नेपाली क्रांति किस ओर?

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कोइराला वंश का पतन : लक्ष्मण पन्त–यहाँ देखें

ने.क.पा. (मा.) किस ओर?

कॉ. लक्ष्मण पन्त के लेख की वैचारिक  अव्स्थितियाँ हमारे चिंता-परेशानी

का सबब  है, हम इनसे कतई सहमत नहीं हैं!

अलोक रंजन

कॉ.लक्ष्मण पन्त नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी(माओवादी) के विदेश ब्यूरो के सदस्य हैं. ‘बिगुल’ को प्रकाशनार्थ भेजे गए लेख ‘कोइराला वंश का पतन’ में निहित विचारधारात्मक-राजनितिक अवस्थितियाँ, यदि मौटे तौर पर भी पार्टी की अवस्थितियाँ हैं, तब तो यह वाकई हमारे लिए चिंता और परेशानी का सबब हैं. लेख की मूल अवस्थितियाँ नई परिस्थितियों में नेपाल के वर्ग-संघर्ष के अनुभवों के सैद्धांतिक निचोड़ के नाम पर, राज्य और क्रांति विषयक मूल लेनिनवादी निष्पत्तियों का निषेध  करती हैं और संशोधनवादी  विपथ-गमन के स्पष्ट संकेत प्रस्तुत करती हैं. इन विचारधारात्मक विभ्रमों-गलतियों-भटकावों को यदि समय रहते ठीक नहीं किया गया तो नेपाली क्रांति की अग्रवर्ती विकास-प्रक्रिया पर निश्चय ही इनका गंभीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा.
कुछ  छूट देते हुए यह सोचा जा सकता है कि कॉ. लक्ष्मण पन्त की अवस्थिति ने.क.पा. (मा.) की आधिकारिक अवस्थिति नहीं होकर, उनकी निजी राय है या पार्टी में मौजूद तमाम विचारों में से एक विचार  है. लेकिन तब भी कई गंभीर सवाल उठते हैं. कहीं ऐसा तो नहीं कि ने.क.पा. (मा.) का पार्टी-नेतृत्व रणकौशल (टेक्टिक्स)  के नाम पर जिस तरह  और  जितनी तेज़ी से (और प्राय: पूर्व-अवस्थिति और उसमें बदलाव के कारणों की कोई चर्चा-व्याख्या किए बिना) अपनी राजनितिक अवस्थितियाँ बदलता रहता हैं, और जिस तरह वह रणनीति और यहाँ तक कि बुनियादी  उसूली दायरों के प्रश्नों को भी रणकौशल का सवाल बना देता है, उससे कतारों और मध्यवर्ती नेतृत्व के स्तरों तक विचारधारात्मक विभ्रम फ़ैल रहा हो, लाइन और परिस्थिति के बारे में चीजें स्पष्ट न हो रही हों और पार्टी केभीतर संशोधनवादी विपथ-गमन का पूर्वाधार तैयार हो रहा हो? दूसरी बात, यह सही है कि कोई पार्टी एकाश्मी नहीं होती और उसमें कई विचार लगातार-मौजूद रहते हैं, लेकिन उसमें क्या क्रांतिकारी और संशोधनवादी विचारों का शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व लंबे समय तक संभव होगा  और यदि ऐसा होगा तो क्या यह कालांतर में पार्टी के चरित्र को ही नहीं प्रभावित करेगा? तीसरी बात, कॉ. लक्ष्मण पन्त के इस लेख में प्रस्तुत विचार यदि निजी हैं, या पार्टी में मौजूद किसी धड़े के विचार हैं, तो भी अन्तरपार्टी जनवाद का कोई भी रूप क्या इस बात की इजाजत देता है कि किसी क्रांतिकारी कम्युनिस्ट पार्टी के विदेशब्यूरो का सदस्य ऐसे विचारों को (चाहे निजी  लेख के तौर पर ही सही) अन्तरपार्टी  मंच की बहसों की बजाय बाहर प्रकाशित करे? इससे क्या अंतरराष्ट्रीय  कम्युनिस्ट आन्दोलन की कतारों में भारी विभ्रम नहीं फैलेगा?
कॉ.  लक्ष्मण पन्त का मानना है कि प्रधानमंत्री पद पर का. प्रचंड की विजय नेपाल में एक नए युग की शुरुआत है. एक सौ साठ वर्षों के विश्व कम्युनिस्ट आन्दोलन के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है कि  सर्वहारा वर्ग की एक अलग सेना अपनी कमान में रखने वाली पार्टी खुले और गुप्त, बुलेट और बैलट, लोकयुद्ध और जनांदोलन-इन दोनों तरह के तरीकों का इस्तेमाल करते हुए सरकार बनाने में कामयाबी हासिल की है. नेपाल की नई माओवादी सरकार सर्वहारा और बुर्जुआ वर्ग के संयुक्त अधिनायकत्व  पर आधारित है और राज्यसत्ता में दो परस्पर शत्रु वर्गों का संयुक्त अधिनायकत्व मार्क्सवादी विज्ञान के लिए भी एक नई चीज़ है.
कॉ. लक्ष्मण पन्त के लेख की सबसे बड़ी भ्रान्ति  यह है कि उन्होंने सरकार को ही राज्यसत्ता समझ लिया है. राज्यसत्ता किसी एक वर्ग द्वारा (अकेले या सहयोगी वर्गों के साथ मिलकर) विरोधी वर्गों पर बलात् शासन का केन्द्रीय यंत्र होती है, इसी के द्वारा शासक वर्ग मुख्यत: अपने वर्ग हितों की पोषक सामाजिक-आर्थिक संरचना को बनाये रखते हैं और इसका मुख्य अंग सैन्य-अर्धसैन्य बल, और विराट नौकरशाही तंत्र होता है. सरकार या मंत्रिमंडल (कार्यपालिका) उसका एक गौण अंग होता है. सरकार की भूमिका शासक वर्ग की एक ‘मैनेजिंग कमेटी’ की होती है. नेपाली क्रांति की “विश्व ऐतिहासिक उपलब्धियों” की बेचैनी से तलाश करते हुए कॉ. लक्ष्मण पन्त इन सभी चीज़ों को एकदम भुला देते हैं.
यह मानना एकदम हवाई बात होगी कि नेपाल में शासक वर्गों की पुरानी राज्य-मशीनरी का ध्वंस करके एक नई राज्य-मशीनरी स्थापित हो चुकी है. नेपाल में अभी हुआ केवल यह है कि कोइराला सरकार की जगह माओवादी नेतृत्व में एक नई, मिली-जुली सरकार अस्तित्व में आई है. नौकरशाही-मशीनरी  का ढांचा अभी, लगभग ज्यों का त्यों, बरक़रार है. सेनाओं का एकीकरण अभी नहीं हुआ है, और प्रश्न यह भी है कि क्या एकीकरण के बाद अस्तित्व में आने वाली सेना एक जनसेना होगी. जैसी सत्ता-संरचना  और जैसा संवैधानिक ढाँचा होगा, और जैसी सेना की ढांचागत  संरचना होगी, एकीकरण के बाद सेना का वर्ग-चरित्र भी कालांतर में वैसा ही बन जाएगा (भले ही बुर्जुआ सेना के सभी आम जवान भी किसानों  के बेटे क्यों न हों) एक क्रांतिकारी सेना भी बुर्जुआ सेना में रूपांतरित हो जाती है. यह  इस बात पर निर्भर करता है कि सत्तासीन पार्टी क्या नीतियाँ अपनाती हैं. वैसे यह बात भुलाई नहीं जा सकती कि एकीकृत सेना में भी जन-सेना का समानुपातिक हिस्सा काफी छोटा होगा और उसकी सामरिक शक्ति का अनुपात भी सापेक्षत: छोटा होगा. सारा दारोमदार इस बात पर है कि संयुक्त सरकार (जिसे कॉ. लक्ष्मण  पन्त “परस्पर शत्रु वर्गों की संयुक्त तानाशाही” समझते  हैं) के अंतर्गत, वैधिक-संवैधानिक ढांचे के बाहर, पार्टी के राजनितिक वर्चस्व के अंतर्गत समांतर लोक सत्ता किस रूप में उभरती, कायम रहती है और मज़बूत बनती है तथा शासकीय सैन्य ढांचे के बाहर पार्टी जनता की हथियारबंद ताकत को सुगठित-सुदृढीकृत कर पाती है या नहीं.  परिवर्तन राज्यसत्ता का नहीं हुआ है, मात्र सरकार का हुआ है और उसे भी एक माओवादी सरकार कहना  ग़लत होगा (जैसा कॉ. लक्ष्मण कहते हैं). यह एक मिली-जुली सरकार है, जिसमें माओवादियों  का बहुमत है क्योंकि वह संसद (संविधान सभा) की सबसे बड़ी पार्टी है (पर अकेले या क्रांतिकारी वाम को मिलकर भी बहुमत से काफी दूर है). माओवादी ज्यादा से ज्यादा यह कर सकते हैं कि कोई प्रतिक्रियावादी गृहनीति, भुमिनीति, उद्योग नीति या सामाजिक नीति न बनने दें और संविधान सभा के रूप में काम करने वाली वर्तमान  संसद में अन्य बुर्जुआ और संशोधनवादी दलों की यथास्थिति बुर्जुआ जनवादी नीतियों को संविधान में संहिताबद्ध न होने दें. लेकिन बुर्जुआ और संशोधनवादी भी (सरकार में शामिल ने.क.पा. (एमाले) और मधेसी जनाधिकार फोरम भी इनमें शामिल है) एक रैडिकल क्रांतिकारी जनवादी, भूमि सुधार नीति, उद्योग एवं वित नीति, शिक्षा-स्वास्थ्य सम्बन्धी नीति, विदेश नीति या सत्ता-संरचना के सच्चे जनवादीकरण की नीति को लागू होने से रोकने के लिए, और नए संविधान में संहिताबद्ध होने से रोकने के लिए, एकजुट हो जायेंगे. इस बाबत कोई भी भ्रम संघातिक होगा. ऐसी स्थिति में, जैसा कि हम पहले से कहते आए हैं, माओवादियों सहित पूरा क्रांतिकारी वाम, ज्यादा से ज्यादा, जनोन्मुख बुर्जुआ जनवादी संविधान बनाने के लिए ही संघर्ष कर सकता है, एक नवजनवादी संविधान कतई नहीं हासिल कर सकता. शासन चलते हुए, वह जनहित की नीतियों को लोगू करने की हरचंद कोशिश करते हुए, इसका विरोध करने वालों  का जनता की नज़रों  में पर्दाफाश कर सकता है और अपने जनाधार का विस्तार कर सकता है. इससे ज्यादा कुछ सम्भव हो ही नहीं सकता. माओवादी संसदीय जनवाद के व्यामोह में फंसे बगैर या कोई समझौता किए बगैर, यदि सिद्धांतनिष्ठ ढंग से संघर्ष चलायें तो कई संभावनाएं हो सकती हैं. मुमकिन है कि कोई भी जनोन्मुख कदम उठाना सम्भव न हो पाने की स्थिति में माओवादियों को बीच में ही सरकार और संसद को छोड़कर बाहर आ जाना पड़े ( जोकि नेपाल की स्थितियों में निश्चित ही दुष्कर और लंबा रास्ता होगा और उसकी सफलता काफी हद तक भारतीय उपमहाद्वीप की और चीन की अंदरूनी परिस्थितियों पर निर्भर करेगी). यह भी सम्भव है कि एक अपेक्षतया अधिक जनवादी बुर्जुआ संघात्मक गणतंत्र मुहैया कराने वाला संविधान दो वषों के भीतर अस्तित्व में आ जाए, इस दौरान प्रगतिशील नीतियों के अमल में बाधक पार्टियों के विरुद्ध जनता में व्यापक प्रचार करके माओवादी अपना आधार मज़बूत करें और नए संविधान के अंतर्गत होने वाले चुनाव में स्पष्ट और भारी बहुमत हासिल करें. इस स्थिति में वे आमूलगामी  भूमि-सुधार व अन्य   सामाजिक-आर्थिक नीतियों को लागू करें, संविधान-संशोधन के द्वारा अधिक जनवादी संवैधानिक ढाँचा स्थापित करें और जनवादी क्रांति के प्रोग्राम को आगे बढाएं . इस सूरत में भी प्रतिक्रियावादी ताकतें सामाजिक प्रतिक्रांति की कोशिश करेंगी और अन्ततोगत्वा  निर्णय संसद से बाहर सड़कों पर ही होगा. तब सारा दारोमदार इस बात पर होगा कि स्वयं सरकार में होते हुए भी माओवादियों ने वैकल्पिक, समांतर लोकसत्ता के विविध ‘आर्गन्स’ विकसित किए है या नहीं, केंद्रीकृत शासकीय सैन्य तंत्र का किस हद तक जनवादीकरण किया है, किस हद तक उसमें राजनितिक काम किया और किस हद तक उस औपचारिक ढांचे  के बाहर शस्त्र्बद्ध जनता के रूप में क्रांति की सामरिक शक्ति मौजूद है.

तात्पर्य यह है कि किसी भी सूरत में एक बुर्जुआ संसदीय जनवादी व्यवस्था सर्वहारा  राज्यसत्ता का ‘आर्गन’ नहीं हो सकती, या उसे शांतिपूर्ण रूपांतरण के द्वारा ऐसा नहीं बनाया जा सकता. एक सर्वहारा या जनवादी ढांचे में कार्यकारी  और विधायी शक्तियां मिली हुई ही हो सकती हैं, एक “कार्यशील” विधायिका ही हो सकती है. इस प्रणाली  तक पहुँचने का रास्ता यदि “संवैधानिक सुधारों” का रास्ता होगा भी तो उसके पीछे अवश्यंभावी तौर पर सामाजिक वर्ग संघर्ष में जनता की सशस्त्र शक्ति की निर्णायक विजय या श्रेष्ठता का दबाब काम करता रहेगा. इसके आलावा कोई ओर रास्ता नहीं हो सकता. इसलिए हम पहले भी कहते रहें हैं कि राजतन्त्र का अंत और गणतंत्र की घोषणा नेपाल की जारी राष्ट्रिय जनवादी क्रांति की एक महत्वपूर्ण विजय और मुकाम है, लेकिन इस क्रांति का कोई भी कार्यभार अभी मूलत: और मुख्यत: पूरा नहीं हुआ है. संविधान सभा के रूप में वर्ग-संघर्ष का एक नया दायरा और मंच सामने आया है. इस दौरान संविधान सभा या संसद के भीतर, नीतियों-विधानों को लेकर जारी संघर्ष वर्ग-संघर्ष का एक रूप होगा लेकिन निर्णय अभी भी संसद के बाहर जारी वर्ग-संघर्ष में ही होना  है.
नेपाल की जनवादी क्रांति के साम्राज्य-विरोधी और सामंतवाद-विरोधी कार्यभार अभी भी पुरे नहीं हुए हैं. इस जारी क्रांति की एक ऐतिहासिक उपलब्धि यदि कोई है तो वह है राजतन्त्र  की समाप्ति, न कि कॉ. प्रचंड का प्रधानमंत्री बनना, जैसा कि कॉ. लक्ष्मण पन्त मानते हैं. कॉ. लक्ष्मण पन्त (लेख के अंत में) यह भी कहते हैं कि सरकार में शामिल होना सैद्धांतिक नहीं बल्कि एक “टेक्टिकल” सवाल है, इसका क्रांति को आगे बढ़ाने में इस्तेमाल किया जा सकता है (या नहीं किया जा सकता). दूसरी ओर, लेख के शुरू में ही इसे वह एक ऐतिहासिक विजय और नेपाल में  एक नए युग की शुरुआत घोषित कर देते हैं. सरकार में शामिल होना एक ‘टेकटिक्स’ है, इसका क्रांति को  आगे बढाने में इस्तेमाल किया जा सकता है, यह अपने आप में कोई ऐतिहासिक विजय नहीं है. और कॉ. प्रचंड का प्रधानमंत्री बनना  यदि ऐतिहासिक विजय है तो राष्ट्रपति  पद पर माओवादी उम्मीदवार की हार इसी तर्क से ऐतिहासिक हार मानी जानी चाहिए, लेकिन कॉ. लक्ष्मण पन्त ऐसा नहीं मानते. ने.क.पा. (एमाले) और मधेसी दल केवल मोल-तोल व जोड़-तोड़ के लिए सरकार में शामिल हुए हैं. इस  “टेक्टिकल” गंठजोड़ के इन घटकों को नेपाली कांग्रेस से रत्ती भर भी कम प्रतिक्रियावादी नहीं माना जा सकता. एक ‘टेकटिक्स’ के तहत इस सरकार में शामिल होना तो ठीक है, पर इसे ऐतिहासिक विजय बताना विचारधारात्मक भटकाव है जो जनता में विभ्रम पैदा करके क्रांतिकारी शिक्षा, प्रचार एवं तैयारी की  प्रक्रिया को भारी नुकसान पहुँचायेगा.

मिलीजुली सरकार एक आरजी (प्रोविज़नल)  सरकार है, इसे “दो परस्पर शत्रु वर्गों की तानाशाही” बताना नए इज़ाफे के नाम पर मार्क्सवाद की टांग तोड़ने के समान है. वर्ग-अधिनायकत्व वर्ग-शासन का रूप है, यह सरकार का रूप नहीं है. एक वर्ग अपने शत्रुओं पर अधिनायकत्व लागू करता है. वर्ग-अधिनायकत्व वर्ग-संघर्ष का ही एक रूप और विस्तार है. यदि परस्पर शत्रु वर्ग नेपाल में मिलकर अधिनायकत्व चला रहा है तो वह अधिनायकत्व उन्होंने कायम किन वर्गों पर किया है? मिलीजुली सरकार चलाना एक रणकौशल है, संघर्ष का एक मंच और रूप है, इसे आमूलगामी राज्यसत्ता-परिवर्तन अभी कतई नहीं माना जा सकता. यह प्रक्रिया अभी जारी है.
हो सकता है कि यह हास्यास्पद  थीसिस ने.क.पा.(मा) के नेतृत्व की न हो, लेकिन इसके लिए उसकी ही एक स्थापना जिम्मेवार है. बहुदलीय संसदीय जनवादी प्रणाली को संघर्ष के दौरान ‘टेक्टिकल’ इस्तेमाल की एक चीज़ मानने की बजाय जब सर्वहारा  जनवाद का ‘आर्गन’ घोषित कर दिया जाएगा, तो इस संशोधनवादी प्रमेय से तमाम सारे भद्दे-भोंडे, हास्यास्पद, संशोधनवादी उप-प्रमेय पैदा होने लगेंगे. ने.क.पा.(मा) संसद और गत चुनाव में तथा सरकार में भागीदारी को एक ओर तो एक  ‘टेक्टिकल’ कार्रवाई मानती है, फ़िर उसी सुर में बहुदलीय जनवाद को सर्वहारा शासन  का उपकरण भी घोषित कर देती है. तब फ़िर इसमें भला क्या आश्चर्य कि लक्ष्मण पन्त दो कदम आगे बढ़कर मिलीजुली सरकार को परस्पर-विरोधी वर्गों की संयुक्त तानाशाही तथा सरकार और राज्यसत्ता को समानार्थी घोषित कर देते है. एक ओर सरकार चलाने को वे ‘टेक्टिक्स’ बताते हैं तो दूसरी ओर माओवादियों के नेतृत्व में सरकार-गठन को युगांतकारी भी घोषित कर देते हैं.
कॉ. लक्ष्मण पन्त द्वारा किया जाने वाला पार्टियों का वर्ग-विश्लेषण भी  अत्यन्त भ्रामक है. कॉ. प्रचंड के प्रधानमंत्री बनने को वे इसलिए भी ऐतिहासिक मानते हैं कि वह ५० वर्षों पुराने कोइराला वंश और ‘कान्ग्रेसक्रेसी’ का पतन है जो साम्राज्यवाद, सामंतवाद और विस्तारवाद का मुख्य प्रतिनिधि व मूर्त रूप रहा है और राजतन्त्र का मुख्य सहारा रहा है. यह मूल्यांकन सिरे से ग़लत है और ने.क.पा. के मुख्य धडों के पुराने मूल्यांकनों से भी कतई मेल नहीं खाता. आज से पचास या चालीस या तीस वर्षों पहले नेपाली कांग्रेस को सामंतों या दलाल पूंजीपतियों  का प्रतिनिधि कदापि नहीं कहा जा सकता था. इन वर्गों का प्रतिनिधित्व राजा और राजतंत्रावादी दल कर रहे थे. तब नेपाली कांग्रेस के चरित्र का राष्ट्रिय पहलू प्रधान था. (हालाँकि गौणत: प्रतिक्रियावादी और समर्पणवादी  पहलू भी उसमें मौजूद था). कॉ. पुष्पलाल द्वारा राजशाही के विरुद्ध नेपाली कांग्रेस के साथ संयुक्त मोर्चे की लाइन बिल्कुल सही थी. (यह माओवादी पार्टी भी मानती है) गलती यह थी कि उनके नेतृत्व में पार्टी अपनी स्वतन्त्र पहलकदमी खोकर नेपाली कांग्रेस की पिछलग्गू हो गई. नेपाली कांग्रेस मुख्यत: नेपाल के राष्ट्रिय और निम्नपूंजीपति वर्ग का प्रतिनिधित्व करती थी, १९९० के बाद सत्तासीन होने पर और क्रांतिकारी वाम के आगे बढ़ने के साथ ही नेपाली कांग्रेस व उससे जुड़े नेपाली राष्ट्रिय  पूंजीपति वर्ग के चरित्र का प्रतिक्रियावादी पहलू प्रधान होता चला गया. राजा और राजतंत्रावादी दलों का पतन सुनिश्चित होने के साथ ही साम्राज्यवादी और विस्तारवादी शक्तियों तथा दलाल पूंजीपति और सामंतों जैसे प्रभावशील देशी प्रतिक्रियावादी वर्ग भी अपना दांव नेपाली कांग्रेस पर लगाने को मजबूर हो गए. लेकिन इसके साथ ही ने.क.पा. (एमाले) , मधेसी दल और अन्य बुर्जुआ दल भी आज मुख्यत: प्रतिक्रियावादियों की ही सेवा कर रहे हैं. हाँ, इसके भीतर रैडिकल राष्ट्रिय एवं जनवादी तत्वों के धडे ज़रूर मौजूद हैं. कॉ. लक्षमण पन्त मात्र राजतन्त्र की समाप्ति के साथ ही सामंतवाद के साथ मुख्य  अन्तरविरोध को गौण मान लेते हैं और बताते हैं कि मुख्य अन्तरविरोध अब साम्राज्यवाद और विस्तारवाद के साथ हो गया है. यह थीसिस भी मार्क्सवादी पहुँच-पद्धति के पूर्ण निषेध पर आधारित है. राजतन्त्र की समाप्ति और जनवादी संघात्मक गणराज्य की औपचारिक घोषणा के बाबजूद, अभी नेपाल में रैडिकल भूमि सुधार का एक भी कदम नहीं उठाया गया है, राज्य और समाज के पुनर्गठन का प्रश्न भी अभी मात्र एजेंडा पर उपस्थित हुआ ( और यह भी तह है कि मौजूदा अंतरिम ढांचे में यदि यह काम होगा भी तो आंशिक या अत्यन्त न्यून रूप में ही होगा) ऐसे में, मात्र राजा के शासन के खात्मे से ही सामंतवाद-विरोधी मुख्य अंतरविरोध को गौण बना देना एक रूपवादी, अधिरचनावादी पहुँच-पद्धति के अतिरिक्त ओर कुछ भी नहीं है. इसी रूपवादी पहुँच से कॉ. लक्ष्मण पन्त गिरिजा प्रसाद कोइराला की सरकार के पतन को साम्राज्यवाद और विस्तारवाद के विरुद्ध नेपाली जनता के संघर्ष की एक अहम जीत भी मानते हैं. यानि  कुल मिलकर, उनके अनुसार सामंतवाद और साम्राज्यवाद दोनों के विरुद्ध महत्वपूर्ण ऐतिहासिक जीतें हासिल हो चुकी हैं. यह स्थापना जनता के बीच बुर्जुआ सुधारवादी विभ्रम ओर मिथ्या आशा को मज़बूत  बनाकर नेपाल में जारी क्रांति के अग्रवर्ती विकास पर प्रतिकूल प्रभाव ही छोडेगी.

गौरतलब यह भी है कि अभी तक किसी देश के उपनिवेश, नव-उपनिवेश होने या उस पर हमले की स्थिति में ही साम्राज्यवाद-विस्तारवाद के विरुद्ध  मुख्य अन्तरविरोध की स्थापना दी जाती रही है. नेपाल न तो उपनिवेश है, न ही नव-उपनिवेश और न ही उस पर किसी साम्राज्यवादी या विस्तारवादी देश ने सीधे हमला ही किया है. साम्राज्यवाद वहां देशी प्रतिक्रियावादी वर्गों  और उनकी पार्टियों के माध्यम से ही क्रियाशील है. ऐसे में साम्राज्यवाद के विरुद्ध जनता की सीधे लामबंदी के बजाय अभी भी जनवादी कार्यभारों को पूरा करने के लिए (एक जनवादी संविधान, जनवादी कानून व्यवस्था, क्रांतिकारी भूमि सुधार आदि के लिए) जनता को लामबंद करना ही वहां क्रांतिकारी शक्तियों का मुख्य कार्यभार है.
नेपाल में गणतंत्र की अभी मात्र औपचारिक घोषणा हुई  है. जब तक, कम से कम एक रैडिकल बुर्जुआ अर्थों में भी एक संघात्मक जनवादी गणराज्य स्थापित नहीं हो जाता, यानि ऐसा प्रावधान देने वाले संविधान के तहत नई सरकार काम नहीं करने लगती और जब तक रैडिकल बुर्जुआ हदों तक भी भूमि सुधार नहीं हो जाते, तब तक वहां क्रांति के जनवादी कार्यभार ही प्रधान रहेंगे. हाँ, इसी बीच यदि किसी रूप में प्रत्यक्ष साम्राज्यवादी दखलन्दाजी  हो जाए तो मुख्य अन्तरविरोध अवश्य बदल जाएगा. ज़्यादा सम्भावना इसी बात की है कि यदि नेपाल की क्रांतिकारी वाम शक्तियां वहां भूमि-क्रांति के कार्यभारों को रैडिकल तरीके से पूरा नहीं कर पाती है और विचारधारात्मक कारणों से क्रांति की विकास प्रक्रिया पर यदि कोई प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है तो वहां का सत्तासीन बुर्जुआ वर्ग (ज्यादा सटीक शब्दों में, राष्ट्रिय पूंजीपति वर्ग का प्रतिक्रियावादी हिस्सा) एक गैर क्रांतिकारी क्रमिक प्रक्रिया से (जुन्कर टाइप रूपांतरण से) बुर्जुआ भूमि सुधारों को लागू करने का लंबा रास्ता अपनाएगा. ( आज का साम्राज्यवाद भी इसमें सहयोगी भूमिका निभाएगा) और धीरे-धीरे समाज के पूँजीवादीकरण  के साथ ही श्रम और पूँजी के बीच का अन्तरविरोध वहां प्रधान बनता चला जाएगा. बहरहाल, यह आकलन अलग से विस्तृत चर्चा-विश्लेषण की मांग करता है.
यहाँ हम कॉ. लक्ष्मण पन्त के लेख में विश्लेषण की रूपवादी पद्धति और इसमें निहित संशोधनवादी और संसदीय भटकावों को इंगित करना चाहते हैं. इसके पहले ‘बिगुल’ में प्रकाशित लंबे निबंध में हम ने.क.पा. (मा) के नेतृत्व के विचारधारात्मक  विचलन से जुड़ी समस्याओं का उल्लेख कर चुकें हैं. कॉ. लक्ष्मण पन्त के  दृष्टिकोण को यदि पूरे पार्टी नेतृत्व का दृष्टिकोण न भी माना जाए तो भी यह विश्वासपूर्वक कहा जा सकता है कि इस भटकाव का मूल स्रोत पार्टी नेतृत्व के विचारधारात्मक विभ्रमों और विचलनों में ही मौजूद है.
हम इस मुद्दे पर नेपाल के साथियों से विचार करने और खुलकर बहस करने का आग्रह करते हैं. पूरी दुनिया के सच्चे कम्युनिस्ट नेपाली क्रांति को आगे बढ़ते देखना चाहते हैं. इसलिए नेपाल के क्रान्तिकारी वाम आन्दोलन के भीतर के विचारधारात्मक विचलनों और उनके विरुद्ध संघर्ष के प्रति हमारी चिंता और हमारे सरोकार स्वाभाविक हैं.

नेपाल के संकेत अच्छे नहीं हैं : वरवर राव

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