नेपाल–बहस के लिए

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कोइराला वंश का पतन

लक्ष्मण पन्त, सदस्य, विदेश ब्यूरो, नेपाल की

कम्युनिस्ट पार्टी  (माओवादी)

प्रधानमंत्री पद पर कॉ. प्रचंड की ऐतिहासिक विजय से नेपाल में एक नए युग का सूत्रपात हुआ है. नेपाली जनता ने नेपाली क्रांति के उस मॉडल का पुन: समर्थन किया है जिसमें खुली और गुप्त गतिविधियों, कलम और बन्दूक, बैलेट और बुलेट एवं जनयुद्ध और जनांदोलन दोनों का मेल किया गया है. चेयरमैन प्रचंड की जीत के साथ ही, हमारी पार्टी अंतरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आन्दोलन के एक सौ साठ वर्षों  के इतिहास में सत्ता तक पहुँचने वाली पहली ऐसे पार्टी बन गई है, जिसके पास सर्वहारा वर्ग की अलग सेना है और जो इन अलग-अलग तरीकों का प्रयोग करते हुए सत्ता में पहुँची है. नेकपा (माओवादी) , 1976 में कॉ. माओ के देहांत के बत्तीस वर्षों बाद सरकार का नेतृत्व  करने वाली पहली कम्युनिस्ट पार्टी है.
समूची दुनिया में एक के बाद एक कम्युनिस्ट सत्ताओं के पतन की प्रष्ठभूमि के बरक्स हमारे देश की माओवादी सरकार इस मायने  में भी भिन्न है कि यह सर्वहारा और बुर्जुआ वर्ग की संयुक्त तानाशाही पर आधारित है. किसी भी मार्क्सवादी प्रस्थापना में इस प्रकर की संयुक्त तानाशाही का ज़िक्र नहीं मिलता. मार्क्सवादी विचार के अनुसार राज्यसत्ता में दो विरोधी वर्गों की संयुक्त  तानाशाही सम्भव नहीं है. हालाँकि, नेपाल के अनुभव ने साबित कर दिया है कि इससे अलग भी कुछ किया जा सकता है. आने वाले दिनों में नेपाल के अनुभव और प्रयोग के दार्शनिक और राजनितिक आधार का संश्लेषण करना होगा. इतिहास ने राज्य की दोहरी तानाशाही को सही ठहराने का दायित्व इक्कीसवीं सदी के माओवादियों के कन्धों  पर डाला है.
चेयरमेन  प्रचंड की जीत का एक और ऐतिहासिक पहलू भी है. उनकी जीत के साथ ही पॉँच दशक  पुरानी  ‘कांग्रेसशाही ‘ और कोइराला वंश का अंत हो गया, जो विस्तारवाद और साम्राज्यवाद का मुख्य सुरक्षाकवच  बना रहा और सामंतवाद एवं साम्राज्यवाद का मूर्त रूप था. इस अर्थ में भी श्रावण की 30वीं  तारीख का ऐतिहासिक महत्व है. कोइराला वंश का ढहना, साम्राज्यवाद का एक खम्बा गिरने का द्योतक है. यह राजशाही के अंत से कम मत्वपूर्ण नहीं है. वस्तुत: नेपाली जनता राजशाही और कोइराला वंश दोनों ही से समान रूप से पीड़ित थी. कोइराला वंश और ‘कांग्रेसशाही’ आधी  सदी तक राजशाही का मुख्य आधार रहे.
राजशाही कें अंत तक नेपाली जनता का प्रधान अंतरविरोध सामंतवाद के साथ था. यह स्पष्ट है कि राजशाही के अंत के बाद, नेपाली जनता का प्रधान अंतरविरोध बदल गया है, और अब यह अंतरविरोध साम्राज्यवाद और विस्तारवाद के साथ है. दूसरे शब्दों में, गिरिजा प्रसाद कोइराला का अंत, साम्राज्यवाद और विस्तारवाद के खिलाफ नेपाली जनता के राष्ट्रीय संघर्ष की एक महत्वपूर्ण घटना है.
गणतंत्र की स्थापना के बाद क्रांति का तात्कालिक लक्ष्य बदल गया है और उसी के अनुसार क्रांति के मित्रों एवं शत्रुओं का समीकरण भी बदला है. स्पष्टत: अब मित्र, शत्रुओं में तब्दील हो गए हैं और शत्रु, मित्र बन गए हैं. सामंतवाद और साम्राज्यवाद के दो विराट पहाडों में से एक-सामंतवाद के विशाल पहाड़ को नेपाली जनता ने ध्वस्त कर दिया है. अब नेपाली जनता के समक्ष साम्राज्यवाद और विस्तारवाद की भयावह और विराट चट्टान है. गत चार माह के दौरान नेकपा(माओवादी) को सरकार बनाने से रोकनें की साजिशें इसी का परिणाम थीं.
नेपाली जनता ने सामंतवाद को पराजित करके लोकतंत्र के संघर्ष को काफी हद तक जीत लिया है, लेकिन अभी इसे संस्थागत स्वरूप देने का काम बाकी है. हालाँकि, पूर्ण संप्रभु राष्ट्रवाद के लिए संघर्ष शुरू करना और जीतना अभी बाकी है. फिलहाल यह नहीं बताया जा सकता कि उस संघर्ष की प्रकृति और पद्धति क्या होगी. फ़िर भी, इसमें कोई दो राय नहीं है कि राष्ट्रवाद  के संघर्ष की प्रकृति  राष्ट्रीय ही होगी और यह अधिक जटिल एवं अधिक तीखा होगा. ऐसे में पार्टी की राजनितिक लाइन भी उसी दिशा में निर्देशित होगी.
साम्राज्यवाद-विस्तारवाद और उनके सहयोगियों के समर्थन के बिना लोकतंत्र के लिए संघर्ष में विजय प्राप्त करना सम्भव नहीं था. इसलिए, बारह-सूत्री समझौते को मील का पत्थर कहा गया है. राजशाही के अंत तक, नेपाली कांग्रेस- जिसका साम्राज्यवाद और विस्तारवाद के साथ क़रीबी सम्बन्ध है–जैसी माओवाद की कट्टर विरोधी ताकतों को नेतृत्व देना कोई  छोटी सफलता नहीं है. इस सफलता ने, संसदीय पार्टियों के साथ गठबंधन करने, बातचीत, गोलमेज सम्मलेन, अंतरिम सरकार को आगे बढाने और सविधान सभा के जरिये जनवादी गणतंत्र की प्राप्ति के लिए, दूसरे राष्ट्रीय सम्मलेन द्वारा निरुपित की गई  और केन्द्रीय कमेटी की चुनवांग मीटिंग द्वारा निर्धारित की गई राजनितिक लाइन के सही होने को साबित किया है.
सविधान सभा के चुनाव के बाद तेजी से परिवर्तित होती परिस्थितियों के कारण क्रांतिकारी कतारों में प्रतिक्रिया के कई स्वर उभरे और एक प्रकार की सनसनी फ़ैल गई.राष्टपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव एवं यूएमएल से गठजोड़ के उपरांत पार्टी में और अधिक उथल-पुथल एवं सनसनी व्याप्त हो गई. सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रश्न, जिसने पार्टी की आम कतारों को झकझोरा, यह था कि हमें सरकार में शामिल होना चाहिए या नहीं?
हमें उपरोक्त प्रश्नों के उत्तर  अंश में नहीं, बल्कि सम्पूर्णता में और रूप के बजाय सार में तलाशने होंगे. इन सवालों के जवाब पार्टी द्वारा तय की गई रणनीति में निहित है, उसके रणकौशलों (टैक्टिक्स) में नहीं. क्रांति कभी सीधी रेखा में नहीं बढती. क्रांति का विकास कई बार आगे पीछे होते हुए, विजयों-पराजयों, आक्रमणों-सुरक्षा के सिलसिले से गुजरते हुए होता है. संख्या के हिसाब से, राष्ट्रपति चुनाव में पार्टी के प्रत्याशी की हार को इसी रोशनी में देखा जाना चाहिए. साथ ही, एक पल के लिए भी यह नहीं भुलाया जा सकता की साम्राज्यवाद थक कर बैठ नहीं गया है. वह हताशा में, क्रांति और माओवादी  पार्टी को नष्ट करने और पीएलऐ  को निशस्त्र  करने की साजिशें रच रहा है. हमने सविधान सभा के चुनावों में साम्राज्यवाद पर करारा प्रहार करते हुए उसे रक्षात्मक रूख अपनाने को मजबूर कर दिया. इसके बाद, वे हमें धोखा  देने में कुछ हद तक सफल भी हुए. उन्होंने आक्रामक रूख अपना लिया था और हम रक्षात्मक स्थिति में आ गए थे. क्रांति का यही नियम है. निरंतर विजय और लगातार पराजय दोनों ही सम्भव नहीं हैं. हालाँकि, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पद के चुनाव में हमारे प्रत्याशी की हार हुई है क्योंकि इस घटनाक्रम ने वास्तविक राष्ट्रवादी ताकतों में नेपाली कांग्रेस के खिलाफ नफरत के बीज डाल दिए है. हमने अन्तरविरोध को  सतह पर लेने में सहायता की है, मधेश में असली मेहनतकश अवाम का हमारी पार्टी में विश्वास बढाया है और नेपाली कांग्रेस की सत्ता की भूख को भी उजागर किया है. इसी वजह से, संख्या के खेल में पार्टी की हार के बावजूद इसे हम पार्टी की बड़ी विचारधारात्मक  जीत कह रहे है. आगामी दिनों में यह राष्टवाद के संघर्ष में आधार का काम करेगी. कॉ. प्रचंड की जीत ने, एक बार फ़िर, साम्राज्यवादियों को रक्षात्मक रूख अपनाने को मजबूर  करते हुए उनकी रणनीति को निष्फल कर दिया है. इससे हमारी पार्टी आक्रामक स्थिति में आ गई है.
इस बात से इंकार नहीं है कि साम्राज्यवाद और विस्तारवाद नेपाली क्रांति की राह की रुकावटें है. पार्टी ने जनयुद्ध आरंभ होने के पहले ही क्रांति के दो मुख्य शत्रुओं के रूप में साम्राज्यवाद और विस्तारवाद को चिन्हित कर लिया था. पार्टी के इस वैज्ञानिक निरूपण की पुष्टि इस तथ्य से हो जाती है कि अतीत में जनयुद्ध को कुचलने के लिए राजशाही को इन्हीं शक्तियों का समर्थन प्राप्त हुआ था. यदि, १२ सूत्रीय समझौते से लेकर राष्टपति चुनाव तक की अवधि को देखा जाए तो पुन: इसकी पुष्टि हुई है. राजशाही के अंत के बाद, जोकि विदेशी प्रतिक्रिया का मुख्य ज़रिया था, साम्राज्यवादी ताकतों ने राज्यसत्ता के शून्य को भरने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा रखा है. चुनाव में गिरिजा के परिवार के अधिकांश सदस्यों  की हार के बावजूद प्रधानमंत्री पद नहीं छोड़ने  की उनकी इच्छा यहीं रेखांकित करती है.
केन्द्रीय प्रश्न यह है कि अब क्रांति का लक्ष्य क्या है और आन्दोलन किसके खिलाफ़ और कैसे शुरू किया जाए. निश्चित तौर पर,राष्ट्रवाद के लिए संघर्ष में संघर्ष का निशाना वे ताकतें होंगी जो साम्राज्यवाद और विस्तारवाद के बचाव में आगे आएंगी. गिरिजा को उखाड़ फेंकने में प्राप्त हुई सफलता साम्राज्यवाद के खिलाफ़ संघर्ष की महत्वपूर्ण कड़ी है.
हम  पुराने अन्तरविरोध के निषेध और नए अन्तरविरोध के उभार के संक्रमणकालीन दौर से गुजर रहे है. यह प्रक्रिया एक निश्चित अवधि में पूर्ण होगी. इस अवधि एवं इस प्रक्रिया के पुरा होने  तक पेटी-बुर्जुआ उतावलेपन में आन्दोलन या उभार  की या शान्ति की प्रक्रिया से हटने की बात करना आत्मघाती होगा. आने वाले समय में सम्पूर्ण संघर्ष के साथ-साथ राष्ट्रवाद के संघर्ष को आगे बढाने के लिए केवल राष्ट्रिय स्तर पर ही नहीं, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी व्यापक धुर्वीकरण  और गठबंधन की आवश्यकता है. यह चरण देशभक्त, जनवादी और वाम ताकतों के साथ गठबंधन करने का है. यह सरकार में  शामिल होकर या सरकार से बाहर रहकर, दोनों ही तरीकों से समान रूप से किया जा सकता है. ऐसा नहीं है कि पार्टी सरकार में शामिल होगी या शामिल नहीं होगी तो वह ‘ख़त्म’ हो जायेगी. सरकार में शामिल हुआ जाए या नहीं हुआ जाए इसकी बहस शुरू करने से अधिक महत्वपूर्ण और उपयुक्त इस पर चर्चाओं की शुरुआत करना होगा कि भविष्य में हम क्रांति के भू-आयामी मोर्चों की लामबंदी और मोर्च की शुरुआत  कर सकेंगे या नहीं. सरकार में शामिल होने या नहीं होने के प्रश्न से अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि हम क्रांतिकारी ताकतों और प्रतिक्रियावादी ताकतों का तीखा धुर्वीकरण कर पाने में सक्षम होंगे या नहीं.
सरकार में शामिल होने या नहीं होने का प्रश्न सैद्धांतिक प्रश्न नहीं है. यह एक रणकौशलात्मक प्रश्न है. यदि सरकार में शामिल होने से हमें भावी क्रांति को आगे बढाने में सहायता मिलती है, इससे जनतंत्र को हासिल करने का मार्ग प्रशस्त होता है, राष्ट्रवाद  के संघर्ष में जीत सुनिश्चित होती है या इससे क्रांति, नवजनवादी क्रांति की दिशा में एक कदम आगे बढ़ती है, तो सरकार में भागीदारी करना सही है, अन्यथा ऐसा करना गलत होगा. यदि हम क्रांति की नई योजना, नीति और कार्यक्रम बनाने और बदली हुई परिस्थितियों के अनुरूप नई राजनितिक  एवं सैन्य लाइन के निरुप्पन में असफल रहते हैं तो हम सरकार में शामिल नहीं होने पर भी क्रांति को आगे नहीं बढा सकते हैं. यदि हम सरकार में रहते हुए भी वर्ग संघर्ष को धारदार और तेज कर सकते हैं, तो हम क्रांति के मार्ग पर आगे बढ़ सकते हैं. अंग्रेजी से अनुवाद : संदीप शर्मा

अगली कड़ी में :

नेकपा (माओवादी) के विदेश ब्यूरो के सदस्य लक्ष्मण पन्त के ऊपर प्रकाशित लेख के मूल्यांकन से गंभीर मतभेद रखता हुआ आलोक रंजन का लेख भी हम प्रकाशित कर रहे हैं. पाठकों को याद दिला दें कि ‘बिगुल’ के मई ‘०८ और जून ‘०८  के अंकों में हमने नेपाल के कम्युनिस्ट  आन्दोलन के इतिहास के मूल्यांकन और नेपाली क्रांति की संभावनाओं-समस्यायों पर केंद्रित लेख दो किश्तों में छापा था. नेकपा (माओवादी) के वरिष्ठ नेता कॉ. बाबूराम भट्टराई का साक्षात्कार भी मई ‘०८ के अंक में प्रकाशित हुआ था. इस लेख को उसी की निरंतरता में, तथा उसी परिप्रेक्ष्य में रखकर पढ़ा जाना चाहिए. नेपाली क्रांति का प्रश्न दुनिया भर के कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों के सरोकार और चिंता से जुडा हुआ है. वहां होने वाले हर घटनाविकास का बारीकी से अध्ययन-विश्लेषण क्रांति की सैद्धांतिक-व्यवहारिक समस्याओं को समझने के लिए जरूरी है. इस दृष्टि से हम समझते हैं कि इन लेखों के प्रकाशन से एक सार्थक बहस की शुरुआत हो सकेगी. हम नेपाल और भारत के कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों से तथा वाम बुद्धिजीवियों से इस बहस में भागीदारी का अनुरोध करते हैं.

–संपादक ‘बिगुल’ .

नेपाली क्रांति किस ओर?–यहाँ देखें

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One thought on “नेपाल–बहस के लिए

    संदीप said:
    October 11, 2008 at 8:46 PM

    साथियो,

    आपके इन प्रयासों को देखकर वाकई दिली खुशी हो रही है।
    निरंतरता बनाए रखिएगा।

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