, जिसके बदले में वे उन्हें ब्याज लेने और ऋण के भुगतान प्राप्ति का अधिकार देती हैं. लाभ के दौर में तो यह उपकरण निवेशकों के लिए फायदेमंद होता है, लेकिन मंदी के दौर में यह दोगुना नुकसानदायक साबित होता है. ऋण की इस खरीद फरोख्त में वित्तीय बाज़ार में पूंजी की प्रचुरता के साथ भारी बढोत्तरी हुई. पूँजी के बाज़ार पर भी हर बाज़ार की तरह संतृप्त होने का नियम लागू होता है. यहाँ भी लाभ की दर में लगातार गिरावट की प्रवृति होती है. यही कारण है कि प्राइम ऋण के बाज़ार के संतृप्त होने के बाद अब बदहवासी में निवेश बैंकों और मोर्टगेज बैंकों ने अंधाधुंध सबप्राइम ऋण दिए हैं. यह फौरी ललचा देने वाला रास्ता है. इस बदहवासी में ही बैंकों ने ऋणों का पैकेज बनाकर बेचने के तमाम तरीके निकाले हैं. इन निवेश बैंकों ने अन्य वित्तीय संस्थाओं जैस हैज़ फंड्स, बैंकों और बीमा को ये ऋण पैकेज बेचे. इससे यह उम्मीद की गई कि जोखिम का वितरण हो जाएगा और विस्फोटक कचरा सामग्री (बुरे जोखिम भरे ऋण) किसी एक जगह पर एकत्र नहीं होंगे. इससे कोई एक बैंक बुरे ऋणों के संकट के तहत ध्वस्त नहीं होगा. लेकिन ऋण को दूसरे के मत्थे डालने के इस चमत्कारी मन्त्र ने कई ऋण दात्ताओं को अपने ऋण देने के मानकों को बेहद ढीला कर देने के लिए प्रेरित किया. सबप्राइम ऋणों को और अधिक आकर्षिक बनाने के लिए उनकी पैकेजिंग अन्य प्राइम व ऑल्ट-ए ऋणों के साथ की गई और इन ऋण उत्पादों को कोलेटरल डेट ऑब्लिगेशन (संपार्श्विक ऋण देनदारी) कहा गया. इन ऋणों को तमाम संस्थानों द्वारा अच्छी क्रेडिट रेटिंग दी गई और फ़िर इन निवेश बैंकों ने इन्हें जमकर हैज़ फंड्स और बैंकों को बेचा. लेकिन जैसे ही सबप्राइम ऋण की ब्याज दर बढ़नी शुरू हुई और इन ऋणों के भुगतान का असफल होना शुरू हुआ वैसे ही इन हैज़ फंड्स और बैंकों को पता चला कि जिन ऋणों को वे कम जोखिम वाला समझ रहे थे वे वितीय कचरा थे और फ़िर शुरू हुआ बैंकों और हैज़ फंड्स के दिवालिया होने का सिलसिला और सबप्राइम संकट का प्रारम्भ.

सबप्राइम संकट

सबप्राइम संकट का आरंभ २००६ के उत्तरार्द्ध में, मोटा-मोटी अगस्त में हुआ. सबप्राइम ऋण लेने वाले ऋण के ब्याज का भुगतान करने में स्वयं को असमर्थ पाने लगे और फ़िर शुरू हुआ नीलामियों (फोरक्लोज़र्स ) का सिलसिला. नतीजा यह हुआ कि सबप्राइम ऋण देने वाले तमाम बड़े बैंक एक-एक करके धराशायी होने लगे. १०० से अधिक सबप्राइम ऋणदाताओं ने या तो अपने आप को दिवालिया घोषित कर दिया या फ़िर वे बंद हो गए. इसमें न्यू फ़ाइनेन्शिएल कारपोरेशन भी शामिल था जो देश का दूसरा सबसे बड़ा सबप्राइम ऋणदाता था. इन कंपनियों के औंधे मुंह गिरने के कारण अमेरिका का ६.५ ट्रिलियन (१० खरब) डॉलर का मोर्टगेज बाज़ार ढह ढेरी हो गया और इसका अमेरिकी आवास बाज़ार और पूरी अर्थव्यवस्था पर भयंकर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा. यह संकट अब इस हद तक पहुँच चुका है कि तमाम अर्थशास्त्री इसे एक मंदी का नाम दे रहे हैं और अमेरिकी अर्थव्यवस्था के भयंकर रूप से संकटग्रस्त होने की घोषणा कर रहे है.

इस संकट का कारण यह था कि भारी राष्ट्रिय ऋण और व्यापर घाटे के कारण अमेरिकी केन्द्रीय बैंक फेडेरल रिसर्व को ब्याज दरें बढानी पड़ी. इसके कारण सबसे भारी चोट पड़ी सबप्राइम ऋण लेने वालों को क्योंकि वे परिवर्तनीय ब्याज दर के तहत ऋण प्राप्त करने वाले लोग थे. यह दरें तेज़ी से ऊपर गयीं और नतीजे के तौर पर भारी संख्या में सबप्राइम ऋण लेने वाले लोगों ने ऋण के भुगतान में अपनी असमर्थता जता दी. घरों की नीलामी शुरू हुई. लेकिन सबप्राइम संकट के कारण जो नीलामियाँ शुरू हुईं उसने अमेरिका के ‘हाऊसिंग बूम’ का भी निर्णायक रूप से क्रिया-कर्म कर दिया जो पहले से ही संकट का शिकार था. ‘हाऊसिंग बूम’ के पैदा होने और खत्म होने को हम एक अलग उपशीर्षक के तहत बयान करेंगे. हाऊसिंग बूम के खत्म होने के कारण घरों की कीमतों में भारी कमी आनी शुरू हुई और लोगों की मकान खरीदने में दिलचस्पी ख़त्म होने लगी. यानि कि अब उन नीलामियों का कोई फायदा नहीं था जो सबप्राइम के कारण होनी शुरू हुई क्योंकि कोई खरीदार ही नहीं था. परिणामत:, पूँजी बाज़ार के खिलाड़ियों की पूँजी फंसनी शुरू हो गई और एक लिक्विडिटी क्रंच की स्थिति पूँजी बाज़ार में पैदा हो गई. लिक्विडिटी या तरलता का अर्थ होता है अर्व्यवस्था में पूँजी की मौजूदगी. तरलता में कमी के कारण कई बड़े निवेश बैंक असमाधेयता (insolvency) का शिकार हो गए और क्रेडिट क्रंच (ऋण में कमी) पैदा हो गई. बड़े निवेश बैंकों और हैज़ फंड्स के दिवालिया होने के कारण स्टॉक मार्केट में भी पतन का खतरा पैदा हो गया. कारण यह था कि हैज़ फंड्स और सबप्राइम ऋण लेने वाले सभी निवेशक या तो पूँजी की कमी का या फ़िर असमधेयता और दिवालियेपन का शिकार हो गए उनके शेयरों के दाम गिराने लगे. हेज़ फंड्स में निवेश करने वाले लोगों ने अपने शेयर बेचने शुरू कर दिए. कोई निवेश बैंक या हैज़ फंड नहीं जानता था कि उसने जो कोलेटरल डेट ऑब्लिगेशन वाले बोंड्स खरीदे हैं उनमें कितना जहरीला वित्तीय कचरा है, यानि उसमें कितना सबप्राइम ऋण है. इन निवेश संस्थानों ने अपने जोखिम का नए सिरे से मूल्यांकन शुरू किया, या कहा जाए वे ऐसा करने को बाध्य हो गए.उपभोक्ताओं का भरोसा डगमगा गया और उन्होंने और खर्च करने और अपनी उपभोक्ता खरीदारियों को वित्त पोषित करने की क्षमता खो दी. मतलब यह कि उपभोक्ता सामग्रियों पर खर्च में भारी कमी आनी शुरू हो गई. और अमेरिका अर्थव्यवस्था के लिए तो यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण था जिसके कुल सकल घरेलू उत्पाद का ७० प्रतिशत हिस्सा उपभोक्ता खरीदारियों से आता था. इससे स्थिर आय, इक्विटी और डेरिवेटिव बाज़ार में अस्थिरता बढ़ी. इसका असर पूरी अर्थव्यवस्था पर आना शुरू हो गया. जो लोग शुरू में कह रहे थे कि सबप्राइम संकट वित्तीय पूँजी बाज़ार का संकट है इसलिए इससे अमेरिकी अर्थव्यवस्था जल्दी उबर जायेगी और इसका वास्तविक अर्थव्यवस्था पर कोई प्रभाव नहीं होगा, उन्हें काफी शर्मिंदगी का सामना करना पड़ रहा है. आज एकदम साफ़ हो चुका है कि सबप्राइम संकट अतिउत्पादन और पूँजी की प्रचुरता का ऐसा संकट है जिसका प्रभाव अमेरिका की वास्तविक अर्थव्यवस्था पर ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ने वाला है.

सबप्राइम संकट की एक साम्राज्यवादी वित्तीय संकट के रूप में समझ विकसित करने के लिए हमें डॉट-कॉम बुलबुले के समय से अमेरिकी अर्थव्यवस्था के पूरे ऐतिहासिक विकास पर निगाह दौड़नी होगी. अगर यह समझ लिया जाय कि कहानी यहाँ तक पहुँची कैसे तो यह भी समझा जा सकता है कि यह जायेगी कहाँ !

अमेरिकी अर्थव्यवस्था को बूम-बस्ट चक्र (1997-2005)

डॉट-कॉम बुलबुला सट्टेबाजी के कारण पैदा हुआ एक स्टॉक-मार्केट बूम था. यह मोटे तौर पर १९९० के दशक से शुरू हुआ और २००१ तक बना रहा. इसी दौर में ई-कॉमर्स और ई-बिज़ आदि जैसे जुओं की शुरुआत हुई. इस बुलबुले के पैदा होने के पूरे दौर में पश्चिमी विकसित पूंजीवादी देशों के स्टॉक मार्केट में भारी उछाल आया जिसका कारण था इन्टरनेट व सम्बंधित सेक्टर में आई वृद्धि. इस पूरे दौर ने नए किस्म की कंपनियों के आश्चर्यजनक उभार को देखा जिन्हें डॉट-कॉम कम्पनियाँ कहा गया. इन कंपनियों की वृद्धि के कारण शेयरों की बढ़ती कीमत और सट्टेबाजी या स्पेक्यूलेशन के कारण एक ऐसा माहौल पैदा हुआ जिसमें कंपनियों ने वास्तविक अर्थव्यवस्था में निवेश करना कम कर दिया और स्टॉक मार्केट से तुंरत-फुरत मुनाफा कमा लेने की तकनीक का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया. लेकिन कोई ठोस आधार न होने के कारण २००१ में डॉट-कॉम बुलबुला फूटा और इसने २००० के दशक की मंद मंदी का श्रीगणेश कर दिया

अगली किश्त में जारी

हाऊसिंग बूम


डॉट-कॉम बुलबुले के फटने के कारण पैदा हुए संकट से निपटने के लिए फेडरेल बैंक ने ब्याज दरों को ऐतिहासिक रूप से निम्न स्तरों तक गिरा दिया. यहीं से शुरू होती है ‘हाऊसिंग बूम की कहानी. जरा येल के अर्थशास्त्री रॉबर्ट शिलर के इस कथन पर निगाह डालें-“जैसे ही शेयरों की कीमतें गिरी, रियल एस्टेट उस सट्टेबाजी के पागलपन के लिए एक प्राथमिक निकासी द्वार बन गया, जिसे स्टॉक मार्केट ने शुरू किया था. अपने हाल ही में हासिल की गई प्रतिभा का ये जुआरी इससे बेहतर और कहाँ इस्तेमाल कर सकते थे?… आजकल घर खरीदने से बड़ा राष्ट्रिय उन्माद सिर्फ़ पोकर है…”

आज जिस परिघटना को हम ‘हाऊसिंग बूम’ के नाम से जानते हैं वह अमेरिकी आवास बाज़ार में मौटे तौर पर २००१ से २००५ तक अस्तित्वमान रही और २००५ में उसमें उतार शुरू हुआ. आवास बाज़ार में तेज़ी पूरे अमेरिका में समान रूप से नहीं आई. विशेष रूप से इसके केन्द्र थे कैलिफोर्निया, फ्लोरिडा, न्यूयार्क, शिकागो,डेट्रोइट, और बॉसबॉश मेगालोपोलिस. इसके अतिरिक्त भी कई अन्य इलाकों में इस तेज़ी का प्रभाव देखा गया. आवास बाज़ार में आने वाली तेज़ी कोई नई परिघटना नहीं थी. यह द्वितीय युद्ध के बाद से चक्रीय रूप से अमेरिकी अर्थव्यवस्था में आती-जाती रही है. लेकिन इस बार यह सबसे बड़े पैमाने पर आई थी और इसमें कुछ अस्वस्थ और अस्वाभिक था. इस बुलबुले के पैदा होने के कई कारण थे. इसमें ऐतिहासिक रूप से निम्न ब्याज दरें, ऋणदाताओं द्वारा बेहद कम ब्याज दरों पर और बिना जाँच-पड़ताल के बड़े पैमाने पर दिया जाने वाला ख़राब ऋण, और प्रचार और सट्टेबाजी द्वारा घर खरीदने के लिए पैदा किया गया उन्मांद प्रमुख थे. लेकिन यह सारा गोरखधंधा क्यों किया गया था, यह जानना दिलचस्प होगा. डॉट-कॉम बुलबुले के फटने के बाद अमेरिकी अर्थव्यवस्था जिस मंदी की ओर बढ़ रही थे उसके बारे में हम बता चुके हैं. इस मंदी के आसन्न होने के कारण उपभोक्ता सामग्रियों की खरीद में कमी आने लगी थी. इस कमी को रोकने के लिए लोगों के बीच एक ऐसा माहौल पैदा करना जरूरी था जिससे कि उपभोक्ता खर्च को गिरने से रोका जा सके. ऐसा किया जा सकता था ‘वेल्थ इफेक्ट’ पैदा करके और सहज प्राप्य पूँजी मुहैया कराके.

पहली बात तो यह है कि अमेरिकियों में मकान के मालिकाने के प्रति एक आसक्ति वहां की व्यवस्था ने लंबे समय के दौरान पैदा की है. ज्ञात हो की अमेरिकी बड़े पूंजीपति वर्ग में रियल एस्टेट वालों की हमेशा से ही एक शक्तिशाली लाबी रही है. नतीज़न, एक आम मध्य वर्गीय अमेरिकी नागरिक घर का मालिक होना बहुत बड़ी नेमत समझता है. लेकिन इस बुलबुले को बनाने के लिए पहले यह इच्छा एक उन्माद में तब्दील की गई और फ़िर पागलपन में. यहाँ तक कि तमाम सटोरियों की पत्रिकाओं तक ने २००५ के आरंभ होते-होते रियल एस्टेट बाज़ार को “झागदार” (फ्रोथी) बताना शुरू कर दिया. २००७ में फोबर्स पत्रिका ने एक लेख में लिखा , यह समझने के लिए कि अमेरिका में घर खरीदने का उन्माद सभी संजीदा सच्चाइयों से कोसों दूर है, आपको बस मौजूदा सबप्राइम ऋण संकट पर एक निगाह डालने की आवश्यकता है…जैसे-जैसे ब्याज दरें और उसके साथ मोर्टगेज भुगतान चढ़ने शुरू हुए हैं, वैसे-वैसे कई नए मालिकों को अपनी जरूरतों को पूरा करने में दिक्कतें पेश आ रही हैं…ये ऋण लेने वाले उससे भी बुरी स्थिति में पहुँच गए हैं जिसमें वे ऋण लेने से पहले थे.

दूसरी बात यह है के अमेरिका में आवास में निवेश करने को ज्यादा भरोसेमंद माना जाता है. इस रूप में नहीं कि यह आपको रहने के लिए जगह देगा, बल्कि इस रूप में कि यह एक लाभदायक और भरोसेमंद एसेट (सम्पदा) है जिसकी कीमत समय के साथ बढेगी. साथ ही यह तुलनात्मक रूप से जोखिम से मुक्त निवेश है. यह कहा जाता है कि शेयर में हर तरह मकानों की कीमत अस्थिर और गैर भरोसेमंद नहीं होती. इसके अतिरिक्त, महामंदी के बाद के दौर से हाऊसिंग बूम के समाप्त होने तक अमेरिका में मकानों की दरों में कभी गिरावट नहीं आई थी. इसलिए भी मकान में लोग पैसा लगाना शेयर मार्केट में पैसा लगाने से बेहतर समझने लगे क्योंकि डॉट-कॉम बुलबुले के फूटने और १९९७-९८ के पूर्वी एशियाई संकट के बाद निवेशकों ने यह समझ लिया था कि शेयर बाज़ार अधिक से अधिक अस्थिर और आवारा होता जा रहा है. आवास में निवेश भरोसेमंद और ठोस प्रतीत होता था. लेकिन आवास बाज़ार में तेजी के समाप्ति से यह विश्वास डगमगा चुका है. बहरहाल, इसने हाऊसिंग बुलबुले को पैदा करने में काफी योगदान दिया.

कुछ अर्थशास्त्रियों ने इस यकीन पर भी सवाल उठाया है कि पूरी बीसवीं शताब्दी में (महामंदी के दौर को छोड़कर) आवासीय कीमतों में लगातार बढोत्तरी होती रही है. रॉबर्ट शिलर ने दिखलाया है कि १८९० से २००४ के बीच मुद्रा स्फीति को समायोजित करने के बाद आवास की कीमतों में मात्र ०.४ प्रतिशत की वृद्धि हुई है. १९४० से २००४ के बीच वृद्धि ०.७ प्रतिशत रही है.

हाऊसिंग बूम के पीछे तीसरा कारण था सट्टेबाजी. जैसे ही २०००-२००१ में आवासीय कीमतों को बढोत्तरी शुरू हुई, जिसका कारण फेड द्वारा ब्याज दरों में नाटकीय कटौती था, वैसे ही सट्टेबाजों द्वारा घरों की खरीद में भारी वृद्धि हुई. कई अर्थशास्त्रियों ने उस समय ही आने वाले समय में भारी क्रेश की चेतावनी दे दी थी. उनका कहना था कि घरों की आसमान छूती कीमत का कारण उनके वास्तविक मूल्य में वृद्धि नहीं बल्कि सट्टेबाजी या स्पेक्युलेशन है. मार्च २००६ में Worldwide Financial के सी.इ.ओ. अन्जेलो मोत्सिलो ने कहा कि सालभर के भीतर घरों की कीमत में ३० प्रतिशत तक की गिरावट आने की पूरी सम्भावना है क्योंकि घर अपनी वास्तविक कीमत पर नहीं है और सट्टेबाजी के बुलबुले की हवा निकलते ही पूरा का पूरा आवासीय उद्योग अमेरिका के ही नहीं बल्कि विश्व के पैमाने पर एक लम्बी मंदी का शिकार हो जाएगा. सट्टेबाजी को बढ़ने के लिए जिम्मेदार एक कारक फेड द्वारा लंबे समय तक लक्ष्य ब्याज दर को १ प्रतिशत पर रखना भी था जिसने सटोरियों का मनोबल बढ़ने का ही काम किया. इसके लिए तत्कालीन फेड अध्यक्ष व अर्थशास्त्री एलन ग्रीन स्पैन को दोषी ठहराया जाता है. लेकिन पूंजीवाद के पूंजीवादी समालोचक यह नहीं समझ पाते हैं कि इसमें श्रीमान ग्रीन स्पैन की कोई गलती नहीं थी. दरअसल, अगर पूरी अर्थव्यवस्था को डॉट-कॉम के गुबारे के फटने के बाद डूबने से बचना था तो बाज़ार में बड़ी मात्र में पूँजी इंजेक्ट करके निवेश को बढ़ावा देना फेड की मजबूरी थी. यह सच है कि इससे संकट केवल निलंबित ही हो सकता था. लेकिन पूंजीवाद कुछ ओर कर भी नहीं सकता.

चौथा कारण था मिडिया द्वारा रियल एस्टेट से घूस खाकर लोगों में घर खरीदने के प्रति एक उन्माद और पागलपन पैदा करना. २००५ से २००६ के बीच ऐसे टेलिविज़न कार्यक्रमों की भारी वृद्धि हुई जो घर खरीदने के लिए लोगों को उकसाते थे. अमेरिका में ऐसी किताबों की भरमार हो गई जो मकान को सर्वश्रेष्ठ सम्पदा घोषित करने लगीं. इसमें रियल एस्टेट लाबी द्वारा फेंकी गई हड्डियों को चबा-चबा कर गुज़ारा करने वाले अर्थशास्त्री डेविड लेरियाह की किताब ‘व्हाई दि रियल एस्टेट बूम विल नोट एंड’ प्रमुख थी. हालाँकि फेड के अध्यक्ष वेन बर्नार्के द्वारा २००६ में हाऊसिंग बूम की समाप्ति की घोषणा के बाद यही लेरियाह यह मानाने को मजबूर हुए कि एक बुलबुला पैदा किया गया था जिसे हमेशा के लिए नहीं चलाया जा सकता था और बाज़ार करेक्शन तो होना ही था. लेरियाह नेशनल असोसिएशन ऑफ़ रियल्टर्स के पैसों पर पलने वाला एक कुख्यात अर्थशास्त्री है जिसका काम ही रियल एस्टेट के मगरमच्छों का हित साधने वाली सट्टेबाजों को अपने सिद्धांतों से बढ़ावा देना है. हाऊसिंग बूम के समाप्ति के बाद इन्हें अमेरिकी अर्थशास्त्र का जोकर कहा जाने लगा है!

लेकिन ये चारों सहायक कारण थे. हाऊसिंग बूम के असल कारण तो मुख्य रूप से दो थे.

पहला, २००१ में डॉट-कॉम क्रेश के झटके को सोखने के लिए कदम उठाना. २००० में नास्डाक सूचकांक में डॉट.कॉम बुलबुले के फटने के कारण ७० प्रतिशत की अभूतपूर्व गिरावट आई. इसके कारण लोगों ने शेयरों में से अपनी पूँजी निकालनी शुरू कर दी और मिडिया और सट्टेबाजों के बहकावे में रियल एस्टेट में लगानी शुरू कर दी जिसे ज्यादा भरोसेमंद और कभी हानिकारक न बननेवाला निवेश करार दिया गया. येल के अर्थशास्त्री रॉबर्ट शिलर ने इस पर गौर करने योग्य टिप्पणी करते हुए कहा था कि “अतार्किक प्रचुरता” शेयरों में दुनिया से निकलकर मकानों की दुनिया में आ गई. शेयर मार्केट के ढहने के बाद सट्टेबाजी का निकास द्वार बना आवास उद्योग.

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