दो -वर्गों का समाज

Posted on Updated on

सबसे खुबसूरत है वह समुद्र

जिसे अब तक देखा नही हमने

सबसे खूबसूरत बच्चा

अब तक बड़ा नहीं हुआ

सबसे खुबसूरत हैं वे दिन

जिन्हें अब तक जिया नहीं हमने

सबसे ख़ूबसूरत हैं वे बातें

जो अभी कही जानी है

—नाजिम हिकमत

दो -वर्गों का  समाज

अगर आप किसी आधुनिक समाज शास्त्री से सवाल करें कि वर्ग कितने होते हैं, उनका जवाब होगा छ: , या शायद तीन, या बारह, या कोई अन्य संख्या जो उनकी  कल्पना को भाए. ‘वर्ग’ की बहुत सी परिभाषाएँ दी जाती हैं. वे प्राय नकली और अप्रयाप्त होती हैं.

एक बेहतर सहायक उत्तर

हमरा समाज दो वर्गों में विभाजित है. इसमें एक मेहनतकश वर्ग और दूसरा पूंजीपति वर्ग शामिल है. मेहनतकश वर्ग को अपनी रोजी-रोटी कमाने के लिए काम करना पड़ता है जबकि पूंजीपति वर्ग के जीने के लिए प्रयाप्त धन होता है. अगर आप को आश्चर्य हो कि आप किस वर्ग से सम्बन्ध रखते हैं, अपने आप से एक सवाल करें कि अगर  आप कल से काम करना बंद कर दें तो क्या आप अपने निवेश पर गुज़ारा कर सकते हैं?. पूंजीवादी  वर्ग इस प्रकार आपकी तरह टूट जाए, सवाल ही पैदा नहीं होता . प्रत्येक श्रेणी में कुछ लोग शामिल होते हैं. निसंदेह ज्यादातर लोग मेहनतकश श्रेणी में शामिल हैं और पूजीपति श्रेणी जनसँख्या  का एक छोटा सा ही हिस्सा हैं. लेकिन, पूंजीवाद को समझने के दृष्टिकोण  से वे एक बहुत महतवपूर्ण अंश हैं.

सहायता के लिए इस परिभाषा का क्या महत्व है

केवल दो ही श्रेणीओं के होने के पीछे क्या कारण है ? उत्तर बड़ा सरल है, वह है कि, आपको यह समझना है कि कैसे   पूंजीवाद काम करता है. श्रेणी हमें बताती है कि हम अपनी वर्तमान अवस्था में क्यों हैं. यह हमें समझाती है कि किस प्रकार समाज गुलाम समाज से सामंतवाद को पार करते हुए  पूंजीवाद में विकसित हुआ और बदल गया. विशेष आर्थिक हित के कारण एक वर्ग ने दूसरे वर्ग से समाज के आर्थिक आधार को छीन लिया.

परंतु श्रेणी केवल इतना ही नहीं समझाती कि  इस पूंजीवाद के झंझट में हम कैसे फंस गए बल्कि पूंजीवाद किस प्रकार काम करता है , का विश्लेषण भी करती है. अधिकतर लोगों के जीवन का मुख्य तथ्य है काम— घर में काम ताकि उजरती-गुलाम का गुजरा हो सके या फ़िर जीने के लिए मजदूरी करने का काम. क्यों ? ऐसा हमेशा से नहीं रहा. सामंती युग में भू-दास खेतों पर काम करते हुए , भोजन का उत्पादन करते थे ताकि वे उसे खा सके . इस प्रकार वे अपना समय व्यतीत करते थे. निश्चय ही, अगर उत्पाद  भू-पति को देना पड़ता था, यह परेशानियों का सबब था, फ़िर भी ये परेशानियाँ आधुनिक उजरती गुलाम की परेशानियों से बिल्कुल अलग तरह की थीं.

वर्ग पूंजीवाद की दुर्घतानायों का भी विश्लेषण करता है: युद्ध, जिसे हम इसलिए लड़ते हैं ताकि पूंजीपति वर्ग के हितों की रक्षा हो सके. अकाल तभी पड़ता है जब पूंजीपति श्रेणी हमारे खान-पान से मुनाफा नहीं कमा रही होती. काम से हमें दूर रखकर बेरोज़गारी इसलिए पैदा की  जाती है ताकि हम मजदूरों में मुकाबला पैदा करके मजदूरी को कम से कम रखा जा सके, और इस प्रकार और बहुत सी बातें. इस प्रकार अब हमारे पास बचती हैं दो श्रेणियां , चूंकि यही हमें चाहिए यह जानने के लिए कि किस प्रकार हम पूंजीवाद तक पहुच गए और यह पूंजीवाद किस प्रकार विकसित हुआ.

सबसे महत्वपूर्ण कारण कि केवल दो ही श्रेणियां क्यों हैं, का इन दो कारणों से कुछ भी लेना-देना नहीं है. यह एक तथ्य है कि इससे हमें समझ आती है कि किस तरह हम इस पूंजीवाद के झंझट से मुक्त हो सकते हैं. हम, मेहनतकश श्रेणी के लोगों का इसी में हित है कि इस बीमार पूंजीवादी श्रेणी जिसमे हमें बलात रूप से धकेल दिया गया है, से किस तरह मुक्ति पाई जाए.केवल वर्ग-चेतना के कार्य  की पहचान करके ही एक वर्ग-विहीन समाज की स्थापना हो सकती है. एक रास्ता है जिस पर चलकर ऐसा किया जा सकता है और वह रास्ता है वैज्ञानिक समाजवाद का, केवल  इसी रास्ते पर चलकर वर्ग-विहीन समाज जिसे साम्यवाद कहतें हैं, की मंजिल को पाया जा सकता है. एक वर्ग के रूप में संगठित होकर हम समाज बदल सकते हैं. अगर हम ऐसा नहीं करते हैं तो हमें पूंजीवाद से यूँ ही चिपके रहना होगा.

राजनितिक लोगो का यह दावा की हम वर्ग-विहीन समाज में ही तो रह रहें हैं, निश्चित रूप से गुमराह करने वाला है, काश कि वे इमानदारी से इसे स्वीकार कर पाते. समाज विज्ञानी ग़लत बताते हैं कि पूंजीवाद और वर्गों का अस्तित्व सदैव रहा है और सदैव रहेगा. हमारा यह मानना कि समाज दो वर्गों में विभाजित है पूर्ण रूप से ठीक हैं क्योंकि कोई और नहीं बल्कि यही तरीका हमें समझाता है कि किस प्रकार हम युद्ध, अकाल, गरीबी और बेरोजगारी पर काबू पा सकते हैं. हमें जरूरत है वर्ग-चेतना की और उससे भी बढ़कर इस बात के लिए चेतन होने की कि हम मेहनतकश वर्ग से तालुक रखते हैं और वे पूंजीपति वर्ग से. इसलिए वर्ग दो होते हैं.

योगेन्द्र
yogendrapjoshi@gmail.com | 59.94.119.46

समाज में मोटे तौर पर तीन प्रकार के लोग मिलेंगे: प्रथम जो अपनी बुद्धि के बल पर जीवनयापन करते हैं और बुद्धिबल के सहारे समाज में प्रतिष्ठा भी पा जाते हैं; दूसरे वे हैं जो दैहिक श्रम के भरोसे जीते हैं और समाज उन्हें सम्मान देने की नहीं सोचता; और तीसरे वे हैं जो किस्मत लेकर पैदा होते हैं, जिनके पास संसाधन होते हैं बिना कुछ किये मौज से जीने के लिये । तीनों ही सुख से जीने की तमन्ना लेकर आते हैं, और यह जरूरी नहीं कि वे समष्टि के हित की कामना लिये हों । जो कुछ अलग होते हैं वे तीनों वर्गों में होते हैं और अपवाद होते हैं न कि नियम !

– योगेन्द्र जोशी (indiaversusbharat.wordpress.com; hinditathaakuchhaur.wordpress.com;
jindageebasyaheehai.wordpress.com; vichaarsankalan.wordpress.com)


शहीद भगत सिंह विचार मंच, संतनगर

इस सामाजिक आर्थिक प्रबंध में, मनुष्य की किस्म उसकी सामाजिक भूमिका और रोज़ी-रोटी के लिए उस द्वारा अपनाए जाने वाले ढंगों से निर्धारित होती है. निजी संपत्ति की नींव पर टिके इस प्रबंध में, प्रत्येक आदमी को अपनी भूमिका स्वयं चुनने की स्वतंत्रता नहीं है. जन्मजात किस्मत का धनी कोई पैदा नहीं होता. इस वर्गीय समाज में, उसकी आर्थिक हैसियत ही उसे किस्मत का धनी या बदकिस्मत बनाती है. यह सामाजिक आर्थिक हैसियत किसी मनुष्य की जन्मजात विशेषता के कारण नहीं होती.

कुछ लोग अपनी जीविका के लिए, अपनी श्रम शक्ति बेचते हैं, चाहे वह शारीरिक श्रम हो या मानसिक. दूसरे लोग, पूँजी के मालिक होने की हैसियत से श्रम शक्ति खरीदते हैं और इसी प्रक्रिया द्बारा अपनी पूँजी में वृद्धि करते हैं. इसी आधार पर, मोटे तौर पर समाज में दो तरह के लोग हैं, एक पूँजी के मालिक और, दूसरे श्रम शक्ति बेचकर जिन्दा रहने वाले मजदूर वर्ग के लोग. अपनी वर्गीय स्थिति की बदौलत मजदूर वर्ग, अपनी श्रम शक्ति बेचने की मजबूरी के कारण पूंजीपतियों की बेरहम लूट का शिकार होते हैं.

समाज के अन्य तबके व वर्ग, समाज के इन दो मुख्य वर्गों के बीच इन वर्गों के सहयोगी या विरोधी की भूमिका अदा करते हैं. मानवीय इतिहास की एक विशेष मंजिल पर मानवीय श्रम का शारीरिक और मानसिक श्रम में विभाजन हो गया. शारीरिक श्रम या मानसिक श्रम विशेष इतिहासिक परिस्थितियों की पैदावार है न कि किसी व्यक्ति विशेष या व्यक्तियों के समूह की जन्मजात विशेषता. समाज के विकास की विकसित मंजिल में यह विभाजन भी आलोप हो जाएगा.

एक गैर राजनितिक बुद्धीजीवी, इस सच्चाई से अनजान ख़ुद ही अपने आप को महान और किस्मत का धनी होने के भ्रम में, अपने ही सीमित खोल में बनाये काल्पनिक संसार में संतुष्ट है. जब कभी, वह अपने इस काल्पनिक संसार के भ्रम से मुक्त होकर, खोल के बाहर झांकेगा, तो आवश्य ही इस संसार की क्रूर हकीकतें उसे निष्पक्ष नहीं रहने देंगीं. अगर वह ईमानदार है तो वह सच्चाई, न्याय और गौरव के पक्ष में खड़ा होगा. परन्तु सच्चाई को समझकर भी, यदि वह निष्पक्ष और गैर राजनितिक होने का नाटक करता है तो वह दम्भी है, सच का सामना करने से घबराता है. भविष्य का आजाद मनुष्य, मानवीय इतिहास के इस बेरहम और मुश्किल दौर में, उस द्बारा दिखाई गई कायरता पर अवश्य सवाल उठाएगा.

Advertisements

2 thoughts on “दो -वर्गों का समाज

    shobha said:
    October 9, 2008 at 9:20 PM

    बहुत अच्छा लिखा है. आपका स्वागत है.

    pradeep manoria said:
    October 10, 2008 at 9:55 AM

    सुंदर कविता सुंदर सौष्ठव वाली आपका स्वागत् है
    मेरे ब्लॉग पर पधार कर कविता का आनद लें

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s