पूंजीवाद के इतिहास की सबसे बड़ी दूसरी मंदी

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‘लालच जिंदाबाद ! इंक.’ का नया शाहकार !!!

महामंदी-II

निर्देशक : अमेरिकी अर्थव्यवस्था

निर्माता : विश्व पूंजीवाद

—अभिनव

आह्वान– अक्टूबर-दिसम्बर २००८ से साभार

एक बार पुलित्ज़र विजेता रॉबर्ट पेन वोरेन ने कहा था, “अतीत हमेशा वर्तमान को एक झिड़की होता है.” आह्वान के पिछले अंक में अमेरिकी सबप्राइम संकट के बारे में लिखते हुए हमने कहा था कि यह छोटे चक्रीय क्रम में आने वाला कोई छोटा संकट नहीं है बल्कि अन्तिम मर्ज़ से ग्रस्त पूंजीवाद का एक महासंकट है जो आठ दशक के लंबे चक्र  के बाद दोबारा आया है. यह निश्चित तौर पर एक बहस का मुद्दा हो सकता है कि यह साम्राज्यवाद का आखरी संकट है या नहीं . बहुत से  प्रेक्षक कहेंगे कि इस संकट से देर-सबेर विश्व पूंजीवाद उबर जाएगा. लेकिन अंतदृष्टि रखने वाले सभी अर्थशास्त्री और राजनितिक टिप्पणीकार स्पष्ट रूप से बता रहे हैं कि जिन नुस्खों से विश्व पूंजीवाद मौजूदा संकट से उबर सकता है वे इससे भी भयंकर मंदी को कुछ समय बाद प्रस्तुत कर देंगे. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने ८ अक्टूबर के दिन ही दुनिया की चार महत्वपूर्ण आर्थिक शक्तियों ने इस महामंदी के प्रभाव को कुछ समय के लिए टालने की खातिर कुछ कदम उठाये. अमेरिका, चीन, ब्रिटेन और यूरोपीय संघ के केंदीय बैंकों ने ऋण दरों को गिरा दिया और कुछ देशों में सरकारों ने ऋणों और बैंकों की देनदारियों का बीमा कर दिया है. ऐसा दो कारणों से किया गया है; पहला, बाज़ार में जारी गिरावट को थामा जा सके; दूसरा, लोगों के बीच भय न फैले. लेकिन इन देशों की सरकारें अच्छी तरह जानती है कि ऐसा करके वे संकट को कुछ समय के लिए हल्का महसूस करा सकते हैं.  इससे संकट वास्तव में कम नहीं होने वाला. बल्कि इससे संकट और भयंकर तरीके से बढ़ सकता है.

हालाँकि हमने पिछले अंक में बताया था कि पूरी विश्व अर्थव्यवस्था डॉट-कॉम क्रैश, स्टॉक मार्केट संकट और सबप्राइम संकट से होते हुए किस तरह इस वैश्विक वित्तीय संकट तक पहुँची है, लेकिन हम एक बार फ़िर पाठकों को इस पूरी प्रक्रिया से अवगत करना चाहेंगे.

आज हम जो परिघटना देख रहे हैं वह दरअसल एक सट्टेबाजी से पैदा हुए वित्तीय बुलबुले का फूटना है. यह बुलबुला बना था अमेरिकी आवास बाज़ार में. कहानी को शुरू से शुरू करने की बजाय हम आवासीय बाज़ार से ही शुरू करेंगे. अमेरिका  में यह मान्यता रही है कि आवास बाज़ार में कभी मंदी नहीं आ सकती क्योंकि घर का स्वामी होना हर अमेरिकी नागरिक के सबसे प्यार से पाले गए सपनों में से एक होता है. इसलिए यह माना जाता है कि घरों की कीमत अमेरिका में कभी घट नहीं सकती है. इसलिए आवास ऋणों का बाज़ार अमेरिका में काफी गर्म रह्ता  है. यह गर्मी खास तौर पर डॉट-कॉम और शेयर बाज़ार बुलबुले के फूटने के बाद और बढ़ी. कारण यह था कि इन संकटों के बाद वित्तीय बाज़ार में जो मंदी आई उससे निपटने के लिए अमेरिकी केंदीय बैंक ने ऋण दरों को बेहद घटा दिया और बाज़ार में तरलता को इंजेक्ट किया. नतीजा यह था  कि तमाम ऋण बैंकों ने बड़े पैमाने पर आवास ऋण देना शुरू किया. आवास ऋणों की मांग एकदम आसमान छूने लगी . यह पूरा काम किस तरह पूरा होता था, इस पर निगाह डाल कर ही मौजूदा संकट की आन्तरिक संरचना को समझा जा सकता है.

दुनिया भर के निवेश बैंक अमेरिकी बैंकों से आवास ऋणों को खरीदते हैं. इसके बाद वे इसे सी.डी.ओ. (कोलैटरल डेट ऑब्लिगेशन) पैकेजों में तोड़ देते हैं.  इसका अर्थ होता है उन आवास ऋणों को खरीदना जिन्हें बैंक पहले ही जारी कर चुके होते हैं. इसके बाद उन्हें छोटे-छोटे वित्तीय पैकेजों में तोडा जाता ही और फ़िर ब्याज दरों, ऋण काल आदि के आधार पर विभिन्न नामों से दुनिया भर के निवेशकों को बेचा जाता है. ये नाम कुछ ऐसे होते हैं–“हाई ग्रेड स्ट्रक्चर्ड एनहैंस्ड लीवरेज फंड” !! ये काफ़ी कुछ म्यूचुअल फंड्स जैसे होते हैं. जब कोई निवेशक सी.डी.ओ खरीदता है तो उसे उस ऋण पर आने वाले ब्याज का लाभांश प्राप्त होता है. केन्द्रीय बैंक निवेश बैंकों को ये ऋण इसलिए बेचते हैं क्योंकि निवेश बैंक उनको एकमुश्त विशालकाय पेशगी देते हैं. एकमुश्त भुगतान केन्द्रीय बैंकों को ऋण देने-लेने में और ज़्यादा सक्षम बना देता है क्योंकि यह उनके पास उपलब्ध तरलता को बढ़ा देता है. नहीं तो आवास ऋण का वापस भुगतान होने में २० से ३० वर्ष का समय लग जाता है. इन  सी.डी.ओ. पैकेजों में दुनिया भर के धनलोलुप सट्टेबाजों से लेकर लोभी बैंकर व लालची दलाल निवेश करते हैं और इसके जोखिम को वे अपने से नीचे छोटे निवेशकों में बाँट देते हैं. नतीजा यह होता है कि भारत के छोटे से कर्मचारी से लेकर लीमैन जैसे विशालकाय निवेश बैंक एक कमज़ोर-ज़र्ज़र वित्तीय जाले का एक  अंग बन जाते हैं. अगर एक जगह से जाला टूटता है तो सभी धड़ाम-धड़ाम गिरना शुरू हो जाते हैं. आवास बाज़ार को वित्तीय निवेशक बैंकों ने इसलिए चुना क्योंकि यहाँ जैसी ब्याज दर उन्हें और किसी भी बाज़ार में नहीं मिल सकती. डॉट-कॉम बुलबुले के फटने के बाद शेयर बाज़ार उतना ललचा देने वाला निवेश विकल्प नहीं रह गया था.

बैंक आवास बाज़ार को एकदम सुरक्षित मानते थे. इसका कारण पहले ही बताया जा चुका है. नतीज़तन, बैंकर यह मानकर चलते थे कि २-३ प्रतिशत से ज्यादा ग्राहक ऐसे नहीं होंगे जो ऋण के ब्याज का भुगतान न कर सकें. इसके अतिरिक्त, भुगतान में असफलता से निपटने के लिए निवेश बैंकों ने इन ऋणों का बीमा ए.आई.जी. बीमा कम्पनी से करवा लिया. बीमा कंपनी ने भी आवास बाज़ार से अत्यधिक विश्वास दिखलाते हुए इन ऋणों का बीमा कर दिया. लेकिन २००५ के अंत में यह विश्वास खोखला साबित होना शुरू हो गया.

जैसे-जैसे सी.डी.ओ. पैकेजों की मांग वित्तीय बाज़ारों में तेज़ी से बढ़ने लगी, वैसे ही विशाल निवेश बैंकों, जैसे लीमैन, ने स्वयं अपनी पूँजी इसमें निवेश करनी शुरू कर दी. इससे एक हाऊसिंग बूम पैदा हुआ. यह पूरा बूम इस आवास बाज़ार में मौजूदा स्थायी तेज़ी की धारणा पर आधारित था. इस बूम का फल चखने के लिए टटपूंजिया निवेशकों से लेकर विशाल बैंकों तक सभी इसमें निवेश करने लगे. इसके कारण दलाली के बदले में केन्द्रीय बैंकों ने और अधिक आवास ऋण देना शुरू कर दिया. इन ऋणों को और अधिक आकर्षक बनाने के लिए बैंकों ने धीरे-धीरे ऋण देने के मानकों को ढीला करना शुरू कर दिया. यह वित्तीय बाज़ार में “अति-उत्पादन” के संकट से निपटने के लिए उठाया जाने वाला कदम था. वित्तीय संस्थानों को निवेश के लिए नए अवसर और स्थान चाहिए थे और उन स्थानों पर निवेशकों को लुभाने के लिए नए हथकंडे भी अपनाए ही जाने थे. नतीजतन, सबप्राइम लेंडिंग की शुरुआत हुई जिसमें किसी व्यक्ति के ऋण इतिहास पर ध्यान दिए बगैर ऋण देने की शुरुआत की गई. ऋण के भुगतान की असफलता से निपटने के लिए एडजस्टेबल (परिवर्तनीय) ब्याज दरों के सिद्धांत को लागू किया गया. यानि, कुछ ही किश्तों में ऋण के बराबर ब्याज वसूल लेने का हथकंडा. इसके पीछे यह मान्यता काम कर रही थी कि कोई भी ऋण लेने वाला पहली कुछ किस्तें तो देगा ही, उसके बाद ही वह डिफाल्टर बनेगा. नतीज़तन, लोगों ने घर खरीदने के लिए बड़े पैमाने पर ऋण लेना शुरू कर दिया और इससे घरों की मांग बढ़ी,  उनकी कीमतें भी बढ़ी और फ़िर ऋण की मांग और अधिक बढ़ी; इससे घरों की मांग फ़िर से और अधिक बढ़ी, फ़िर ऋण की मांग भी बढ़ी… और नतीजा था, एक विशालकाय वित्तीय बुलबुला. लोगों ने आवास को एक निवेश के रूप में देखना शुरू कर दिया जिसने इस बुलबुले को अन्तिम हदों तक फुला दिया.

२००६ के अंत में इन ऋण दाताओं ने एक ऐसी परिघटना देखनी शुरू की जो उनकी कल्पना से परे थी. लोगों ने ऋण लेकर घरों को खरीदा और पहले ही भुगतान में उन्होंने ऋण वापस करने में अपनी क्षमता जता दी. २००४ से २००६ के बीच ब्याज दरें बढ़ती  गई थीं जिसके कारण परिवर्तनीय दर वाले ऋणों की किश्त भरना ऋण प्राप्त कर्ताओं के बहुत बड़े हिस्से के लिए असंभव हो गया. परिणामत:, फोरक्लोज़र्स, यानि कि ऋण वापस न मिलने की सूरत में नीलामी शुरू हो गई. लेकिन इसके साथ ही आवास बाज़ार में कीमतों में गिरावट शुरू हो गई और घर खरीदने या उसमें निवेश करने में लोगों की दिलचस्पी तेज़ी से घटी. यानि, अब नीलाम होने वाले घरों को खरीदने वाले लोग भी बेहद कम हो गए. लिहाज़ा करोडों-अरबों डालरों का ऋण डिफ़ोल्ट्स के कारण डूबना शुरू हो गया. ज़्यादा से ज़्यादा घर बाज़ार में बिकने के लिए बिछ गए लेकिन खरीददार कोई नहीं था! वाल स्ट्रीट की कम्पनियाँ जो इन आवासीय ऋणों को खरीदकर सी.डी.ओ. पैकेजों में तोड़कर दुनिया भर में बेचकर मुनाफा कमा रही थी, उन्होंने आवासीय ऋणों को निवेश बैंकों आदि से खरीदना बंद कर दिया. नतीज़तन, तमाम निवेश बैंक तबाह होने लगे. इन ऋणों का बीमा करने वाली कंपनी ए.आई .जी. ने कभी नहीं सोचा था कि इतने सारे डिफाल्ट्स होंगे. इतनी बड़ी संख्या में होने वाले दावों को वह पूरा नहीं कर सकती थी. सबसे मज़ेदार यह बात थी कि इन बीमा करारों को भी तोड़कर दुनियाभर के बाज़ारों में बेच दिया गया था जिससे यह पता कर पाना और अधिक मुश्किल हो गया कि बर्बाद होने वाले निवेशकों को मुआवजा देने कि लिए जिम्मेदार कौन है?

आवासीय ऋणों की नीवं पर बना यह वैश्विक बुलबुला अब छोटे-छोटे विस्फोटों के साथ फूटना शुरू हो गया है. नतीजे के तौर पर हम पिछले कुछ महीने में दिवालिया हुए वैश्विक वित्तीय बैंकों पर एक निगाह डाल सकते हैं. अभी हाल ही में बर्बाद हुए विशालकाय बैंक लीमैन की भारतीय शाखा खरीदे जाने के लिए बाज़ार में उपलब्ध है जिसमें करीब एक हज़ार लोग काम करते हैं. भारतीय शेयर बाज़ार इस उथल-पुथल से यह लेख लिखे जाने तक ११,००० (२४ अक्टूबर को ८७०१ पर बंद) के आंकड़े पर आ चुका था. गौरतलब है कि अभी साल भर पहले ही उसके २१,००० के आंकडे को पार करने पर सारे तेजड़िए पागलों की तरह उन्मांद में दलाल स्ट्रीट की सड़कों पर नाच रहे थे. इसका कारण यह है कि वाल स्ट्रीट के बड़े खिलाड़ियों ने भारत में निवेशों की बिकवाली शुरू कर दी है ताकि मोर्टगेज़ बाज़ार में होने वाले अपने नुकसानों की भरपाई कर पाएं. दुनिया भर में हेज फंड्स, पेंशन फंड्स और बीमा कंपनियों नें अपने निवेशकों के करोड़ों डॉलर इस संकट में गवां दिए हैं. भारत के नवधनाढ्यों के लड़के-लड़कियों को भी इस संकट की गर्मी से पसीना आना शुरू हो गया है, जो प्रबंधन और बैंकिंग आदि का कोर्स करके बाहर फुर्र से उड़ जाना चाहते थे. बाहर के बैंकों में पहले ही हजारों रोजगारों की कटौती की जा चुकी है. और यह प्रक्रिया अभी जारी है. तमाम भारतीय धनिकों की संतानों को जो एम्प्लोय्मेंट लेटर मिले थे उन्हें अनिश्चित काल के लिए  रद्द किया जा रहा है. भारतीय आई.टी. कम्पनियाँ जो अमेरिका निवेश बैंकों के लिए काम करती थी, तबाही की कगार पार खड़ी हैं. यही प्रक्रिया पूरी दुनिया में जारी है और अभी यह संकट अपने पूरे आकर में सामने नहीं आया है. सभी राष्ट्राध्यक्ष इस बात को मान रहे हैं कि यह संकट अभी और बढ़ने वाला है. बुश ने स्वयं कहा है कि अमेरिका एक लम्बी और यंत्रणादाई मंदी की और बढ़ रहा है. अभी अमेरिका  सरकार ७०० अरब डॉलर वित्तीय बाज़ार में डाल रही है ताकि सट्टेबाजों को कोई नुकसान न हो और जो वित्तीय बुलबुला बना है वह फूटे नहीं बल्कि और फूले. अगर ऐसे करके कुछ समय के लिए संकट के प्रभाव को टाला जा सके तो बहुत जल्दी ही  यह संकट और विकराल रूप में विश्व पूंजीवाद के सामने होगा.
तमाम संशोधनवादी वामपंथी अर्थशास्त्री पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के दायरे में रहते हुए विनियमन को लागू करके इस संकट को दूर करने का कीन्सियाई नुस्खा सूझा रहे हैं. लेकिन वे भूल जाते हैं कि पूँजी की गति को विनियमित करना पूंजीवादी सरकारों के बूते की बात नहीं होती. मुनाफे की हवस में चलने वाली एक अनियंत्रित, अनियोजित और निजीकृत अर्थव्यवस्था में यह हो ही नहीं सकता. बीच-बीच में होने वाले सरकारी किन्सियाई हस्तक्षेप संकट को कुछ समय के लिए टाल सकता है, सिर्फ़ दुबारा और अधिक गति और संवेग के साथ आने के लिए. यह विनियमन एक शेखचिल्ली का सपना है. ऐसा कोई भी विनियमन पूंजीवादी विश्व को इन चक्रीय संकटों से नहीं बचा सकता हैं. इसके सभी तर्कों को यहाँ विस्तार के साथ नहीं बताया जा सकता. हम अपने पाठकों को पिछले अंक में अमेरिकी सबप्राइम संकट पार प्रकाशित लंबे लेख को पढने का सुझाव देंगे. संक्षेप में, यह साम्राज्यवाद के भूमंडलीकरण के दौर का संकट है. भूमंडलीकरण विश्व साम्राज्यवाद की चरम अवस्था है. इसके बाद पूंजीवाद के पास कोई नई शरणस्थली  नहीं है. ऐसे संकट दुनिया भर में मजदूरों और आम जनता में एक भयंकर असंतोष को जन्म दे रहे हैं और आम मेहनतकश जनता इस बात को धीरे-धीरे समझ रही है कि पूंजीवाद इस दुनिया के आम लोगों को अब सिर्फ़ भूख, बेरोज़गारी, कुपोषण और बर्बादी दे सकता है. मानवता को इसके विकल्प के बारे में सोचना होगा, किसी बेहतर संत कल्याणकारी पूंजीवाद के बारे में नहीं.

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One thought on “पूंजीवाद के इतिहास की सबसे बड़ी दूसरी मंदी

    कुन्नू सिंह said:
    October 27, 2008 at 2:23 AM

    दिपावली की शूभकामनाऎं!!

    शूभ दिपावली!!

    – कुन्नू सिंह

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