महाबली ‘अंकल सैम’ की दुनिया

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(अभी कल-परसों  की ही तो बात है, बस जनवरी २००८ से पहले और १९९० के बाद के काल की दिक् में कि बुर्जुयों के चाटुकार बुद्धिजीवी पत्रकार (आप उनका नाम नहीं जानते, जानते हैं? तो ठीक है) किस तरह  देश की खुशहाली के लिए (वास्तव में बुर्जुयों को खुलकर लुटने के लिए)   लाभ में चल रहे सार्वजनिक   उपक्रमों का  निजीकरण करने की वकालत किया करते थे और एक मैडम तो सार्वजनिक उपक्रमों को  नेहरू का समाजवाद  कह कर कोसा करती थीं. खैर एक या दो कारणों से हमारी बैंकिंग-प्रणाली फिलहाल खतरे से बाहर है लेकिन पूंजीवाद की अपनी विसंगतियां इसे कब तक झेल पाती हैं, देखते हैं. लेकिन उपक्रम के सार्वजनिक या निजी होने से कोई देश समाजवादी/पूंजीवादी नहीं हो जाता. आज ही श्रीमान earthpal की ब्लॉग आपको पूंजीवाद के एक नए फंडे से परिचित कराएगी, वह है जब ठीक-ठाक चल रहा हो तो सार्वजनिक उपक्रमों को ओने-पोने दामों पर खरीद लो, लेकिन मंदी के समय इन्हें सरकार को वापिस कर दो, यानि सार्वजनिककरण. हमने यूटोपिया से लेकर तरह-तरह के समाजवाद का जिक्र सुना था मगर बुर्जुओं का भी एक समाजवाद है, आज जाना.

पूंजीवाद को बचाने के लिए आम लोगों से जमानत : द्वारा earthpal

मुझे अपनी बात सीधे ढंग से और तुरंत शुरू करने दीजिए…..
बैंकों और साहूकारों को बचाने के लिए सारे संसार में गति तेज हो गई है.आख़िर कांग्रेस ने बिल में थोडी-बहुत तरमिमों के कारण  उसकी स्थिति पर पुनर्विचार करने के बाद मंजूरी पर अपनी सहमती दे ही दी. हम पहले ही जानते थे  कि वे अंत में और साफ-साफ तौर पर ऐसा ही करेंगे, बिल तो वो ही है सिवाय इसके कि इसमें करोडो के टैक्स रियायतों के कुछ पन्ने चस्पा किए गये हैं. टैक्स रियायते किनको, मैं इस बारे में अभी आश्वस्त नहीं हूँ लेकिन अपने  निराशावाद  को यहीं विराम दूँगा.
हमारी अपनी ब्राउन सरकार ब्रैडफोर्ड और बिंगले की जमानत दे रही है, पहले यह  नोर्थर्न रोक्क की जमानत दे चुकी है.
आइसलैंड ऐसा ही कुछ करने जा रहा है और ऐसा ही सारा यूरोप.
आमतौर  पर जैसा कि होता है, मैं काफी  चकराया हुआ  हूँ.
मुझे जो बात हज़म नहीं हो रही है वह यह है कि वे (सरकारें : संपादक) क़र्ज़ वाले हिस्से की तो ज़मानत देने जा रहे हैं लेकिन मुनाफे की नहीं. क्यों ? इसका मतलब यह नहीं है, जैसा कि यहाँ इंगित किया गया है,मतलब तो यह है कि  लोग यानि कि आप और मैं,अपने सार्वजनिक धन से बैंकों की डूबत राशिः को पूरा करेंगे और उस कर्जे को अपनी अगली पीढियों को विरासत में देने के लिए अपना लेंगे और बैंक इस सबके बावजूद मुनाफे से अपने गल्ले भर कर चलता बनेंगे ? जैसा कि Socialist Worker ने फ़िर ठीक कहा है, दशको तक लेबर और टोरी सरकारें समान रूप से समझाती रही कि मंडी-प्रणाली ही सबसे बढ़िया और एक मात्र प्रणाली है लेकिन हमें कभी भी नहीं बताया गया कि जब ढांचा ढह-ढेरी होता है….जब बैंक फेल होते हैं और शेयर पानी पी जाते हैं , तो हम लोगों को ही खामियाजा क्यों भुगतना पड़ता है.
” वाल स्ट्रीट की भलाई का और मेहनतकश लोगो जिनके घर कुर्की के कगार पर खड़े हैं के  दिनदैन्य  का उल्टा सम्बन्ध है ….
ठीक, वाल स्ट्रीट और लन्दन की मोटी बिल्लियों की भलाई स्पष्टत: हमारे  नेताओं  के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण है लेकिन साधारण नागरिकों का क्या होगा? लोगों के स्थायित्व के बारे में क्या? उन आम लोगों का क्या होगा जिनके घर पर कुर्की का  खतरा मंडरा रहा है…..क्या उनकी भी कोई जमानत देगा? क्या उनको भी बचाया जाएगा? क्या लोगों के रोजगारों की सुरक्षा की जायेगी? क्या उनकी खून-पसीने से अर्जित पेंशन सुरक्षित रह पायेगी?
राजनितिक लोग तर्क देते हैं कि बैंकिंग प्रणाली को पूर्ण रूप से  मजबूती देने के लिए यह तो करना ही है और ब्राउन सरकार इसे राष्ट्रीयकरण  का नाम दे रही है जो एक और सवाल खड़ा करता है, कि जब उनके कारपोरेट आकायों को मुसीबत से बाहर निकालने का सवाल पैदा हुआ तो  वे अचानक क्यों राष्ट्रियकरण  के पक्ष में खड़े हो गए लेकिन हमारी शक्तिशाली सार्वजनिक उपयोगितायों के सार्वजनिककरण को उन्होंने कैसे नासिका से फुंकारते हुए ठुकरा दिया था?
अंत में, क्या लोगों के मूलभूत हित सुरक्षित रह पाएंगे?
नहीं, समझें, वास्तव में होता क्या है कि सरकार उन बैंको को बचाने के लिए तुंरत आगे आ जाती है जिनका दिवालिया पीटने वाला होता है लेकिन साधारण लोग जब क़र्ज़  में डूबते हैं तो किसी भी प्रकार के रहम की गुंजाईश नहीं होती. उनके घर की कुर्की कर ली जाती है, बस ! और इसके बाद सालों के लिए उन्हें काली-सूची में डाल दिया जाता है.
मैं जानता हूँ कि हमें जो मिलता है उसे सहर्ष स्वीकार करना है और अगर सरकार द्वारा  उचित कदम उठाने की  बजाय हमें अपने सार्वजनिक प्रणाली से ही उनकी जमानतें देनी हैं तो देखना यह है कि  बैंकिंग संकट हमें कितना ज्यादा प्रभावित करने वाला है, उचित तो यही होगा कि आम लोग जो इस संकट से प्रभावित हुए हैं उन्हें भी कुछ सुरक्षा दी जाए.

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One thought on “महाबली ‘अंकल सैम’ की दुनिया

    विचारमंच responded:
    October 11, 2008 at 2:38 AM

    टिप्पणियों का जबाब देते हुए earthpal कितना सही कहते हैं,
    “Jose, के बुद्धिमतापूर्वक शब्द. पूंजीवादी प्रणाली इस तरह विश्वास करती है कि अगर आप धन को ऊपर वाले लोगों में खुलकर फेंकोगे तो थोड़ा-बहुत गरीबों तक भी पहुंचेगा लेकिन जो हम जानते हैं कि गरीबों में सबसे गरीब को इसका एक अंश मात्र भी नहीं मिलता. वास्तव में, पूंजीवाद गरीबों के गरीब रहने पर ही निर्भर करता है”
    अगर इंग्लैंड जैसे विकसित पूंजीवादी राज्यों जहाँ जैसे कि लेनिन ने नोट किया था कि यूरोप के इन देशों का सर्वहारा जिसने साम्राज्यवादी लूट से हिस्सा प्राप्त करना शुरू कर दिया है, का चरित्र क्रान्तिकारी नहीं रहा,(मार्क्स की यूरोप पर “साम्यवाद के भूत” के मंडरा रहे खतरे की भविष्यवाणी को दरुस्त करते हुए) इसलिए क्रांति का ध्रुव पूर्व की और खिसक रहा है.
    लेकिन वर्तमान वितीय संकट (जो नया घटनावृत न होकर सूचना-प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में पूंजीपति-वर्ग के नेतृत्व में होने वाली अन्तिम प्रशंसनीय प्राप्ति के बुरे नतीजों को थोड़े समय के लिए टालने का ही एक गैर-अर्थशास्त्रीय तरीका था) ने इन विकसित देशों के सर्वहारा वर्ग का भी कचूमर निकाल दिया है. भारत जैसे “कमज़ोर कड़ी” में शामिल देशों की तो बात ही छोड़ दें.
    खैर, मंदी का यह दौर भी पहले वाली मंदियों की तरह ख़त्म हो जाएगा क्योंकि पूंजीवाद मरा नहीं बूढा हुआ है लेकिन अपने बुढापे में छोटे-छोटे अन्तराल पर बीमार होने के कारण करोडो लोगों के जीवन की आहुति ही इसकी दवाई होती है.
    अब देखना यह है कि विश्व सर्वहारा वर्ग इस असाध्य रोगों से पीड़ित बीमार बूढेऊ को कबतक झेल पाता है.

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