किसानों के लिए लाभकारी मूल्य और मुख्यधारा के कम्युनिस्ट

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(कई दिनों तक इन्टरनेट पर सर्फिंग करने के बाद यह तथ्य तो उजागर हो गया कि मेहनतकश वर्ग की वकालत करने वाले मुख्यधारा के  ये ‘कम्युनिस्ट’ जो अपनी-अपनी इन्टरनेट-साईटों पर रोजाना हजारों की संख्या में पन्ने तो काले करते हैं,लेकिन  आज तक इन्होने (कम्युनिस्ट क्लासिक्स तो दूर)  मार्क्स-एंगेल्ज़ द्वारा रचित ‘कम्युनिस्ट घोषणापत्र’ तक को क्षेत्रीय भाषाओँ में की तो बात ही छोड़ दें, हिन्दी भाषा में भी प्रकाशित करना गवारा क्यों नहीं समझा. लेकिन, भाषा की बिल्कुल सरल शैली में लिखित सुखविंदर के इस लेख से मार्क्स के अधिशेष/या अतिरिक्त मूल्य के सिद्धांत की व्याख्या ने मुख्यधारा के कम्युनिस्टों की नीतिओं और अवसरवादिता का पर्दाफाश कर दिया. इन संशोधनवादी और लेफ्ट-विंग कम्युनिज्म के शिकार कम्युनिस्टों  से किसी भी प्रकार की उम्मीद न करते हुए,अन्य कार्यों के अतिरिक्त, नव सर्वहारा पुनर्जागरण और नव सर्वहारा प्रबोधन के इस काल में सर्वहारा  के सच्चे सेवकों के कन्धों से कन्धा मिलाते हुए मार्क्सवाद को सर्वहारा के बीच ले जाने के  कार्यभार में हम भी अपने आप को  सम्मलित समझते है. इसी सिलसिले को आगे बढाते हुए हम सुखविंदर के लेख को इस ब्लॉग पर प्रकाशित कर रहे हैं–शहीद भगत सिंह विचार मंच के सदस्यों द्वारा)

पंजाब  का किसान आन्दोलन और कम्युनिस्ट–सुखविंदर

दायित्वबोध के 2005,जुलाई-सितम्बर  से साभार

यूँ तो हरित क्रांति के सभी इलाकों की ही यह खासियत रही है कि वहां धनी किसानों के नेतृत्व में  किसानों का कोई-न-कोई आन्दोलन चलता ही रहता है, लेकिन पंजाब का किसान आन्दोलन पिछले कुछ वर्षों से विशेष तौर से चर्चा का विषय बना हुआ है. यहाँ हमारी दिलचस्पी किसान आन्दोलन में कम  और पंजाब के कम्युनिस्टों की इन आंदोलनों के प्रति पहुँच में ज़्यादा है. मालिक वर्गों की मांगो/मसलों/आंदोलनों के प्रति मजदूर वर्ग के प्रतिनिधियों की पहुँच (एप्रोच) क्या हो? आज एक बार फ़िर हमें इस प्रश्न के रूबरू होना पड़ रहा है.
पंजाब में इन दिनों भी अलग-अलग इलाकों में कहीं ज़्यादा तो कहीं कम, किसान आन्दोलन हरकत में हैं. इस आन्दोलन का नेतृत्व सीपीआई, सीपीआई (एम्), सीपीएम से निकले पासला ग्रुप, और सीपीआई (एमएल) न्यू डेमोक्रेसी से संबधित किसान संगठन कर रहे हैं. इन किसान संगठनों  के आलावा भारतीय किसान यूनियन (एकता) के दोनों ग्रुप भी इस आन्दोलन में शामिल हैं,जिनका समर्थन और मार्गदर्शन पंजाबी में प्रकाशित पत्रिकाएं सुर्ख रेखा, दिशा, दोनों लाल तारा और लाल परचम कर रहे हैं, जो मजदूर वर्ग की वैज्ञानिक विचारधारा मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद विचारधारा  को मानने का दावा करते हैं और भारत में नव-जनवाद, समाजवाद और कम्युनिज्म स्थापित करने की बातें करते हैं.
इन किसान संगठनों के आलावा पंजाब में कुछ और भी किसान संगठन सक्रिय हैं पर उनकी कार्रवाईयां इस लेख के  दायरे से बाहर हैं. उपरोक्त ‘कम्युनिस्ट’ किसान संगठनों द्वारा चलाये गए और चलाये जा रहे आन्दोलन की मुख्य मांगे इस प्रकार हैं :
१. उत्पादों के लाभकारी मूल्य हासिल करना,
२. कृषि लागतों पर सब्सिडी  हासिल करना,
३. कृषि उत्पादों के लिए सुरक्षित मण्डी हासिल करना, और
४. किसानों के कर्जे माफ़ करना.
इसके आलावा और भी मांगे हो सकती हैं लेकिन हमारे लिए उनका ज्यादा महत्व नहीं.
अलग-अलग कम्युनिस्ट पार्टियों के नेतृत्व और उपरोक्त पत्रिकाओं-पर्चों के समर्थन और मार्गदर्शन में उक्त मांगो पर चल रहे किसान आन्दोलन का मजदूर वर्ग के विचारधारात्मक नज़रिए से विश्लेषण करना इस लेख का मुख्य मकसद है.
जहाँ तक कृषि मालों गेहूं, धान, दूध आदि की कीमतों में बढोतरी की मांग का सवाल है, तो यह बात दिन के उजाले की तरह साफ़ है कि यह मांग मजदूर वर्ग के विरोध में जाती है. हर प्रकार के मालिकाने से महरूम, कम मजदूरी पर मुश्किल से गुज़ारा करते मजदूरों को इन वस्तुओं की कीमत में बढोत्तरी की कीमत अपने जिंदा रहने के लिए बेहद जरूरी उपभोग या जिंदगी की ओर  बुनियादी ज़रूरतों में कटौती करके चुकानी पड़ती हैं. क्या कम्युनिस्टों को ऐसी मजदूर विरोधी मांगों पर चलने वाले आन्दोलनों का नेतृत्व, समर्थन या मार्गदर्शन करना चाहिए? और जो यह सब कर रहे हैं क्या वे मजदूर वर्ग के साथ गद्दारी नहीं कर रहे? यह बात इतनी सीधी और सरल है कि इसकी ज्यादा व्याख्या की ज़रूरत नहीं.
कृषि मालों के लाभकारी मूल्यों की लडाई जहाँ मजदूर वर्ग के विरोध  में है, वहीं यह मांग कृषि पूंजीपति या धनी किसानों के हक़ में है, क्योंकि, यही वह वर्ग है, जिसको कृषि मालों की कीमतों में बढोतरी का सबसे ज्यादा फायदा होता है.
किसानी अलग-अलग परतों में बंटी हुई है. कृषि में हुए पूंजीवादी विकास ने इसके अच्छे-खास हिस्से को खेत-मजदूरों में बदल दिया है. मालिक किसानों की बड़ी संख्या गरीब और मध्यम किसानों की है. किसानी का यह हिस्सा खासकर गरीब किसानी आज पूँजी की मार  अधीन आ गई है. गरीब और मध्यम किसान अपनी ज़मीनें बेचकर सम्पत्तिहीन मजदूरों की कतारों में शामिल हो रहे हैं और यह प्रक्रिया दिन-बा-दिन तेज़ होती जा रही है.
माल उत्पादक होने के चलते गरीब किसान भी अन्य  मालिक किसानों (धनी किसानों) के साथ ही अपनी वर्गीय नजदीकी महसूस करता है. उसको यह भ्रम होता है कि अगर उसकी फसल ( चाहे उसके पास बेचने के लिए बहुत अधिक फसल न हो) की ज्यादा कीमत मिले तो वह एक माल उत्पादक के रूप में बचा रह सकता है और किसी समय बड़ा मालिक भी बन सकता है. लाभकारी मूल्यों की लडाई में धनी किसान गरीब किसानों की इस मानसिकता का फायदा उठाते हैं. चूंकि मालिक किसानों का बड़ा हिस्सा गरीब किसानों और मध्यम किसानों का है इसलिए इनके, खासकर गरीब किसानों के समर्थन के बिना धनी किसान न तो अपनी लडाई लड़ सकते हैं और न ही जीत सकते हैं. इसलिए धनी किसान गरीब किसानों का मित्र होने का पाखण्ड करते हैं. धनी किसान कृषि लागतों में बढोतरी होने के कारण कृषि मालों के दामों में बढोतरी किए जाने की वकालत करते हैं. इस प्रकार वे गरीब किसानों को गुमराह करके अपने आन्दोलन में शामिल कर लेते हैं. इस प्रकार अगर कृषि मालों की कीमतें बढ़ जायें तो गरीब किसान के मुकाबले धनी किसानों के मुनाफे कई गुणा  बढ़ जाते हैं. विस्तृत पुनरुत्पादन करने वाला धनी किसानों का यह वर्ग इस बढे हुए मुनाफे को दोबारा कृषि में निवेश करता है. विस्तृत पुनरुत्पादन की एक शर्त यह भी है कि कृषि में लगी पूँजी में बढोतरी के साथ-साथ धनी किसानों के मालिकाने के अधीन ज़मीन में भी बढोतरी हो. इसलिए वह पहले से ही तबाही के कगार पर खड़े किसानों की ज़मीन खरीदकर उन्हें मजदूरों की कतारों में धकेल देते हैं. इसलिए गरीब किसानों के लिए लाभकारी मूल्यों की लडाई एक धोखा, एक छलावा ही साबित होती है.
इस प्रकार देखा जाए तो कृषि उत्पादों के लाभकारी मूल्यों की लडाई जहाँ मजदूर वर्ग के साथ गद्दारी है, वहीं छोटे किसान के साथ धोखा है और इस धोखाधडी भरे धंधे  में शामिल है यहाँ कम्युनिस्टों  का लेबल लगाई हुई पार्टियाँ और ‘कम्युनिस्ट विचारधारा को समर्पित पत्रिकाएं’ लेकिन लाभकारी मूल्यों का अभी और विश्लेषण बाकी है.

धनी किसान और उनकी समर्थक ‘कम्युनिस्ट’ पार्टियाँ और उपर जिक्र में आई पत्रिकाएं कृषि लागत बढ़ने से कृषि मालों की कीमतों में बढोत्तरी  की जो वकालत करती हैं उसकी चीरफाड़ भी जरूरी है. मार्क्सवादी अर्थशास्त्र बताता है कि किसी भी माल की कीमत उसके मूल्य की ही मुद्रा के रूप में अभिव्यक्ति है. मूल्य का सारतत्व किसी माल के उत्पादन में खर्च हुआ श्रम-काल होता है. उत्पादन प्रक्रिया शुरू करने के लिए पूंजीपति अपनी पूँजी को दो मदों पर खर्च करता है. एक मशीनरी, कच्चा माल आदि पर, पूँजी का यह  हिस्सा स्थिर पूँजी कहलाता है; दूसरा श्रम-शक्ति की खरीद पर, पूँजी का यह हिस्सा परिवर्तनशील पूँजी कहलाता है. मशीनरी, कच्चा माल आदि भी चूंकि श्रम के ही उत्पाद होते हैं, इसलिए इसकी कीमत भी उनके उत्पादन के ऊपर खर्च हुए कुल श्रम-काल से ही तय होती है. कच्चे माल पर जब श्रम-शक्ति कार्य करती है, तो कुल मूल्य में बढोत्तरी होती है. लेकिन कच्चा माल नए उत्पादित माल को सिर्फ़ उतने हीं मूल्य का हस्तांतरण कर सकता है, जितना उसमें पहले से ही मौजूद हो. यानी कच्चा माल कोई मूल्य पैदा नहीं करता. सिर्फ़ श्रम-शक्ति ही है जो नया मूल्य सृजित करती है. लेकिन पूँजी का मालिक श्रम-शक्ति के मालिक अर्थात मजदूर को उसके द्वारा सृजित कुल मूल्य का सिर्फ़ एक छोटा हिस्सा ही देता है, बाकी ख़ुद हड़प जाता है. पूँजी का मालिक इस माल को इसमें जोड़े गए मूल्य के ऊपर बेचकर ही मुनाफा कमाता है. मार्क्स इसकी इस प्रकार व्याख्या करते हैं,” मान लीजिए कि श्रम का एक औसत घंटा 6 पेन्स के बराबर मूल्य में जुडा हुआ है, या श्रम के 12 औसत घंटों में 6 शिलिंग का मूल्य जुडा हुआ होता है. यह भी मान लीजिए कि श्रम का मूल्य 3 शिलिंग, या 6 घंटे के श्रम की उपज है. अब यदि किसी माल में लगे हुए कच्चे माल, मशीन आदि में 24 घंटे का औसत श्रम लगा है, तो उसका मूल्य 12 शिलिग़ होगा. इस पर यदि पूंजीपति द्वारा लगाया हुआ मजदूर इन उत्पादन के साधनों में 12 घंटे का श्रम जोड़ देता है, तो ये 12 घंटे 6 शिलिंग के अतिरिक्त मूल्य में फलीभूत होंगे. इस प्रकार उपज  का कुल मूल्य 36 घंटे के फलीभूत श्रम, या 18 शिलिंग के बराबर होगा. लेकिन चूंकि श्रम का मूल्य, या मजदूर की मजदूरी केवल 3 शिलिंग है, पूंजीपति को मजदूर के उस 6 घंटे के अतिरिक्त श्रम के लिए कुछ भी नहीं देना होगा जो माल के मूल्य में शामिल हो गया है. अब यदि पूंजीपति इस माल उसके मूल्य 18 शिलिंग पर बेचता है तो उसे 3 शिलिंग का वह मूल्य भी प्राप्त होता है, जिसके लिए उसने कुछ नहीं दिया. ये 3 शिलिंग अतिरिक्त मूल्य या मुनाफे के रूप में है, जो सीधे पूंजीपति की जेब में जाता है. इस प्रकार माल को उसके मूल्य से अधिक दामों पर न बेचकर, बल्कि उसके सही मूल्य पर बेचकर पूंजीपति 3 शिलिंग का मुनाफा प्राप्त करता है. “ (मार्क्स: मजदूरी, दाम और मुनाफा)

अगर पूंजीपति अपने माल को उसके  मूल्य से अधिक बेचने में कामयाब भी हो जाए, तो इससे समूची अर्थव्यवस्था में मालों के कुल मूल्य में कोई बढोत्तरी नहीं होगी. इस प्रकार हम देखते हैं कि मुनाफा मण्डी में नहीं, बल्कि उत्पादन की प्रक्रिया में पैदा होता है. पूंजीपति मण्डी में  अपने माल के विनिमय से मुनाफा इसलिए प्राप्त करता है क्योंकि उसके माल में पहले से ही मुनाफा निहित होता है. “वाणिज्यिक पूँजी साधारण रूप में परिचलन के क्षेत्र में कार्यशील पूँजी है. परिचलन की प्रक्रिया कुल पुनरुत्पादन की प्रक्रिया का ही एक पड़ाव है. परंतू परिचलन प्रक्रिया में कोई मूल्य पैदा नहीं होता और इसलिए न ही कोई अतिरिक्त मूल्य पैदा होता है. सिर्फ़ मूल्य का एक मात्रा के रूप में हस्तांतरण  होता है…..अगर उत्पादित मालों की बिक्री से अतिरिक्त मूल्य हासिल किया जाता है तो सिर्फ़ इसलिए कि वह पहले से ही उसमें निहित था.” (कार्ल मार्क्स: पूँजी, खंड 3, पृष्ठ 279, अंग्रेजी संस्करण)

इस प्रकार जो लोग मण्डी में मुनाफा ढूंढते हैं, वे होने का परिचय देते हैं. कृषि मालों के लाभकारी मूल्य की मांग व्यर्थ है क्योंकि कृषि मालों में तो पहले से ही मुनाफा निहित होता है

.मण्डी में वस्तुओं की खरीद-फरोख्त व्यापर कहलाती है. पूंजीवादी मण्डी में पूंजीपति अपने माल की ज्यादा से ज्यादा कीमत प्राप्त करने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाते हैं. मण्डी में माल की उसके मूल्य से ज्यादा दाम पर बिक्री जहाँ एक को लाभ पहुंचाती है, वहीं दूसरे को उतना ही नुकसान झेलना पड़ता है. इस सम्बन्ध में कार्ल मार्क्स, बेंजामिन  फ्रैंकलिन का हवाला देते हैं, “जंग डकैती है, व्यापर आम तौर पर धोखाधडी  है.” (कार्ल मार्क्स: पूँजी, खंड-1, पृष्ठ 161,  अंग्रेज़ी संस्करण)
इस प्रकार मण्डी में कृषि मालों की कीमत बढाने की मांग करने वाले बेंजामिन फ्रैंकलिन के शब्दों में धोखाधडी के वकील हैं. ये धोखाधडी भी वे मजदूर वर्ग के साथ ही कर रहे हैं, जिसके रहनुमा होने का वे दावा कर रहें हैं. क्योंकि मालों के दामों की बढोत्तरी का धनी किसान को जितना लाभ होता है, उसी अनुपात में मजदूरों को उसका नुकसान होता है.

.दरअसल, लाभ या मुनाफा बढ़ाने की लडाई पूंजीपतियों के इस या उस गुट की तो हो सकती लेकिन मजदूर वर्ग की नहीं. कृषि मालों के लाभकारी मूल्य की लडाई समाज में पैदा होने वाले कुल  अतिरिक्त मूल्य में औद्योगिक और व्यापारिक पूँजी की बनिस्पत, कृषि बुर्जुआ वर्ग का हिस्सा बढ़ाने की लडाई है और इसके समर्थन में खड़ी ‘कम्युनिस्ट पार्टियाँ’ और उपरोक्त पत्रिकाएं उसी प्रसंग में कृषि क्षेत्र को दी जाने वाली जिस सब्सिडी की मांग उठाती हैं उस पर भी विचार करने की जरूरत है. सब्सिडी अर्थात कृषि उत्पादन में इस्तेमाल होने वाली स्थिर पूँजी पर सब्सिडी जिसके संबध में आजकल पंजाब में उपरोक्त किसान संगठनों के नेतृत्व में कृषि क्षेत्र को मुफ्त बिजली दिए जाने के लिए संघर्ष चल रहा है. स्थिर पूँजी क्योंकि कोई नया मूल्य नहीं पैदा करती, सिर्फ़ अपने मूल्य का ही नए उत्पादित मूल्य में हस्तान्तरण करती है, इसलिए स्थिर पूँजी के दाम गिरने से नए उत्पादित  माल का दाम भी गिर जाएगा, जिससे किसान के कुल लाभ में कोई बढोत्तरी नही होगी. निस्संदेह मजदूर वर्ग के प्रतिनिधियों को किसानों के मुनाफे के बढ़ने या गिरने से कोई सरोकार नहीं होना चाहिए. इस सब की चर्चा तो हम उक्त पार्टियों और पत्रिकाओं  की विचारधारात्मक कंगाली को बेनकाब करने के लिए ही कर रहे हैं.
अगर सब्सिडी की मांग किसी खास इलाके के किसानों के लिए की जाती है, तो सब्सिडी मिलने के उपरांत उस इलाके के किसानों को एक फायदा जरूर होगा कि  उनके उत्पादन की दूसरे इलाके के किसानों के उत्पादन के मुकाबले मण्डी में मुकाबले की योग्यता बढ़ जायेगी. एक इलाके के किसानों का कम लागत पर तैयार माल दूसरे इलाके के किसानों की तबाही का सबब बन सकता है. इससे ज्यादा कृषि सब्सिडी का ओर कोई नतीजा नहीं निकलेगा.
‘कम्युनिस्ट पार्टियों’, पत्रिकायों की रहनुमाई में चल रहे किसान आन्दोलन की अगली महत्वपूर्ण मांग है सुरक्षित मण्डी की. अर्थात किसान जो भी पैदा करे, वह आराम से लाभदायक दामों पर बिक जाए. यह है सुरक्षित पूंजीवादी मण्डी का यूटोपिया. ये लोग मण्डी तो चाहते हैं, लेकिन मुकाबला नहीं. ये लोग पूंजीवाद तो चाहते हैं, लेकिन तबाही नहीं. अगर ये भूल गए हों, तो इन्हें याद दिला दें कि पूंजीवादी मण्डी मूल्य के नियम के मुताबिक चलती है. उत्पादन के साधनों के निजी मालिकाने के अधीन काम करते इस नियम के तहत पूंजीवादी मण्डी हमेशा अराजकता की हालत में रहती है. उत्पादन के स्वत:स्फूर्त नियामक के तौर पर काम करता है. मूल्य के इर्द-गिर्द मालों के दामों में उतार-चढाव,  पूंजीपतियों को कुछ खास वस्तुओं का उत्पादन घटाने या बढ़ाने और उत्पादन के उन क्षेत्रों में अपनी पूँजी लगाने के लिए मजबूर करता है, जहाँ दाम ज्यादा हों. इसका नतीजा अलग-अलग आर्थिक क्षेत्रों में पूँजी और श्रम के स्वत:स्फूर्त पुनर्वितरण में निकलता है. माल उत्पादक अपने मालों की लागत कम करने की कोशिश करता है, लेकिन प्रतिस्पर्धा की परिस्थतियों के अधीन हर कोई इसमें सफल नहीं होता. वे लोग जो अपने मालों को बेचने के उपरांत अपने खर्च पूरे नहीं कर पाते, तबाह हो जाते हैं.इसके विपरीत जो सुधरी हुई तकनीकों का इस्तेमाल करते हैं, इसके कारण श्रम की लागत घटा लेते हैं, वे ओर भी अमीर हो जाते हैं. इस प्रकार माल उत्पादकों के वर्गीय ध्रुवीकरण  का आर्थिक आधार तैयार होता है. इस प्रकार मूल्य के नियम के आधार पर सरल माल उत्पादन के पूंजीवादी उत्पादन में तब्दील हो जाने का आधार अस्तित्व में आता है. यानि वे छोटे उत्पादक जो ख़ुद की श्रम शक्ति से मालों का उत्पादन करतें हैं (सरल माल उत्पादन) तबाह हो जाते हैं और उनकी बची-खुची पूँजी बड़े माल उत्पादकों के हाथों में चली जाती है. इस प्रकार पूंजीवादी उत्पादन (दूसरों की श्रम-शक्ति खरीदकर उत्पादन करवाना) अस्तित्व में आता है

पूंजीवादी मण्डी के नियम इतने बेरहम हैं कि इसके तहत कुछ का फायदा और बहुतों की तबाही अपरिहार्य है. इसका एक ही हल है, पूंजीवादी मण्डी यानि पूंजीवादी व्यवस्था  की तबाही. पूंजीवाद की यह नियति मजदूर वर्ग के हाथों तय है. इसलिए जरूरी है कि इस लडाई में मजदूर वर्ग के दोस्तों, गरीब और मध्यम किसानों, खासकर गरीब किसानों को सुरक्षित मण्डी, लाभकारी मूल्यों आदि के भ्रमोँ  से मुक्त करके उन्हें मजदूर वर्ग के पक्ष में लाया जाए. लेकिन ये कम्युनिस्ट पार्टियाँ और पत्रिकाएं इस मकसद की विपरीत दिशा में ज़ोर लगा रहीं हैं.
उक्त किसान संगठन और उनके ‘कम्युनिस्ट नेता, समर्थक, मार्गदर्शक पत्रिकायों की चौथी महत्वपूर्ण मांग है किसानों की कर्जा मुक्ति, जिसकी आजकल पंजाब में बहुत चर्चा है. इस प्रश्न पर पंजाब के बुर्जुआ सियासतदान, बुर्जुआ अख़बार, उक्त किस्म की कम्यनिस्ट पार्टियाँ और पत्रिकाएँ आज एक ही बोली बोल रहें हैं. कृषि मालों के लाभकारी मूल्यों, कर्जा मुक्ति आदि मसलों पर इन अलग-अलग कैम्पों के लोगों के बीच पंजाब में चाहे-अनचाहे एक अपवित्र गठबंधन बना हुआ है.
‘सुर्ख रेखा’ ने जिस तरह किसानी की क़र्ज़ माफ़ी का प्रचार किया है और आज भी कर रही है, उससे तो यूँ प्रतीत होता है जैसे ‘सुर्ख रेखा’  को मालिक किसानों के कर्जा माफ़ी ‘संग्राम’ में से भी नई जनवादी क्रांति निकलती नज़र आती है. यही हाल इस बिरादरी कीं अन्य पत्रिकाओं का भी है. अगर देखा जाए तो ज्यादा कर्जा उसी को मिलता है जिसके पास ज्यादा पूँजी हो यानि कर्जा देने वाले को अपनी पूँजी वापस मिलने का भरोसा हो. दुनिया के बड़े मगरमच्छों एनरोंन  और वर्डकॉम  का उदहारण हमारे सामने है. वर्डकॉम के दिवालिया होने के समय उस पर 30 अरब डालर  का क़र्ज़ था, पंजाब के सभी किसानों के ऊपर कुल कर्जे से कई गुना ज्यादा. ऐसे हे हमारे देश के छोटे-बड़े उद्योगपतियों और मालिक किसानों के अलग-अलग स्तरों के क़र्ज़ देखे जा सकते हैं. पंजाबी ट्रिब्यून में डॉ. अनूप सिंह के एक लेख के अनुसार, “1996-1997 तक 5701 करोड़ रूपये के कुल कर्जे में से 21.57 प्रतिशत यानि 1230 करोड़ रु का कर्जा 5 एकड़ तक की मालिकी वाले किसानो के ऊपर है. 28.57 प्रतिशत यानि 1637 करोड़ रु 5 से 10 एकड़ की की जमीन मालिकी वाले किसानों पर है. बाकि 2820 करोड़ का कर्जा 10 एकड़ से ज्यादा की मालिकी वाले किसानों पर था.” इससे स्पष्ट है कि जिनके  पास ज़मीन ज्यादा है, उन्हीं पर कर्जा भी ज्यादा है. ये कम्यनिस्ट पार्टियाँ और पत्रिकाएँ किसानी की सभी परतों के कर्जे माफ़ करने की मांग कर रही हैं. वैसे इनको इतना  तो पता ही होगा कि पूंजीपति के  लिए कर्जा भी मुनाफा बढ़ाने का ही एक साधन होता है.

1998 में पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगढ़, के प्रो. एच.एस. शेरगिल की “ग्रामीण पंजाब में उधारी और क़र्ज़” शीर्षक से प्रस्तुत अध्धयन रिपोर्ट के मुताबिक पंजाब के किसानों पर कुल कर्जा 5700 करोड़ रु है, जो कि पंजाब के किसानों की मालिकी के अधीन कुल ज़मीन की कुल कीमत का सिर्फ़ 4 प्रतिशत ही बनता है. अगर कृष में किसानों द्वारा की कुल पूँजी निवेश और किसानों की घरेलू संपत्ति भी जोड़ ली जाए तो किसानों की कुल पूँजी के बनिस्पत कुल कर्जे का प्रतिशत और भी नीचे गिर जाएगा. तथ्यों की रोशनी में पाठक देख सकतें हैं कि इन पार्टियों  और पत्रिकाओं द्वारा किसानी कर्जे के उठाए जा रहे धुएँ की असलियत क्या है.
इस विश्लेषण की रोशनी में देखा जा सकता है कि आज ये कम्यनिस्ट पार्टियाँ और पत्रिकाएँ किसकी सेवा कर रही हैं. छोटे मालिकाने को बचाए रखने की प्रतिक्रियावादी कोशिशों में डूबे हुए ये लोग मजदूर वर्ग की विचारधारा और उसके वर्गीय रुख को त्याग कर मजदूर वर्ग के दुश्मन शोषक वर्गों के दृष्टिकोण  पर खड़े है.
अंत में इनको लेनिन की यह नसीयत याद दिला देते है,” कोई पूछ सकता कि इसका हल क्या है, किसानों की हालत कैसे सुधारी जा सकती है? छोटे किसान ख़ुद को मजदूर वर्ग के आन्दोलन से जोड़कर और समाजवादी व्यवस्था के लिए संघर्ष में ज़मीन और साधनों (कारखाने, मशीनें आदि) को सामाजिक संपत्ति के रूप में बदल देने में मजदूरों की मदद करके खुद को पूँजी की जकड़  से मुक्त कर सकते है. छोटे पैमाने की खेती और छोटी  जोतों को बचाने की कोशिश सामाजिक विकास की गति को अनुपयोगी रूप में धीमा करना होगा. इसका मतलब पूंजीवाद के अधीन ही खुशहाली की सम्भावना के भ्रम से किसानों को धोखा देना होगा. इसका मतलब श्रमिक वर्गों में फ़ुट डालना और बहुसंख्यकों की कीमत पर अल्पसंख्यकों के लिए एक सुविधाजनक स्थिति  पैदा करना होगा.” (मजदूर, पार्टी और किसान)

(जैकारा, जून २००३ से अनूदित)

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