कामरेड अरविन्द जीवित रहेंगे हमारे संकल्पों में!-1

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दूसरी कड़ी

वह हममें से ही एक था जो सहसा हमसे दूर चला गया, और बन गया

हमारे आदर्शों संकल्पों का एक प्रतीक चिन्ह, हमें प्रेरित करता हुआ

एक अक्षय उर्जा स्त्रोत!

कभी-कभी सोचने पर यह भी एक अजीब सी बात लगती है कि हम रोज-रोज अपने किसी एक साथी के साथ जीते हैं, यात्रा करते हैं, मीटिंगें करते हैं, रात-रात भर गप्पें मारते हैं, लड़ते झगड़ते हैं, गंभीर आलोचनाएँ करते-सुनते हैं, सहमत-असहमत होते हैं, आन्दोलन और प्रचार करते हैं…… वह हमारे बीच से होता है और फिर अचानक एक दिन वह हमारे बीच नहीं होता, वह सदा के लिए हमसे बिछड़ जाता है, दूर चला जाता है| हम अवसन्न हो जाते हैं, किंकर्तव्यविमूढ़ता और आश्चर्य मिश्रित शोक से विह्वल, और फ़िर एक तूफ़ान से उभरने की कोशिश करते हुए महसूस करते हैं कि वह हमारे लिए क्या था, वह उनके लिए क्या था जिनके बीच वह जिया, वह उनके लिए क्या था जिनके लिए वह जिया और मरा| और फ़िर वह एक आम मनुष्य नहीं रह जाता, वह हमारी स्म्रितियों में जगह बनाता हुआ हमारे आदर्श-पुंज, हमारे विचार-पुंज और हमारे अदृश्य-अबूझ उर्जा स्त्रोत का एक हिस्सा बन जाता है| हम आदिम मनुष्य के उस कबीले जैसा कुछ-कुछ महसूस करते हैं, जो अपने बीच के किसी व्यक्ति को खोने के बाद सामूहिक रूप से उसे याद करता है| लेकिन चूँकि हम आदिम मनुष्य नहीं हैं, इसलिए हम अपने उस प्रिय दिवंगत की स्मृति से मिथक का निर्माण नहीं करते| हमारा वह साथी हमारी आत्मिक धरोहर बन जाता है, हमारी आत्मिक संपदा और शक्ति का हिस्सा बन जाता है| एक भौतिक शक्ति के र्रूप में वह अब भी हमारे साथ होता है| अब वह एक मनुष्य से एक प्रतीक चिन्हः में रूपांतरित हो जाता है, परचम पर अंकित एक निशान बन जाता है, जिसे एक सच्चा क्रांतिकारी कभी भी अपने से जुदा नहीं कर सकता|

हो सकता है हमारा वह साथी इतिहास में दर्ज होने वाला कोई बड़ा नाम न हो|हो सकता है की भविष्य में उसके  ऐतिहासिक योगदान का मूल्यांकन किसी आम सैनिक की कब्र पर लगे शिलालेख के धुंधले पड़े अक्षरों जितना ही हो| पर उस साथी के साथ और उसकी जुदाई को उसके साथ जिये हुए और काम किए हुए लोग अन्तिम साँस तक  भला कैसे भूल सकते हैं? दूसरी बात, एक प्रतीक चिन्ह बन जाने के बाद, परचम पर अंकित एक निशान बन जाने के बाद, विद्रोहिओं की सांझा स्मृति के दस्तावेज में इन्द्राजी के बाद, वह साथी आने वाली पीढियों के बीच मौज़ूद रहता है, पूर्वजों की विरासत के अनगिन धागों-रेशों के साथ-साथ| वह पुरखों के कोठार के अनाज का एक दाना होता है| तीसरी बात, क्रान्तिकारी संघर्षों की छोटी-छोटी शुरुआतों के दौर में सहयोद्धाओं के छोटे-छोटे कारवां ही होते हैं| युद्ध का यह प्रारंभिक चरण कई मायनों में बेहद कठिन और अनूठा होता है| जो इस दौर में लड़ते हुए मृत्यु को वरण करते हैं, कुछ दशकों बाद उनके नाम भले भुला दिए जाएँ, पर ऐसी शहादतों को आने वाली पीढियाँ कभी नहीं भुला पातीं| ये “ठंडे समय की शहादतें हैं” जो नई बुनियाद डालने का काम करती हैं|

कॉ. अरविन्द के निधन से केवल नई समाजवादी क्रांति की अवधारणा की समर्थक क्रांतिकारी वाम प्रवृति को ही नहीं बल्कि पूरे भारत की क्रांतिकारी वाम धारा को गहरा धक्का लगा है| कॉ. अरविन्द के असामयिक देहांत से भारतीय क्रांतिकारी वाम आन्दोलन के नवनिर्माण एवम नवोन्मेष के जारी प्रयासों को गंभीर आघात लगा है| पूरे देश के कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों ने यह महसूस किया है कि बेहद कठिन समय में उन्होंने एक समर्पित, अनुभवी, योग्य और नेतृत्वकारी सेनानी खो दिया है| कॉ. अरविन्द के निधन के बाद, न केवल उनके वर्तमान और पूर्व कार्यक्षेत्रों- गोरखपुर, दिल्ली लुधियाना, मर्यादपुर आदि जगहों पर बल्कि पटना, रांची, गया, गोपालगंज आदि बिहार के विभिन्न स्थानों और बंगाल के विभिन्न स्थानों पर भी क्रांतिकारी वाम कार्यकर्ताओं, शुभचिंतक नागरिकों और मजदूरों ने शोक सभाएं की| पूरे देश के विभिन्न क्षेत्रों से शोक संदेशों के आने का सिलसिला अभी तक जारी है| नेपाल की क्रांतिकारी वाम धारा के विभिन्न संगठनों के साथ भी कॉ. अरविन्द का जीवंत संपर्क बना हुआ था और वहाँ के क्रांतिकारी आन्दोलन का अध्ययन  करने के काम में कुछ अन्य साथियों के साथ भी वे शामिल थे| नेपाल के विभिन्न क्रांतिकारी वाम संगठनों ने कॉ. अरविन्द के निधन पर गहरा शोक प्रकट किया है और इसे भारतीय क्रांतिकारी वाम आन्दोलन के साथ ही नेपाली वाम धारा और अन्तरराष्ट्रीय क्रांतिकारी कम्युनिस्ट आन्दोलन के लिए भी एक गंभीर क्षति बताया है|

पहली कड़ी

उनके सपने जीवित रहेंगे हमारे सपनों में!

परचम लहराता रहेगा,मशाल जलती रहेगी,यात्रा जारी रहेगी,

कामरेड अरविन्द तुमसे यह हमारा वायदा है!

कामरेड अरविन्द नहीं रहे. बोझिल कलम से निकले पत्थर जैसे भारी इन शब्दों पर हम अभी स्वयं विश्वास करने की कोशिश कर रहें हैं कि  कामरेड अरविन्द नहीं रहे.
विगत 24 जुलाई 2008 को गोरखपुर स्थित सावित्री नर्सिंग  होम में रात को लगभग 9.40 से 9.45 बजे के बीच उनका निधन हो गया. विगत कुछ दिनों से उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं चल रहा था और बीच-बीच में बुखार आता रहता था. थायरायड  की समस्या उनको पहले से ही थी. लगभग एक सप्ताह से वे वायरल बुखार से पीड़ित थे और उसके लिए दवाएं ले रहे थे. 23 जुलाई को बहुत अधिक कमजोरी महसूस होने और साँस लेने में दिक्कत  होने पर साथियों ने उन्हें डॉ. अजीज अहमद के नर्सिंग होम में दाखिल कराया. वहां साँस लेने की दिक्कत बढती गई. पता चला की फेफडे और श्वास नली में गंभीर संक्रमण के कारण दिल पर बहुत अधिक दबाब पड़  रहा है. डॉक्टर कुछ समझ पाते तब तक उन्हें दिल का दौरा पड़ चुका था.जाँच से पता चला कि गुर्दे भी काम करना बंद कर चुके हैं और आंतों में भी संक्रमण है. डॉक्टरों के अनुसार, अब बाहर कहीं ले जाना सम्भव नहीं था. फ़िर उन्हें स्थानीय सावित्री नर्सिंग होम ले जाया गया, जहाँ डायलिसिस की सुविधा थी. लेकिन डायलिसिस शुरू होने से ठीक पहले, एक के बाद एक, दिल के दो दौरे  थोड़े ही समय के अन्तराल पर पड़े और हमारा कामरेड हमसे हमेशा लिए विदा हो गया.

ठंडे-बेरहम समय के विरुद्ध जारी संघर्ष में एक शहादत : लहू है कि

तब भी गाता है!

मर्त्यु से हर क्रांतिकारी का एक करार होता है और उस करार के मुताबिक, ज्यादातर मामलों में दोनों का मिलना आकस्मिक-असामयिक ही होता है.  फ़िर भी इतना अप्रत्याशित भी कुछ हो सकता है, हममें से किसी भी ने कल्पना तक नहीं की थी.एक कठिन जद्दोजहद भरी खोजी यात्रा के बाद, जब हम नई योजनाओं के ब्लू-प्रिंट्स को अन्तिम रूप दे रहे थे, जब हम जन-मुक्ति परियोजनायों के बारे में अपनी सोच को प्रयोगों में उतारकर सत्यापित और विकसित करने की एक नई योजना हाथ में ले रहे थे, जब हम रूढ़ मताग्रहों और “मुक्त चिंतन” से मुक्त क्रांतिकारी  सहयात्रियों के साथ नई सर्वहारा क्रांति के स्वरूप और समस्याओं पर संवाद का एक नया चक्र शुरु कर रहे थे, ठीक ऐसे ही समय में नेतृत्व  के एक सबसे अनुभवी और सबसे महत्वपूर्ण साथी का यूँ इस तरह हमारे बीच से चले जाना एक ऐसा वज्राघात है,जिससे उभरने में,तमाम संकल्पों के बावजूद, निश्चय ही, हमें कुछ समय लगेगा. ज़िन्दगी लड़ती रहेगी, कारवां चलता रहेगा, हमसे विदा लेने वाले साथियों  का स्थान नए साथी लेते रहेंगे , फ़िर भी कठिन और ठंडे समय की कुर्बानियों और शहादतों को झेल पाना आसान नहीं होता. क्रांतिकारी उभार के मुकाबले ठंडे, गतिरोध भरे दिनों में जूझना और कुर्बानी देना कहीं अधिक कठिन होता है और दुर्लभ भी.

हम एक ऐसे ही समय में जी रहे हैं जब गरिमामय शब्द भी अर्थस्फिती के शिकार हैं, क्रांति की लहर पर प्रतिक्रान्ति की शीतलहर  हावी है, ‘इतिहास कें अंत’ और ‘क्रांति के महाख्यनों के विघटन’ के शोरगुल के बीच, क्रांतिकारी जमातें भी “मुक्त चिंतन और अकादमिक विमर्श से प्रभावित हो रहीं हैं और साथ ही, पुराणी गल्तियाँ भी दुहराई जा रही हैं, कभी हू-ब-हू तो कभी  नए-नए रूपों में. प्रतिक्रिया का यह हिमयुग श्रम और पूँजी के शिविरों के बीच जारी विश्व-ऐतिहासिक महासमर के दो चक्रों के बीच का अन्तराल, जब सही क्रांतिकारी विचार और समझौताहीन संघर्ष की आग को जीवित रखने के लिए क्रांतिकारियों की छोटी -सी, बची हुई जमात को असाध्य जीवन जीना पड़ता है और अकूत कुर्बानियां देकर भविष्य-निर्माण के लिए नींव का पत्थर बनना पड़ता है. कामरेड अरविन्द का जीवन ऐसा ही जीवन था और उनका निधन ऐसी ही कुर्बानी थी. यह ‘ठंडे समय की शहादत’ थी.

कामरेड अरविन्द नें मात्र चौवालिस वर्षों  का छोटा-जीवन पाया जिसमें से चौबीस वर्ष उन्होंने भातीय मेहनतकश जनता के मुक्ति-महासमर में लगा दिये. विशेष तौर पर, जीवन के आखिरी दस-बारह वर्षों के दौरान, उन्होने दिन-रात एक करके क्रांतिकारी कतारों की भरती एवं तैयारी के लिए काम किया, जनता के बीच प्रचारात्मक एवं अन्दोलानात्मक काम किए तथा विश्व  सर्वहारा क्रांति के ऐतिहासिक अनुभवों के समाहार और भारतीय सर्वहारा  क्रांति  की प्रकृति  एवं समस्यायों पर जारी शोध-अध्ययन में अहम भूमिका निभाई. ‘नए सर्वहारा पुनर्जागरण और नए सर्वहारा प्रबोधन ‘ की  अवधारणा विकसित करने तथा भारत में संभावित समाजवादी क्रांति की नई युगीन विशिष्टताओं का अध्ययन करके उसे ‘नई समाजवादी क्रांति’ नाम देने के औचित्य-प्रतिपादन में कॉ. अरविन्द की अहम भूमिका थी. आज से पन्द्रह वर्षों पहले हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि विशेषकर महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रांति के सिद्धांत  और प्रयोग के रूप में माओ का जो ऐतिहासिक अवदान है, उसे देखते हुए  माओ के विचारों को माओ विचाधारा की बजाय माओवाद कहा जाना चाहिए. इस निष्कर्ष  तक पहुंचनें में भी कॉ. अरविन्द ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. मज़दूर वर्ग के राजनितिक अख़बार के रूप में ‘बिगुल’ के प्रकाशन की सोच और उसके अमल में कॉ. अरविन्द की अग्रणी भूमिका थी. ‘दायित्वबोध’ के संपादन के साथ-साथ शुरू से ही वे ‘बिगुल’ के न केवल एक नियमित लेखक थे बल्कि अनौपचारिक तौर पर उसके संपादन से भी जुड़े हुए थे. इसके अतिरिक्त वे छात्रों-युवाओं की पत्रिका ‘आह्वान’ में भी न केवल नियमित लिखते थे, बल्कि उसके संपादकों के मार्गदर्शक सलाहकार की भी भूमिका निभाते थे. पिछले अठारह वर्षों के दौरान कॉ. अरविन्द ने गोरखपुर, लखनऊ, सुल्तानपुर, बड़हलगंज, मर्यादपुर, वाराणसी, दिल्ली और नोएडा जैसे कई  कार्यक्षेत्रों में छात्र-युवाओं,ग्रामीण मेहनतकशों और शहरी मजदूरों के मोर्चों पर काम किया, पंजाब में जुड़ने  वाले साथियों का मार्गदर्शन एवं नेतृत्व किया, दिल्ली में रहते हुए हरियाणा में छात्रों-नौजवानों के बीच क्रांतिकारी कामों की शुरुआत की, ‘दिल्ली जनवादी अधिकार मंच’ पर  भी सक्रिय रहे और साम्राज्यवाद-विरोधी संयुक्त मोर्चे और जनकार्रवाइयों में भी शिरकत करते रहे तथा समझौताहीन ढंग से अपना स्टैंड रखकर संघर्ष करते रहे. इस दौरान उन्होंने क्रांतिकारी कतारों में बड़े  पैमाने पर नई भरती की और उन्हें शिक्षित-प्रशिक्षित  किया.

विशेषकर, पिछले पांच-छह वर्षों के दौरान, नई समाजवादी क्रांति  की धारा के भीतर से समाजिक जनवाद, अर्थवाद, ट्रेडयूनियनवाद  और “मार्क्सवादी” नरोदवाद के भटकाव  तथा मध्यवर्गीय घोंसलावाद, अवकाश-वृत्ति एवं विविध पतनशील प्रवृतियाँ सिर उठाती रही हैं. इनके विरुद्ध समझौताहीन,निर्मम संघर्ष करने और इन्हें उखाड़ फेंकने में कॉ.अरविन्द की अग्रणी भूमिका रही. निजी जीवन में कॉ. अरविन्द एक उदार एवं सहृदय व्यक्ति थे. निजी शत्रुता या प्रतिशोध उनकी प्रवृति नहीं थी. लेकिन वे उदारतावादी कतई नहीं थे.वे बोल्शेविक संस्कृति के कट्टर हिमायती थे और विजातीय प्रवृतियों के विरुद्ध समझौताहीन, निर्णायक संघर्ष करते थे. ऐसे संघर्षों में एकाधिक  बार ऐसा हुआ कि उन्होने निजी मित्रता के रिश्तों  तक की कोई परवाह नहीं  की. पिछले कुछ वर्षों से ,ग्रास रूट स्तर की आन्दोलनात्मक कार्रवाइओं, सिद्धान्तिक शोध-अध्ययन के कार्यों और क्रांतिकारी वाम धारा के कुछ निकटस्थ संगठनों से संपर्क-संवाद के कामों में दिन-रात व्यस्त रहते हुए विभिन्न विघटनकारी विध्वंसक तत्वों और भगाडों-गद्दारों  की षड्यंत्रकारी गतिविधियों के विरुद्ध भी कॉ. अरविन्द लगातार सक्रीय थे. ऐसे में कोई भी राजनितिक कार्यकर्त्ता उनकी दिन-रात की व्यस्तता की सहज ही कल्पना कर सकता है. अस्वस्थता के दौर आते थे और कामचलाऊ  इलाज करके वे काम में जुट जाते थे. साथी बीच-बीच में उन पर लगकर इलाज कराने का दबाब भी बनाते थे. पर हर बार उनके पास किसी आसन्न काम के दबाव का तर्क होता था और फ़िर यह वायदा, कि फुर्सत मिलते ही पूरा चेकअप कराएँगे. जो हमसफ़र हैं, उनके लिए आज यह समझना कठिन नहीं है कि मुश्किल समय की दुर्निवार व्यस्तताएं और भर्ष्ट विपथगामियों की विध्वंसक गतिविधियाँ कॉ. अरविन्द की सेहत पर किस कदर भारी पड़ी. लेकिन जब यह प्रक्रिया जारी थी तो इसका अहसास न कॉ. अरविन्द को था और न ही हम सभी को. इसे एक सच्चे क्रांतिकारी जीवन की साझा त्रासद विडम्बना के अतिरिक्त भला और क्या कहा जा सकता है? इस लिए कॉ.अरविन्द के निधन को हम आज के “ठंडे समय की शहादत” की संज्ञा दे रहे हैं.
हम एक ऐसे ठंडे और बेरहम समय में जी रहे हैं, जब सर्वहारा  क्रांतिकारियों को अपने बोलेश्विक उसूलों पर दृढ़ रहने की कीमत कई रूपों में चुकानी होगी. कॉ.अरविन्द ने यही कीमत चुकाई और उन्हें खोकर उनके साथियों  ने भी यही कीमत चुकाई. बीसवीं शताब्दी की सर्वहारा  क्रांतियों की पराजय के बाद का दिक् काल परिवेश किसी भीषण युद्ध के बाद की रात में रणक्षेत्र के द्रश्य जैसा है जब वीर योद्धाओं के शवों और घायलों को वे कायर लुटेरे टटोल और लूट-खसोट रहे होते हैं जो दिन के उजाले में जारी युद्ध के दौरान या तो झाडियों में छिपे बैठे थे या फ़िर उस युद्ध के भगाडे सैनिक थे. ये ही वे लुटेरे हैं जो घोंसलों में बैठे “सिद्धांतों” की दुर्गन्ध छोड़ रहे हैं, “मुक्त चिंतन ”  कर रहे हैं, विगत क्रांतियों पर न्याय-निर्णय दे रहे हैं या मात्र कुत्सा-प्रचार करके अनास्था की लहर पैदा करने की कोशिश कर रहे है. वोरोंस्की के एक आलोचनात्मक लेख की शुरुआत लडाई के बाद की एक ऐसे रात के चित्रण  से होती है. आज के राजनितिक परिवेश से जोड़ते हुए कॉ. अरविन्द अक्सर लेख के उस हिस्से की चर्चा करते थे और हर  बार हमारी बातचीत का समापन इस बात से होता था कि सही राजनितिक लाइन है या नहीं और उसे लागू करने वाली क्रांतिकारी शक्ति है या नहीं.
जो धारा के विरुद्ध तैरते हैं वे अध्ययन-कक्षों से दिये गए निर्णयों, घर की मुंडेर पर चढ़कर दिये गए फतवों और अफवाहों-कुत्सा-प्रचारों पर कान नहीं देते. कॉ.अरविन्द अपनी पसंदीदा कविताएँ साथियों को अक्सर सुनाते थे. पाश की ये पंक्तियाँ भी वे बार-बार सुनाते थे :

हमारे लहू को आदत है
मौसम नहीं देखता, महफ़िल नहीं देखता
जिंदगी के जश्न शुरू कर देता है
सूली के गीत छेड़ देता है

शब्द हैं कि पत्थरों पर बह-बहकर घिस जाते हैं
लहू है कि तब भी गाता है
जरा सोचो कि रूठी सर्द रातों को कौन मनाये?
निर्मोही पलों को हथेलियों पर कौन खिलाये?
लहू ही है जो रोज़ धाराओं के होंठ चूमता है
लहू तारीख की दीवारों को उलाँघ आता है
यह जश्न यह गीत किसी को बहुत हैं–
जो कल तक हमारे लहू की खामोश नदी में
तैरने का अभ्यास करते थे.

…….अगली किश्त में जारी

1….नए समाज के निर्माण के संघर्ष में उनकी समझ एवं दृढ़ता हमारे साथ रहेगी :अनिल चमड़िया

2…जिनकी कलम जनता के पक्ष में चली

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