“आलोचना की स्वतंत्रता” क्या है ? वला. इ. लेनिन

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“आलोचना की स्वतंत्रता” निस्संदेह आज का सबसे ज़्यादा फैशनेबुल और सभी देशों के समाजवादियों और जनवादियों के बीच चलने वाली बहसों में सबसे  अधिक प्रयुक्त नारा है. पहली नज़र में इससे ज़्यादा अजीब बात कोई नहीं मालूम हो सकती की बहस में भाग लेने वाला कोई पक्ष बार-बार आलोचना की स्वतंत्रता की दुहाई दे. क्या अग्रणी पार्टियों में अधिकतर यूरोपीय देशों के उस संवैधानिक कानून के खिलाफ कोई आवाज़ उठी है, जो विज्ञान तथा वैज्ञानिक खोज की स्वतंत्रता की गारंटी देता है? जिस दर्शक ने बहस करने वालों के मतभेदों के सारतत्व को पूरी तरह नहीं समझा है, पर जिसने हर चौराहे पर इस फैशनेबुल नारे को बार-बार सुना है, वह यही कहने पर मजबूर होगा की “इसमें कोई ज़रूर गड़बड़ है!” वह इस नतीजे पर पहुंचेगा “यह नारा उन सांकेतिक शब्दों में से है, जो उपनामों की तरह चलन में आ जाने के कारण प्रतिष्ठा प्राप्त कर लेते है और लगभग नाम का ही हिस्सा बन जाते हैं.”

वस्तुत: यह कोई छिपी बात नहीं  है कि वर्तमान अंतरराष्ट्रीय {प्रसंगवश, आधुनिक समाजवाद के इतिहास में शायद यह एकमात्र अवसर है, जब समाजवादी आन्दोलन में विभिन्न प्रवृत्तियों का विवाद पहली बार राष्ट्रीय से अंतर्राष्ट्रीय विवाद बन गया  है,  और यह बात अपने ढंग से बड़ी उत्साहवर्द्धक है. पहले लासालवादियों आइजेनाखवादियों  गेदवादियों और संभावनावादियों, फेबियनों और सामाजिक-जनवादियों के झगड़े शुद्धत:  राष्ट्रीय झगड़े ही थे, उनमें केवल राष्ट्रीय विशेषताएं नज़र आती थी और वे मानो अलग-अलग स्तर पर चलते थे.  पर इस समय (और अब यह बात बिल्कुल साफ़ हो गई है) इंग्लैंड के फेबियन, फ्रांस के मंत्रालयवदी , जर्मनी के बर्नस्टीनवादी और रुसी आलोचक –सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं, सब एक दूसरे की प्रशंसा करते हैं, एक दूसरे से सीखते हैं और मिलकर “जड़सूत्रवादी” मार्क्सवाद का विरोध करते हैं. समाजवादी अवसरवाद के विरुद्ध सही माने में इस पहले अंतरराष्ट्रीय संघर्ष में शायद अंतरराष्ट्रीय क्रांतिकारी सामाजिक-जनवाद इतना मज़बूत हो जाए कि वह उस राजनितिक प्रतिक्रियावाद का अंत कर सके, जो लंबे काल से यूरोप पर हावी है.} सामाजिक-जनवादी आन्दोलन में दो प्रवृत्तियों ने मूर्त रूप ग्रहण कर लिया है. इन प्रव्रत्तियों का संघर्ष कभी चमकती लपट की तरह भड़क उठता है, तो कभी मंद पड़ जाता है “और सुलह” के लंबे चौडे “प्रस्तावों” की राख के नीचे सुलगता रहता है. यह “नई” प्रवृति क्या है, जो “पुराने जड़सूत्रवादी” मार्क्सवाद के प्रति एक “आलोचनात्मक” रुख अपनाती है, इसे बर्नस्टीन ने बहुत साफ-साफ बता दिया है और मिलेरां ने दिखा दिया है.

सामाजिक-जनवाद को सामाजिक क्रांति की पार्टी न रहकर सामाजिक सुधारों की जनवादी पार्टी बन जाना चाहिए. बर्नस्टीन ने इस राजनितिक मांग के साथ बड़े कायदे से सजाई गई “नई” दलीलों और एक पूरी तर्क-श्रंखला जोड़ दी है. समाजवाद को वैज्ञानिक आधार पर खड़ा करने की संभावना से इंकार किया गया कि समाजवाद आवश्यक तथा अवश्यंभावी है; इस बात से इनकार किया गया कि दरिद्रीकरण, सर्वहाराकरण और पूंजीवाद के अंतर्विरोधों के तीव्रीकरण में वृद्धि हो रही है; “अन्तिम लक्ष्य” के पूरे विचार को ग़लत ठहरा दिया गया और सर्वहारा वर्ग के अधिनायकत्व के विचार को पूरी तरह से ठुकरा दिया गया;  इससे इंकार किया गया कि उदारतावाद और समाजवाद में कोई सैद्धांतिक वैपरीत्य है; वर्ग संघर्ष के सिद्धांत को इस आधार पर त्याग दिया गया कि उसे एक ऐसे पूर्णतया जनवादी समाज पर , जो बहुसंख्या की इच्छा के अनुसार शासित है, लागू नहीं किया जा सकता, इत्यादि.

इस प्रकार क्रांतिकारी सामाजिक-जनवाद से बुर्जुआ सामाजिक-सुधारवाद की ओर दृढ़तापूर्वक मोड़ की मांग के साथ-साथ मार्क्सवाद के सभी बुनियादी विचारों की बुर्जुआ आलोचना को भी उतनी ही दृढ़ता के साथ अपना लिया गया. और मार्क्सवाद की यह आलोचना चूंकि राजनितिक सभाओं में, विश्वविद्यालयों में, अनगिनत पुस्तिकाओं में और अनेक विद्वत्तापूर्ण निंबधों में बहुत दिनों से चल रही है, और चूंकि पढ़े-लिखे वर्गों की पूरी नई पीढी दसियों बरस से इसी आलोचना द्वार शिक्षित हो रही है, इसलिए इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि सामाजिक-जनवादी आन्दोलन के अन्दर यह “नई आलोचनात्मक” प्रवृत्ति बनी-बनाई और एकदम उसी प्रकार पैदा हो गई जैसे जुपिटर के शीश से मिनर्वा पैदा हो गई थी. इस नई प्रवृत्ति के सारतत्व को बढ़ने और विकसित होने  की आवश्यकता नही हुई: बुर्जुआ साहित्य से उसे सशरीर उठाकर समाजवादी साहित्य में डाल दिया गया.

और आगे चलिए. यदि बर्नस्टीन की सैद्धांतिक आलोचना और राजनितिक आकाँक्षाओं को किसी ने अभी तक साफ़-साफ नहीं समझा है, तो फ्रांसीसियों ने “नई प्रणाली” को बड़े सजीव ढंग से पेश कर दिया है. इस मामले में भी फ्रांस ने एक ऐसा देश होने की अपनी पुरानी ख्याति का औचत्य साबित कर दिया है, “जिसके इतिहास में वर्ग संघर्षों को अन्य किसी भी जगह की अपेक्षा निर्णायक पराकाष्ठा तक लड़ा गया है” (मार्क्स की पुस्तक 18 Der Brumaire की एंगेल्स द्वारा लिखित भूमिका). फ्रांसीसी समाजवादियों ने सिद्धांत बघारना नही, अमल करना शुरू कर दिया है; फ्रांस में जनवाद के दृष्टिकोण से राजनितिक परिस्थिति चूंकि अधिक विकसित थी, इसलिए उन्हें तुंरत “व्यावहारिक बर्नस्टीनवाद” पर अमल करने का मौका मिल गया है और उसके सारे नतीजे भी सामने आ गए हैं. मिलेरां ने व्यावहारिक बर्नस्टीनवाद की एक बहुत बढ़िया मिसाल पेश कर दी है.यह अकारण नहीं था कि बर्नस्टीन और फोल्मर ने इतनी मुस्तैदी से मिलेरां का समर्थन और तारीफें करना शुरू कर  दिया! सचमुच यदि सामाजिक-जनवाद मूलत: केवल सुधार की ही पार्टी है और उसमें इसे खुलेआम स्वीकार करने का साहस होना चाहिए, तो हर समाजवादी को न सिर्फ़ बुर्जुआ मंत्रीमंडल में शामिल होने का अधिकार है, बल्कि उसे सदा इसकी कोशिश करनी चाहिए. यदि जनवाद का अर्थ  सारत: वर्ग प्रभुत्व का खात्मा है, तो फ़िर समाजवादी मंत्री को वर्ग सहयोग पर भाषणों की झडी लगाकर पूरे बुर्जुआ संसार का मन क्यों नहीं मोह लेना चाहिए? भले ही मजदूरों पर राजनितिक पुलिस द्वारा चलाई गई गोलियों ने सौ बार और हजार बार वर्गों के जनवादी सहयोग के वास्तविक स्वरूप की कलई क्यों न खोल दी हो, पर समाजवादी मंत्री को मंत्रिमंडल में ही क्यों नहीं बने रहना चाहिए? उसे ज़ार का, जिसके लिए फ्रांसीसी समाजवादियों के पास अब फांसी, कोड़े और जलावतनी के महारथी के सिवा और कोई नाम नहीं है, अभिनन्दन करने में ख़ुद क्यों नहीं भाग लेना चाहिए? और सारी दुनिया की आँखों के सामने समाजवाद को इस तरह अपमानित और कलंकित करने का, उस मजदूर जनता की समाजवादी चेतना को, जो हमारी विजय का एकमात्र आधार है, भ्रष्ट करने का इनाम है छोटे-मोटे सुधारों की लम्बी-चौडी योजनाएं, वास्तव में ऐसे टुच्चे सुधार कि उनसे कहीं ज्यादा बुर्जुआ सरकारों से हासिल किया जा चुका है.

जो जानबूझकर अपनी आँख बंद नहीं कर लेता, वह यह देखे बिना नहीं रह सकता कि समाजवाद की यह नई ” आलोचनात्मक” प्रवृति अवसरवाद की एक नई किस्म के सिवाय और कुछ नहीं है. और यदि लोगों के बारे में हम उनके बढ़िया कपडों को देखकर, जिन्हें उन्होंने स्वयं पहन लिया है, या उनकी लम्बी-चौडी उपाधियों को सुनकर, जिन्हें उन्होंने स्वयं अपने को दिया है, नहीं, बल्कि उनके कामों को और यह देखकर अपनी राय बनाते हैं कि सचमुच ये लोग किन बातों का प्रचार करते हैं, तो यह बात साफ हो जायेगी कि “आलोचना की स्वतंत्रता” का मतलब सामाजिक-जनवाद के अन्दर अवसरवादी प्रवृत्ति की स्वतंत्रता है, सामाजिक जनवाद को सुधारों की जनवादी पार्टी में बदल डालने की स्वतंत्रता है और समाजवाद के अन्दर बुर्जुआ विचार तथा बुर्जुआ तत्व डाल देने की स्वतंत्रता है.
स्वतंत्रता एक बहुत शानदार शब्द है, लेकिन स्वतन्त्र उद्योग के झंडे के नीचे अत्यन्त लुटेरे युद्ध चलाए गए है, स्वतन्त्र श्रम के झंडे की आड़ में मेहनतकशों को लूटा गया है. “आलोचना की स्वतंत्रता” शब्दाबली के आधुनिक उपयोग में भी यही अन्तर्निहित झूठ छिपा हुआ है. जिनको सही माने में यह विश्वास है कि उन्होंने विज्ञान का विकास किया है, वे नए विचारों के साथ पुराने विचारों के साथ-साथ जीवित रहने की स्वतंत्रता की नहीं बल्कि पुराने विचारों की नए विचारों द्वारा प्रतिस्थापना की मांग करेंगे. “आलोचना की स्वतंत्रता जिंदाबाद” का जो नारा आज सुनाई देता है, वह “थोथा चना बाजे घना” की कहावत की बड़ी तीव्रता से याद दिलाता है.
हम एक सुसंहत टुकडी के रूप में एक बहुत कठिन चढाई  पर एक दूसरे का हाथ पकड़े बढे जा रहे है. हम चारों ओर से दुश्मनों से घिरे हुए हैं और हमें लगातार उनकी गोलियों की बौछार के बीच से आगे बढ़ना पड़ रहा है. हम अपनी इच्छा से और ठीक यही उद्देश्य लेकर इस टुकडी में शामिल हुए हैं कि दुश्मन से लड़ें और पड़ोस की उस दलदल में न गिर पड़े, जहाँ के रहने वाले शुरू से ही हमारी इसलिए निंदा कर रहे हैं कि हमने अपना एक अलग अनन्य गुट बना लिया है और समझौते के रास्ते की  बजाय संघर्ष का रास्ता चुना है. और जब हममें से ही कुछ लोग यह चिल्लाना शुरू कर देते हैं; आप भी कैसे रुढिवादी हैं! क्या आप लोगों को शर्म नहीं आती कि आप हमें एक बेहतर रास्ता सुझाने की भी स्वतंत्रता नहीं देना चाहते!–हाँ, हाँ, महानुभावो! आपको न केवल रास्ता सुझाने की स्वतंत्रता है, बल्कि आपको जहाँ चाहें चले जाने की, दलदल में घुस जाने की भी स्वतंत्रता है. दरअसल, हमारे विचार से तो दलदल ही आपके लिए उपयुक्त स्थान है, और वहां पहुँचने के लिए हम हर तरह से आपकी मदद करने को तैयार हैं. लेकिन बस हमारा साथ छोड़ दीजिए, हमारा पल्ला न पकडिए और शानदार शब्द स्वतंत्रता को कीचड़ में न घसीटिये, क्योंकि हम भी जहाँ चाहें, वहां जाने के लिए “स्वतन्त्र” हैं, हम भी न केवल दलदल में रहनेवालों के खिलाफ लड़ने के लिए स्वतन्त्र हैं, बल्कि उन लोगों के खिलाफ लोहा लेने  के लिए भी स्वतन्त्र हैं, जो दलदल की और रुख कर रहे हैं!
— ‘क्या करें’ का एक अंश

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