मूल्य का श्रम-सिद्धांत

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मार्क्सवादी अर्थशास्त्र से परिचय

“राजनितिक अर्थशास्त्र मालों का नहीं मनुष्यों के आपसी  संबंधो का वर्णनं करता है.”– एंगेल्ज़
पूंजीवाद के अधीन किस प्रकार मेहनतकश जनता का शोषण किया जाता है और पूंजीवाद समाज कैसे चलता है को  समझने के लिए राजनितिक अर्थशास्त्र में मूल्य का श्रम-सिद्धांत है. इस लेख में मजदूरी, कीमत और मुनाफों के घटनावृत्त का भी वर्णन किया गया है.

क्यों महत्वपूर्ण है मूल्य का श्रम-सिद्धांत

मानव समाज के विकास में पूंजीवाद वह पड़ाव है जिसके लक्षण हैं उत्पादन के साधनों पर  श्रम मजदूरी और जिन्स (माल) उत्पादन पर एकाधिकार. पूंजीवाद अर्थशास्त्र को समझाने के लिए मूल्य के श्रम सिद्धांत  का केन्द्रीय स्थान है क्योंकि पूंजीवाद  जिन्स उत्पादन का लासानी रूप है और मूलरूप से मूल्य का श्रम सिद्धांत  जिन्स की कीमत का निर्धारक कौन है, का विश्लेषण करता है. कोई समय था जब  मूल्य के प्रतिद्वंदी सिद्धांत थे, परंतु अब अकादमिक अर्थशास्त्र में इस प्रकार के किसी भी सिद्धांत की जरूरत से इनकार करने की प्रवृति पाई जाती हैं. आपको जो चाहिए, वे कहते हैं, वह है कीमत का सिद्धांत. यद्धपि हम पाएंगे, कि  मूल्य की अवधारणा से मुक्त होकर कीमतों का विश्लेषण नहीं किया जा सकता.

कुछ परिभाषाएँ

धन प्रकृति में पाए जाने वाले पदार्थ से मानवीय श्रम द्वारा निर्मित कोई भी वस्तु. पूंजीवादी समाज में, मार्क्स कहते हैं,धन बेहद्द जिन्सों के संग्रह का रूप धारण कर लेता है.

जिन्स धन की वह वस्तु जिसका धन की  अन्य वस्तुओं  के साथ विनिमय के लिए उत्पादन किया जाता है. इस प्रकार जिन्स एक आर्थिक प्रणाली है जहाँ धन बिक्री के लिए उत्पादित होता है. साधारण रूपों में उत्पादन के गैर-जिन्स समाजों की सीमायों पर इसका अस्तित्व होता है जहाँ धन केवल प्रत्यक्षत:  या तो उत्पादकों के स्वयं के लिए या फ़िर मालिकों के अधीन वर्ग  के उपयोग के लिए पैदा किया जाता है. पहले जिन्सों की अदला-बदली होती थी लेकिन जैसे ही जिन्स उत्पादन का विकास हुआ एक जिन्स ने विशेष भूमिका अपना ली जिसके बदले में सभी जिन्सों का विनिमय किया जा सकता था और इसके विपरीत भी, संक्षिप्त में इसने ही धन का रूप धारण कर लिया. राजनितिक अर्थशास्त्र के लिए यहीं से समस्या का जन्म होता है. जिन अनुपातों पर जिंसों के आपसी विनिमय का निर्धारण होता है उनका निर्णय कौन करता हैं ?

वह क्या है जो सभी जिन्सों में  उभयनिष्ठ है…

एक निष्कर्ष जोकि हम इस तथ्य से निकाल सकते हैं कि जिंसों के निर्धारित अनुपातों में लगातार आपस में  अदला-बदली के लिए जरूरी है कि कोई उभयनिष्ठ चरित्र,  वाला कम या अधिक मापन के लिए पैमाना हो.लेकिन क्या हो? धन की वस्तुओं के रूप में जिन्सों के दो चरित्र हैं; उनकी उपयोगिता होती है और वे मानव श्रम के उत्पाद हैं. इनमें कौन मानक हो सकता है? कुछ ने उपयोगिता की और इशारा किया लेकिन समस्या यह है कि वही वस्तु किसी अन्य व्यक्ति के लिए कम या ज्यादा उपयोगी हो सकती है. उपयोगिता एक व्यक्तिगत मसला है, जिन्स और इसके उपभोक्ता  के बीच व्यक्तिगत सम्बन्ध. इसलिए उपयोगिता परिवर्तनशील और मनोगत मानक होगी और इसका विश्लेषण नहीं कर पायेगी कि क्यों जिन्सों का टिकाऊ अनुपात पर विनिमय लगातार जारी रहता है. अब हमारे पास बचती हैं जिन्से जो कि मानव श्रम की उत्पाद हैं.
उपयोगिता के विपरीत जिन्स में निहित श्रम की मात्रा का वस्तुगत मापन किया जा सकता है : उदाहरण के लिए, इसके बनाने पर कितना समय लगा. तथापि वह  धन, जिसमें मानव श्रम के उत्पाद होने का गुण निहित न हो   जिन्स  नहीं हो सकता. हम जो जानना चाहते हैं वह यह कि जिन्से धन के अन्य रूपों से कैसे भिन्न हैं.धन, हम जानते हैं कि,केवल  कुछ विशेष सामाजिक हालात में जिन्स का रूप लेता है, विशेषकर तब जब इसका उत्पादन बिक्री के लिए होता है. इसी प्रकार श्रम ( खर्च  हुई मानव-उर्जा) उन्हीं हालातों में “मूल्य” बन जाती है. इस प्रकार मूल्य कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसे आप जिन्स के भौतिक या रासायनिक गुण में ढूंढ़ सकें क्योंकि यह एक सामाजिक गुण, सामाजिक सम्बन्ध  है. चूंकि मूल्य स्वयं को केवल  विनिमय में ही उजागर करता है, विनिमय मूल्य, यह सामाजिक सम्बन्ध दिखने में ऐसा लगता है जैसे वस्तुओं के बीच का सम्बन्ध हो. (लेकिन ऐसा नही जैसे की ऊपर एंगेल्ज़ ने कहा है) यही वह चीज़ थी जो  मार्क्स के  “जिन्सों की अंधभक्ति” लिखने का कारण बनी. कीमत मूल्य की मुद्रा में अभिव्यक्ति है.

श्रम, मूल्य के  श्रम-सिद्धांत के अनुसार मूल्य का आधार है.लेकिन श्रम किस तरह किसी जिन्स का मूल्य निर्धारित करती है? किसी जिन्स का मूल्य, मार्क्स बताते हैं, इस पर खर्च होने वाले सामाजिक आवश्यक श्रम-समय में निहित होता है या इसे यूँ कहे, इसके शुरू से अंत तक की उत्पादन प्रक्रिया पर खर्च होने वाली सामाजिक आवश्यक श्रम-समय की मात्रा पर. इस बात को नोट करें कि मूल्य का श्रम-सिद्धांत यह नहीं कहता कि किसी जिन्स का मूल्य इसमें निहित श्रम की वास्तविक मात्रा द्वारा निर्धारित होता है. इसका अर्थ होगा कि एक अकुशल वर्कर निपुण वर्कर से ज्यादा मूल्य पैदा करेगा. सामाजिकआवश्यक से अभिप्राय है औसत काम के हालात जैसे कि  औसत उत्पादनशीलता, औसत श्रम-सघनता के अधीन किसी जिन्स के उत्पादन और पुनरुत्पादन के लिए आवश्यक मात्रा.उदाहरण के लिए , कोयला उद्योग को लें, मान लीजिए एक शिफ्ट में औसत प्रति व्यक्ति उत्पादन 43 क्व्ट्स . है और 230 गद्दों में काम चल रहा है. इनमे से कुछ में 43 क्व्ट्स से ऊपर जबकि कुछ में कम कोयला निकाला जा रहा होगा परन्तु कोयले का मूल्य किसी भी प्रकार से गद्दों में मजदूरों के श्रम द्वारा निर्धारित नही होता. इसका मूल्य मण्डी द्वारा निर्धारित सामाजिक औसत से होता है.निश्चित रूप से इसका अर्थ है कि जो भी सामाजिक-आवश्यक होता है, वह बदलता रहता है. कोयला जिन्स पैदा करने की प्रक्रिया में गद्दों से बाहर  मौजूद मजदूर जो कोयला खंनन के लिए आवश्यक पदार्थ पैदा कर रहे होते हैं भी शामिल  होते हैं.

पूंजीवाद के अधीन प्रत्येक वस्तु यो तो जिन्स होती हैं या फ़िर जिन्स का रूप धारण कर लेती है, खरीदी और बेची जाती है. मूल्य के श्रम-सिद्धांत के विरुद्ध दिए जाने वाले तर्क से मुकाबले के लिए इस योग्यता का होना आवश्यक है कि कुछ वस्तुएं जिनका क्रय-विक्रय भी होता है श्रम का उत्पाद नहीं हैं या उनमें  निहित श्रम की मात्र से बहूत दूर उन्हें किसी मूल्य पर बेचा जाता है उदाहरण  के लिए,भूमि और कला की वस्तुएं. पूंजीवाद के अधीन भूमि का मूल्य, इसके शुद्ध रूप में इसके लगान का मात्र पूंजीकरण ही तो है. भूमि का कोई मूल्य नहीं होता क्योंकि यह मानव श्रम का उत्पाद नहीं है. कलाकृतियां और ऐन्टिक्स वास्तव में मानव श्रम के ही उत्पाद है लेकिन वास्तव में जिन्सें नहीं है क्योंकि उनका पुनरुत्पादन नहीं हो सकता; इसलिए  इस प्रकार की वस्तुओं के सन्दर्भ में “सामाजिक ज़रूरी-श्रम कोई मायने नहीं रखता. एक बचकाना एतराज है : क्यों एक सोने का ढेला एक उल्का-पिण्ड से अधिक कीमती है जबकि इसमें कोई श्रम निहित नहीं है ? वस्तुत: यह मूल्य  के श्रम-सिद्धांत की पुष्टि है कि सामान्य दशा के अधीन उत्पादन में सोने का  मूल्य इसके मूल्य जितना ही होता. अगर सोना आसमानों से निरंतर गिरता रहे तब इसकी कीमत इसको एकत्रित करने पर लगी श्रम तक गिर जायेगी.

जिन्स के रूप में श्रम शक्ति

पूंजीवाद के अधीन एक और वस्तु  जो जिन्स  का रूप लेती  है, वह है मानव शक्ति (काम करने की  मानव की क्षमता, मानव ऊर्जा). वास्तव में यह  तथ्य  पूंजीवाद का आधार है क्योंकि यह पहले  निर्माताओं (यहाँ मजदूरों को) को स्वामित्व और संपत्ति निर्माण के लिए उपकरणों पर नियंत्रण से  पृथक मानता है. परंतू यहाँ मानव-शक्ति और अन्य जिन्सोँ के मध्य एक बहुत महत्वपूर्ण अन्तर हैं, मानव-शक्ति मनुष्य में जो अपनी जो वस्तु (मानव-शक्ति) वे बेच रहे होते हैं के मूल्य को प्राप्त करने के लिए सोच और संघर्ष  कर सकते हैं, में अवतीर्ण होती है. अन्यथा इसका मूल्य दूसरी जिन्सों के मूल्य की भांति इसे बनाने और इसे पुनः बनाने पर खर्च की गई सामाजिक दृष्टि से आवश्यक श्रम की मात्रा द्वारा  तय होता. एक आदमी की श्रम शक्ति बनाने पर खर्च हुई श्रम वह होती है जो उस पर  भोजन, वस्त्र  आश्रय और उसे काम के योग्य फिट रखने के लिए खर्च हुई होती है. इसलिए अकुशल मानव की  श्रम-शक्ति उसे और उसके परिवार को जिन्दा रखने और काम करने के योग्य रखने के मूल्य  के बराबर होती है. कुशल मनुष्यों को इसलिए ज्यादा मिलता है क्योंकि उनके कौशल की उपज और उसे बरक़रार रखने पर ज्यादा खर्च होता है.जब मजदूर  एक नियोक्ता ढूँढता है तो उसे  उसकी श्रम-शक्ति का प्रयोग (अर्थात 8 घंटे)  करने के बदले में भुगतान किया जाता है. मजदूरी, इस प्रकार, एक विशेष प्रकार का मूल्य है; यह मानव-शक्ति की कीमत की मुद्रा में अभिव्यक्ति है.

अवैतनिक श्रम

श्रम शक्ति की एक विशिष्ट विशेषता है.क्योंकि धन केवल मनुष्य की  मानसिक और शारीरिक ऊर्जा के प्रकृति में पाई जाने वाली सामग्री पर  खर्च  द्वारा उत्पादित किया जा सकता है और चूंकि श्रम ( श्रम-शक्ति का क्षय) मूल्य का आधार है ,इसलिए इस  मानव-शक्ति में नए मूल्य उत्पादित करने की विशिष्टता समाहित है. मान लीजिए हमारे श्रमिक के श्रम-शक्ति की कीमत 4 घंटे प्रतिदिन है. 4 घंटे काम करने के बाद क्या वह काम करना बंद कर देगा. बिल्कुल नहीं. अपने अनुबंध के तहत उसे और 4 घंटे के लिए काम करना होगा. चूंकि वह अपने नियोक्ता के ठिकाने पर उसके उपकरण, मशीनरी और कच्चे माल के साथ काम कर रहा  है इसलिए , हर चीज़ जो वह उत्पादित करता है वह नियोक्ता की होती है. इस प्रकार, इस मामले में, नियोक्ता को 4 घंटे का मुफ्त  श्रम मिल जाता है. यह उसके  लाभ का स्रोत है जिसका  वह ब्याज के रूप में अपने लेनदारों और (भूमि) किराया के रूप में उसके मकान मालिक को (और करों के रूप में )राज्य के साथ बटवारा करता है.इन  सब ब्याज, लाभ और किराये का स्रोत श्रमिक-वर्ग का अवैतनिक श्रम है. आओ शोषण की इस प्रक्रिया को थोड़ा करीब से देखें . देखने के लिए पहला मुद्दा यह है कि यह सब उत्पादन के स्थान पर घटित होता है. काम का स्थान ही वह जगह है जहाँ मजदूर का शोषण होता है. ( मार्क्स का यह सिद्धांत उन कम्युनिस्टों और वामपंथी और मार्क्सवादी विचारधारा का दम भरने वाली पत्रिकायों के भारतीय नारोदनिक संस्करण का परदाफाश करने के लिए काफी है जो किसान की लूट का स्थान मण्डी मानते हैं) जब एक कामगार अपनी मजदूरी (या वेतन, श्रम शक्ति की कीमत के लिए एक और नाम) प्राप्त करता है उसका पहले ही शोषण हो चुका होता है. इस प्रकार उसका साहूकार या दुकानदार या भूपति या कर संग्रह करने वाले द्वारा दोबारा  शोषण नहीं किया जा सकता बेशक वे भी उसे लूट सकते हैं और धोखा दे सकते हैं परंतु यह मार्क्सवाद के मूल्य का श्रम-सिद्धांत के बाहर अलग विषय है. तथाकथित दूसरे दरजे का  शोषण एक मिथक है.

क्या है पूँजी ?

मार्क्स के लिए , मूल्य की  भांति, पूँजी कोई वस्तु न होकर एक सामाजिक सम्बन्ध है. वास्तव में यह मूल्य, बल्कि मूल्यों का संग्रह है. केवल कुछ सामाजिक शर्तों के अधीन ही उत्पादन के साधन पूँजी बनते हैं, विशेषकर तब जब अधिशेष या अतिरिक्त मूल्य हासिल करने के लिए इनका प्रयोग उजरती-श्रम के शोषण के लिए किया जाता है.इस प्रकार हम मार्क्स को “मूल्य के स्व विस्तार” के रूप में पूंजी संचय की इस प्रक्रिया का  वर्णन करते  हुए पाते हैं. पूंजी, अपने शुद्ध रूप में, धन-पूँजी है. कहने के लिए एक पूंजीपति सूती वस्त्र उत्पादन  के लिए अपनी पूंजी निवेश करता है. एक कारखाना, वस्त्र मशीनरी, कच्चा कपास  आदि और श्रम शक्ति खरीदने के लिए भी, उसे अपनी पूँजी अग्रिम रूप से खर्च करनी होगी. उसकी पूँजी को दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है. अचल पूँजी में इमारतें और मशीनरी शामिल होती हैं जिनका उत्पादन प्रक्रिया  में पूर्ण रूप से क्षय नहीं होता. चक्रीय पूंजी में  कच्ची सामग्री और श्रम शक्ति होते हैं जिनको समाजवादी नज़रिए से स्थिर  पूँजी और अस्थिर पूँजी की दो उप-श्रेणियों में विभाजित करने की बहुत अहमियत है. भवन, मशीनरी और कच्चे माल में निवेश की हुई पूँजी स्थिर पूँजी कहलाती है. उत्पादन की  प्रक्रिया में इनके मूल्य या मूल्य के  भाग का नए उत्पाद में हस्तांतरण हो जाता है. श्रम- शक्ति में निवेशित पूँजी अस्थिर पूँजी कहलाती है. चूंकि इस पूँजी का ही विस्तार होता है इसलिए इसे अस्थिर पूँजी कहते हैं. नए उत्पाद में स्थिर पूँजी के हस्तांतरण के औजार के अलावा श्रम-शक्ति न केवल अपने मूल्य का हस्तांतरण करती है बल्कि इसमें नया मूल्य भी जोड़ देती है. इस प्रकार हमें पता चलता है कि मशीनें मूल्य पैदा नहीं कर सकती. वे जो कुछ करती हैं , वह तब जब मनुष्य द्वारा उन्हें गति प्रदान की जाती है. हाँ, उनके मूल्य( जो भूतकाल में मानवीय श्रम का ही उत्पाद रहा है) का कुछ भाग नए उत्पाद के मूल्य में परवर्तित हो जाता है. पूंजीवादी अर्थशास्त्री भी इसकी मान्यता देते हैं जब वे तबदीली की इस प्रक्रिया में इमारतें और मशीनरी के मूल्य को कवर करने के लिए, वस्तु की लागत के इस हिस्से को मूल्यह्रास में दिखाते हैं

शोषण की दर

हम पहले ही जान चुके हैं कि दिन का एक  भाग  श्रम-शक्ति के क्षय द्वारा समकक्ष उत्पादन की प्रक्रिया में खर्च हो जाता है और बाकि पूंजीपति के लिए अतिरिक्त मूल्य पैदा करने पर खर्च  होता है. काम के दिन का पहला भाग को मार्क्स ने आवश्यक-श्रम कहा ( “सामाजिक दृष्टि से आवश्यक श्रम” के साथ भ्रमित न हों) जबकि  शेष को अतिरिक्त श्रम का भाग. हम यहाँ दिन के हिस्से के रूप के बारे में बता रहे है. इसे शाब्दिक रूप से ग्रहण न करें, ऐसा होने पर आप मार्क्स के ज़माने के अर्थशास्त्रियों की भांति गलती कर सकते हो, जिन्होंने ’10 घंटे काम के’ के बिल का इस बिनाह पर विरोध किया था कि सारा मुनाफा तो दिन के अन्तिम घंटों में ही पैदा होता है ! वास्तव में काम के समय  हर पल मजदूर द्वारा  अतरिक्त मूल्य का सृजन  किया जा रहा होता है. मार्क्स अतिरिक्त श्रम और आवश्यक श्रम में  अनुपात को ( जो अतिरिक्त मूल्य और अस्थिर पूँजी के अनुपात की तरह ही होता है ) अतिरिक्त मूल्य की दर, या शोषण की दर (s/v).  कहते हैं. निश्चित रूप से आवश्यक श्रम के मुकाबले अतिरिक्त श्रम के अनुपात को बढ़ाने में पूंजीपति का हित होता है. इसे सिरे चढाने के दो तरीके हैं. पहला, काम के दिन को ही बड़ा करके. इस प्रकार से पैदा होने वाले अतिरिक्त मूल्य को निरपेक्ष बेशी/अतिरिक्त मूल्य या निरपेक्ष अधिशेष कहते हैं. दूसरा तरीका है आवश्यक श्रम के मुकाबले अतिरिक्त श्रम के अनुपात में बढोत्तरी  करना. इसे करने का सबसे जालिम तरीका उनकी मजदूरी में कटौती ( जिसे नियोक्ता कर सकें तो बिल्कुल करेंगे) करना है जिससे उनका जीवन स्तर गिर जाता है. इस प्रकार पैदा हुआ अतिरिक्त मूल्य सापेक्ष अतिरिक्त मूल्य कहलाता है.

जिन्स के मूल्य की परिभाषा  देते हुए

पूंजीवादी उत्पादन की जटिलताओं का जींस के मूल्य पर क्या प्रभाव पड़ता है ? सूती वस्त्रों की  प्रत्येक इकाई के मूल्य में कच्चे माल का मूल्य, मशीनों के मूल्य का हस्तांतरण, श्रम-शक्ति का मूल्य या  जिन्स का मूल्य शामिल होता है = c+v+s, c यहाँ उत्पाद में हस्तांतरित कुल स्थिर पूँजी C का एक हिस्सा है . S/(C + V).  लाभ की दर है. शुरू से लेकर अंत तक सामाजिक रूप से जरूरी श्रम का  इसमे निहित होना ही जिन्स का मूल्य निर्धारित करता है, न कि  इसके उपादान के केवल अन्तिम पड़ाव पर लगी हुई श्रम-शक्ति द्वारा इसका मूल्य निर्धारित होता है. इसलिए यह कहना गलत है कि खेतिहर मजदूर भोजन पैदा करते हैं और कार बनाने वाले मजदूर कारें. पूँजीवाद के अंतर्गत उत्पादन जिसमें सभी मजदूर  भाग लेते हैं एक सामाजिक प्रक्रिया है.  पूरे पूंजीपति वर्ग द्वारा पूरे मजदूर वर्ग का शोषण इस का एक महत्वपूर्ण परिणाम  है. मजदूर अपने विशेष नियोक्ता द्वारा नहीं बल्कि पुरे पूंजीपति वर्ग द्वारा शोषित किया जाता है.

क्यों कीमत हमेशा मूल्य के बराबर नहीं  होती

वस्तुओं के बारे में इतना सब कुछ कहने के बाद  कि पूंजीवाद के अधीन वस्तुएं निर्धारित अनुपात में अपने मूल्यों के अनुसार विनिमय करती हैं, यह कहना कि जिन्से अपने मूल्य पर नहीं बिकती हैं, आश्चर्य चकित कर सकता है. लेकिन वास्तव में मामला यही है. इस वजह से यह समझना महत्वपूर्ण है कि श्रम सिद्धांत कीमत का केवल  मात्र सिद्धांत नहीं  है. कीमत और मूल्य में अन्तर कैसे  हो सकता  है, को जानने के लिए दो आसान कारण हैं. कीमतें में उतार चढाव  मांग और पूर्ति के कारण हो सकता है और एकाधिकार में वस्तु अपने मूल्य के ऊपर बिकेगी (या  सब्सिडी के कारण अपने मूल्य से नीचे). तीसरा कारण और अधिक जटिल है लेकिन पता  होना चाहिए अगर हम पूँजीवाद के नमूदार कामकाज को समझना चाहते हैं, उदाहरणार्थ व्यवसाय के मूल्य निर्धारण की नीतियों के पीछे क्या है ? जो लोग कीमतों का फ़ैसला करते हैं वे मूल्यों के बारे में कुछ नहीं जानते होते और न ही उन्हें इसकी जरूरत होती है. फ़िर वे क्या करते हैं ?
हमने  देखा  कि लगी हुई पूँजी को स्थिर और अस्थिर में विभाजित किया जा सकता है और यह अस्थिर पूँजी ही  होती है जो अतिरिक्त मूल्य पैदा करने के वास्ते बढ़ जाती है. मार्क्स के अनुसार अनुपात C/V  पूंजी की जैविक संरचना  है. सभी उद्योगों में शोषण (s / v) की इसी दर को देखते हुए, अगर सभी जिन्सों को उनकी कीमत पर बेचा जाए तो इसका अर्थ होगा कि तकनिकी रूप से पिछडे  और उद्योगों के  गहन-श्रमिक वाले क्षत्रों में इसकी दर सबसे ऊँची होगी. क्या ऐसा होता है ? बिल्कुल नहीं ! पूँजी के लिए कम या ज्यादा होने की बजाय दर वही रहती है चाहे यह कहीं भी निवेशित हो.
लाभों  के औसत के साथ मूल्य के  श्रमिक सिद्धांत का किस प्रकार  समाधान किया जाए, ऐसी समस्या थी जिसने एडम स्मिथ और रिकार्डो को सबसे ज्यादा परेशान किया. लेकिन मार्क्स ने इसे एक ही सम्भव तरीके से हल कर दिया, और वह इस अवमानना को छोड़ना था कि सभी जिन्से अपने मूल्यों पर बिकती हैं. आलोचकों ने  मार्क्स के इसी काम में “बड़ा  विरोधाभास” देखा लेकिन इसका कुछ भी अर्थ नहीं है. जैसा कि हमने  पूंजीवादी उत्पादन और संचालन में  देखा है कि यह एक सामाजिक प्रक्रिया है: व्यक्तिगत रूप से पूंजीपति द्वारा अपने मजदूरों का ही शोषण नहीं होता बल्कि सारा पूंजीपति वर्ग सारे श्रमिक वर्ग का  मिलकर शोषण करता है. प्रत्येक पूंजीपति बहूत से मजदूर रखता है जो बहुत सारा अधिशेष कमाते/ पैदा करते हैं. अधिशेष व्यक्तिगत रूप से किसी एक अकेले पूंजीपति के पास न जाकर एक पूल में चली जाती है जहाँ यह अन्य अतिरिक्त मूल्यों में मिलकर प्रत्येक पूंजीपति द्वारा निवेशित अनुपात के अनुसार (पूंजीपतियों में) बँट जाती है. (यही कारण है कि क्यों एक पूर्ण  स्वचालित फैक्ट्री  भी मुनाफा कमा रही होती है). इसके कारण  कीमतों पर पड़ने वाले प्रभाव की कल्पना करें. मान लीजिए s/v 100 प्रतिशत है और विभिन्न  जैविक संरचनाओं  वाले तीन सेक्टर हैं.
.CVC मुनाफे की  दर का मूल्य ABC
औसत रहित लाभों   के साथ B सबसे ज्यादा मुनाफे वाला सेक्टर है, लेकिन औसत निकालते हुए हम पाते हैं कि:
CVC मुनाफा मूल्य कीमत A 140 मूल्य से अधिक  B 140 मूल्य से नीचे  C 140 मूल्य पर
मार्क्स इसी को विक्रय  मूल्य कहते हैं, जो की लागत से जमा मुनाफे  की दर की औसत से पैदा हुई उत्पादन की कीमत है. बिल्कुल इसी तरह व्यापर चलते हैं और अकादमिक अर्थशात्रियों द्वारा (जो कि व्यापारियों के द्रष्टिकोण से केवल घटनाओं को ही लेते हैं) इस तरह माना जाता है.  लेकिन वो बात नहीं है. ऐसा कहना हवा में बात करना होगा कि कीमत खर्च जमा “सामान्य मुनाफे” पर निर्धारित होती है, लेकिन सामान्य मुनाफा है क्या ? रिवाज द्वारा लागू की गई कोई चीज़ ! केवल यही है जो दिखाई देता है.श्रम पर आधारित मूल्य और अतिरिक्त मूल्य के कारण  केवल मूल्य का श्रम-सिद्धांत ही प्रयाप्त रूप से विश्लेषण कर सकता है कि क्यों मुनाफे की सामान्य दर , कहने के लिए, 10 है बजाय 15 के.

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2 thoughts on “मूल्य का श्रम-सिद्धांत

    RAJENDRA PRASAD MEENA said:
    May 28, 2009 at 12:06 PM

    i want that you given me more information aboout indian economics and some important definition i.e. direct taxes and indirect taxes and his example.

    Shaheed Bhagat Singh Vichar Manch, Santnagar said:
    May 28, 2009 at 1:17 PM

    You have demanded something that is the concern of the economists of a bourgeois state whereas our subject is political economy not that of economics. We humbly admit our inability to answer your query.

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